भाजपा की नगर निकाय चुनावों खासकर मेयर की ग्यारह में से दस सीटों पर जीत ने धामी के विषय में चल रही अफवाहों पर फिलहाल विराम लगा दिया है। जिस प्रकार हर चुनाव को प्रदेश सरकार के प्रदर्शन से जोड़कर देखा जाता है शायद इसमें ये भुला दिया जाता है कि हर चुनाव सरकार के मुखिया की परफॉरमेंस पर निर्भर नहीं होता पार्टी की हार-जीत में स्थानीय फैक्टर भी काम करते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद जितने भी चुनाव उत्तराखण्ड में हुए उन चुनावों से पहले हर राजनीतिक विश्लेषक को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की कुर्सी खतरे में दिखी। हर चुनाव को मुख्यमंत्री धामी के स्वायित्व से जोड़कर देखा जाने लगा। वो अलग बात है कि हर बार धामी मजबूत होकर उभरे
राजनीतिक दलों के लिए हर चुनाव सत्ता का सेमीफाइनल होता है। फिर वो पंचायत चुनाव हो या फिर नगर निकाय या लोकसभा और विधानसभा के उपचुनाव। उत्तराखण्ड में पिछले दिनों कई सेमीफाइनलों का दौर चला। पहले मंगलौर और बद्रीनाथ विधानसभा के उपचुनावों को सेमीफाइनल कहा गया। उसके बाद केदारनाथ उपचुनाव को भी 2027 में आने वाले विधानसभा चुनावों के लिए सेमीफाइनल कहा गया। केदारनाथ उपचुनाव के बाद हुए नगर निकाय चुनाव को भी सेमीफाइनल की श्रेणी में रखा गया। अब शायद आने वाले पंचायती चुनावों को भी सत्ता के एक और सेमीफाइनल के रूप में पेश किया जाए। 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद जितने भी चुनाव उत्तराखण्ड में हुए उन चुनावों से पहले हर राजनीतिक विश्लेषक को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की कुर्सी खतरे में दिखी। हर चुनाव को मुख्यमंत्री धामी के स्वायित्व से जोड़कर देखा जाने लगा। वो अलग बात है कि हर चुनाव के बाद धामी मजबूत होकर उभरे। मंगलौर और बद्रीनाथ में भाजपा की हार के बाद मुख्यमंत्री बदले जाने की आवाजें जिस प्रकार भाजपा के अंदर से उठी उन्हें केदारनाथ विधानसभा उपचुनाव के परिणाम ने एक हद शांत कर दिया लेकिन नगर निकाय चुनाव को फिर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के राजनीतिक भविष्य से जोड़ा जाने लगा। नगर निकाय चुनावों के परिणाम ने इन कयासों पर फिर विराम लगा दिया। भाजपा की नगर निकाय चुनावों खासकर मेयर की ग्यारह में से दस सीटों पर जीत ने धामी के विषय में चल रही अफवाहों पर फिलहाल विराम लगा दिया है। जिस प्रकार हर चुनाव को प्रदेश सरकार के प्रदर्शन से जोड़कर देखा जाता है शायद इसमें ये भुला दिया जाता है कि हर चुनाव सरकार के मुखिया की परफॉरमेंस पर निर्भर नहीं होता पार्टी की हार-जीत में स्थानीय फैक्टर भी काम करते हैं। मसलन क्षेत्र विशेष की राजनीतिक परिस्थितियां स्थानीय जनप्रतिनिधियों खासकर स्थानीय सांसद व विधायक की भूमिका का काफी हद तक प्रभाव। परिणामों का समग्र विश्लेषण को सरकार के मुखिया से जोड़कर देखने से स्थानीय सांसद व विधायक के प्रदर्शन और क्षमता की अनदेखी होने से चुनाव परिणामों का विश्लेषण उनकी कमजोरियों को छिपा देता है। समग्र दृष्टिकोण और माइक्रोलेवल पर चुनावों का विश्लेषण करने पर अलग-अलग तस्वीर नजर आती है। चुनाव सिर्फ सरकार की ही परीक्षा नहीं होते स्थानीय जनप्रतिनिधियों के कार्य की भी समीक्षा होती हैं।
