उत्तराखण्ड ने हमेशा से अपनी प्राकृतिक सुंदरता, सैन्य परम्परा और सांस्कृतिक विरासत के लिए पहचान बनाई है। अब यह खेलों के क्षेत्र में भी एक नई पहचान गढ़ने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सरकार की ‘पदक लाओ, सरकारी नौकरी पाओ’ की योजना दूरदर्शिता का उदाहरण है। यह पहल खिलाड़ियों के भविष्य को सुरक्षित करने के साथ राज्य और देश के खेल भविष्य को भी मजबूत बनाती है। यह केवल एक सरकारी मुहिम नहीं बल्कि खेलों के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक बदलाव की शुरुआत है जो युवाओं को सपने देखने और उन्हें पूरा करने का भरोसा देती है। यदि इसे सही तरीके से लागू किया गया तो पूरे देश के लिए एक माॅडल साबित हो सकती है
भारत खेल महाशक्ति बनने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। काॅमनवेल्थ गेम्स 2030 की मेजबानी भारत को मिलना और ओलम्पिक खेल 2036 की दावेदारी इस दिशा में बड़े संकेत हैं। ऐसे में राज्यों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। इस बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए राज्यों को जमीनी स्तर पर खेल प्रतिभाओं को तैयार करना होगा। इसी कड़ी में उत्तराखण्ड सरकार की ‘पदक लाओ सरकारी नौकरी पाओ’ की पहल खिलाड़ियों के भविष्य को सुरक्षित करने के साथ-साथ खेल संस्कृति को मजबूत करने का एक बड़ा प्रयास है। लेकिन सरकार की इस नीति को लेकर मीडिया और सोशल मीडिया में सवाल उठ रहे हैं कि पिछले साल 2025 में 38वें राष्ट्रीय खेलों में 24 स्वर्ण सहित कुल 103 पदक जीतकर राष्ट्रीय स्तर पर पदक तालिका में राज्य को 25 से 7 वें स्थान पर पहुंचाने वाले खिलाड़ियों को क्या उनका हक मिला? अब सरकार की यह योजना क्या रंग लाएगी? ‘पदक लाओ, सरकारी नौकरी पाओ’ से बदलेगी तस्वीर? इस नीति का कितना असर खिलाड़ियों पर पड़ेगा जैसे प्रश्न पूछे जा रहे हैं।
खेल विश्लेषकों का कहना है कि पदक विजेता खिलाड़ियों को लम्बे समय तक नौकरी नहीं मिलना इस नीति की जरूरत को और मजबूत करता है। भारत के पर्वतीय राज्य उत्तराखण्ड ने हमेशा से अपनी प्राकृतिक सुंदरता, सैन्य परम्परा और सांस्कृतिक विरासत के लिए पहचान बनाई है लेकिन अब यह राज्य खेलों के क्षेत्र में भी एक नई पहचान गढ़ने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसी क्रम में राज्य सरकार द्वारा शुरू की गई ‘पदक लाओ, सरकारी नौकरी पाओ’ की पहल खेल जगत और युवाओं के बीच नई ऊर्जा भरने में सहायक हो सकती है। यह योजना सिर्फ एक प्रोत्साहन नहीं बल्कि खेलों को करियर के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
यह योजना केवल खिलाड़ियों के लिए ही नहीं बल्कि पूरे राज्य के लिए फायदेमंद है। इससे राज्य का नाम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन होता है। अधिक खिलाड़ी जब पदक जीतेंगे तो उत्तराखण्ड की पहचान एक खेल राज्य के रूप में भी मजबूत होगी। इससे पर्यटन, निवेश और बुनियादी ढांचे के विकास को भी बढ़ावा मिल सकता है। लेकिन इसके साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हैं।
सबसे बड़ी चुनौती है खेलों के लिए बुनियादी ढांचे का विकास। अगर खिलाड़ियों को बेहतर प्रशिक्षण, कोचिंग और सुविधाएं नहीं मिलेंगी तो वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे। इसके अलावा चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता भी बेहद जरूरी है। अगर खिलाड़ियों को लगे कि नियुक्तियों में भेदभाव या राजनीति हो रही है तो इस योजना का प्रभाव कम हो सकता है। इसलिए सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी हो।
