Uttarakhand

पार्टी एक सुर अनेक

उत्तराखण्ड कांग्रेस के दबंग छवि वाले नेता रंजीत रावत पर रामनगर स्थित एक गोदाम को कब्जाने का आरोप कुछ माह पूर्व सामने आया था। यह विवाद गत् दिनों तब चरम पर जा पहुंचा जब पुलिस बल ने मौके पर से कब्जा हटवा दिया। 2002 में पहली बार सल्ट से विधायक चुनकर आए रंजीत रावत कांग्रेस नेता हरीश रावत के ‘खासमखास’ या कहें ‘हनुमान’ कहे जाते थे। राजनीति की पहली सीढ़ी कांग्रेस से शुरू कराने से लेकर सचिवालय के चतुर्थ तल पर ताकतवर बनाकर रंजीत रावत को बैठाने वाले हरीश रावत ही थे। अपनी राजनीति के शुरुआती दौर से लेकर मुख्यमंत्री बनने तक हरीश रावत ने अपने आस-पास एक ऐसे समूह को भी प्रश्रय दिया जिसने हरीश रावत के साथ कांग्रेस की राजनीति को भी नुकसान किया। 2016 में हरीश रावत की सरकार का गिरना, एक बड़ा दलबदल होना शायद सचिवालय की चैथी तल पर बनी शक्तिपीठ के अहंकार का प्रभाव था जिसने हरक सिंह रावत, यशपाल आर्य, डाॅ. इंदिरा हृदयेश, सतपाल महाराज सरीखे नेताओं को कमतर आंकना शुरू कर दिया था। बहरहाल, इस कार्यवाही के विरोध में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष करण माहरा के नेतृत्व में कई वरिष्ठ कांग्रेसी धरने पर जा बैठे तो पूर्व सीएम हरीश रावत और उनके करीबी इससे दूर रहे। 2027 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस भीतर चल रही जंग संकेत दे रही है कि ‘ऑल इज नाॅट वेल’

राजनीति अगर शून्य से शिखर तक जाने का सफर है तो शिखर से शून्य तक जाने का चक्र भी इसी राजनीति का हिस्सा है। बहुत कम राजनेताओं को अपने राजनीतिक जीवन में स्थिरता का अवसर मिलता है वरना राजनीति किसी भी राजनीतिज्ञ के लिए उतार-चढ़ाव का सफर रहता है। हां, राजनीतिक जीवन के दौर में एक अवसर जरूर आता है जब समय उसका मूल्यांकन करता है कि उसने अपने राजनीतिक जीवन के सफर में सत्ता का हिस्सा रहते स्वयं को सौम्य बनाए रखा या फिर सत्ता की ताकत के अक्खड़पन में खुद को संवैधानिक सत्ता के समानांतर एक और सत्ता का केंद्र बना डाला जिसने कई राजनीतिक सम्भावनाओं को परवान चढ़ने से पहले ही निस्तेज कर दिया।

अभी हाल में रामनगर के कांग्रेस कार्यालय का विवाद उन घटनाओं का साक्षी बना जिसने कई नेताओं को आईना दिखाया। इस सबके केंद्र में थे सल्ट से पूर्व विधायक रहे रंजीत रावत जिनका रामनगर के ही एक व्यापारी से कांग्रेस के कथित कार्यालय पर विवाद चल रहा था। 13 मई की घटना ये दिखाने के लिए पर्याप्त थी कि वर्तमान में चल रही सत्ता का रसूख ही चलता है भले ही आप अपने समय में कितने ताकतवर रहे हों। रामनगर के रानीखेत रोड स्थित कांग्रेस के कथित कार्यालय के विवाद को कांग्रेस के नजरिए से भी आंका जा सकता है कि कांगे्रस अध्यक्ष करण माहरा, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, हल्द्वानी विधायक सुमित हृदयेश, जसपुर विधायक आदेश चैहान, खटीमा विधायक और उपनेता प्रतिपक्ष भुवन कापड़ी, पूर्व विधायक संजीव आर्य समेत कांग्रेस का बड़ा अमला रंजीत रावत के समर्थन में धरना देने पहुंच गया। जनता की समस्याओं में इस तरह की एकजुटता से बचने वाली कांग्रेस इस मुद्दे पर लम्बे समय बाद एकजुट दिखी। जबकि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के 2022 में दोबारा सत्ता सम्भालने के बाद कांगे्रेस जमीन पर संघर्ष करती नहीं दिखी है। यह प्रकरण यशपाल आर्य के विवेक पर तो सवाल खड़े करता ही है, साथ ही एक सवाल और है कि अतिक्रमण के नाम पर लोगों के घरों पर चल रहे बुल्डोजरों के विरोध में क्या कभी कांग्रेसी ऐसे जुटे जैसे वो रामनगर में कांग्रेस कार्यालय में कथित कब्जे के विरोध में जुटे।

