world

ट्रम्प की जुबान और ईरान वार्ता का इम्तिहान

बीते 28 जून को अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर सैन्य टकराव ने उस अंतरिम समझौता वार्ता को संकट में डाल दिया है, जिससे पश्चिम एशिया में शांति की उम्मीद बंधी थी लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक सवाल ईरान पर नहीं बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की कार्यशैली पर उठ रहे हैं। एक ओर उनका प्रशासन बातचीत बचाने में जुटा है तो दूसरी तरफ ट्रम्प के आक्रामक, विरोधाभासी और सनसनीखेज बयान बार-बार उसी कूटनीतिक प्रक्रिया को कमजोर कर रहे हैं। यह पहली बार नहीं है। ट्रम्प की राजनीति में बयान केवल विचार नहीं होते, वे हथियार होते हैं और कई बार उन्हीं के निशाने पर उनके अपने सहयोगी भी आ जाते हैं

अमेरिका और ईरान के बीच पिछले कुछ सप्ताह से चल रही वार्ता ने यह उम्मीद जगाई थी कि वर्षों पुराने परमाणु विवाद का कोई व्यावहारिक समाधान निकल सकता है। दोनों देशों ने एक अंतरिम सहमति के आधार पर आगे बातचीत जारी रखने का फैसला किया था। परमाणु निरीक्षण, आर्थिक प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर तकनीकी स्तर पर संवाद आगे बढ़ रहा था लेकिन 28 जून को दोनों देशों के बीच फिर सैन्य कार्रवाई और जवाबी गोलीबारी की खबरों ने पूरे घटनाक्रम को बदल दिया। अब यह वार्ता पहले की तुलना में कहीं अधिक नाजुक स्थिति में पहुंच चुकी है।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि समझौते के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल ईरान नहीं बल्कि स्वयं व्हाइट हाउस दिखाई दे रहा है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस लगातार बातचीत को आगे बढ़ाने, तनाव कम करने और दोनों देशों के बीच भरोसा कायम करने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगभग हर दूसरे दिन ऐसे बयान दे रहे हैं जिनसे यह संदेश जाता है कि यदि उनकी शर्तें पूरी नहीं हुईं तो सैन्य कार्रवाई किसी भी समय फिर शुरू हो सकती है। यही विरोधाभास आज अमेरिकी कूटनीति का सबसे बड़ा संकट बन गया है।

विदेश नीति में शब्दों की कीमत गोला-बारूद से कम नहीं होती। कई बार एक बयान महीनों की बातचीत पर भारी पड़ जाता है। दुनिया की लगभग हर बड़ी कूटनीतिक सफलता इसलिए सम्भव हुई क्योंकि बातचीत करने वाले नेताओं ने सार्वजनिक मंचों पर संयम बरता लेकिन डोनाल्ड ट्रम्प ने राजनीति की बिल्कुल अलग शैली विकसित की है। उनके लिए हर अंतरराष्ट्रीय संकट मीडिया की सुर्खियां बटोरने का अवसर भी होता है। यही कारण है कि वे अक्सर ऐसे बयान देते हैं जो अगले ही दिन उनकी सरकार के आधिकारिक रुख से मेल नहीं खाते। यही विरोधाभास ईरान वार्ता में भी दिखाई दे रहा है। जेडी वेंस समझौते की भाषा बोल रहे हैं जबकि ट्रम्प दबाव और धमकी की। वेंस भरोसा पैदा करना चाहते हैं, ट्रम्प भय पैदा करना चाहते हैं। वेंस बातचीत को आगे बढ़ा रहे हैं जबकि ट्रम्प बार-बार यह याद दिला रहे हैं कि यदि उनकी शर्तें नहीं मानी गईं तो अमेरिका फिर से ताकत का इस्तेमाल करेगा। कूटनीति की भाषा में इसे ‘मिक्स्ड सिग्नल’ कहा जाता है और अंतरराष्ट्रीय सम्बंधों में इससे अधिक नुकसानदेह स्थिति शायद ही कोई दूसरी होती है।

असल में ट्रम्प की राजनीति का आधार ही यह विश्वास रहा है कि जितना बड़ा बयान, उतनी बड़ी राजनीतिक सफलता। राष्ट्रपति बनने से पहले वे कारोबारी थे और कारोबारी दुनिया में आक्रामक मोलभाव कई बार सफल हो जाता है लेकिन राष्ट्रों के बीच सम्बंध किसी रियल एस्टेट सौदे की तरह नहीं चलते। यहां सामने वाला पक्ष केवल कीमत नहीं देखता बल्कि विश्वसनीयता भी देखता है। यही कारण है कि ट्रम्प की सबसे बड़ी ताकत उनकी आक्रामक शैली कई बार अमेरिका की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है।