सरकारी आंकड़ों और खेल मंत्री रेखा आर्या के अनुसार ‘पदक लाओ, सरकारी नौकरी पाओ’ नीति के तहत सरकार ने 38वें राष्ट्रीय खेलों के पदक विजेताओं सहित लगभग 243 खिलाड़ियों को सरकारी नौकरी देने की प्रक्रिया तेज कर दी है। कार्मिक विभाग ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है और जल्द ही इन खिलाड़ियों को ‘आउट आॅफ टर्न’ (नियुक्ति प्रक्रिया से अलग) सरकारी नौकरी मिलेगी। स्वर्ण पदक विजेताओं को 4,200 ग्रेड पे और रजत, कांस्य पदक विजेताओं को 2,800-2,000 ग्रेड पे की नौकरियां दी जा रही हैं। इसके अलावा खिलाड़ियों को खेल और पुलिस विभाग में समायोजित करने पर जोर दिया जा रहा है। युवा खिलाड़ियों को 2036 के ओलम्पिक और राष्ट्रमंडल खेलों के लिए अभी से तैयार रहने का आह्वान के साथ पदक विजेता खिलाड़ियों को नकद पुरस्कार और प्रोत्साहित करने की योजनाएं मुख्यमंत्री उदीयमान खिलाड़ी प्रोत्साहन योजना लागू की गई है।
गौरतलब है कि बीते दिनों टेबल टेनिस संघ द्वारा देहरादून में आयोजित 87वीं अंतरराज्यीय जूनियर एवं युवा राष्ट्रीय टेबल टेनिस प्रतियोगिता का समापन समारोह धूमधाम से सम्पन्न हुआ। समापन अवसर पर प्रदेश की खेल मंत्री रेखा आर्या मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए मंत्री ने कहा कि प्रदेश सरकार खिलाड़ियों के भविष्य को संवारने के लिए पूरी गम्भीरता से कार्य कर रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को सरकारी नौकरी दी जाएगी। साथ ही अन्य सरकारी नौकरियों में खिलाड़ियों को 4 प्रतिशत आरक्षण का लाभ भी दिया जा रहा है। उन्होंने खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन करते हुए कहा कि आने वाले समय में बड़े खेल आयोजन देश में प्रस्तावित हैं। राष्ट्रमंडल खेल और वर्ष 2036 के ओलम्पिक के मद्देनजर युवाओं को अभी से तैयारी में जुट जाना चाहिए ताकि वे इन मंचों पर बेहतर प्रदर्शन कर सकें।
यही नहीं मंत्री ने कहा कि अगले वर्ष प्रस्तावित 39वें राष्ट्रीय खेलों से पहले विभिन्न खेलों की राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं उत्तराखण्ड में आयोजित कराने के प्रयास किए जा रहे हैं। इससे प्रदेश के खिलाड़ियों को उच्च स्तर की प्रतियोगिताओं का अनुभव मिलेगा और वे अधिक संख्या में चयनित हो सकेंगे। समारोह में खिलाड़ियों के उत्कृष्ट प्रदर्शन की सराहना करते हुए विजेताओं को सम्मानित किया गया। समापन अवसर पर मंत्री ने कहा कि राज्य में खेल सुविधाओं को लगातार मजबूत किया जा रहा है और आने वाले समय में उत्तराखण्ड खेलों के क्षेत्र में नई पहचान स्थापित करेगा।
इस योजना का मुख्य उद्देश्य राज्य के खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करना, उनकी आर्थिक असुरक्षा को दूर करना और खेलों को एक सम्मानजनक करियर विकल्प के रूप में स्थापित करना है। लम्बे समय से यह देखा गया है कि कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी संसाधनों और आर्थिक सहयोग के अभाव में अपने सपनों को बीच में ही छोड़ देते हैं। ऐसे में यह योजना खिलाड़ियों को यह भरोसा देती है कि अगर वे राज्य और देश के लिए पदक जीतते हैं तो उनका भविष्य सुरक्षित होगा।
इस योजना के तहत राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को सीधे सरकारी नौकरी देने का प्रावधान है। इसमें ओलम्पिक, एशियाई खेल, काॅमनवेल्थ गेम्स, राष्ट्रीय और अन्य मान्यता प्राप्त प्रतियोगिताएं शामिल हैं। खिलाड़ियों की उपलब्धियों के आधार पर उन्हें विभिन्न श्रेणियों में सरकारी सेवाओं में नियुक्ति दी जाती है।
खेलों को करियर बनाने का अवसर
