वर्ष 1970 के दशक में बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, मजदूर आंदोलनों और व्यवस्था से मोहभंग ने हिंदी सिनेमा को ‘एंग्री यंग मैन’ दिया। ‘जंजीर’, ‘दीवार’, ‘नमक हराम’ और ‘रोटी कपड़ा और मकान’ जैसी फिल्मों में नायक सत्ता और व्यवस्था से सवाल करता था। करीब आधी सदी बाद हिंदी सिनेमा फिर राजनीतिक है लेकिन अब उसका नायक अक्सर सैनिक, जासूस या राष्ट्र रक्षक है। तब पर्दे पर आम आदमी का गुस्सा था, आज राष्ट्रवाद का जोश है। सवाल यह है कि सिनेमा की राजनीति बदली है या राजनीति ने सिनेमा की भाषा बदल दी है?
हिंदी सिनेमा के इतिहास में 1970 का दशक केवल अमिताभ बच्चन के उदय, राजेश खन्ना के स्टारडम, ‘शोले’ की सफलता या आर.डी. बर्मन के संगीत का दशक नहीं था। यह वह समय था जब देश की राजनीति सड़कों पर थी और सड़कों का गुस्सा धीरे-धीरे सिनेमा के पर्दे पर उतर रहा था। बेरोजगारी बढ़ रही थी, महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही थी, भ्रष्टाचार के खिलाफ असंतोष गहरा रहा था, मजदूर आंदोलन तेज हो रहे थे और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सवाल उठने लगे थे। वर्ष 1975 में लगाए गए आपातकाल ने इस बेचैनी को और गहरा कर दिया। ऐसे समय में हिंदी सिनेमा भला राजनीति से अछूता कैसे रह सकता था?
यह वही दशक था जब हिंदी फिल्मों का नायक बदल गया। 1950 और 1960 के दशक का नायक अक्सर प्रेम, नैतिकता और सामाजिक आदर्शों के बीच संघर्ष करता था। राज कपूर का गरीब लेकिन आशावादी आम आदमी, दिलीप कुमार का संवेदनशील और त्रासदी से घिरा नायक तथा देव आनंद का आत्मविश्वासी शहरी युवक स्वतंत्रता के बाद के भारत की उम्मीदों का प्रतिनिधित्व करते थे लेकिन 1970 के दशक तक आते-आते आजादी के सपनों और जमीन की वास्तविकताओं के बीच दूरी बढ़ चुकी थी। जनता को लगने लगा था कि व्यवस्था ने उससे किए गए वादे पूरे नहीं किए। इसी निराशा से एक नया सिनेमाई नायक पैदा हुआ, गुस्से से भरा, व्यवस्था से नाराज और न्याय के लिए कानून से बाहर जाने को भी तैयार।
वर्ष 1973 में आई ‘जंजीर’ को इस बदलाव का निर्णायक बिंदु माना जाता है। अमिताभ बच्चन द्वारा निभाया गया पुलिस अधिकारी विजय खन्ना हिंदी सिनेमा के पुराने रोमांटिक नायक से बिल्कुल अलग था। वह कम बोलता था, भीतर से घायल था और अपराध तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ उसके भीतर गहरा आक्रोश था। सलीम-जावेद द्वारा रचा गया विजय केवल एक फिल्मी पात्र नहीं था बल्कि उस पीढ़ी की बेचैनी का प्रतिनिधि था जिसे व्यवस्था से न्याय मिलने का भरोसा कम होता जा रहा था। ‘जंजीर’ की सफलता के साथ हिंदी सिनेमा में ‘एंग्री यंग मैन’ का जन्म हुआ।
इसके दो वर्ष बाद आई ‘दीवार’ ने इस राजनीतिक और सामाजिक असंतोष को और अधिक गहराई दी। फिल्म की शुरुआत मजदूर आंदोलन और एक ईमानदार श्रमिक नेता के अपमान से होती है। उसका बेटा विजय गरीबी, सामाजिक तिरस्कार और व्यवस्था की विफलता के बीच बड़ा होता है। वह अपराध की दुनिया में जाता है लेकिन दर्शक उसे केवल अपराधी के रूप में नहीं देखते। वे उसके भीतर उस व्यक्ति को देखते हैं जिसे समाज ने बार-बार अस्वीकार किया। विजय का प्रसिद्ध संवाद, ‘आज मेरे पास बिल्डिंग है, प्रॉपर्टी है, बैंक बैलेंस है…’ केवल दो भाइयों की बहस नहीं थी बल्कि उस दौर के नैतिक और आर्थिक संघर्ष का प्रतीक था।
