- दि संडे पोस्ट डेस्क
अंडमान-निकोबार के ग्रेट निकोबार द्वीप पर प्रस्तावित लगभग 92,000 करोड़ रुपए की मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना को लेकर सियासत एक बार फिर से तेज हो गई है। लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने अपने दौरे के बाद इसे देश के इतिहास की सबसे बड़ी ‘इकोलाॅजिकल लूट’ करार देते हुए आरोप लगाया है कि सैकड़ों वर्ग किलोमीटर के घने वर्षावनों की कटाई, आदिवासी समुदायों की अनदेखी और काॅरपोरेट हितों को साधने के लिए यह परियोजना आगे बढ़ाई जा रही है जबकि केंद्र सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा, सामरिक मजबूती और आर्थिक विकास के लिए अनिवार्य बता रही है
जहां आवाम के खिलाफ साजिशें हो शान से
जहां पे बेगुनाह हाथ धो रहे हों जान से
जहां पे लब्जे-अमन एक खौफनाक राज हो
जहां कबूतरों का सरपरस्त एक बाज हो
वहां न चुप रहेंगे हम
कहेंगे हां कहेंगे हम
हमारा हक हमारा हक हमें जनाब चाहिए
जवाब-दर-सवाल है, के इन्कलाब चाहिए
इन्कलाब जिन्दाबाद,
इन्कलाब इन्कलाब
-राम शलभ सिंह
हिंद महासागर के विस्तृत भूभाग में स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप इन दिनों भारत की सबसे महत्वपूर्ण नीतिगत और राजनीतिक बहसों का केंद्र बना हुआ है। 29 अप्रैल 2026 को यहां पहुंचे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने अपने दौरे के बाद जो बयान दिया, उसने इस परियोजना को लेकर पहले से चल रही बहस को और तीखा कर दिया है। उन्होंने इस परियोजना को ‘देश की प्राकृतिक सम्पदा की सबसे बड़ी लूट’ और ‘सबसे बड़ा घोटाला’ बताते हुए आरोप लगाया कि यह विकास के नाम पर पर्यावरण, आदिवासी अधिकारों और पारदर्शिता के सिद्धांतों की अनदेखी है।
दरअसल, ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना, जिसे वर्ष 2021 में शुरू किया गया था, एक बहु-आयामी मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर पहल है, जिसे नीति आयोग के नेतृत्व में आगे बढ़ाया जा रहा है। इस परियोजना के तहत गैलेथिया बे, पेम्मया बे और नंजप्पा बे जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य प्रस्तावित हैं, जो पारम्परिक रूप से निकोबारी समुदाय के निवास क्षेत्र रहे हैं, खासकर 2004 की सुनामी से पहले। परियोजना में एक
अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट कंटेनर टर्मिनल, एक ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक ग्रीनफील्ड टाउनशिप, गैस आधारित ऊर्जा संयंत्र और पर्यटन ढांचे का विकास शामिल है। इस पूरी परियोजना को अंडमान एंड निकोबार आइलैंड्स इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट काॅरपोरेशन (ANIIDCO) के माध्यम से लागू किया जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट कंटेनर टर्मिनल, एक ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक ग्रीनफील्ड टाउनशिप, गैस आधारित ऊर्जा संयंत्र और पर्यटन ढांचे का विकास शामिल है। इस पूरी परियोजना को अंडमान एंड निकोबार आइलैंड्स इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट काॅरपोरेशन (ANIIDCO) के माध्यम से लागू किया जा रहा है।
राहुल गांधी ने अपने दौरे के दौरान का एक वीडियो जारी करते हुए कहा कि ‘‘उन्होंने अपने जीवन में जितने भी जंगल देखे हैं, उनमें यह क्षेत्र सबसे सुंदर है लेकिन अब यहां के विशाल और प्राचीन वर्षावनों को काटने की तैयारी की जा रही है।’’ उनके अनुसार, इस परियोजना के तहत लगभग 130 से 160 वर्ग किलोमीटर तक फैले प्राथमिक वन क्षेत्र को समाप्त किया जाएगा, जिससे जैव विविधता को भारी नुकसान होगा और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर गम्भीर प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने इसे ‘विकास की भाषा में छिपा विनाश’ बताया।
इस पूरे मामले में आदिवासी अधिकारों का सवाल भी केंद्र में है। निकोबार जनजातीय परिषद का कहना है कि जैसे-जैसे परियोजना के विभिन्न हिस्सों को स्वीकृति मिलने का समय नजदीक आ रहा है, जिला प्रशासन द्वारा उन्हें उनकी पारम्परिक भूमि छोड़ने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। परिषद ने यह भी कहा है कि प्रशासन का यह दावा सही नहीं है कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत अधिकारों को लागू किया गया है क्योंकि उनके अनुसार इस अधिनियम की प्रक्रिया विधिवत शुरू ही नहीं की गई। यह आरोप इस परियोजना के सामाजिक प्रभावों को और अधिक संवेदनशील बना देता है।