भारत में लम्बे समय तक खेलों को एक स्थायी करियर के रूप में नहीं देखा जाता था, खासकर छोटे राज्यों और ग्रामीण क्षेत्रों में। माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ाई और पारम्परिक नौकरियों की ओर ही प्रेरित करते थे लेकिन ऐसी योजनाएं इस सोच को बदलने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। जब सरकार खुद खिलाड़ियों को नौकरी की गारंटी देती है तो यह संदेश जाता है कि खेल भी एक सुरक्षित और सम्मानजनक पेशा हो सकता है।
इस योजना का सबसे बड़ा असर राज्य के युवाओं पर देखने को मिलेगा। अब युवा खेलों को सिर्फ शौक नहीं बल्कि करियर के रूप में देखने लगे हैं। गांव-गांव में खेल के प्रति रुचि बढ़ रही है। खिलाड़ी पहले जहां संसाधनों की कमी और भविष्य की चिंता से जूझते थे वहीं अब वे ज्यादा आत्मविश्वास के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं।
यह योजना खेल और रोजगार के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। खिलाड़ी अक्सर अपने करियर को लेकर असमंजस में रहते हैं कि आगे क्या करें। सरकारी नौकरी उन्हें स्थिरता और सम्मान देती है। इससे वे अपने खेल करियर पर पूरी तरह ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।
यह पहल केवल आर्थिक या पेशेवर नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव का भी संकेत है। जब समाज में खिलाड़ियों को सम्मान और सुरक्षा मिलती है तो नई पीढ़ी प्रेरित होती है। खासकर महिलाओं के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे उन्हें खेलों में आगे बढ़ने का साहस मिलता है।
एक जनपद एक खेल नीति का प्रारूप तैयार कर लिया गया है, जिस पर जल्द अमल होगा। खेल मंत्री रेखा आर्या ने सचिवालय में हुई विभाग की समीक्षा बैठक में यह जानकारी दी। उन्होंने नाॅर्थ ईस्ट राज्यों में होने वाले आगामी 39 वें राष्ट्रीय खेलों में राज्य के पदकों की संख्या बढ़ाने पर विशेष जोर दिया। खेल मंत्री ने कहा ‘एक जिला एक खेल नीति का उद्देश्य हर जिले में एक विशिष्ट खेल को बढ़ावा देना है। 39वें राष्ट्रीय खेलों की तैयारी के लिए पूरी कार्ययोजना प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। इसमें खिलाड़ियों को गहन प्रशिक्षण देने और विभिन्न खेल संघों के साथ समन्वय स्थापित करने पर जोर दिया गया। साथ ही इससे पहले अधिक से अधिक राष्ट्रीय चैम्पियनशिप उत्तराखण्ड में आयोजित कराने की तैयारी है।’
खिलाड़ियों को पुलिस ड्यूटी से मिलेगी छूट
उत्तराखण्ड खेल विभाग अगले साल मेघालय में होने वाले 39वें राष्ट्रीय खेलों की तैयारियों में जुट गया है। इसके तहत राज्य की टीम में शामिल होने वाले सम्भावित खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। विभाग ने सरकारी नौकरी पाने वाले पदक विजेता खिलाड़ियों को भी इसके दायरे में लाने का निर्णय लिया है। इस कोटे से अभी पुलिस व खेल विभाग में ही खिलाड़ी सेवायोजित हुए हैं। ऐेसे में अब इन्हें पुलिस ड्यूटी व पुलिस प्रशिक्षण से छूट दिलाई जा रही है ताकि वे खेल प्रशिक्षण में ध्यान दे सकें।
इस नीति में यह स्पष्ट है कि यदि नियुक्ति के समय खिलाड़ी सक्रिय हैं तो उन्हें कम से कम पांच वर्षों तक खेल जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। साथ ही विभागीय स्तर पर यह सुनिश्चित किया जाएगा कि खिलाड़ियों को अनावश्यक प्रशासनिक दायित्वों से मुक्त रखते हुए उन्हें खेल अभ्यास और प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए पर्याप्त समय दिया जा सके।
अन्य राज्यों के लिए उदाहरण
उत्तराखण्ड की यह पहल अन्य राज्यों के लिए भी एक माॅडल बन सकती है। अगर देश के अन्य राज्य भी इसी तरह की योजनाएं लागू करें तो भारत खेलों के क्षेत्र में एक बड़ी शक्ति बन सकता है। पहले से ही हरियाणा और पंजाब जैसे राज्य खिलाड़ियों को प्रोत्साहन देने के लिए जाने जाते हैं और अब उत्तराखण्ड भी इस सूची में तेजी से शामिल हो रहा है।