कांग्रेस के भीतर आंतरिक कलह थम नहीं पा रही है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सात लोकसभा सीटों पर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी मिलकर चुनाव लड़ रही हैं। एक ओर जहां ‘आप’ अपने हिस्से की चार सीटों पर जमकर प्रचार-प्रसार में जुटी है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस की स्थिति यह है कि जब से कांग्रेस ने कन्हैया कुमार और उदित राज को टिकट दिया है, तब से पार्टी के कुछ नेताओं को यह रास नहीं आ रहा है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि दिल्ली में शीला दीक्षित के बेटे संदीप आम आदमी पार्टी के मुखर विरोधी रहे हैं लेकिन मौजूदा राजनीतिक हालात को देखते हुए उन्होंने ‘आप’ के खिलाफ जुबान बंद रखी। दिल्ली से चुनाव लड़ने की चाहत का दीक्षित ने खुलकर इजहार भी किया। उनकी नजरें कांग्रेस के हिस्से में आई उत्तर पूर्वी दिल्ली की सीट पर थीं, लेकिन आलाकमान ने यहां से जेएनयू की वामपंथी छात्र राजनीति से कांग्रेसी दायरे में शामिल हुए कन्हैया कुमार को उम्मीदवार बना दिया जिसे संदीप दीक्षित पचा नहीं पा रहे हैं। दूसरी तरफ उत्तर पश्चिमी दिल्ली से पार्टी ने जिस उदित राज को अपना उम्मीदवार बनाया है। उन्हें पार्टी के अंदरूनी हलके में खुलकर बाहरी उम्मीदवार बताया जा रहा है
लोकसभा चुनाव का पहले चरण का मतदान पूरा हो गया। अब 26 अप्रैल को दूसरे चरण का मतदान होना है। इस बीच दिल्ली में कांग्रेस पार्टी के भीतर आपसी मतभेद बढ़ते जा रहे हैं। दिल्ली में छठे चरण में यानी 25 मई को वोटिंग है। यहां लोकसभा की कुल सात सीटें हैं। कांग्रेस का आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन है। गठबंधन के तहत चार सीटों पर आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं और तीन सीटों पर कांग्रेस पार्टी चुनाव लड़ रही है। लेकिन आपसी खींचतान और विरोध की वजह से पार्टी का चुनाव प्रचार काफी ढीला नजर आ रहा है। पार्टी के अंदर के मतभेद भी खुलकर सामने आ रहे हैं। इससे पार्टी का बीजेपी से मुकाबला काफी कठिन लग रहा है। ऐसी चर्चा है कि कन्हैया कुमार और उदित राज की उम्मीदवारी से पुराने नेता और कार्यकर्ता नाराज हैं। यहां तक कि आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन से भी कांग्रेस के कुछ नेता नाराज हैं। इसी नाराजगी और बगावत को रोकने के लिए दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली ने गत् दिनों एक बैठक बुलाई थी। इस बैठक में दिल्ली कांग्रेस प्रभारी दीपक बाबरिया भी मौजूद थे। बैठक की शुरुआत होते ही नेताओं के बीच बहस शुरू हो गई।
असल में जब से कन्हैया कुमार और उदित राज को टिकट मिला है, तब से कांग्रेस के नेताओं को यह रास नहीं आ रहा और स्थानीय नेता इसको लेकर तरह-तरह की बयानबाजी करने में पीछे नहीं रह रहे हैं। जब स्थिति को संभालने और नेताओं के बीच आपसी तालमेल को लेकर बैठक बुलाई गई तो इस बैठक में नतीजा बेहतर होने के बजाए और खराब हो गया। आलम यह है कि उम्मीदवारों के ऐलान के बाद प्रदेश कांग्रेस के नेताओं की पहली बैठक काफी हंगामेदार रही। नाॅर्थ ईस्ट लोकसभा सीट के उम्मीदवार कन्हैया कुमार की इलाके के नेताओं के साथ बुलाई गई बैठक में नेताओं के बीच तीखी बहस हुई। यहां तक कि कांग्रेस के एक सीनियर नेता ने कन्हैया कुमार के लिए अपशब्द तक कहे, जिसके बाद बात और बिगड़ गई है। इस पूरे घटनाक्रम से नाराज कन्हैया कुमार बैठक से निकलकर चले गए।
