चाबहार बंदरगाह, जिसे भारत ने पाकिस्तान को बायपास कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का रणनीतिक द्वार बनाया था, अब अमेरिकी प्रतिबंधों, पश्चिम एशिया के युद्ध और बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच गहरे संकट में फंस गया है। सवाल यह नहीं कि परियोजना रुकी है बल्कि यह कि क्या भारत अपनी सामरिक स्वायत्तता बचा पाएगा या वाशिंगटन के दबाव में पीछे हटेगा?

भारत की विदेश नीति और उसकी रणनीतिक स्वायत्तता को लेकर देश के भीतर भी बहस तेज होती जा रही है। भारतीय विपक्ष लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि मौजूदा सरकार और विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिकी दबाव में काम कर रहे हैं। विपक्षी नेताओं के अनुसार, अमेरिका में उद्योगपति गौतम अडानी से जुड़े कानूनी मामलों और तथाकथित ‘एपस्टीन फाइल्स’ जैसे विवादों का इस्तेमाल दबाव के औजार के रूप में किया जा सकता है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है और सरकार इन आरोपों को खारिज करती रही है। इसी संदर्भ में  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक राम माधव का हालिया बयान भी चर्चा में रहा जिसमें उन्होंने अमेरिका में एक कार्यक्रम के दौरान स्वीकार किया कि भारत को कई मौकों पर वैश्विक शक्ति-संतुलन के भीतर काम करना पड़ता है, जिसे आलोचक अमेरिकी दबाव के रूप में देखते हैं जबकि समर्थक इसे व्यावहारिक कूटनीति मानते हैं। इन्हीं बहसों के बीच ईरान का चाबहार बंदरगाह परियोजना एक बार फिर केंद्र में आ गई है क्योंकि यह वही प्रोजेक्ट है जहां भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ और ‘अमेरिकी दबाव’ आमने-सामने दिखाई देते हैं।

भारत की विदेश नीति में चाबहार बंदरगाह एक समय ‘गेम चेंजर’ के रूप में देखा जाता था लेकिन 2026 में यह परियोजना उस मोड़ पर पहुंच गई है जहां उम्मीद, निवेश और रणनीति, तीनों पर अनिश्चितता की धुंध छा गई है। ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित यह बंदरगाह केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं था बल्कि भारत की ‘कनेक्टिविटी डिप्लोमेसी’ और ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनाॅमी’ का प्रतीक था लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के नए चरण और क्षेत्रीय संघर्षों ने इसे लगभग ठहराव की स्थिति में ला खड़ा किया है।
चाबहार : भूगोल से रणनीति तक
 

भारत और ईरान के बीच चाबहार को विकसित करने का विचार 2003 में सामने आया लेकिन इसे वास्तविक गति 2016 में मिली जब नरेंद्र मोदी ने तेहरान जाकर समझौते को आगे बढ़ाया।

