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जिसने अपना घर जलते देखा लेकिन मोहब्बत लिखना नहीं छोड़ा

यूंही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो
वो गजल की सच्ची किताब है उसे चुपके चुपके पढ़ा करो

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो

अभी राह में कई मोड़ हैं कोई आएगा कोई जाएगा
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो

मुझे इश्तिहार सी लगती हैं ये मोहब्बतों की कहानियां
जो कहा नहीं वो सुना करो जो सुना नहीं वो कहा करो

कभी हुस्न-ए-पर्दा-नशीं भी हो जरा आशिकाना लिबास में
जो मैं बन संवर के कहीं चलूं मिरे साथ तुम भी चला करो

नहीं बे-हिजाब वो चांद सा कि नजर का कोई असर न हो
उसे इतनी गर्मी-ए-शौक से बड़ी देर तक न तका करो

ये खिजां की जर्द सी शाल में जो उदास पेड़ के पास है
ये तुम्हारे घर की बहार है उसे आंसुओं से हरा करो
-बशीर बद्र

उर्दू गजल को आधुनिक दौर की भाषा देने वाले महान शायर बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। 28 मई 2026 को भोपाल में 91 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनके जाने के साथ उर्दू शायरी का एक ऐसा अध्याय समाप्त हुआ जिसने गजल को विश्वविद्यालयों और साहित्यिक हलकों से निकालकर आम आदमी के दिल तक पहुंचाया।
सात साल का बच्चा और पहला शेर
15 फरवरी 1935 को अयोध्या में जन्मे सैयद मोहम्मद बशीर को शायद खुद भी अंदाजा नहीं रहा होगा कि एक दिन उनका नाम उर्दू अदब के सबसे लोकप्रिय शायरों में गिना जाएगा। कहा जाता है कि उन्होंने अपना पहला शेर मात्र सात वर्ष की आयु में कह दिया था। यह असाधारण प्रतिभा का संकेत था। सिर्फ ग्यारह वर्ष की उम्र में, 1946 में, इटावा में आयोजित उर्स के अवसर पर एक अखिल भारतीय मुशायरे में उन्होंने पहली बार सार्वजनिक रूप से गजल पढ़ी। उस समय उनका नाम सैयद मोहम्मद बशीर था। मुशायरे में मौजूद लोगों को उस बालक की प्रतिभा इतनी प्रभावित कर गई कि उसे एक नया तखल्लुस मिला- ‘बद्र’। अरबी में ‘बद्र’ का अर्थ होता है पूर्णिमा का चांद। किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह नाम आगे चलकर उर्दू साहित्य के आकाश में सचमुच एक चांद की तरह चमकेगा।
अलीगढ़ का छात्र, जिसने उर्दू को नई दिशा दी
बशीर बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की और उर्दू साहित्य में पीएचडी की। वे शुरू से ही मेधावी छात्र रहे। कॉलेज से लेकर शोध तक उन्होंने अनेक पुरस्कार प्राप्त किए। अलीगढ़ के दिनों का एक दिलचस्प किस्सा उनके व्यक्तित्व को समझने में मदद करता है। एक बार मौखिक परीक्षा के दौरान परीक्षक ने उनसे उनके ही एक शेर की व्याख्या करने को कहा-

‘अब हम मिले तो कई लोग बिछड़ जाएंगे,
इंतजार और करो अगला जनम तक मेरे।’

परीक्षक को यह पता ही नहीं था कि जिस शेर की व्याख्या वह पूछ रहा है, उसका रचनाकार स्वयं उसके सामने बैठा छात्र है। बशीर बद्र ने अपने ढंग से शेर का अर्थ समझाया लेकिन परीक्षक उनकी व्याख्या से सहमत नहीं हुआ और अपनी अलग व्याख्या पर अड़ा रहा। बाद में जब उसे सच्चाई का पता चला तो यह प्रसंग लम्बे समय तक साहित्यिक हलकों में सुनाया जाता रहा। यह घटना बताती है कि बड़ी कविता अक्सर अपने लेखक से भी बड़ी हो जाती है। वह पाठकों के बीच जाकर नए-नए अर्थ ग्रहण करती रहती है।