बताया जाता है कि 2017 में विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस नेता रंजीत रावत ने व्यापारी नीरज अग्रवाल से चुनाव कार्यालय बनाने के लिए उनका गोदाम दो माह के लिए किराए पर लिया था। दो माह की अवधि बीत जाने के बाद भी रंजीत रावत ने उस गोदाम को खाली नहीं किया। नीरज अग्रवाल का कहना है कि उन्होंने कई बार गोदाम खाली करने को कहा लेकिन उनका गोदाम खाली नहीं किया गया। पिछले कुछ वर्षों से गोदाम मालिक और रंजीत रावत के बीच गोदाम खाली करने के विषय में विवाद होने लगा था। पिछले अक्टूबर में भी एक बार विवाद की स्थिति बनी थी। लेकिन इस बार कांग्रेस कार्यालय हटाकर नीरज अग्रवाल अपने गोदाम पर फिर काबिज हो गए।

रामनगर की इस घटना के समय पुलिस से जूझते रंजीत रावत दिखे। क्या उनकी साख पर यह धक्का था या फिर यह 2014 से 2017 तक हरीश रावत के मुख्यमंत्रित्वकाल में सचिवालय के चैथे तल से हासिल हुई ताकत को भी एक धक्का था? 2002 में पहली बार सल्ट से विधायक चुनकर आए रंजीत रावत कांग्रेस नेता हरीश रावत के ‘खासमखास’ या कहें ‘हनुमान’ कहे जाते थे। राजनीति की पहली सीढ़ी कांग्रेस से शुरू कराने से लेकर सचिवालय के चतुर्थ तल पर ताकतवर बनाकर रंजीत रावत को बैठाने वाले हरीश रावत ही थे। अपनी राजनीति के शुरुआती दौर से लेकर मुख्यमंत्री बनने तक हरीश रावत ने अपने आस-पास एक ऐसे समूह को भी प्रश्रय दिया जिसने हरीश रावत के साथ कांग्रेस की राजनीति को भी नुकसान किया। 2016 में हरीश रावत की सरकार का गिरना, एक बड़ा दलबदल होना शायद सचिवालय की चैथी तल पर बनी शक्तिपीठ के अहंकार का प्रभाव था जिसने हरक सिंह रावत, यशपाल आर्य, डाॅ. इंदिरा हृदयेश, सतपाल महाराज सरीखे नेताओं को कमतर आंकना शुरू कर दिया था। कांग्रेस की 2016 में रही एक वरिष्ठ नेत्री की मानें तो उस वक्त उनकी विधानसभाओं के प्रस्ताव उनसे रंजीत रावत के मााध्यम से मांगे जाते थे। उनका मानना था कि अगर चतुर्थ तल से चल रही समानांतर सरकार को हल्का नहीं किया गया तो कांग्रेस भरभराकर बिखर जाएगी जो 2017 के विधानसभा चुनाव में सच साबित हुआ। 2002 और 2007 में सल्ट से विधायक चुने जाने के बाद 2012 में सल्ट से रंजीत रावत की हार ने उन्हें राजनीतिक रूप से सल्ट से पलायन करना पड़ा और वो अपने लिए
राजनीतिक जमीन तलाशने रामनगर आ गए। लेकिन उनको रामनगर की कांग्रेस ने दिल से स्वीकार नहीं किया उसमें उनके अक्खड़ स्वभाव का भी हाथ रहा। इसमें कोई दो राय नहीं कि रंजीत रावत के विधायक बनने के बाद सल्ट ने कई दशकों से रूकी विकास की गाड़ी को एक नई रफ्तार दी। उनके व्यक्तिगत व्यवहार ने उन्हें रामनगर से कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी बना तो दिया लेकिन वो फिर नाकामयाब रहे। 2022 के विधानसभा चुनाव से ऐन वक्त पहले कांग्रेस में टिकट वितरण के चलते जो हंगामा हुआा उसने उन्हें फिर से सल्ट जाने को मजबूर होना पड़ा। लेकिन सल्ट के मतदाताओं ने उन्हें फिर से स्वीकार नहीं किया। 2022 की हार के बाद रंजीत रातव रामनगर की राजनीति में अपना सिक्का जमाने की हर सम्भव कोशिश कर रहे हैं लेकिन कांग्रेस का एक बड़ा धड़ा उनके खिलाफ है।