‘दीवार’ में विजय की बांह पर लिखा ‘मेरा बाप चोर है’, व्यवस्था द्वारा गरीब और कमजोर व्यक्ति पर लगाए गए स्थायी कलंक का प्रतीक बन गया। फिल्म सवाल उठाती है कि अपराधी कौन है, वह व्यक्ति जो कानून तोड़ता है या वह व्यवस्था जो किसी व्यक्ति को अपराध की ओर धकेलती है? यही कारण है कि ‘दीवार’ को केवल अपराध कथा नहीं बल्कि वर्ग संघर्ष की फिल्म भी माना जाता है।
1970 के दशक की राजनीति का एक बड़ा केंद्र मजदूर आंदोलन था। मुम्बई की मिलों और औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिक अधिकारों को लेकर संघर्ष चल रहे थे। इसका प्रभाव फिल्मों पर भी दिखाई दिया। वर्ष 1973 में आई ‘नमक हराम’ में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के किरदारों के माध्यम से पूंजीपति और मजदूर वर्ग के संघर्ष को दिखाया गया। फिल्म में दोस्ती की कहानी के भीतर वर्ग चेतना का प्रश्न मौजूद था। राजेश खन्ना का किरदार जब मजदूरों के जीवन और संघर्ष को करीब से देखता है तो उसकी सोच बदल जाती है। वह अपने सम्पन्न मित्र के बजाय श्रमिकों के अधिकारों के साथ खड़ा हो जाता है।
इसी दौर में गुलजार की फिल्मों ने राजनीति को अधिक संवेदनशील और मानवीय दृष्टि से देखा। वर्ष 1975 में रिलीज हुई ‘आंधी’ को भारतीय राजनीतिक सिनेमा की सबसे चर्चित फिल्मों में गिना जाता है। फिल्म की मुख्य पात्र आरती देवी एक प्रभावशाली महिला राजनीतिज्ञ है। उसके व्यक्तित्व और वेशभूषा में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की झलक देखी गई, हालांकि फिल्मकारों ने इसे किसी एक नेता की जीवनी मानने से इनकार किया। आपातकाल के दौरान फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई। बाद में जनता पार्टी की सरकार आने पर इसे दोबारा प्रदर्शित किया गया। ‘आंधी’ ने सत्ता और निजी जीवन के बीच संघर्ष को बेहद संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत किया।
यह दशक केवल मुख्यधारा के सिनेमा में राजनीतिक बदलाव का दौर नहीं था। इसी समय समानांतर सिनेमा का आंदोलन भी मजबूत हुआ। श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’, ‘निशांत’ और ‘मंथन’ जैसी फिल्मों ने ग्रामीण भारत में सामंतवाद, जाति, शोषण और सत्ता के असमान वितरण को पर्दे पर उतारा। इन फिल्मों में कोई सुपरहीरो नहीं था। इनके पात्र किसान, मजदूर, महिलाएं और समाज के हाशिए पर खड़े लोग थे।
इसी दशक में राजनीतिक व्यंग्य भी सिनेमा का महत्वपूर्ण हिस्सा बना। अमृत नाहटा की फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ सत्ता और राजनीतिक व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य थी। आपातकाल के दौरान इस फिल्म को प्रतिबंधित कर दिया गया और इसके प्रिंट नष्ट किए जाने का मामला भी सामने आया। यह घटना इस बात का प्रतीक बन गई कि सत्ता सिनेमा की राजनीतिक ताकत से कितनी असहज हो सकती है।
