मेरा बचपन उत्तराखण्ड के रानीखेत में बीता। आज भी जब आंखें बंद करता हूं तो देवदार और चीड़ के जंगल, पहाड़ों से उतरती ठंडी हवा, मंदिरों की घंटियां, ईद पर मिलने वाले दोस्त, होली और दीपावली पर एक-दूसरे के घरों में आना-जाना, सब कुछ याद आ जाता है। हम लोगों ने कभी अपने पड़ोसियों को उनके धर्म से नहीं पहचाना। हमारी पहचान इंसानियत थी। शायद इसी वजह से उत्तराखण्ड को देवभूमि कहा जाता रहा है। देवभूमि केवल इसलिए नहीं कि यहां बदरीनाथ, केदारनाथ, जागेश्वर या हेमकुंड साहिब हैं बल्कि इसलिए कि यहां समाज के भीतर एक सहज सह-अस्तित्व था लेकिन पिछले कुछ वर्षों से उत्तराखण्ड की जो तस्वीर देश के सामने आ रही है, वह उस उत्तराखण्ड से बिल्कुल अलग है जिसे मैंने देखा, जिया और प्रेम किया।
हाल ही में ‘द वायर’ पत्रिका में प्रकाशित एक विस्तृत रिपोर्ट में उत्तराखण्ड में उभर रही उस प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला है जो केवल साम्प्रदायिक तनाव का मामला नहीं है बल्कि सोशल मीडिया, राजनीति, भीड़तंत्र और नफरत के गठजोड़ की कहानी है। इस रिपोर्ट का शीर्षक है”In Uttarakhand, Bajrang Dal Members Are Now Professional Hate Influencers”। शीर्षक ही अपने आप में बहुत कुछ कह देता है। इस रिपोर्ट में लिखे हर एक शब्द से मैं इत्तेफाक रखता हूं। यह सौ प्रतिशत सच है कि यहां नफरत को एक डिजिटल उत्पाद में बदलने का काम हो रहा है और इसे नाना प्रकार के हिंदूवादी संगठन परवान चढ़ा रहे हैं जिसमें सबसे आगे है ‘बजरंग दल’।
इसे समझने से पहले यह समझना जरूरी है कि बजरंग दल आखिर है क्या? बजरंग दल का गठन 1984 में विश्व हिंदू परिषद के युवा संगठन के रूप में किया गया था। राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान इसकी भूमिका तेजी से बढ़ी और बाद के वर्षों में यह हिंदुत्व राजनीति के सबसे आक्रामक संगठनों में गिना जाने लगा। संगठन स्वयं को हिंदू समाज और धर्म की रक्षा के लिए समर्पित बताता है लेकिन पिछले चार दशकों में इसका नाम अनेक विवादों से जुड़ता रहा है। ‘वेलेंटाइन डे’ पर युवाओं को पीटना, अंतरधार्मिक सम्बंधों का विरोध, कथित लव जिहाद के खिलाफ अभियान, गौ-रक्षा के नाम पर हिंसक कार्रवाइयां, साम्प्रदायिक तनाव और भीड़ की राजनीति इत्यादि के सहारे घृणा फैलाने के इस ‘व्यापार’ में बजरंग दल का नाम समय-समय पर सामने आता रहा है। उत्तराखण्ड में भी पिछले कुछ वर्षों के दौरान ‘लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’, ‘थूक जिहाद’ और जनसंख्या परिवर्तन जैसे मुद्दों को लेकर जो माहौल बनाया गया, उसमें बजरंग दल की सक्रियता लगातार बढ़ती स्पष्ट नजर आती है।
कोटद्वार को याद कीजिए जहां कुछ अर्सा पहले ही एक बुजुर्ग मुस्लिम दुकानदार की दुकान का नाम ‘बाबा’ लिखे होने पर कुछ लोगों ने आपत्ति जताई कि ‘बाबा’ तो हिंदुओं से जुड़ा शब्द है और एक मुस्लिम व्यक्ति अपनी दुकान का यह नाम कैसे रख सकता है? 42 वर्षीय जिम ट्रेनर दीपक कुमार ने उस मुस्लिम दुकानदार का समर्थन किया। जब उससे उसकी पहचान पूछी गई तो उसने कहा ‘‘मेरा नाम मोहम्मद दीपक है।’’ यह उत्तर केवल एक व्यक्ति का जवाब नहीं था बल्कि उस उत्तराखण्ड की आत्मा का उत्तर है जहां कभी इंसानियत धर्म से बड़ी हुआ करती थी लेकिन इसके बाद दीपक कुमार को भारी कीमत चुकानी पड़ी। उस पर हमला हुआ। उसने अपनी शिकायत में अमन स्वेदिया, सिद्धांत बडोनी, भूप्पी चैधरी और अन्य लोगों के नाम दिए लेकिन पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर में नामजद आरोपियों का उल्लेख नहीं है। गत् दिनों खबरें पढ़ने को मिलीं कि दीपक कुमार का जिम आर्थिक संकट से गुजर रहा है और सामाजिक बहिष्कार के कारण उसका व्यवसाय बुरी तरह प्रभावित हो चुका है।