बैठक के दौरान हुई तीखी बहस वाली बात को प्रदेश प्रभारी दीपक बाबारिया ने हालांकि खारिज किया है और कहा है कि ऐसी कोई बात नहीं हुई थी। बैठक में वरिष्ठ नेता संदीप दीक्षित भी पहुंचे, लेकिन वह मंच पर न जाकर पूर्व विधायकों और पदाधिकारियों के बीच बैठ गए। जब अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली ने उन्हें मंच पर बुलाया तो उन्होंने मना कर दिया। खुद कन्हैया कुमार ने भी उन्हें मंच पर आमंत्रित किया तो वे गुस्से में आ गए और कन्हैया की उम्मीदवारी पर अपना विरोध जताने लगे। उन्होंने कहा कि कन्हैया कुमार की उम्मीदवारी से कांग्रेस को उत्तर-पूर्वी सीट के साथ ही दिल्ली की अन्य सीटों पर भी काफी नुकसान होने वाला है।

सूत्रों की मानें तो जब संदीप दीक्षित ने कहा कि कन्हैया की उम्मीदवारी से कांग्रेस को भारी नुकसान होने वाला है, तब इस पर कन्हैया ने उन पर बीजेपी की भाषा बोलने का आरोप लगाया। जिस पर संदीप और भड़क गए और उन्हें अपशब्द कह डाले जिसके बाद दीपक और संदीप के बीच भी बहस हुई। बहस काफी तीखी रही जिसके बाद बैठक बिना नतीजा समाप्त करनी पड़ी।
राजनीतिक पंडितों का कहना है कि राजधानी दिल्ली में कांग्रेस और ‘आप’ भले ही मिलकर चुनाव लड़ रहे हों, लेकिन लगता नहीं कि दोनों ही दलों के जमीनी कार्यकर्ताओं के दिल मिल गए हैं। कांग्रेस में जहां अंदरूनी कलह दिख रही है, वहीं आम आदमी पार्टी का उभार कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ ही हुआ था। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान अरविंद केजरीवाल अक्सर तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भ्रष्टाचारी बताते हुए सत्ता में आने पर जेल भेजने का दावा करते थे। कांग्रेसी कार्यकर्ता उस बात को अब तक भूल नहीं पाए हैं।
शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित कहते भी रहे हैं कि अपनी मां के अपमान का बदला वे जरूर लेंगे। ऐलानिया तौर पर संदीप आम आदमी पार्टी के मुखर विरोधी रहे हैं लेकिन मौजूदा राजनीतिक हालात को देखते हुए उन्होंने आम आदमी पार्टी के खिलाफ जुबान बंद रखी। उन्होंने दिल्ली से चुनाव लड़ने की चाहत का खुलकर इजहार भी किया। उनकी नजरें कांग्रेस के हिस्से में आई उत्तर पूर्वी दिल्ली की सीट पर थीं, लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने यहां से जेएनयू की वामपंथी छात्र राजनीति से कांग्रेसी दायरे में शामिल हुए कन्हैया कुमार को उम्मीदवार बना दिया है जिसे संदीप दीक्षित पचा नहीं पा रहे हैं।

