स्विट्जरलैंड में अमेरिका-ईरान वार्ता के दौरान पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की कथित हत्या की साजिश के दावे ने पहले ही अंतरराष्ट्रीय हलकों में हलचल मचा दी थी। अब एक नई रिपोर्ट में यह सामने आया है कि अमेरिकी अधिकारियों को ईरान के वरिष्ठ नेता मोहम्मद बाकर गालिबाफ की सुरक्षा को लेकर भी गम्भीर आशंका थी और उन्होंने तेहरान को सतर्क रहने का संदेश भिजवाया था। दोनों घटनाओं के बीच कोई प्रत्यक्ष सम्बंध सिद्ध नहीं हुआ है लेकिन इतना स्पष्ट है कि पश्चिम एशिया में अब युद्ध केवल मिसाइलों और बमों से नहीं बल्कि खुफिया अभियानों, मनोवैज्ञानिक दबाव और कूटनीतिक रणनीतियों के जरिए भी लड़ा जा रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या शांति वार्ताएं भी अब गुप्त युद्ध का नया मोर्चा बन चुकी हैं?
पश्चिम एशिया की राजनीति हमेशा से युद्ध, कूटनीति और खुफिया अभियानों का संगम रही है। लेकिन हाल के दिनों में सामने आई दो घटनाओं ने इस धारणा को और मजबूत कर दिया है कि अब शांति वार्ताएं भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं रह गई हैं। पहली घटना पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की कथित हत्या की साजिश से जुड़ी है और दूसरी ईरान के वरिष्ठ नेता मोहम्मद बाकर गालिबाफ की सुरक्षा को लेकर व्यक्त की गई आशंकाओं से। दोनों घटनाएं अलग-अलग हैं लेकिन दोनों के केंद्र में एक ही नाम बार-बार उभरता है, इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद।
मोसाद दुनिया की उन चुनिंदा खुफिया एजेंसियों में शामिल है जिनकी कार्यशैली ने उसे लगभग एक किंवदंती बना दिया है। इसकी पहचान केवल सूचनाएं जुटाने वाली एजेंसी के रूप में नहीं है बल्कि ऐसी संस्था के रूप में है जो हजारों किलोमीटर दूर बैठकर भी अपने लक्ष्य तक पहुंचने की क्षमता रखती है। पिछले छह दशकों में मोसाद पर कई देशों में गुप्त अभियान चलाने, दुश्मनों का अपहरण करने, वैज्ञानिकों की हत्या करने, साइबर हमले करने और संवेदनशील सैन्य परियोजनाओं को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगते रहे हैं। इजराइल की नीति भी ऐसी रही है कि वह ऐसे अभियानों पर शायद ही कभी आधिकारिक टिप्पणी करता है।
1960 में अर्जेंटीना से नाजी अधिकारी एडोल्फ आइखमैन को पकड़कर इजराइल लाना हो, 1972 के म्यूनिख ओलम्पिक नरसंहार के बाद वर्षों तक चले प्रतिशोधी अभियान हों या फिर ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े वैज्ञानिकों की रहस्यमय हत्याएं, इन सभी घटनाओं ने मोसाद की उस छवि को मजबूत किया कि वह अपने विरोधियों को दुनिया के किसी भी कोने में खोज सकता है। यही कारण है कि जब किसी अंतरराष्ट्रीय साजिश में मोसाद का नाम सामने आता है तो दुनिया उसे पूरी तरह असम्भव मानकर खारिज भी नहीं करती।
इसी पृष्ठभूमि में स्विट्जरलैंड की घटना चर्चा में आई। दावा किया गया कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही शांति वार्ता के दौरान पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर भी वहां मौजूद थे और उसी दौरान उन्हें निशाना बनाने की योजना बनाई गई थी। बाद में पाकिस्तान ने इस दावे को पूरी तरह निराधार बताया लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई।
इसी दौरान यह जानकारी सामने आई कि अमेरिकी अधिकारियों को ईरान के वरिष्ठ नेता मोहम्मद बाकर गालिबाफ की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर चिंता थी। आशंका यह थी कि यदि वार्ता के दौरान उनके साथ कोई अप्रिय घटना होती है तो महीनों की कूटनीतिक कोशिशें एक झटके में समाप्त हो सकती हैं। यही तथ्य इस पूरे घटनाक्रम को सामान्य अफवाह से कहीं अधिक गंभीर बना देता है। यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है, क्या वास्तव में किसी शांति वार्ता को विफल करने के लिए किसी प्रमुख प्रतिनिधि की हत्या की जा सकती है?