चाबहार का महत्व उसकी भौगोलिक स्थिति में निहित है। यह पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए भारत को सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचा देता है, एक ऐसा क्षेत्र जहां भारत की आर्थिक और रणनीतिक दिलचस्पी लम्बे समय से रही है लेकिन भौगोलिक बाधाओं के कारण पहुंच सीमित रही।
यह बंदरगाह दो टर्मिनलों, शाहिद कलंतरी और शाहिद बेहिश्ती में विभाजित है जिनमें भारत का निवेश मुख्य रूप से शाहिद बेहिश्ती में रहा है। भारत ने यहां उपकरण, क्रेन और अन्य बुनियादी ढांचे के लिए करीब 120 मिलियन डॉलर का निवेश किया जबकि कुल प्रतिबद्धता लगभग 500 मिलियन डॉलर तक बताई जाती रही है।
चाबहार का दूसरा महत्त्वपूर्ण पहलू इसका संबंध इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर से है। यह 7,000 किलोमीटर से अधिक लम्बा मल्टी-माॅडल नेटवर्क भारत को ईरान के जरिए रूस और यूरोप से जोड़ने की क्षमता रखता है। यूक्रेन युद्ध के बाद जब पारम्परिक यूरोपीय व्यापार मार्ग बाधित हुए, तब ‘इन्सटक’ को एक व्यावहारिक विकल्प के रूप में फिर से देखा जाने लगा।
ग्वादर का संतुलन : एक अनकहा उद्देश्य
चाबहार की रणनीतिक उपयोगिता केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। यह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के जवाब में भी देखा जाता है जिसे चीन ने विकसित किया है और जो चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) का अहम हिस्सा है।
ग्वादर और चाबहार के बीच दूरी लगभग 140 किलोमीटर है लेकिन भू-राजनीतिक दृष्टि से यह दूरी बहुत बड़ी है। ग्वादर में चीन की बढ़ती उपस्थिति भारत के लिए चिंता का विषय रही है, खासकर इस सम्भावना को लेकर कि यह बंदरगाह भविष्य में सैन्य उपयोग के लिए भी इस्तेमाल हो सकता है। ऐसे में चाबहार भारत को उसी समुद्री क्षेत्र में एक संतुलन प्रदान करता है, एक तरह से ‘काउंटर-वेट’ के रूप में।
अमेरिकी प्रतिबंध : परियोजना की सबसे बड़ी बाधा
चाबहार की कहानी को समझने के लिए अमेरिकी प्रतिबंधों को समझना अनिवार्य है। 2015 के ईरान परमाणु समझौते के बाद जब प्रतिबंधों में ढील मिली, तब भारत ने इस परियोजना को आगे बढ़ाया लेकिन 2018 में डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा इस समझौते से बाहर निकलने और ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति लागू करने के बाद स्थिति बदल गई। हालांकि उस समय चाबहार को एक विशेष छूट दी गई थी क्योंकि यह अफगानिस्तान के विकास के लिए महत्त्वपूर्ण माना गया था और उस समय काबुल में अमेरिका समर्थित सरकार थी लेकिन 2025 में ट्रम्प प्रशासन ने इस छूट को समाप्त करने का निर्णय लिया। भारत ने कूटनीतिक प्रयासों के जरिए इसे अप्रैल 2026 तक बढ़वाया लेकिन इसके बाद कोई राहत नहीं मिली।
इसका परिणाम यह हुआ कि अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग और फाइनेंस लगभग असंभव हो गई। बीमा कंपनियां परियोजना से दूर हो गईं। निजी क्षेत्र की भागीदारी खत्म हो गई। भारत की सरकारी कम्पनी आईपीएल की गतिविधियां सीमित हो गईं। यानी परियोजना तकनीकी रूप से ‘जिंदा’ है लेकिन व्यावहारिक रूप से ठहर चुकी है।
पश्चिम एशिया का युद्ध और समुद्री जोखिम
चाबहार संकट को केवल प्रतिबंधों के नजरिए से देखना अधूरा होगा। पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव, खासकर ईरान और अमेरिका, इजराइल के बीच, ने इस परियोजना की जटिलता को कई गुना बढ़ा दिया है।
ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण का दावा और अमेरिका की नौसैनिक गतिविधियां इस क्षेत्र को अत्यधिक संवेदनशील बना चुकी हैं। भारत की ऊर्जा सुरक्षा इस मार्ग पर निर्भर है, भारत अपनी तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से प्राप्त करता है। ऐसे में चाबहार केवल व्यापार का नहीं बल्कि ऊर्जा सुरक्षा का भी प्रश्न बन जाता है।

अफगानिस्तान फैक्टर : बदलता समीकरण
चाबहार परियोजना का एक प्रमुख उद्देश्य अफगानिस्तान तक भारत की पहुंच सुनिश्चित करना था लेकिन तालिबान के सत्ता में आने के बाद यह समीकरण बदल गया है।
भारत और तालिबान के सम्बंध अभी भी सीमित और एक-दूसरे को परखने के दौर में हंै। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ते तनाव ने भी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप, चाबहार का वह उपयोग जिसके तहत भारत अफगानिस्तान को सहायता भेजता था, अब पहले जैसा सक्रिय नहीं रहा।
भारत की कूटनीतिक दुविधा
चाबहार संकट का सबसे जटिल पहलू भारत की कूटनीतिक स्थिति है। एक ओर भारत और अमेरिका के बीच रक्षा, तकनीक और इंडो-पैसिफिक सहयोग तेजी से बढ़ा है। दूसरी तरफ भारत की विदेश नीति पारम्परिक रूप से ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ पर आधारित रही है। ऐसे में भारत खुलकर अमेरिकी प्रतिबंधों का विरोध नहीं कर सकता लेकिन पूरी तरह पीछे हटना भी उसके दीर्घकालिक हितों के खिलाफ है।
कुल मिलाकर चाबहार अब केवल एक बंदरगाह नहीं रहा, यह भारत की विदेश नीति की दिशा और उसकी स्वतंत्र निर्णय क्षमता की परीक्षा बन चुका है। यह तय करेगा कि भारत वैश्विक दबावों के बीच अपने
दीर्घकालिक रणनीतिक हितों को किस हद तक सुरक्षित रख पाता है। फिलहाल, यह संतुलन बेहद नाजुक बना हुआ है।

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