तमिलनाडु में आखिरकार अभिनेता से नेता बने सी. जोसफ विजय ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है। उनके साथ नौ मंत्रियों ने भी शपथ ग्रहण ली। कांग्रेस, वाम दलों, वीसीके और आईयूएमएल के समर्थन से बनी यह सरकार राज्य की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव मानी जा रही है क्योंकि लगभग छह दशक बाद पहली बार डीएमके और एआईएडीएमके दोनों ही सत्ता से बाहर होकर विपक्ष की भूमिका में दिखाई देंगी

तमिलनाडु की राजनीति में 10 मई का दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। फिल्मी पर्दे पर वर्षों तक सुपरस्टार की छवि रखने वाले सी. जोसफ विजय ने आखिरकार राजनीतिक सत्ता के शिखर तक पहुंचते हुए मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। चेन्नई के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में आयोजित भव्य समारोह में हजारों समर्थकों, राजनीतिक नेताओं और फिल्म जगत की हस्तियों की मौजूदगी के बीच विजय ने पद एवं गोपनीयता की शपथ ग्रहण की।

विजय के साथ उनकी पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) के नौ नेताओं ने भी मंत्री पद की शपथ ली। इनमें एन. आनंद, आधव अर्जुन, केजी अरुण राज, केए सेंगोट्टैयन, पी. वेंकटरामनन, सीटीआर निर्मल कुमार, राजमोहन, टीके प्रभु और एस. कीर्तन शामिल हैं। यह मंत्रिमंडल फिलहाल पहला चरण माना जा रहा है और आने वाले दिनों में सहयोगी दलों को भी सरकार में शामिल किए जाने की संभावना जताई जा रही है।
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी लेकिन बहुमत के आंकड़े से कुछ सीटें पीछे रह गई। इसके बाद कांग्रेस ने विजय को समर्थन देने का फैसला किया। कांग्रेस के अलावा कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ इंडिया, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (एम), वीसीके और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने भी विजय सरकार को समर्थन दिया। इन दलों के समर्थन से गठबंधन ने बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया और विजय के लिए सत्ता का रास्ता साफ हो गया।
शपथ ग्रहण समारोह केवल राजनीतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि शक्ति प्रदर्शन भी बन गया। स्टेडियम के बाहर सुबह से ही विजय समर्थकों की भारी भीड़ जमा हो गई थी। ‘थलपति सीएम’ के नारे लगातार गूंजते रहे। कई समर्थक विजय की फिल्मों के पोस्टर और पार्टी के झंडे लेकर पहुंचे थे। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि तमिलनाडु में किसी अभिनेता के लिए इतना बड़ा राजनीतिक जन-समर्थन पहले केवल एम.जी. रामचंद्रन और जे. जयललिता के दौर में देखने को मिला था।
मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद विजय ने अपने संबोधन में कहा कि यह केवल सरकार बदलने का क्षण नहीं बल्कि ‘तमिलनाडु में नए राजनीतिक युग की शुरुआत’ है। विजय ने कहा कि उनकी सरकार सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और पारदर्शिता के सिद्धांतों पर चलेगी। उन्होंने मंच से कहा, ‘‘यह सेकुलर राजनीति की नई शुरुआत है। तमिलनाडु ने नफरत और विभाजन की
राजनीति को अस्वीकार कर दिया है। जनता ने विकास, शिक्षा और समान अवसर की राजनीति को चुना है।’’
विजय ने अपने सम्बोधन में युवाओं का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उनकी जीत का सबसे बड़ा आधार राज्य के युवा मतदाता रहे, जिन्होंने पारंपरिक राजनीति से अलग विकल्प चुनने का साहस दिखाया। विजय ने कहा, ‘‘यह जीत मेरी नहीं, तमिलनाडु के युवाओं की जीत है। यह उन लोगों की जीत है जो बदलाव चाहते थे। अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम उस भरोसे को टूटने न दें।’’
हालांकि विजय का भाषण केवल उत्साह और राजनीतिक संदेश तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने राज्य की आर्थिक स्थिति को लेकर भी गम्भीर चिंता जताई। विजय ने कहा कि नई सरकार को बेहद कठिन वित्तीय परिस्थितियों में काम शुरू करना पड़ रहा है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा, ‘‘राज्य का खजाना लगभग खाली है। पिछली सरकारों ने आर्थिक अनुशासन पर ध्यान नहीं दिया और अब हमें भारी कर्ज तथा वित्तीय दबाव के बीच काम करना होगा।’’