मेरठ कॉलेज और इरफान हबीब
अलीगढ़ के बाद बशीर बद्र मेरठ कॉलेज पहुंचे जहां वे उर्दू विभागाध्यक्ष बने और लगभग सत्रह वर्षों तक इस पद पर रहे। यहीं उनकी मुलाकात देश के प्रख्यात इतिहासकार इरफान हबीब से हुई।
हबीब बाद में याद करते हुए कहते हैं कि बशीर बद्र सिर्फ प्रेम के शायर नहीं थे। उनकी गजलों में रोमांस भी था और सामाजिक-राजनीतिक चेतना भी। वे पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में मुशायरों के लोकप्रिय सितारे बन चुके थे। उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ चुकी थी कि शिक्षण कार्य और लगातार साहित्यिक यात्राओं के बीच संतुलन बनाना कठिन हो गया। अंततः उन्होंने विभागाध्यक्ष का पद छोड़ दिया लेकिन मेरठ उनकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहा।
जब दंगों ने एक शायर का घर जला दिया
फिर आया वह दौर जिसने बशीर बद्र के जीवन की दिशा बदल दी। 1986 के मेरठ दंगे। शहर हिंसा की आग में झुलस रहा था। साम्प्रदायिक उन्माद ने इंसानों के साथ-साथ उनके घरों और सपनों को भी निशाना बनाया। शास्त्री नगर स्थित बशीर बद्र का घर भी इस हिंसा की चपेट में आ गया। घर को भारी नुकसान पहुंचा। वर्षों की मेहनत से संजोई गई किताबें, नोट्स, दस्तावेज और अप्रकाशित साहित्य नष्ट हो गया। एक लेखक के लिए यह सिर्फ सम्पत्ति का नुकसान नहीं था। यह उसकी स्मृतियों, उसके श्रम और उसके रचनात्मक जीवन के एक हिस्से का विनाश था। इरफान हबीब ने बाद में कहा- ‘‘वे बहुत आहत थे।’’
यही वह घटना थी जिसने उन्हें मेरठ छोड़ने का निर्णय लेने पर मजबूर कर दिया। वे भोपाल चले गए, जहां उनकी पत्नी का परिवार रहता था लेकिन यहीं बशीर बद्र की महानता सामने आती है। जिस व्यक्ति ने दंगों में अपना घर खोया, उसने अपनी कविता को नफरत का हथियार नहीं बनाया। उसने लिखा-

‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।’

यह शेर किसी कल्पना से पैदा नहीं हुआ था। इसके पीछे एक जली हुई जिंदगी का धुआं था। गालिब और मीर की परम्परा से आगे बशीर बद्र का सबसे बड़ा साहित्यिक योगदान यह माना जाता है कि उन्होंने उर्दू गजल को आम बोलचाल की भाषा के अधिक निकट ला दिया।

मीर और ग़ालिब की परंपरा महान थी लेकिन उसकी भाषा पर फारसी का गहरा प्रभाव था। आम पाठक के लिए वह कई बार कठिन हो जाती थी। बशीर बद्र ने उस विरासत को नकारा नहीं बल्कि उसे आधुनिक
संवेदनाओं और सरल भाषा के साथ आगे बढ़ाया। उनके शेर सीधे दिल तक पहुंचते थे।

‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी,
यूं ही कोई बेवफा नहीं होता।’
‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।’
‘मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला,
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला।’

यही वजह है कि उनके शेर विश्वविद्यालयों के शोध पत्रों में भी मिलते हैं और आम लोगों की बातचीत में भी।
प्रेम, विरह और इंसानियत का शायर अक्सर बशीर बद्र को प्रेम का शायर कहा जाता है लेकिन वे सिर्फ प्रेम के शायर नहीं थे। वे रिश्तों की जटिलता, मनुष्य की कमजोरी और समाज की विडम्बनाओं को भी समझते थे। उनका यह मशहूर शेर देखिए-

