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सपा की नजर अब गुर्जरों पर यादव समीकरणों से आगे बढ़ते अखिलेश

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण देखें तो यहां यादव वोट तुलनात्मक रूप से कम हैं। जाट वोटों के सबसे बड़े दिग्गज नेता जयंत चौधरी भाजपा के साथ हैं। ऐसे में यहां समाजवादी पार्टी को नए सामाजिक आधार की जरूरत है। इसलिए पार्टी गुर्जरों को पूरी तरह से अपने खेमे में लाने के लिए लालायित है। 28 मार्च को जेवर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का उद्घाटन और उसके अगले ही दिन दादरी में अखिलेश यादव की ‘भाईचारा भागीदारी रैली’ ने उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव का शंखनाद कर दिया है। जिस तरह एक ही दिन के अंतराल में जिला गौतमबुद्ध नगर में दो राजनीतिक दलों ने अपनी जनशक्ति का प्रदर्शन किया है उससे चर्चा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश सियासी रणभूमि बन रहा है
22 सितम्बर 2021
स्थान: उत्तर प्रदेश के दादरी का मिहिर भोज काॅलेज।
कार्यक्रम: सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा का अनावरण।
मुख्य अतिथि: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
मिहिर भोज की मूर्ति अनावरण के इस कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री के सामने ही विवाद शुरू हो गया था। कारण शिलापट्ट पर लिखे ‘गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज’ में से ‘गुर्जर’ शब्द पर कालिख पोतना था जिसके बाद राजपूत और गुर्जर समुदाय आमने-सामने आ गए थे। उत्तर प्रदेश से शुरू हुई जाति की यह लड़ाई पूरे देश में फैल गई। इस तरह अच्छा-खासा मुख्यमंत्री का कार्यक्रम विवादों का केंद्र बन गया।

29 मार्च 2026
स्थान: उत्तर प्रदेश के दादरी का मिहिर भोज काॅलेज।
कार्यक्रम: समाजवादी पार्टी की ‘समाजवादी समानता भाईचारा रैली’।
 मुख्य अतिथि : उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव।
मंच से अखिलेश यादव का ऐलान: राजनीति में प्रतीकों का बड़ा महत्व होता है। लखनऊ में गोमती किनारे सम्राट मिहिर भोज की मूर्ति लगाएंगे। साथ ही मेरठ की क्रांति के जननायक धन सिंह कोतवाल और विजय सिंह पथिक की मूर्ति को भी गौतमी नदी के किनारे पर स्थापित किया जाएगा। मूर्ति प्रकरण पर पहले से ही भाजपा से नाराज हुए बैठे गुर्जर समाज को अखिलेश यादव ने इस तरह का ऐलान कर समाजवादी पार्टी से जोड़ने का दांव चल दिया।

अखिलेश यादव का ये ऐलान भाजपा की मुश्किल बढ़ाने वाला साबित हो सकता है। गुर्जर मिहिर भोज की विरासत पर अपना दावा करते हैं। वहीं राजपूत उनको क्षत्रिय बताकर इसका विरोध करते हैं। ऐसे में यह भी तय है कि भाजपा के लिए इस प्रकरण पर अखिलेश यादव की तरह कोई स्पष्ट लाइन लेना आसान नहीं होगा। वहीं दूसरी तरफ अखिलेश ने ठाकुरों की नाराजगी की परवाह किए बिना ही गुर्जरों के इस भावनात्मक मुद्दे पर अपना समर्थन देकर उन्हें अपने पाले में लाने की रणनीति बना ली है।

इस रैली के जरिए अखिलेश यादव ने साफ संकेत दिया है कि उनकी राजनीति अब केवल पारम्परिक यादव-मुस्लिम समीकरण तक सीमित नहीं रहने वाली है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण देखें तो यहां यादव वोट तुलनात्मक रूप से कम हैं। जाट वोटों के सबसे बड़े दिग्गज नेता जयंत चैधरी भाजपा के साथ हैं। ऐसे में यहां समाजवादी पार्टी को नए सामाजिक आधार की जरूरत है। इसलिए पार्टी गुर्जरों को पूरी तरह से अपने खेमे में लाने के लिए लालायित है।