‘द वायर’ की रिपोर्ट में बताया गया है कि अमन स्वेदिया नाम का एक व्यक्ति जो स्वयं को डिजिटल क्रिएटर बताता है और खुलकर स्वीकार करता है कि वह बजरंग दल से जुड़ा हुआ है, घृणा के इस व्यापार का बड़ा सौदागर है। उसके वीडियो देखने पर यह स्पष्ट होता है कि यह कोई मोबाइल फोन से अचानक बना लिया गया कंटेंट नहीं है। यहां कैमरा है, वायरलेस माइक्रोफोन है, एडिटिंग है, नाटकीय प्रस्तुति है और सबसे महत्वपूर्ण है एक सुनियोजित नैरेटिव। अमन स्वेदिया से जुड़ा फेसबुक पेज “Dehradun Exclusives” लगभग चार लाख फाॅलोअर्स के करीब पहुंच चुका है। इस पेज पर अपलोड होने वाले वीडियो लाखों और कई बार करोड़ों लोगों तक पहुंचते हैं।
एक वीडियो में अमन स्वेदिया एक हिंदू मकान मालिक से कह रहा है कि मुसलमानों को दुकान किराए पर मत दो। वह कह रहा है कि अगर किसी हिंदू को कम किराए पर भी दुकान देनी पड़े तो दे दो लेकिन मुसलमान को मत दो क्योंकि वह कथित तौर पर ‘जिहाद’ के लिए दुकान लेता है। वह ‘लव जिहाद’, ‘थूक जिहाद’ और ‘नेम जिहाद’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल खुलकर कर इस वीडियो में कर रहा है। यह वीडियो लगभग 25 लाख व्यूज अब तक पा चुकी है। सोचिए, एक ऐसी वीडियो जिसमें खुलेआम मुसलमानों का बहिष्कार की अपील की जा रही है वह लाखों लोगों तक पहुंचती है और सोशल मीडिया का एल्गोरिद्म उसे और आगे भी बढ़ा रहा है।
‘द वायर’ की इस रिपोर्ट में अमन स्वेदिया के कई वीडियो का उल्लेख है। 14 मई को अपलोड किए गए एक वीडियो में वह और उसके साथी एक घर में पहुंचते हैं और आरोप लगाते हैं कि वहां रहने वाला व्यक्ति अपनी पहचान छिपाकर रह रहा है। जब मकान मालिक से सवाल पूछे जाते हैं तो वह पलटकर कहता है ‘यह मेरा घर है, मैं जिसे चाहूं किराए पर रखूं, आपको क्या दिक्कत है?’ यह उत्तर इतनी तसल्ली तो देता है कि उत्तराखण्ड का पूरा समाज अभी भी भीड़तंत्र के सामने झुका नहीं है।
10 मई के एक वीडियो में अमन स्वेदिया एक बाजार में खड़ा होकर घोषणा करता है कि यदि कुछ दुकानें खाली नहीं कराई गईं तो बजरंग दल उन्हें तोड़ देगा। रिपोर्ट के अनुसार उस समय पुलिसकर्मी भी आस-पास मौजूद थे। 8 मई के एक वीडियो में मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार की अपील की जा रही है। 30 अप्रैल को एक मुस्लिम युवक को सड़क पर रोककर कार से बाहर निकाला जाता है और सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाता है। 25 अप्रैल के वीडियो में एक मुस्लिम युवक पर हिंदू लड़की को भगाने का आरोप लगाया जाता है। 23 अप्रैल को एक होटल के कमरे में घुसकर एक मुस्लिम युवक और एक महिला से पूछताछ की जाती है। युवक पर ‘लव जिहाद’ का आरोप लगाया जा रहा है। 18 अप्रैल को मदरसे में पढ़ने वाले बच्चों से पूछताछ की जाती है और ‘स्टाॅप मदरसा जिहाद’ जैसे नारे लगाए जाते हैं। 10 अप्रैल को किराए पर रहने वाले मुस्लिम युवकों को निशाना बनाया जाता है और प्राॅपर्टी डीलरों को चेतावनी दी जाती है कि मुसलमानों को मकान न दें। 3 अप्रैल को एक होटल के कमरे में घुसकर मोहम्मद साहिल नाम के युवक से पूछताछ की जाती है। इन वीडियो के व्यूज लाखों में नहीं बल्कि कई मामलों में करोड़ों में हैं।
