नेपाल में भारी जनसमर्थन के साथ सत्ता में आए युवा प्रधानमंत्री बालेन शाह ‘बालेंद्र’ की छवि मात्र कुछ माह भीतर ही दरकने लगी है। जिन युवाओं ने उन्हें भ्रष्टाचार, राजनीतिक वंशवाद और पुरानी व्यवस्था के खिलाफ उम्मीद के प्रतीक के रूप में सत्ता तक पहुंचाया, उन्हीं के बीच अब निराशा और बेचैनी के स्वर सुनाई देने लगे हैं। अध्यादेशों के जरिए शासन, न्यायपालिका से टकराव, बुलडोजर कार्रवाइयों, संसद की उपेक्षा और विदेश नीति को लेकर उठे सवालों ने उनकी ‘व्यवस्था परिवर्तन’ वाली छवि को चुनौती दी है। ऐसे समय में फ्रांसीसी दार्शनिक अल्बेयर कामू की पुस्तक ‘दि रिबेल’ में लिखी गई चेतावनी ‘हर क्रांतिकारी अंततः या तो शोषक बन जाता है या फिर विधर्मी घोषित कर दिया जाता है’ नेपाल की राजनीति पर सटीक बैठती दिखाई दे रही है
फ्रांसीसी दार्शनिक और नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक अल्बेयर कामू ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘दि रिबेल’ में लिखा कि ‘हर क्रांतिकारी अंततः या तो शोषक बन जाता है या फिर विधर्मी घोषित कर दिया जाता है।’ इसी पुस्तक में उन्होंने एक और टिप्पणी की थी ‘आधुनिक युग की लगभग हर क्रांति अंततः राज्यसत्ता को और अधिक शक्तिशाली बनाकर समाप्त हुई है।’
नेपाल की राजनीति में इन दिनों इन दोनों कथनों की चर्चा बढ़ गई है। कारण है प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ‘बालेन’, जिन्हें कुछ महीने पहले तक नेपाल की राजनीति में नई सुबह, नई पीढ़ी और नई उम्मीदों का प्रतीक माना जा रहा था लेकिन सत्ता में आने के बाद जिस तरह के विवाद उनकी सरकार के साथ जुड़े हैं उन्होंने यह बहस छेड़ दी है कि कहीं नेपाल की युवा क्रांति भी इतिहास की अन्य क्रांतियों की तरह सत्ता के पुराने ढांचे का ही नया संस्करण तो नहीं बन रही है।
जन आंदोलन से सत्ता तक का सफर
बालेन शाह का उदय नेपाल की राजनीति की सबसे दिलचस्प घटनाओं में से एक माना जाता है। पेशे से इंजीनियर और लोकप्रिय रैपर रहे बालेन पहले काठमांडू महानगर के मेयर बने और फिर राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश कर देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे। उनकी लोकप्रियता का आधार पारम्परिक राजनीतिक दलों से जनता की गहरी नाराजगी थी।
नेपाल में पिछले दो दशकों से राजनीतिक अस्थिरता, बार-बार सरकारों का बदलना, भ्रष्टाचार के आरोप, बेरोजगारी, युवाओं का विदेश पलायन और आर्थिक ठहराव बड़े मुद्दे रहे हैं। लाखों नेपाली युवाओं को लगा कि कांग्रेस, एमाले और माओवादी जैसे स्थापित दल अब उनकी आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे। इसी माहौल में बालेन शाह एक ऐसे चेहरे के रूप में उभरे जो खुद को ‘सिस्टम के बाहर का आदमी’ बताते थे। 2025 के छात्र और युवा आंदोलनों ने इस भावना को और मजबूत किया। सोशल मीडिया पर सक्रिय युवाओं ने बालेन को पुरानी राजनीति के विकल्प के रूप में पेश किया। नतीजा यह हुआ कि 2026 के चुनाव में उन्होंने अप्रत्याशित सफलता हासिल की और सत्ता तक पहुंच गए।
बदलाव की उम्मीदें और शुरुआती फैसले
सत्ता में आने के बाद बालेन शाह ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई, प्रशासनिक सुधार, वीआईपी संस्कृति पर रोक और सरकारी जवाबदेही बढ़ाने जैसे कदमों की घोषणा की। शुरुआती दिनों में इन फैसलों का व्यापक स्वागत हुआ।
नेपाल की नौकरशाही और राजनीतिक ढांचे को लेकर जनता में पहले से असंतोष था। इसलिए जब बालेन ने तेज और निर्णायक फैसले लेने शुरू किए तो बड़ी संख्या में लोगों को लगा कि आखिरकार कोई नेता व्यवस्था को झकझोरने की कोशिश कर रहा है लेकिन यहीं से विवादों का दौर भी शुरू हुआ।
अध्यादेशों की राजनीति और लोकतांत्रिक संस्थाओं से टकराव
सरकार के आलोचकों का कहना है कि बालेन शाह ने सुधारों के नाम पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को दरकिनार करना शुरू कर दिया। संसद में पर्याप्त बहस और सहमति बनाने के बजाय कई महत्वपूर्ण फैसले अध्यादेशों के माध्यम से लागू किए गए।
विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति पर रोक लगाने और सरकारी कर्मचारियों के ट्रेड यूनियनों की गतिविधियों को सीमित करने जैसे फैसलों ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। सरकार का तर्क है कि ये संस्थाएं
राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण अपनी मूल भूमिका से भटक चुकी हैं जबकि आलोचकों का कहना है कि लोकतंत्र में असहमति और राजनीतिक भागीदारी को समाप्त नहीं किया जा सकता। मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अदालत ने हस्तक्षेप करते हुए इन फैसलों पर रोक लगा दी। इसके बाद विपक्ष ने आरोप लगाया कि बालेन सरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने की दिशा में बढ़ रही है।