राहुल गांधी ने भी अपने दौरे के दौरान स्थानीय समुदायों से मुलाकात का हवाला देते हुए कहा कि लोगों को न तो इस परियोजना की पूरी जानकारी दी गई है और न ही उन्हें यह बताया गया है कि उनकी जमीन के बदले उन्हें क्या मिलेगा। उन्होंने कहा कि जब विकास की प्रक्रिया में सबसे अधिक प्रभावित होने वाले लोगों की आवाज ही शामिल नहीं होती तो वह विकास नहीं बल्कि थोपे गए बदलाव का उदाहरण बन जाती है।
उन्होंने इस परियोजना के पीछे काॅरपोरेट हितों का भी आरोप लगाया और अडानी समूह का नाम लेते हुए कहा कि यह परियोजना एक बड़े उद्योगपति को लाभ पहुंचाने के लिए लाई जा रही है। हालांकि सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि परियोजना पारदर्शी प्रक्रियाओं के तहत आगे बढ़ाई जा रही है और इसमें किसी एक कंपनी को सीधे लाभ पहुंचाने का सवाल ही नहीं है।
सरकार का पक्ष इस मुद्दे पर स्पष्ट है कि ग्रेट निकोबार परियोजना केवल एक विकास परियोजना नहीं बल्कि एक रणनीतिक आवश्यकता है। यह द्वीप मलक्का, सुंडा और लोम्बोक जैसे महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य के निकट स्थित है, जिससे भारत को वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के प्रमुख समुद्री मार्गों की निगरानी करने में मदद मिल सकती है। सरकार का कहना है कि यह परियोजना भारत की ‘एक्ट ईस्ट पाॅलिसी’ और इंडो-पैसिफिक रणनीति के अनुरूप है और इससे क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।
प्रस्तावित ग्रीन फील्ड एयरपोर्ट को भी रक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया जा रहा है क्योंकि इससे भारत की सैन्य तैनाती और निगरानी क्षमता में वृद्धि होगी, खासकर हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में। इसके अलावा इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल का उद्देश्य भारत की सिंगापुर और कोलम्बो जैसे विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता को कम करना है, जिससे देश की समुद्री अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिल सकती है। यह परियोजना ‘मैरिटाइम इंडिया विजन 2030’ और ‘अमृतकाल विजन 2047’ जैसे दीर्घकालिक रणनीतिक लक्ष्यों से भी जुड़ी हुई बताई जा रही है।
इन सरकारी दावों के बावजूद, परियोजना की व्यवहार्यता और इसके पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर बहस जारी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिकी वाला है जहां दुर्लभ प्रजातियां, घने वन, प्रवाल भित्तियां और समुद्री कछुओं के महत्वपूर्ण प्रजनन स्थल मौजूद हैं। ऐसे में बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियां इन सभी प्राकृतिक तंत्रों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती हैं।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस परियोजना को ‘पर्यावरणीय आपदा की रेसिपी’ बताते हुए कहा है कि सरकार को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए। वहीं समुद्री विशेषज्ञ इसकी आर्थिक व्यवहार्यता पर सवाल उठा रहे हैं। इन विशेषज्ञों के अनुसार यह परियोजना पहले से स्थापित वैश्विक ट्रांसशिपमेंट हब्स के बीच प्रतिस्पर्धा में कितनी सफल होगी, यह स्पष्ट नहीं है। राहुल गांधी ने अपने वीडियो संदेश में यह भी संकेत दिया कि उनकी यात्रा को रोकने की कोशिश की गई। उन्होंने कहा कि अब उन्हें समझ में आ रहा है कि सरकार क्यों नहीं चाहती थी कि वे यहां आएं? इस दौरान हेलीकाॅप्टर सेवाओं के अस्थायी निलम्बन को लेकर भी विवाद खड़ा हुआ, जिसे प्रशासन ने तकनीकी और सुरक्षा कारणों से लिया गया निर्णय बताया जबकि विपक्ष ने इसे राजनीतिक कदम करार दिया।
यह पूरा मामला एक बार फिर उस मूलभूत प्रश्न को सामने लाता है कि भारत किस प्रकार का विकास माॅडल अपनाना चाहता है। क्या विकास केवल बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और आर्थिक लाभ तक सीमित रहेगा? या उसमें पर्यावरणीय संतुलन, सामाजिक न्याय और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को भी समान महत्व दिया जाएगा?
यह पूरा मामला एक बार फिर उस मूलभूत प्रश्न को सामने लाता है कि भारत किस प्रकार का विकास माॅडल अपनाना चाहता है। क्या विकास केवल बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और आर्थिक लाभ तक सीमित रहेगा? या उसमें पर्यावरणीय संतुलन, सामाजिक न्याय और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को भी समान महत्व दिया जाएगा?
ग्रेट निकोबार परियोजना अब केवल एक विकास योजना नहीं रह गई है बल्कि यह भारत की नीति, राजनीति और भविष्य की दिशा को तय करने वाली एक महत्वपूर्ण परीक्षा बन गई है। आने वाले समय में संसद, अदालतों और जन चर्चा में यह मुद्दा और अधिक गहराई से उठेगा और यही तय करेगा कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन कैसे स्थापित हो।