उत्तराखण्ड के नगर निकाय चुनावों की सरकार के इतर स्थानीय सांसद, विधायक के स्तर पर देखें तो तस्वीर ज्यादा साफ नजर आती है। कुमाऊं क्षेत्र की बात करें तो अल्मोड़ा, नैनीताल, बागेश्वर, चम्पावत और ऊधमसिंह नगर के परिणाम स्थानीय नेताओं के प्रदर्शन की मिली जुली तस्वीर पेश करते हैं। ऊधमसिंह नगर-नैनीताल संसदीय क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन मिला जुला रहा वहीं कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत सराहनीय नहीं रहा। ऊधमसिंह नगर जिले की बात करें तो यहां 17 नगर निकाय में 10 पर भाजपा 1 पर कांग्रेस 6 पर निर्दलीयों ने बाजी मारी। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य अपनी विधानसभा बाजपुर से बाजपुर नगर पालिका पर कांग्र्रेस प्रत्याशी को जिताने में सफल रहे लेकिन उपनेता विपक्ष भुवन कापड़ी खटीमा नगर पालिका पर कांग्रेस प्रत्याशी को नहीं जिता पाए। रूद्रपुर से विधायक शिव अरोरा के क्षेत्र से विकास शर्मा, मेयर बने लेकिन किच्छा विधायक तिलकराज बेहड़ किच्छा विधानसभा के अंतर्गत आने वाली नगला नगर पालिका की सीट कांग्रेस की झोली में नहीं डाल पाए। गदरपुर से विधायक अरविंद पाण्डे भाजपा का प्रत्याशी जिताने में सफल रहे। काशीपुर से विधायक चीमा के क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी दीपक बाली मेयर चुने गए। ऊधमसिंह नगर से कांग्रेस के 5 विधायक होने के बावजूद एक नगर पालिका पर सफलता बताती है कि यशपाल आर्य को छोड़कर कोई विधायक खास प्रदर्शन नहीं कर पाया। जसपुर विधानसभा में कांग्रेस विधायक आदेश चौहान एक भी नगर निकाय नहीं जितावा सके खासकर मुस्लिम बहुल इलाकों में कांग्रेस की जगह मतदाताओं की पसंद निर्दलीय रहे। आने वाले चुनावों में ये कांग्रेस के लिए चिंता की वजह हो सकती है। सितारगंज नगर पालिका में सौरभ बहुगुणा ने अपनी बादशाहत कायम रखी वहां भाजपा प्रत्याशी चुनाव जीते। ऊधमसिंह नगर के उलट नैनीताल जिले की तस्वीर कहती है कि यहां भाजपा विधायक व सांसद खास करिश्मा नहीं दिखा पाए। रामनगर नगर पालिका की सीट पर विधायक दीवान सिंह बिष्ट और पौड़ी सांसद अनिल बलूनी की प्रतिष्ठा दावं पर थी क्योंकि भाजपा प्रत्याशी मदन जोशी दोनों की खास पसंद थे यहां पर भाजपा प्रत्याशी का नहीं जीत पाना विधायक दीवान सिंह बिष्ट व सांसद अनिल बलूनी की साख पर सवाल खड़े कर जाता है। नैनीताल जिले की रामनगर विधानसभा सीट को छोड़ दें तो हल्द्वानी नगर निगम, नैनीताल, भवाली, भीमताल और लालकुआं नगर पालिका नैनीताल, ऊधमसिंह नगर संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है। यहां पर मतदाता ने अपने विधायक व सांसद को तव्ज्जो नहीं दी। हल्द्वानी मेयर सीट पर भाजपा के गजराज सिंह बिष्ट की जीत ने नैनीताल जिले में भाजपा की साख बचा ली लेकिन कालाढूंगी और लालकुआं नगर पालिकाओं में भाजपा का तीसरे नंबर पर खिसक जाना बताता है कि प्रत्याशी चयन में यहां भाजपा चूक गई क्योंकि इन दोनों ही सीटों पर भाजपा के बागी जीते हैं और दूसरे स्थान पर कांग्रेस रही। कालाढूंगी विधानसभा सीट पर भाजपा की प्रत्याशी अंजू वालिया बंशीधर भगत की पसंद थी। निवर्तमान अध्यक्ष पुष्कर सिंह कत्थूरा की पत्नी इस बार भाजपा से बागी होकर लड़ी थीं और उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी को हराया। इसी प्रकार लालकुआं नगर पंचायत में स्थानीय विधायक डॉ. मोहन सिंह की पसंद प्रेमनाथ को भाजपा के बागी सुरेंद्र सिंह लोटनी ने तीसरे नंबर पर धकेल दिया यहां कांग्रेस प्रत्याशी अस्मिता मिश्रा दूसरे स्थान पर रहीं।