न्यायपालिका पर प्रभाव बढ़ाने के आरोप
न्यायपालिका में नियुक्तियों को लेकर भी सरकार घिर गई। मुख्य न्यायाधीश पद के लिए डाॅ. मनोज शर्मा की सिफारिश ने कानूनी हलकों में बहस छेड़ दी। वरिष्ठता की परम्परा को दरकिनार किए जाने के आरोप लगे और कई पूर्व न्यायाधीशों ने चिंता व्यक्त की कि न्यायपालिका को राजनीतिक प्रभाव से दूर रखना आवश्यक है।
नेपाल जैसे लोकतंत्र में जहां संस्थागत स्थिरता अभी भी विकसित हो रही है, न्यायपालिका से जुड़े ऐसे विवादों को बेहद गम्भीर माना जाता है। यही वजह है कि इस मुद्दे ने बालेन सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया।
बुलडोजर राजनीति और मानवीय संकट
काठमांडू और उसके आस-पास के इलाकों में चलाए गए अतिक्रमण विरोधी अभियानों ने भी सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया। बालेन शाह ने सरकारी भूमि पर कब्जों के खिलाफ सख्त अभियान चलाया। शुरुआत में शहरी मध्यवर्ग ने इसका समर्थन किया क्योंकि वर्षों से अवैध निर्माण और अतिक्रमण एक बड़ी समस्या बने हुए थे लेकिन जब कार्रवाई के कारण सैकड़ों परिवार प्रभावित हुए और कुछ लोगों की आत्महत्या की खबरें सामने आईं तो माहौल बदल गया। मानवाधिकार संगठनों ने आरोप लगाया कि सरकार कानून लागू करने के नाम पर मानवीय पहलुओं की अनदेखी कर रही है। यह पहली बार था जब बालेन शाह की ‘निर्णायक नेता’ वाली छवि को ‘कठोर और असंवेदनशील शासक’ के रूप में भी देखा जाने लगा।
संसद और विपक्ष के साथ बढ़ता तनाव
बालेन शाह की कार्यशैली को लेकर संसद के भीतर भी सवाल उठ रहे हैं। कई महत्वपूर्ण मौकों पर उनकी अनुपस्थिति और राष्ट्रपति के सम्बोधन के दौरान सदन से बाहर चले जाने जैसी घटनाओं ने राजनीतिक विवाद को जन्म दिया।
विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रधानमंत्री लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ संवाद स्थापित करने के बजाय टकराव का रास्ता अपना रहे हैं। दूसरी ओर समर्थकों का तर्क है कि पुरानी राजनीतिक जमात जानबूझकर सरकार के हर कदम का विरोध कर रही है।
विदेश नीति की चुनौती
नेपाल की राजनीति केवल घरेलू मुद्दों तक सीमित नहीं है। भारत और चीन के बीच स्थित होने के कारण नेपाल की विदेश नीति हमेशा संवेदनशील रही है। बालेन शाह ने सत्ता में आने के बाद घरेलू मुद्दों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया लेकिन आलोचकों का कहना है कि विदेश नीति की उपेक्षा नेपाल के लिए महंगी साबित हो सकती है।
लिपुलेख, कालापानी और कैलाश मानसरोवर मार्ग जैसे मुद्दों ने समय-समय पर नेपाल में राष्ट्रवादी भावनाओं को उभारा है। बालेन के पुराने ‘ग्रेटर नेपाल’ सम्बंधी बयानों को भी अब उनके विरोधी बार-बार उठा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रवादी नारों और व्यावहारिक कूटनीति के बीच संतुलन बनाए रखना किसी भी नेपाली प्रधानमंत्री के लिए अनिवार्य है।
क्या दरक रही है ‘जेन जी क्रांति’?
बालेन शाह की सबसे बड़ी ताकत युवा वर्ग रहा है लेकिन अब सोशल मीडिया पर उन्हीं युवाओं के बीच मतभेद दिखाई देने लगे हैं। एक वर्ग अब भी उन्हें व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद मानता है जबकि दूसरा वर्ग यह सवाल पूछ रहा है कि क्या सत्ता में पहुंचने के बाद वे भी उसी राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बनते जा रहे हैं, जिसके खिलाफ उन्होंने आंदोलन खड़ा किया था।
यही कारण है कि आज नेपाल में बहस केवल बालेन शाह को लेकर नहीं है। बहस उस पूरी राजनीति को लेकर है जो खुद को ‘क्रांति’, ‘परिवर्तन’ और ‘नई व्यवस्था’ के नाम पर प्रस्तुत करती है। इतिहास गवाह है कि कई क्रांतियां जनता की मुक्ति के नाम पर शुरू हुईं लेकिन अंततः सत्ता के केंद्रीकरण में बदल गईं।
नेपाल की युवा क्रांति अभी अपने शुरुआती दौर में है और बालेन शाह के पास अपनी आलोचनाओं का जवाब देने तथा अपनी प्रतिबद्धताओं को साबित करने का पर्याप्त समय है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जिस तेजी से उम्मीदें पैदा हुई थीं, उसी तेजी से निराशा भी जन्म ले सकती है।
शायद यही कारण है कि नेपाल के राजनीतिक गलियारों में आज अल्बेयर कामू की पुस्तक ‘दि रिबेल’ बार-बार याद की जा रही है। सवाल केवल इतना नहीं कि बालेन शाह सफल होंगे या असफल। असली सवाल यह है कि क्या कोई क्रांति सत्ता में आने के बाद भी अपने मूल आदर्शों के प्रति ईमानदार रह सकती है या फिर वह अंततः उसी व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है जिसे बदलने का दावा करती है।