नगर निकाय चुनाव में वो अपने पसंद के व्यक्ति को अध्यक्ष का टिकट दिलवाना चाहते थे लेकिन विवाद के चलते कांग्रेस ने यहां प्रत्याशी न घोषित कर इसे ओपन सीट कर दिया। रंजीत रावत की ओर से यहां महेंद्र पाण्डे आौर कांग्रेस के दूसरे गुट के प्रत्याशी हाजी अकरम थे। उसमें हाजी अकरम बााजी मार ले गए। इस बार कांग्रेस कार्यालय प्रकरण में जिस प्रकार रंजीत रावत को बैकफुट पर जाना पड़ा उससे लगता है ‘समय बड़ा बलवान’ सरीखी कहावतें सच जान पड़ती हैं। कभी सुपर सीएम की उपाधि पाए रंजीत रावत जो कभी अकेले लड़ने की ताकत रखते थे उन्हें एक कांग्रेस कार्यालय विवाद में कांग्रेस के पूरे अमले को आगे लाना पड़ता है। 2027 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस के अंदर जिस प्रकार रणनीतिक तैयारियां चल रही हैं उसमें रामनगर प्रकरण ने कांग्रेस की छवि को एक हद तक नुकसान पहुंचाया है। इसने प्रदेश अध्यक्ष करण माहरा, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य सहित उन तमाम विधायकों और नेताओं की राजनीतिक परिपक्वता पर भी सवाल उठा दिए हैं। व्यक्तिगत विवाद के साथ कांग्रेस पार्टी को जोड़ देना किसी के गले नहीं उतरा। नगर पालिका अध्यक्ष हाजी अकरम ने इसे निजी लड़ाई बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इस पर टिप्पणी करने से पहले इनकार करते हुए इतना जरूर कहा कि किसी की सम्पत्ति पर कब्जा करने की कांग्रेस की संस्कृति नहीं है। इस विवाद के बाद रंजीत रावत ने सरकार पर पक्षपात के आरोप लगाए। साथ ही उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से हरीश रावत पर निशाना साधते हुए कहा कि उनके खिलाफ पार्टी में स्लीपर सेल सक्रिय हैं। जिस प्रकार हरीश रावत ने अपनी सक्रियता बढ़ाई है उससे कांग्रेस का एक बड़ा तबका परेशान है। हरीश रावत की सक्रियता का असर रामनगर प्रकरण के बाद रामनगर कांग्रेस पर भी पड़ा है। जहां हरीश रावत समर्थक मुखर हो गए हैं। रामनगर प्रकरण में करण माहरा का पूरी पार्टी को रंजीत रावत के समर्थन में खड़े कर देना 2027 की लामबंदी की ओर इशारा जरूर करता है। इसमें लड़ाई रंजीत रावत के गुरु रहे हरीश रावत और करण माहरा के गुरु रंजीत रावत के बीच नजर आती है।

इस बाबत रंजीत रावत से फोन पर बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने बात करने से मना कर दिया। जबकि दूसरी तरफ गोदाम स्वामी नीरज अग्रवाल ने कहा कि मैंने अपना गोदाम उनको दो महीने के लिए दिया था। एक दिन जब मैंने कुछ सामान रखा तो उन्होंने विरोध किया, इस पर मैंने कहा कि मेरा गोदाम है तो मैं अपना सामान क्यों नहीं रख सकता? उन्होंने मुझसे गोदाम खाली करने के पैसे मांगे और धमकी भी दी।

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