‘दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त बन जाएं तो शर्मिंदा न हों।’

यह सिर्फ दो व्यक्तियों के बीच सम्बंधों की बात नहीं है। यह समाज, समुदायों और देशों के लिए भी एक संदेश है। कहा जाता है कि शिमला समझौते के समय पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने भी इस शेर का उल्लेख किया था। यह किसी शायर के लिए बड़ी उपलब्धि है कि उसकी कविता साहित्यिक मंचों से निकलकर इतिहास और कूटनीति की भाषा बन जाए।

उनकी किताबें और साहित्यिक योगदान
बशीर बद्र के खाते में उर्दू की सात और हिंदी की एक प्रमुख काव्य पुस्तक दर्ज हैं। उनके प्रसिद्ध संग्रहों में ‘इकाई’, ‘कुल्लियाते बशीर बद्र’, ‘आमद’, ‘इमेज’, ‘आहत’ और ‘उजाले अपनी यादों के’ शामिल हैं। उन्होंने आलोचना के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण काम किया। आजादी के बाद उर्दू गजल का तनकीदी मुताला और बीसवीं सदी में गजल जैसी पुस्तकें उर्दू साहित्य के गम्भीर अध्ययन में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
पद्मश्री और सम्मान
1999 में भारत सरकार ने उन्हें साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया लेकिन शायद उनका सबसे बड़ा सम्मान वह लोकप्रियता थी जो उन्हें आम लोगों के बीच मिली। बहुत कम शायर ऐसे होते हैं जिनके शेर लोगों को कंठस्थ याद रहते हैं। बशीर बद्र उन दुर्लभ शायरों में थे।
अंतिम वर्षों की ख़ामोशी
जीवन के अंतिम वर्षों में वे पार्किंसन और डिमेंशिया जैसी बीमारियों से जूझ रहे थे। लगभग एक दशक तक वे सक्रिय सार्वजनिक जीवन से दूर रहे। इरफान हबीब ने उनके निधन पर कहा- ‘‘हमने उन्हें आज नहीं खोया, हम उन्हें लगभग एक दशक पहले ही खो चुके थे।’’ यह टिप्पणी जितनी मार्मिक है, उतनी ही सच्ची भी। शरीर धीरे-धीरे कमजोर होता गया, स्मृतियां धुंधली पड़ती गईं लेकिन उनके शेर लोगों की स्मृतियों में हमेशा की तरह जीवित रहे।
आखिर में…
बशीर बद्र का जीवन हमें एक दुर्लभ सबक देता है। एक आदमी जिसने साम्प्रदायिक हिंसा देखी, अपना घर खोया, अपनी पांडुलिपियां खो दीं, वह चाहता तो कटुता का कवि बन सकता था लेकिन उसने मोहब्बत को चुना। उसने रिश्तों को चुना। उसने इंसानियत को चुना। आज जब समाज लगातार विभाजनों और टकरावों से गुजर रहा है, तब बशीर बद्र की शायरी पहले से अधिक प्रासंगिक लगती है। राजनीति की सुर्खियां बदलती रहेंगी। सरकारें आएंगी-जाएंगी। नेता बनेंगे और भुला दिए जाएंगे लेकिन जब भी कोई इंसान अपने टूटे हुए दिल को शब्द देने की कोशिश करेगा, उसे कहीं न कहीं बशीर बद्र का कोई शेर मिल जाएगा। शायद तभी वह समझ पाएगा कि एक सच्चा शायर कभी मरता नहीं। वह अपनी पंक्तियों में जीवित रहता है।
‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।’
बशीर बद्र चले गए हैं लेकिन उनकी यादों के ये उजाले बहुत लंबे समय तक हमारे साथ रहेंगे।

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