वर्ष 1975 में आई ‘शोले’ को आम तौर पर एक मनोरंजक एक्शन फिल्म के रूप में देखा जाता है लेकिन उसके भीतर भी राज्य और कानून की विफलता का प्रश्न मौजूद था। रामगढ़ के लोगों की रक्षा करने में सरकारी व्यवस्था अनुपस्थित दिखाई देती है और एक पूर्व पुलिस अधिकारी को दो अपराधियों की मदद लेनी पड़ती है। ठाकुर का कानून पर भरोसा टूट चुका है और वह निजी प्रतिशोध का रास्ता चुनता है। यह कहानी उस दौर में व्यवस्था के प्रति बढ़ते अविश्वास की छाया भी मानी जा सकती है। वर्ष 1974 में आई ‘रोटी कपड़ा और मकान’ ने बेरोजगारी, गरीबी और महंगाई को सीधे अपनी कहानी का हिस्सा बनाया। फिल्म का शीर्षक ही आम आदमी की बुनियादी जरूरतों का राजनीतिक नारा था। मनोज कुमार द्वारा निर्देशित इस फिल्म में एक शिक्षित बेरोजगार युवक की पीड़ा दिखाई गई। फिल्म का गीत ‘बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गई’ उस समय की आर्थिक स्थिति पर सीधी टिप्पणी बन गया।
‘त्रिशूल’ में एक युवक अपने पिता और पूंजी की ताकत से संघर्ष करता है। ‘काला पत्थर’ में खदान मजदूरों के जीवन, मालिकों की लापरवाही और श्रमिकों की सुरक्षा के प्रश्न उठाए गए। इन फिल्मों में नायक की निजी कहानी के पीछे वर्ग, श्रम और सामाजिक न्याय का बड़ा प्रश्न मौजूद था।
1970 का दशक राजनीतिक इसलिए भी था क्योंकि उस समय फिल्मों के लेखक अत्यंत प्रभावशाली हो गए थे। सलीम-जावेद ने ऐसे किरदार और संवाद लिखे जिनमें व्यवस्था के खिलाफ जनता का गुस्सा दिखाई देता था। उनका नायक अक्सर गरीब बस्ती से आता था, अन्याय का शिकार होता था और फिर अपने तरीके से व्यवस्था को चुनौती देता था। ‘जंजीर’, ‘दीवार’, ‘त्रिशूल’ और ‘काला पत्थर’ में यह राजनीतिक चेतना अलग- अलग रूपों में दिखाई देती है। इस दौर में अमिताभ बच्चन का उदय केवल एक अभिनेता की सफलता नहीं थी। उनकी लम्बी कद-काठी, गम्भीर आवाज और नियंत्रित गुस्से में उस पीढ़ी ने अपना आक्रोश देखा। वे पर्दे पर उस आम आदमी की आवाज बने जो भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सामाजिक असमानता से परेशान था लेकिन वास्तविक जीवन में खुद को असहाय महसूस करता था। दर्शक सिनेमाघर में विजय को व्यवस्था से लड़ते देखकर अपने भीतर दबे गुस्से को अभिव्यक्ति देते थे।
1980 के दशक में आते-आते यह राजनीतिक तेवर धीरे-धीरे बदलने लगा। हिंसा और बदले की कहानियां बढ़ीं लेकिन उनमें 1970 के दशक जैसी सामाजिक गहराई कम होती गई। 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण, उपभोक्तावाद और नए मध्यम वर्ग के उभार ने हिंदी सिनेमा की प्राथमिकताएं बदल दीं। पर्दे का नायक व्यवस्था से लड़ने के बजाय प्रेम, परिवार, विदेश, समृद्धि और व्यक्तिगत सफलता की कहानियों में अधिक दिखाई देने लगा लेकिन करीब आधी सदी बाद हिंदी सिनेमा एक बार फिर राजनीतिक दिखाई दे रहा है। फर्क इतना है कि उसकी राजनीति और उसका नायक दोनों बदल चुके हैं। 1970 के दशक का सिनेमा सत्ता और व्यवस्था से सवाल करता था जबकि आज के राजनीतिक सिनेमा का एक बड़ा हिस्सा राष्ट्र, सेना, सुरक्षा, इतिहास और राष्ट्रीय अस्मिता के आख्यानों के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता है। तब पर्दे का नायक बेरोजगारी, गरीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार और वर्गीय असमानता से लड़ता था, आज वह अक्सर सीमा पार के दुश्मन, आतंकवाद, विदेशी साजिश या देश के भीतर मौजूद राष्ट्रविरोधी ताकतों से मुकाबला करता नजर आता है।