इतिहास बताता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसी घटनाएं असम्भव नहीं मानी जातीं। प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत भी एक राजनीतिक हत्या से हुई थी। मध्य पूर्व के इतिहास में भी कई ऐसे उदाहरण हैं जहां किसी नेता की हत्या ने पूरे क्षेत्र की राजनीति बदल दी। इसलिए यदि किसी वार्ता में शामिल प्रमुख व्यक्तियों की सुरक्षा को लेकर विशेष चिंता व्यक्त की जाती है तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। हालांकि पत्रकारिता की दृष्टि से यह भी उतना ही आवश्यक है कि क्षमता और प्रमाण के बीच अंतर किया जाए।
इतिहास बताता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसी घटनाएं असम्भव नहीं मानी जातीं। प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत भी एक राजनीतिक हत्या से हुई थी। मध्य पूर्व के इतिहास में भी कई ऐसे उदाहरण हैं जहां किसी नेता की हत्या ने पूरे क्षेत्र की राजनीति बदल दी। इसलिए यदि किसी वार्ता में शामिल प्रमुख व्यक्तियों की सुरक्षा को लेकर विशेष चिंता व्यक्त की जाती है तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। हालांकि पत्रकारिता की दृष्टि से यह भी उतना ही आवश्यक है कि क्षमता और प्रमाण के बीच अंतर किया जाए।
मोसाद के पास दुनिया के किसी भी हिस्से में गुप्त अभियान चलाने की क्षमता है, यह बात उसके इतिहास से स्पष्ट होती है लेकिन केवल क्षमता के आधार पर किसी विशेष घटना की जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती। आसिम मुनीर वाले मामले में अभी तक ऐसा कोई स्वतंत्र प्रमाण सार्वजनिक नहीं हुआ है जिससे यह निश्चित रूप से कहा जा सके कि वास्तव में हत्या की योजना बनाई गई थी।
फिर भी इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू कुछ और है। यह घटना दिखाती है कि आज का युद्ध केवल टैंकों, लड़ाकू विमानों और मिसाइलों तक सीमित नहीं रह गया है। अब खुफिया एजेंसियां, साइबर आॅपरेशन, दुष्प्रचार अभियान, मीडिया नैरेटिव और मनोवैज्ञानिक दबाव भी युद्ध के प्रमुख हथियार बन चुके हैं। किसी हत्या की साजिश की खबर भी कई बार अपने आप में एक रणनीतिक हथियार बन जाती है। इससे विरोधी देश के नेतृत्व पर दबाव बनाया जा सकता है, उसके सुरक्षा तंत्र को अस्थिर किया जा सकता है और वैश्विक जनमत को प्रभावित किया जा सकता है।
इजराइल और ईरान के बीच वर्षों से चल रहा ‘छाया युद्ध’ इसी रणनीति का उदाहरण माना जाता है। दोनों देश प्रत्यक्ष युद्ध से बचते हुए भी एक-दूसरे के खिलाफ साइबर हमलों, खुफिया अभियानों, आर्थिक दबाव और सीमित सैन्य कार्रवाइयों का सहारा लेते रहे हैं। ऐसे माहौल में यदि शांति वार्ताओं के दौरान शीर्ष नेताओं की सुरक्षा को लेकर आशंकाएं सामने आती हैं तो यह केवल सुरक्षा का नहीं बल्कि पूरी कूटनीतिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश यही है कि पश्चिम एशिया में अब युद्ध की परिभाषा बदल चुकी है। युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जा रहा बल्कि वार्ता कक्षों, खुफिया नेटवर्क, डिजिटल प्लेटफाॅर्म और वैश्विक मीडिया में भी लड़ा जा रहा है। मोसाद इस रणनीति का सबसे चर्चित चेहरा है लेकिन यह संघर्ष केवल एक एजेंसी या एक देश तक सीमित नहीं है। अमेरिका, ईरान, इजराइल, पाकिस्तान और खाड़ी देशों के बीच चल रही रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ने पूरे क्षेत्र को ऐसे दौर में पहुंचा दिया है जहां हर शांति वार्ता के साथ एक अदृश्य सुरक्षा युद्ध भी चलता है। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा और सबसे गम्भीर निष्कर्ष है।