28 मार्च को जेवर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का उद्घाटन और उससे अगले ही दिन दादरी में अखिलेश यादव की भाईचारा भागीदारी रैली ने उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव का शंखनाद कर दिया है। जिस तरह एक ही दिन के अंतराल में जिला गौतम बुद्ध नगर में दो राजनीतिक दलों ने अपनी जनशक्ति का प्रदर्शन किया है उससे चर्चा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश सियासी रणभूमि बन रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अखिलेश यादव की दोनों रैलियों में सबसे ज्यादा चर्चा दादरी रैली को लेकर हो रही है। हालांकि रैलियों की भीड़ की तुलना करें तो जेवर में दादरी से कही अधिक भीड़ थी। लेकिन दादरी की रैली में जुटी भीड़ का जोश देखने लायक था। गौतमबुद्ध नगर के दादरी में जिस तरह से समाजवादी पार्टी की भाईचारा भागीदारी रैली लोगों की जुबान पर है उसने भाजपा की नींद उड़ा दी है। पिछले 10 सालों में यह पहला मौका है जब समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में अपने मजबूत गढ़ से इतर जाकर इतनी बड़ी रैली की। अखिलेश की यह रैली भाजपा के मजबूत दुर्ग माने जाने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 2027 की चुनावी रणनीति का एक हिस्सा बताई जा रही है।

उत्तर प्रदेश में जयंत चैधरी से अखिलेश यादव का गठबंधन टूटा तो उन्होंने भाजपा के संग केमिस्ट्री बना ली। जिसका उपहार जयंत चैधरी को केंद्र में मंत्री पद मिला । पश्चिमी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का एकमात्र हमराही जयंत चैधरी थे लेकिन उनके जुदा होते ही समाजवादी पार्टी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अकेली और अलग-थलग पड़ गई थी।

राजनीतिक गुणा भाग से देखा जाए तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ मुस्लिम वोटों के अलावा कोई अपना पुख्ता वोट बैंक नहीं है क्योंकि यादव फिरोजाबाद और सम्भल के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नहीं हैं। पूर्व में जयंत चैधरी समाजवादी पार्टी के साथ थे तो उन्हें यहां जाट-मुस्लिम समीकरण से सफलता मिली थी लेकिन राष्ट्रीय लोकदल के पाला बदलने के बाद अखिलेश यादव के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश दूर की कौड़ी बन गया था।

2027 के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर अखिलेश यादव को एक बार फिर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन बनानी है। ऐसे में उन्हें गुर्जर समाज में एक ऐसे जमीनी नेता की तलाश थी जिनके सहारे वह पश्चिम में अपनी नैया पार लगा सकें। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कभी देहात मोर्चा के जरिए अपनी सामाजिक और राजनीतिक पैठ बना चुके राजकुमार भाटी के रूप में अखिलेश की यह तलाश पूरी हो गई। बहरहाल, गुर्जर समाज के जमीनी नेताओं में गिने जाने वाले राजकुमार भाटी को आगे कर अखिलेश यादव पश्चिमी उत्तर के गुर्जरों में नए सियासी फाॅर्मूले को अमलीजामा पहनाने में जुट गए हैं।

जयंत चैधरी के जाने के बाद अखिलेश यादव ने अपना गियर बदला और पश्चिम के समीकरण में जाट मुसलमान की जगह गुर्जर और मुसलमान का समीकरण बनाने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। गौरतलब है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यादव आबादी बहुत छोटी है ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम यादव समीकरण नहीं चल सकता था।

अपनी पार्टी के बेबाक प्रवक्ता राजकुमार भाटी के साथ ही पहले से अखिलेश यादव के पास अतुल प्रधान जैसा संघर्षशील जुझारू गुर्जर चेहरा है जिसका मेरठ के आस-पास के गुर्जर समुदाय में अच्छा प्रभाव माना जाता है। इसके अलावा युवा नेत्री कैराना से लोकसभा सांसद इकरा हसन भी है। जिनकी पहले से ही मुस्लिम गुर्जरों में बड़ी पकड़ बनी हुई है। इकरा हसन को जिताने में मुस्लिमों से ज्यादा गुर्जरों का हाथ रहा है क्योंकि इकरा हसन मुस्लिम गुर्जर है।

अखिलेश यादव को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अतुल प्रधान की सक्रियता और इकरा हसन का गुर्जर मुस्लिम समीकरण उनके चुनावी रथ में पहियों का काम कर सकता है जबकि अखिलेश ने इस रथ का सारथी राजकुमार भाटी को बनाया है।