‘जंजीर’ का विजय भ्रष्ट व्यवस्था से नाराज था, ‘दीवार’ का विजय उस सामाजिक ढांचे की उपज था जिसने उसके परिवार को अपमान और गरीबी दी थी और ‘रोटी कपड़ा और मकान’ का नायक बेरोजगारी तथा महंगाई से संघर्ष कर रहा था। इसके विपरीत आज की कई सफल फिल्मों में नायक सैनिक, खुफिया अधिकारी, पुलिस अधिकारी या राष्ट्र के गौरव की रक्षा करने वाला योद्धा है। ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’, ‘शेरशाह’, ‘फाइटर’, ‘आर्टिकल 370’, ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘द केरल स्टोरी’ और ‘द साबरमती रिपोर्ट’ जैसी फिल्मों ने राष्ट्रवाद, आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा, ऐतिहासिक पीड़ा और इतिहास की नई व्याख्याओं को लोकप्रिय सिनेमा के केंद्र में ला दिया है।
यह बदलाव केवल फिल्मों के विषयों तक सीमित नहीं है। फिल्मों की भाषा और सत्ता को देखने का नजरिया भी बदला है। 1970 के दशक में व्यवस्था अक्सर सवालों के घेरे में होती थी। पुलिस, प्रशासन, उद्योगपति और राजनीतिक सत्ता को भ्रष्ट या आम आदमी से दूर दिखाया जाता था। आज की अनेक राष्ट्रवादी फिल्मों में सेना, सुरक्षा एजेंसियां और राज्य की शक्ति समाधान के रूप में सामने आती हैं। तब नायक व्यवस्था से टकराता था, आज वह कई बार व्यवस्था का प्रतिनिधि बनकर देश के दुश्मनों से लड़ता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि 1970 के दशक का सिनेमा राष्ट्रविरोधी था या आज का राष्ट्रवादी सिनेमा राजनीतिक प्रश्नों से रहित है। ‘हकीकत’, ‘उपकार’ और ‘पूरब और पश्चिम’ जैसी फिल्मों में राष्ट्र प्रेम पहले भी मौजूद था। अंतर यह है कि उस दौर में देशभक्ति के साथ गरीबी, किसान, मजदूर, सामाजिक समानता और राष्ट्र निर्माण के प्रश्न जुड़े थे। आज राष्ट्रवाद का विमर्श अक्सर राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य शक्ति, ऐतिहासिक अन्याय और सांस्कृतिक पहचान के संदर्भ में सामने आता है। दोनों दौर अपने-अपने समय की राजनीति को प्रतिबिंबित करते हैं।
सबसे दिलचस्प अंतर शायद यह है कि 1970 के दशक का नायक पूछता था कि व्यवस्था ने आम आदमी को क्या दिया? आज का राष्ट्रवादी नायक पूछता है कि देश के लिए तुमने क्या किया? तब राजनीति के केंद्र में नागरिक के अधिकार, रोजगार, रोटी और न्याय अधिक दिखाई देते थे, आज उसके केंद्र में राष्ट्र की सुरक्षा, गौरव और पहचान प्रमुखता से मौजूद हैं। इस दृष्टि से देखें तो हिंदी सिनेमा राजनीतिक होना बंद नहीं हुआ बल्कि उसकी राजनीति बदल गई है। 1970 के दशक में सिनेमा सत्ता से सवाल करता था, आज उसका एक प्रभावशाली हिस्सा राष्ट्र और सत्ता के प्रचलित आख्यानों को पर्दे पर विस्तार देता दिखाई देता है। तब पर्दे पर व्यवस्था के खिलाफ आम आदमी का गुस्सा था, आज राष्ट्रवाद का जोश है। दोनों दौर यह साबित करते हैं कि लोकप्रिय सिनेमा कभी अपने समय की राजनीति से पूरी तरह अलग नहीं होता।
शायद इसीलिए आधी सदी बाद भी ‘दीवार’, ‘जंजीर’, ‘आंधी’, ‘मंथन’, ‘अंकुर’ तथा ‘रोटी कपड़ा और मकान’ जैसी फिल्में पुरानी नहीं लगतीं। उनके सवाल आज भी भारतीय समाज में मौजूद हैं। वहीं आज की राष्ट्रवादी फिल्में अपने समय की नई राजनीतिक आकांक्षाओं, चिंताओं और पहचानों को दर्ज कर रही हैं। समय बदल गया, राजनीति बदल गई और सिनेमा का नायक भी बदल गया। कभी वह व्यवस्था से न्याय मांगता था, आज वह राष्ट्र की रक्षा के लिए लड़ता दिखाई देता है। सवाल केवल इतना है कि आने वाले वर्षों का हिंदी सिनेमा सत्ता से प्रश्न पूछेगा, सत्ता के आख्यान को आगे बढ़ाएगा या इन दोनों के बीच कोई नई राह खोजेगा।