आम आदमी पार्टी के दस में सात राज्यसभा सांसदों का भाजपा में शामिल होने के बाद आशंका जताई जा रही है कि इसका असर सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पंजाब की सत्ता की स्थिरता पर भी गहरा प्रभाव पड़ सकता है। राजनीतिक गलियारों से लेकर मीडिया और सोशल मीडिया में चर्चा जोरों पर है कि पंजाब की भगवंत मान सरकार के 92 में से कुछ ऐसे विधायक नाराज चल रहे हैं, जो मंत्री पद न मिलने या किन्हीं अन्य कारणों से पार्टी से नाराज हैं। इनमें से कई चड्ढा और संदीप पाठक के करीबी माने जाते हैं, वे कमजोर कड़ियां साबित हो सकते हैं। चर्चा तो यहां तक है कि 60 से अधिक विधायक चड्ढा और पाठक के सम्पर्क में हैं जो पार्टी के लिए एक बड़ा खतरा बन सकते हैं। इस बीच पार्टी ने अपने सभी विधायकों को एकजुट रखने के लिए बैठक की है। ऐसे में सवाल है कि क्या खतरे में है मान सरकार? क्या अब भाजपा का अगला ऑपरेशन लोटस पंजाब है जैसे कई सवाल सुर्खियों में हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो पंजाब के विधायकों के बीच चड्ढा और पाठक इन दोनों नेताओं की गहरी पैठ रही है। चुनावी प्रबंधन के दौरान कई विधायकों के टिकट वितरण में इनकी अहम भूमिका थी, जिसके कारण वे अब भी इनके सीधे सम्पर्क में हो सकते हैं। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि राज्यसभा सांसदों को सीधे तौर पर राज्य सरकार गिराने में कोई संवैधानिक रोल नहीं होता लेकिन राजनीति सिर्फ संवैधानिक गणित से नहीं चलती बल्कि संदेश और माहौल भी उतना ही अहम होता है। भगवंत मान सरकार ने 2022 में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता हासिल की थी। उस समय आप को पंजाब में एक मजबूत और स्थिर विकल्प के रूप में देखा गया। लेकिन अब अगर बड़े स्तर पर नेता पार्टी छोड़ते हैं तो यह छवि कमजोर हो सकती है। इससे विधायकों पर भी मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ सकता है, खासकर उन पर जो पहले से असंतुष्ट बताए जाते हैं।
दूसरी ओर भाजपा के लिए यह एक रणनीतिक मौका हो सकता है। पंजाब में अब तक भाजपा की स्थिति सीमित रही है लेकिन अगर वह आप के नेताओं को अपने साथ जोड़ने में सफल होती है तो यह उसके लिए राज्य में पैर जमाने का अवसर बन सकता है। इससे भाजपा को संगठनात्मक मजबूती के साथ- साथ राजनीतिक नैरेटिव बनाने में भी मदद मिलेगी। हालांकि यह केवल राज्यसभा सांसदों के जाने से सरकार तुरंत खतरे में नहीं आ जाती। सरकार गिराने के लिए विधानसभा में बहुमत का टूटना जरूरी होता है और फिलहाल आप के पास स्पष्ट बहुमत है लेकिन राजनीति में आज का संकेत, कल की सम्भावना बन सकता है। अगर यह घटनाक्रम आगे बढ़ता है और विधायक भी पार्टी छोड़ने लगते हैं तब स्थिति गंभीर हो सकती है।
इस पूरे मामले का एक और पहलू है जनता का भरोसा। पंजाब के मतदाताओं ने आप को बदलाव के वादे पर चुना था। अगर पार्टी के अंदर टूट-फूट की खबरें लगातार आती हैं तो इससे जनता का विश्वास डगमगा सकता है। विपक्षी दल इस मुद्दे को जनता के बीच जोर-शोर से उठाएंगे और सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े करेंगे।
भगवंत मान के लिए यह समय परीक्षा का है। उन्हें न केवल अपने विधायकों और नेताओं को एकजुट रखना होगा बल्कि जनता को भी यह भरोसा दिलाना होगा कि सरकार स्थिर है और अपने वादों पर काम कर रही है। संगठन के भीतर संवाद बढ़ाना, असंतोष को समय रहते दूर करना और मजबूत नेतृत्व दिखाना इस समय उनकी सबसे बड़ी जरूरत होगी।
बहरहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि सात राज्यसभा सांसदों के भाजपा में शामिल होने से भगवंत मान सरकार तुरंत गिर जाएगी। लेकिन इतना तय है कि यह घटनाक्रम राजनीतिक रूप से बड़ा झटका साबित हो सकता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि आप इस चुनौती से कैसे निपटती है और क्या वह अपने संगठन को एकजुट बनाए रख पाती है या नहीं।