उत्तर प्रदेश में आकाश आनंद की बहुजन समाज पार्टी में वापसी हो गई है। पहली बार 2019 से शुरू हुई आकाश की सियासी पारी परवान चढ़ने से पहले ही हिचकोले खाती रही है। राजनीति भले ही उन्हें विरासत में मिली हो लेकिन बुआ मायावती की कसौटी पर खरा उतरना उनके लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती रही है। कभी अपरिपक्व तो कभी अपनी ससुराल के कारण आनंद को बुआ की नाराजगी झेलनी पड़ी। आखिरकार काफी ऊहापोह की स्थिति से जूझने के बाद उनकी बसपा में वापसी तो हो गई है लेकिन प्रदेश के सत्ता गलियारे में सवाल तैरने लगा है कि क्या आकाश आनंद मायावती की कसौटी पर अब खरे उतर पाएंगे? मायावती खुद इस समय सियासी तौर पर संघर्ष करती दिख रही हैं। पिछले एक दशक में बसपा सुप्रीमो को हर तरफ सिर्फ हार ही झेलनी पड़ी है। 2014 में शून्य के बाद बसपा 2017 के यूपी चुनाव में 19 सीट, 2019 लोकसभा चुनाव में 10 सीटें, 2022 यूपी चुनाव में सिर्फ एक सीट और 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी फिर से शून्य पर खड़ी है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि बसपा संगठन के लिहाज से भले ही राष्ट्रीय पार्टी हो लेकिन उसका सबसे बड़ा गढ़ उत्तर प्रदेश में टूट चुका है। पहले भाजपा ने उसके गैर जाटव वोटबैंक में सेंध लगाई, अब अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने भी मायावती के कई करीबी नेताओं को तोड़कर दलित वोट बैंक पर निशाना साध रखा है। ऐसे में आकाश आनंद को जहां एक तरफ मायावती की कसौटी पर खरा उतरना है, वहीं दूसरी तरफ बसपा को दोबारा खड़ा करने की बड़ी चुनौती से पार पाना आसान नहीं है। बसपा की सबसे बड़ी चुनौती ये है कि पार्टी में पुराने नेता अब गिनती के हैं और नई पौध यानी युवा कार्यकर्ताओं की भारी कमी है। हालांकि बसपा ने इसे देखते हुए बहुजन वाॅलंटिअर फोर्स खड़ी करने की रणनीति बनाई है। लेकिन सवाल अभी भी यही है कि क्या आकाश आनंद को ‘खुलकर खेलने’ का मौका मिल पाएगा? गौरतलब है कि 2019 में मायावती ने उत्तराधिकारी के तौर पर आकाश आनंद को पेश किया था। तब आकाश को राष्ट्रीय समन्वयक नियुक्त किया गया था। आकाश के पार्टी में शामिल होने का असर भी दिखने लगा था और बसपा एक्स से लेकर फेसबुक और यूट्यूब जैसे आॅनलाइन प्लेटफाॅर्म पर भी एक्टिव दिखने लगी थी। ऐसा लगा कि मायावती अब धीरे-धीरे एक्टिव पाॅलिटिक्स से दूर हो जाएंगीं और आकाश ही आगे बढ़ेंगे। लेकिन 2024 के घटनाक्रम ने कहानी पलट दी। लोकसभा चुनाव का वो दौर था जब आकाश अपने फायरब्रांड भाषणों से सुर्खियां बटोर रहे थे। इस बीच उनके सीतापुर में दिए गए एक भाषण पर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज हो गया। इसके बाद अचानक मायावती का फरमान आ गया। उन्होंने आकाश को राष्ट्रीय समन्वयक पद से हटाते हुए तर्क दिया कि अभी उन्हें और परिपक्व होने की जरूरत है। अब एक बार फिर से आकाश को मायावती ने सक्रिय तो कर दिया है लेकिन उनकी वापसी की बसपा के कोर वोट बैंक को खास उत्साहित कर पाने में हाल-फिलहाल सफल होती नजर नहीं आ रही है।
कसौटी पर खरे उतर पाएंगे आकाश?