नैनीताल नगर पालिका की प्रतिष्ठित सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी डॉ. सरस्वती खेतवाल की भाजपा प्रत्याशी जीवंती भट्ट पर चार हजार वोटों की जीत ने भाजपा विधायक सरिता आर्य के लिए परेशानी खड़ी कर दी है। नैनीताल नगर पालिका में भाजपा की चार हजार मतों के लगभग हार भविष्य के लिए खतरे का संकेत है। नैनीताल विधानसभा के अंतर्गत ही भवाली नगर पालिका में भाजपा की हार भीमताल विधायक राम सिंह कैड़ा के लिए चिंता का सबब है। हल्द्वानी विधानसभा विधायक सुमित हृदयेश कांग्रेस के ललित जोशी को 19 हजार से अधिक मतों से बढ़त दिलाने में सफल रहे। कुल मिलाकर नैनीताल जिले में सांसद व चार विधायक होने के बावजूद भाजपा का प्रदर्शन कई सवाल खड़े कर गया।
अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र की बात करें तो अल्मोड़ा पिथौरागढ़, चंपावत और बागेश्वर में आने वाले चार जिलों में कांग्रेस, भाजपा का प्रदर्शन मिला -जुला रहा। अल्मोड़ा जिले में अल्मोड़ा की मेयर और चौखुटिया नगर पंचायत की सीट पर भाजपा ने कब्जा जमाया वहीं चिलियानौला, द्वाराहाट और भिक्यिासैण के नगर निकायों में कांग्रेस काबिज हुई। रानीखेत विधानसभा के अंतर्गत चिलियानौला और भिक्यिासैण में भाजपा की हार उसके हाल को दर्शाती है। भिक्यिासैण और चिलियानौला में केंद्रीय मंत्री अजय टम्टा के प्रचार के बावजूद भाजपा का हार जाना विधायक प्रमोद नैनवाल और अजय टम्टा के लिए शुभ संकेत नहीं है। भिक्यिासैण में तो भाजपा की जिलाध्यक्ष और विधायक प्रमोद नैनताल की खास लीला बिष्ट का हार जाना भाजपा के लिए चिताजनक है। चिलियानौला नगर पालिका में तो भाजपा प्रत्याक्षी मदन कुवार्बी तीसरे स्थान पर पहुंच गए वहां कांग्रेस के अरूण रावत विजयी हुए। बागेश्वर में विधायक पार्वती दास के लिए परिणाम 50-50 रहे। बागेश्वर नगर पालिका में भाजपा के सुरेश खेतवाल तो गरूड़ में कांग्रेस विजयी रही। पिथौरागढ़ जिले में विधायक मयूख महर कड़े संघर्ष के बावजूद अपना प्रत्याशी नहीं जिता पाए तो वहीं धारचूला से विधायक हरीश धामी धारचूला नगर निकाय से कांग्रेस प्रत्याशी तो जिता ले गए लेकिन मुनस्यारी में भाजपा को रोक नहीं पाए। डीडीहाट विधायक बिशन सिंह चुफाल डीडीहाट नगर निकाय में भाजपा को विजय नहीं दिलवा पाए डीडीहाट में कांग्रेस ने जीत हासिल की। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की चंपावत सीट और उससे सटी लोहाघाट सीट पर भाजपा की फतह बताती है कि अपनी विधानसभा और उससे जुड़ी विधानसभा में वो भाजपा की फतह में कामयाब रहे। कुल मिलाकर उत्तराखण्ड के नगर निकाय चुनावों में सरकार के प्रदर्शन के इतर स्थानीय सांसदों व विधायकों का प्रदर्शन कुमाऊं मंडल में मुख्यमंत्री को छोड़कर कहीं भी शत-प्रतिशत नहीं रहा।

