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घोटाले की गूंज या सियासी शोर?

चुनावी मौसम में आरोपों की गूंज, सत्ता की सफाई और सच की तलाश, असम के मुख्यमंत्री पर लगे आरोपों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत में राजनीति और पारदर्शिता साथ-साथ चल भी रहे हैं या नहीं? और ऐसे हर विवाद के बीच ‘पनामा पेपर्स’ की याद हमें यह बताती है कि सत्ता चाहे जितनी मजबूत क्यों न हो, उसकी परतें आखिरकार खुलती ही हैं

विधानसभा चुनाव के बीच किसी मुख्यमंत्री पर हजारों करोड़ के भ्रष्टाचार के आरोप केवल एक राजनीतिक बयान नहीं बल्कि लोकतंत्र की साख पर सीधा सवाल होता है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर कांग्रेस द्वारा लगाए गए आरोपों ने ठीक यही स्थिति पैदा कर दी है। गत् सप्ताह कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने दावा किया कि मुख्यमंत्री के परिवार, पत्नी और पुत्र के नाम पर विदेशों में कम्पनियां हैं, और इन कम्पनियों के जरिए भारी-भरकम वित्तीय लेन-देन हुआ है। यह आरोप यूं ही हवा में नहीं दागेे गए बल्कि खेड़ा ने हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी के नाम से जारी तीन पासपोर्टों की काॅपी समेत कई दस्तावेज सार्वजनिक करे।