अमन स्वेदिया के साथ इस ‘महान कार्य’ में एक महापुरुष और है जिनका नाम है सिद्धांत बडोनी। कभी मकान मालिकों को धमकाते हुए, कभी दुकानदारों से सवाल करते हुए, कभी मुस्लिम युवकों पर आरोप लगाते हुए, यह केवल दो व्यक्तियों की कहानी नहीं रह जाती बल्कि एक ऐसे नेटवर्क की तस्वीर है जो लगातार कंटेंट तैयार कर रहा है और यह मॉडल उत्तराखण्ड तक सीमित नहीं है। इस खबर में भाजपा विधायक रविंद्र नेगी का जिक्र किया गया है। रविंद्र नेगी पहले मुस्लिम दुकानदारों को निशाना बनाने वाले अभियानों और दुकानों पर नाम लिखवाने की मांग को लेकर चर्चा में रहे। बाद में वे ‘माननीय’ बन गए। यह प्रमाणित करता है कि साम्प्रदायिक मुद्दों पर लोकप्रियता हासिल करना राजनीतिक सफलता की सीढ़ी बन चुका है।
रिपोर्ट में बाॅबी चैधरी का भी उल्लेख है जिसके इंस्टाग्राम पर पचास हजार से अधिक फॉलोअर्स बताए गए हैं। उसकी प्रोफाइल पर “DM for Paid Promotion” लिखा हुआ है। यानी यह केवल विचारधारा का मामला नहीं बल्कि एक कारोबारी मॉडल भी हो सकता है। इसी तरह दक्ष चैधरी का नाम आता है जिसके इंस्टाग्राम पर 33 लाख से अधिक फाॅलोअर्स हैं। ‘द वायर’ की खबर के अनुसार मुस्लिम विरोधी कंटेंट ने उसे बड़ी लोकप्रियता दिलाई है।
अब पैटर्न समझिए पहले हिंसा और उसकी रिकॉर्डिंग कैमरा पहले तैयार होता है। माइक्रोफोन पहले लगा लिया जाता है। नैरेटिव पहले से तय होता है। फिर किसी व्यक्ति, दुकान, होटल, घर या परिवार को निशाना बनाया जाता है। वीडियो रिकॉर्ड होती है। उसे सोशल मीडिया पर अपलोड किया जाता है। लाखों व्यूज आते हैं। फाॅलोअर्स बढ़ते हैं। प्रभाव बढ़ता है और फिर वही प्रभाव राजनीतिक तथा सामाजिक ताकत में बदलने लगता है। यानी नफरत अब केवल एक विचारधारा नहीं रही वरन् वह एक डिजिटल उद्योग बनती जा रही है।
सब कुछ खुल्लम खुल्ला हो रहा है और राज्य सरकार खामोश है। यदि कोई व्यक्ति कानून अपने हाथ में लेकर लोगों से उनकी धार्मिक पहचान पूछ रहा है, दुकानों और घरों में घुस रहा है, आर्थिक बहिष्कार की अपील कर रहा है, लोगों को सार्वजनिक रूप से अपमानित कर रहा है और यह सब कैमरे पर रिकॉर्ड करके लाखों लोगों तक पहुंचाता है तो फिर कानून का शासन कहां है? क्या किसी लोकतांत्रिक राज्य में भीड़ यह तय करेगी कि किसे दुकान किराए पर मिलेगी? कौन होटल में रुकेगा? कौन किससे प्रेम करेगा और कौन किस नाम से व्यापार करेगा?
मैं फिर अपने बचपन के रानीखेत की ओर लौटता हूं। मुझे वह उत्तराखण्ड याद है जहां लोग एक-दूसरे के धर्म नहीं गिनते थे। मुझे वह उत्तराखण्ड याद है जहां इंसानियत सबसे बड़ा धर्म थी। मुझे वह उत्तराखण्ड याद है जिस पर गर्व किया जा सकता था। आज जब देवभूमि की पहचान मंदिरों से ज्यादा वायरल नफरत भरे वीडियो से होने लगे तो आत्ममंथन की आवश्यकता है। सवाल केवल मुसलमानों का नहीं है। सवाल केवल बजरंग दल का भी नहीं है। सवाल उत्तराखण्ड की आत्मा का है। सवाल यह है कि क्या हम अपनी देवभूमि को उसके मूल स्वरूप में बचा पाएंगे या फिर एक दिन इतिहास लिखेगा कि हिमालय की गोद में बसी एक शांत भूमि को कैमरों, एल्गोरिद्म और नफरत की राजनीति ने बदल बर्बाद कर दिया।