दूसरी तरफ उत्तर पश्चिमी दिल्ली से कांग्रेस ने जिन उदित राज को अपना उम्मीदवार बनाया है, वे 2014 में बीजेपी के टिकट पर दिल्ली से ही सांसद बने थे। यह बात और है कि 2019 में उनका टिकट कट गया तो वे बागी बन गए और बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए। उदित राज को भी कांग्रेस के अंदरूनी हलके में खुलकर बाहरी उम्मीदवार बोला जा रहा है। उनकी उम्मीदवारी को कांग्रेसी ही नहीं पचा पा रहे हैं। उनके बड़बोलेपन से भी कांग्रेसी परेशान हैं। दिल्ली के चुनाव में इंडिया गठबंधन के सामने दो तरह की चुनौतियां हैं। पहली चुनौती आप और कांग्रेस के बीच जमीनी स्तर पर तालमेल और सहयोग को लेकर है तो दूसरी चुनौती कांग्रेस का अपना अंदरूनी संकट है। कांग्रेस के अंदरूनी संकट का ही नतीजा है कि कन्हैया कुमार और उदित राज कांग्रेसी हलके को स्वीकार्य नहीं हो पा रहे हैं। दोनों नेताओं में एक समानता यह भी है कि दोनों की छवि अतिवादी विचारों की है।
पारंपरिक कांग्रेसी नेताओं को लगता है कि इनकी छवि के चलते इनके लिए समर्थन जुटाना आसान नहीं होगा। कन्हैया कुमार के जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष रहते हुए ही देश के टुकड़े होंगे वाली नारेबाजी हुई थी। कांग्रेसी नेताओं को लगता है कि कन्हैया कुमार पर इस नारे की छवि इतने गहरे तक अंकित हो चुकी है कि उनके लिए वोट हासिल कर पाना आसान नहीं होगा। बेशक दिल्ली पर जेएनयू छात्रसंघ चुनाव नतीजों का असर नहीं पड़ता, लेकिन दिल्ली में जेएनयू के होने की वजह से वहां होने वाली घटनाओं की जानकारी दिल्ली वालों को अन्य इलाके के लोगों की तुलना में ज्यादा ही है।
कांग्रेसी नेताओं को लगता है कि जैसे ही वे मैदान में उतरेंगे, बीजेपी के कार्यकर्ता और नेता ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे नारों की जनता को खूब याद दिलाएंगे। प्रचार में उतरे कांग्रेसी नेताओं के लिए उसका बचाव करना आसान नहीं है। स्थानीय कांग्रेसी नेताओं को लगता है कि संदीप दीक्षित अगर मैदान में होते तो वे कन्हैया की तुलना में ज्यादा प्रभावी होते। उनकी वजह से कांग्रेसी कार्यकर्ता भी मैदान में उतर जाते। दिल्ली में कांग्रेस विरोधी भी शीला दीक्षित के विकास कार्यों को नकार नहीं पाते। शीला दीक्षित के दिल्ली में अब भी समर्थक ज्यादा हैं। इसी तरह उदित राज को लेकर भी कांग्रेसी सहज नहीं हैं।
दिल्ली में इंडिया गठबंधन का दूसरा बड़ा संकट आम आदमी पार्टी और कांग्रेस में आपसी तालमेल का ना होना है। आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता कुछ साल पहले तक कांग्रेस के ही खिलाफ सड़कों पर उतरते रहे हैं, जिसे कांग्रेसी कार्यकर्ता अब तक भुला नहीं पाए हैं। दिलों की यह दूरी इतनी गहरी है कि जमीनी स्तर पर दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं का मन नहीं मिल पा रहा है। प्रत्याशियों और नेताओं के बीच भी कोई सामंजस्य नजर नहीं आ रहा। अलबत्ता उदित राज जरूर संजय सिंह से मिल आए हैं लेकिन इसका असर जमीनी स्तर पर प्रचार अभियान में नहीं दिख रहा है। कांग्रेसी कार्यकर्ता ही नहीं, आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता भी उदास हैं। इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता हुआ दिख रहा है। जिन चार सीटों पर आम आदमी पार्टी लड़ रही है, वहां सिर्फ उसके ही कार्यकर्ता सक्रिय हैं, जबकि कांग्रेसी हिस्से वाली तीन सीटों में से दो पर आपसी खींचतान ही जारी है। ऐसे में एक-दूसरे दलों के समर्थकों का वोट दोनों दल के कार्यकर्ता किस तरह अपने पक्ष में शिफ्ट करा पाएंगे, इसकी ना तो ठोस रणनीति नजर आ रही है और ना ही आपसी तालमेल।