विजय ने कहा कि उनकी सरकार को लोकलुभावन वादों और आर्थिक वास्तविकताओं के बीच संतुलन बनाना पड़ेगा। उन्होंने संकेत दिया कि आने वाले दिनों में सरकार खर्चों की समीक्षा करेगी और प्रशासनिक ढांचे में बड़े सुधार किए जाएंगे। विजय ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई की जाएगी और सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार विजय का यह बयान महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान उनकी पार्टी ने रोजगार, मुफ्त बिजली, शिक्षा सुधार और महिला सुरक्षा जैसे कई बड़े वादे किए थे। अब सत्ता में आने के बाद विजय ने पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि राज्य की आर्थिक स्थिति चुनौतीपूर्ण है।
शपथ ग्रहण समारोह में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की मौजूदगी ने राष्ट्रीय स्तर पर भी इस गठबंधन को चर्चा का विषय बना दिया। राहुल गांधी ने विजय को बधाई देते हुए कहा कि तमिलनाडु ने लोकतांत्रिक और समावेशी राजनीति के पक्ष में फैसला दिया है। इसके अलावा वाम दलों और वीसीके के कई वरिष्ठ नेता भी समारोह में मौजूद रहे।
तमिलनाडु की राजनीति में यह बदलाव इसलिए भी ऐतिहासिक माना जा रहा है क्योंकि 1967 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है जब राज्य की सत्ता किसी ऐसे दल के हाथ में गई है जो पारम्परिक द्रविड़ राजनीति का हिस्सा नहीं रहा। पिछले लगभग छह दशकों से राज्य की राजनीति मुख्य रूप से द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम और आल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कशगम के बीच घूमती रही। कभी डीएमके सत्ता में रहती थी तो कभी एआईएडीएमके लेकिन इस बार दोनों दलों को विपक्ष में बैठना पड़ेगा। डीएमके के लिए यह हार विशेष रूप से बड़ा झटका मानी जा रही है क्योंकि पार्टी को उम्मीद थी कि वह सत्ता-विरोधी लहर के बावजूद वापसी कर लेगी, वहीं एआईएडीएमके पहले से ही नेतृत्व संकट और संगठनात्मक कमजोरी से जूझ रही थी। ऐसे में विजय ने खुद को तीसरे विकल्प के रूप में पेश किया और जनता ने उन्हें मौका दे दिया।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि विजय की लोकप्रियता केवल फिल्मी स्टारडम की वजह से नहीं थी। उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में लगातार सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय रखी, छात्रों और युवाओं से संवाद बनाया और खुद को ‘एंटी-एस्टैब्लिशमेंट’ चेहरे के रूप में स्थापित किया। यही कारण रहा कि पहली बार चुनाव लड़ने के बावजूद उनकी पार्टी ने इतनी बड़ी सफलता हासिल की।
विजय ने अपने भाषण में यह भी कहा कि उनकी सरकार किसी बदले की राजनीति में विश्वास नहीं करेगी। उन्होंने विपक्ष से सहयोग की अपील करते हुए कहा कि तमिलनाडु के विकास के लिए सभी दलों को साथ मिलकर काम करना चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के मामलों में किसी को बख्शा नहीं जाएगा। नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब अपने चुनावी वादों को पूरा करने की होगी। राज्य की आर्थिक स्थिति, बेरोजगारी, उद्योगों में निवेश की कमी और बढ़ते कर्ज जैसे मुद्दे विजय सरकार के सामने तुरंत खड़े दिखाई दे रहे हैं। इसके बावजूद विजय समर्थकों में भारी उत्साह है और उन्हें उम्मीद है कि फिल्मी पर्दे का यह सुपर स्टार राजनीति में भी लम्बी पारी खेलने जा रहा है।
तमिलनाडु की राजनीति में यह बदलाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि राजनीतिक संस्कृति के बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है। विजय ने जिस तरह युवाओं, मध्यम वर्ग और गैर-पारम्परिक मतदाताओं को अपने साथ जोड़ा, उसने यह साबित कर दिया कि राज्य की राजनीति अब केवल द्रविड़ दलों के इर्द-गिर्द सीमित नहीं रह गई है। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि विजय अपनी लोकप्रियता को स्थायी राजनीतिक ताकत में बदल पाते हैं या नहीं लेकिन फिलहाल इतना तय है कि तमिलनाडु में ‘विजय युग’ की शुरुआत हो चुकी है।

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