गौरतलब है कि गुर्जरों को अपने पाले में लाने के लिए अखिलेश यादव ने एक रणनीति के तहत राजकुमार भाटी को पिछले कुछ समय से सक्रिय किया हुआ था। पिछले साल के नवम्बर माह से ही राजकुमार भाटी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जनसम्पर्क अभियान में जुटे हुए थे। उन्होंने गांव-गांव गुर्जर समाज की चौपाल लगाकर लोगों को जागरूक किया।

उन्होंने गुर्जरों में राजनीतिक जागरूकता लाने का काम किया और बताया कि वे सिर्फ दादरी, जेवर, लोनी आदि तक ही सीमित नहीं है बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 32 जिलों में अपना वर्चस्व बनाए हुए हैं। यही नहीं बल्कि राजकुमार भाटी ने इन 32 जिलों की हर विधानसभा में सर्वे कराया जिसमें लोगों के सामने यह बात रखी की गुर्जर समुदाय 140 विधानसभा सीटों पर अपना सामाजिक और राजनीतिक दबदबा रखता है।

पिछले 5 महीने से राजकुमार भाटी ने गुर्जर समाज में जन चेतना का काम किया। उन्हें उत्साहित किया कि अगर वह चाहे तो पश्चिम उत्तर प्रदेश में अपना राजनीतिक वजूद बना सकते हैं। इसके लिए उन्होंने
समाजवादी पार्टी को बेहतर ऑप्शन बताया। साथ ही उन्होंने भाजपा द्वारा गुर्जर समाज को अनदेखी के भी मामले सामने रखे। 32 जिलों की जनसभाओं में राजकुमार भाटी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दादरी रैली में हुए मिहिरभोज मूर्ति प्रकरण पर भी गुर्जरों की दुखती रग पर हाथ रखा और उन्हें विश्वास दिलाया कि उनके ऐतिहासिक और आजादी के योद्धाओं को अगर कोई सम्मान दे सकता है तो वो समाजवादी पार्टी है।
यही वजह रही कि 29 अप्रैल को जब अखिलेश यादव दादरी रैली में आए तो उन्होंने मूर्ति प्रकरण को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने गुर्जरों से वादा किया कि अगर 2027 में उनकी सरकार बनती है तो सबसे पहले वह
भाजपा द्वारा गुर्जरों के साथ किए अपमान को लखनऊ में गौतमी पर मिहिर भोज की मूर्ति लगाकर चुकता करने का काम करेंगे। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि अखिलेश यादव की यही घोषणा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गुर्जरों को समाजवादी पार्टी से जोड़ने में फेविकोल का काम करेगी।
राजकुमार के सिर सजेगा विधायक या सांसद का ताज!
बीते 29 मार्च को दादरी में समाजवादी पार्टी की अपार सफलता के बाद चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। कहा जा रहा है कि राजकुमार भाटी को रैली की सफलता का ईनाम जल्द ही मिलेगा। समाजवादी पार्टी उनको या तो विधान परिषद सदस्य बनाएगी या राज्यसभा में भेजकर उनका प्रमोशन करेगी।
राजनीतिक पंडितों का आकलन है कि समाजवादी पार्टी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजकुमार भाटी के रूप में तुरुप का इक्का मिल चुका है। दादरी रैली में उन्होंने यह साबित भी कर दिया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाटी के संयोजन में जिस तरह से भीड़ जुटी थी उसका अंदाजा खुद समाजवादी पार्टी तक को नहीं था लेकिन अब समाजवादी पार्टी अच्छी तरह समझ चुकी है कि भाटी सिर्फ अच्छा बोलना ही नहीं जानते बल्कि वह बेहतर राजनीति और सोशियल मैनेजर भी हैं। अब से पहले राजकुमार भाटी को लेकर सिर्फ चर्चाएं ही चल रही थीं कि वे दादरी से अब विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे लेकिन उन्होंने 29 मार्च की रैली में यह कहकर कि वह दादरी से चुनाव नहीं लड़ेंगे लोगों को राजनीतिक गुणा भाग करने पर विवश कर दिया कि चुनाव नहीं लड़ेंगे तो आखिर अब वह करेंगे क्या? क्योंकि राजकुमार भाटी में जिस तरह का टैलेंट है वह सिर्फ एक प्रवक्ता तक सीमित तो रहने वाला नहीं है। ऐसे में अब नई चर्चाओं ने जन्म ले लिया है। वह यह कि अखिलेश यादव उनकी प्रतिभा को पहचान चुके हैं और अब वह उन्हें इनाम देने जा रहे हैं। यह ईनाम उन्हें विधायक या सांसद के रूप में मिल सकता है।

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