भारतीय राजनीति में आरोप लगाना जितना आसान है, उतना ही आसान है उन्हें ‘राजनीतिक साजिश’ बताकर खारिज कर देना। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी यही किया। उन्होंने आरोपों को निराधार बताया, कांग्रेस पर चुनावी हथकंडा अपनाने का आरोप लगाया और पवन खेड़ा को कानूनी नोटिस भेजने की बात कही। यह दृश्य नया नहीं है, आरोप लगते हैं, सफाई आती है और मामला जनता के विवेक पर छोड़ दिया जाता है, मगर असली सवाल यह है कि क्या हर बार जनता को केवल आरोप और सफाई के बीच ही चुनाव करना होगा? क्या सच तक पहुंचने का कोई ठोस तंत्र है या नहीं? यहीं पर यह पूरा घटनाक्रम एक पुरानी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण घटना की याद दिलाता है, ‘पनामा पेपर्स’। यह केवल एक पत्रकारिता का खुलासा नहीं था बल्कि यह उस वैश्विक ढांचे की पोल खोलने वाली घटना थी जिसमें अमीर और ताकतवर लोग कानून के भीतर रहते हुए भी उससे बच निकलने के रास्ते बना लेते हैं।
2016 में जब पनामा पेपर्स सामने आए तो दुनिया भर की राजनीति हिल गई थी। 1.15 करोड़ दस्तावेजों का यह लीक यह दिखाने के लिए काफी था कि सत्ता और सम्पत्ति का गठजोड़ किस स्तर तक पहुंच चुका है। पनामा की लाॅ फर्म ‘मोसैक फोंसेका’ के जरिए बनाई गई ऑफशोर कम्पनियों के जाल में दुनिया के बड़े-बड़े नेता, उद्योगपति और प्रभावशाली लोग शामिल थे।
यहां एक बात समझना जरूरी है कि ऑफशोर कम्पनी बनाना अपराध नहीं है लेकिन सवाल यह है कि इन्हें बनाया क्यों जाता है? क्या यह सिर्फ व्यापार की सुविधा के लिए है या फिर टैक्स से बचने, सम्पत्ति छिपाने और जवाबदेही से दूर रहने का एक सुनियोजित तरीका है?
‘पनामा पेपर्स’ ने यह भ्रम तोड़ दिया कि सब कुछ ‘कानूनी’ है इसलिए सब कुछ ‘सही’ भी है। इसने दिखाया कि कानून के शब्दों के बीच भी कितनी बड़ी खामोशियां छिपी होती हैं।
‘पनामा पेपर्स’ में भारत से जुड़े कई नाम भी सामने आए थे। इनमें प्रमुख रूप से अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन, डीएलएफ रियल स्टेट कम्पनी के मालिक के.पी. सिंह और गरवारे परिवार समेत कई कारोबारी और प्रभावशाली लोगों के नाम शामिल थे। इन सभी ने किसी भी तरह की अवैध गतिविधि से इनकार किया लेकिन इन नामों के सामने आने भर से यह स्पष्ट हो गया कि आॅफशोर नेटवर्क भारत के भीतर भी गहराई तक फैला हुआ है और सबसे अहम बात, इस पूरे खुलासे और उससे जुड़ी जांचों में भारत से सम्बंधित लगभग 20,078 करोड़ रुपए की बेनामी सम्पत्तियों का पता चला, जिनमें से करीब 13,800 करोड़ रुपए पर टैक्स वसूली की कार्रवाई भी की गई। यह आंकड़ा सिर्फ एक वित्तीय भर डेटा नहीं है बल्कि यह उस समानांतर आर्थिक ढांचे की झलक है जो कानून के दायरे के बाहर नहीं, बल्कि उसकी आड़ में चलता है।
अगर इतिहास की तरफ देखें तो काले धन और विदेशों में सम्पत्ति छिपाने का सिलसिला दशकों पुराना है। ‘हवाला कांड’ से लेकर स्विस बैंक खातों तक, बार-बार यह सवाल उठता रहा है कि आखिर भारतीय धन देश से बाहर क्यों जाता है और उसे वापस लाने में इतनी मुश्किल क्यों होती है?
90 के दशक का हवाला कांड याद कीजिए कि कैसे राजनीतिक और कारोबारी नेटवर्क के जरिए पैसा देश से बाहर भेजा गया और फिर उसे अलग-अलग माध्यमों से घुमाकर वैध बनाया गया। उस समय भी बड़े-बड़े नाम सामने आए थे लेकिन अंत में सजा कितनों को हुई, यह सवाल आज भी कायम है।
फिर आया ‘ब्लैक मनी’ का दौर, जब हर चुनाव में विदेशों में जमा भारतीय धन को वापस लाने का वादा किया जाने लगा। स्विस बैंक खातों में भारतीयों के पैसे को लेकर लगातार दावे किए गए लेकिन सच्चाई यह है कि आज तक उस पूरे धन का स्पष्ट और अंतिम आंकड़ा सामने नहीं आ सका। सरकारों ने कानून बनाए, जांच एजेंसियां सक्रिय हुईं, अंतरराष्ट्रीय समझौते हुए लेकिन क्या समस्या खत्म हुई? या सिर्फ उसका तरीका बदल गया?
2015 में काला धन कानून लाया गया, जिसका उद्देश्य विदेशों में छिपी सम्पत्तियों पर कार्रवाई करना था। यह एक मजबूत कदम माना गया लेकिन इसके बाद भी समय-समय पर नए खुलासे सामने आते रहे। ‘पनामा पेपर्स’ के बाद ‘पैराडाइज पेपर्स’ ने फिर वही कहानी दोहराई, बस नाम और स्थान बदल गए, तरीका वही रहा। यानी समस्या कहीं गहराई में है। यह केवल कानून का सवाल नहीं है बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और नैतिकता का सवाल भी है। अब अगर हम असम के मुख्यमंत्री पर लगे आरोपों को इसी संदर्भ में देखें तो यह मामला सिर्फ एक राज्य या एक नेता तक सीमित नहीं रह जाता। यह उस बड़े सिस्टम का हिस्सा बन जाता है जहां सत्ता, सम्पत्ति और गोपनीयता एक-दूसरे में उलझे हुए हैं।
यह जरूरी नहीं है कि हर आरोप सही हो लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि हर आरोप की जांच हो ईमानदारी से, निष्पक्षता से और समयबद्ध तरीके से। समस्या यह है कि अक्सर जांच भी राजनीति का हिस्सा बन जाती है। जो सत्ता में होता है, उसके लिए जांच धीमी पड़ जाती है और जो विपक्ष में होता है उसके लिए वही जांच तेज हो जाती है।
ऐसे में जनता के सामने एक अजीब स्थिति बनती है, सच कहीं बीच में फंस जाता है और शोर दोनों तरफ से बराबर होता है। ‘पनामा पेपर्स’ ने दुनिया को यह सिखाया था कि अगर पत्रकारिता और जांच एजेंसियां मिलकर काम करें तो सबसे मजबूत दीवारें भी गिर सकती हैं। कई देशों में सरकारें गिरीं, नेताओं को इस्तीफा देना पड़ा और कई मामलों में सजा भी हुई लेकिन भारत में अक्सर कहानी अधूरी रह जाती है। खुलासा होता है, बहस होती है, कुछ समय तक हंगामा चलता है और फिर मामला धीरे-धीरे पीछे छूट जाता है। क्या यही हमारी व्यवस्था की सीमा है? या यह एक सोची-समझी चुप्पी है?
असम के इस ताजा विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हम सच में पारदर्शिता चाहते हैं या सिर्फ उसका दिखावा करते हैं। क्या हम आरोपों की राजनीति से आगे बढ़कर जवाबदेही की
राजनीति तक पहुंच पाए हैं?
लोकतंत्र में सत्ता का मतलब सिर्फ चुनाव जीतना नहीं होता, बल्कि हर फैसले और हर वित्तीय गतिविधि के लिए जवाबदेह होना भी होता है। अगर कोई नेता या उसका परिवार विदेशों में कम्पनियां बनाता है, तो यह उसका अधिकार हो सकता है, लेकिन उस पर सवाल उठना भी उतना ही स्वाभाविक है और उन सवालों का जवाब देना भी उतना ही जरूरी है। अंततः यह पूरा मामला हमें एक असहज लेकिन जरूरी सच्चाई के सामने खड़ा करता है कि भारत में भ्रष्टाचार औरकाले धन की समस्या केवल अतीत की कहानी नहीं है बल्कि यह आज भी हमारे वर्तमान का हिस्सा है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब इसके तरीके और अधिक जटिल हो गए हैं। ‘पनामा पेपर्स’ ने परतें हटाईं थीं। आज फिर वही जरूरत है क्योंकि अगर परतें नहीं हटेंगी तो सच कभी सामने नहीं आएगा और अगर सच सामने नहीं आएगा तो लोकतंत्र सिर्फ एक प्रक्रिया बनकर रह जाएगा, विश्वास नहीं।

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