उनके पहले कार्यकाल से लेकर अब तक इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। कभी उन्होंने उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन को ‘राॅकेट मैन’ कहकर युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर दी और कुछ ही महीनों बाद उन्हीं के साथ हाथ मिलाकर स्वयं को शांति का दूत घोषित कर दिया। कभी उन्होंने अफगानिस्तान से सेना हटाने का फैसला लिया तो कभी ईरान के खिलाफ अधिकतम दबाव की नीति अपनाई। उन्होंने 2015 के परमाणु समझौते को ‘इतिहास की सबसे खराब डील’ बताते हुए अमेरिका को उससे बाहर निकाल लिया और आज उनका प्रशासन लगभग उसी दिशा में नए समझौते की कोशिश कर रहा है। यही विरोधाभास ट्रम्प की राजनीति की सबसे बड़ी पहचान बन चुका है।

उनकी बयानबाजी केवल ईरान तक सीमित नहीं रही। कभी वे कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने जैसी बातें करते हैं, कभी ग्रीनलैंड खरीदने की जिद पर अड़ जाते हैं, कभी गाजा पर अमेरिकी नियंत्रण की कल्पना प्रस्तुत करते हैं और कभी स्वयं को नोबेल शांति पुरस्कार का सबसे बड़ा हकदार घोषित कर देते हैं। समर्थकों को यह बेबाकी लग सकती है लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में ऐसे बयान कई बार अमेरिका की
आधिकारिक नीति पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं।

व्यक्तित्व नहीं, विदेश नीति का संकट
डोनाल्ड ट्रम्प को समझने के लिए उनके बयानों को अलग-अलग घटनाओं की तरह नहीं बल्कि उनकी पूरी राजनीतिक रणनीति के हिस्से के रूप में देखना होगा। ट्रम्प जानते हैं कि आज की राजनीति में सुर्खियां ही सबसे बड़ी पूंजी हैं। इसलिए वे ऐसे बयान देते हैं जो समर्थकों को उत्साहित करें, विरोधियों को उत्तेजित करें और मीडिया को कई दिनों तक बहस करने का विषय दे दें लेकिन यही रणनीति तब खतरनाक हो जाती है, जब उसका इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में होने लगे।

विदेश नीति चुनावी सभाओं के भाषणों से नहीं चलती। वहां शब्दों का वजन गोलियों से कम नहीं होता। एक राष्ट्रपति का सार्वजनिक बयान केवल व्यक्तिगत राय नहीं होता बल्कि पूरी सरकार का संदेश माना जाता है। जब वही संदेश हर दूसरे दिन बदलने लगे तो सहयोगी देशों के साथ- साथ विरोधी देश भी असमंजस में पड़ जाते हैं कि आखिर अमेरिका की वास्तविक नीति क्या है। यही स्थिति आज ईरान वार्ता में दिखाई दे रही है। एक ओर अमेरिकी अधिकारी बातचीत को आगे बढ़ाने की बात करते हैं, दूसरी तरफ ट्रम्प बार-बार यह संकेत देते हैं कि यदि उनकी शर्तें नहीं मानी गईं तो सैन्य कार्रवाई का रास्ता हमेशा खुला है। इस दोहरे संदेश ने केवल ईरान ही नहीं बल्कि यूरोप के उन देशों को भी असहज कर दिया है जो इस वार्ता के सफल होने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

‘मैक्सिमम प्रेशर’ की सीमाएं
ट्रम्प की विदेश नीति का सबसे चर्चित सिद्धांत रहा है ‘मैक्सिमम प्रेशर’। उनका विश्वास रहा है कि आर्थिक प्रतिबंधों, सैन्य दबाव और आक्रामक बयानबाजी से किसी भी देश को झुकाया जा सकता है। उन्होंने उत्तर कोरिया, चीन, ईरान, वेनेजुएला और यहां तक कि अपने सहयोगी देशों के साथ भी इसी शैली को अपनाया लेकिन अनुभव बताता है कि यह नीति हर जगह सफल नहीं हुई। ईरान पर लगातार प्रतिबंध लगाने के
बावजूद उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह नहीं रुका। उत्तर कोरिया ने भी अपना परमाणु कार्यक्रम समाप्त नहीं किया। चीन के साथ व्यापार युद्ध ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया। यानी दबाव की राजनीति ने हर जगह अपेक्षित परिणाम नहीं दिए। ईरान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 2018 में ट्रम्प जिस परमाणु समझौते से बाहर निकले थे, उसी तरह की व्यवस्था की ओर आज अमेरिका फिर लौटने की कोशिश कर रहा है। इससे बड़ा विरोधाभास शायद ही कोई हो सकता है।

जेडी वेंस की कठिन परीक्षा
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे असहज स्थिति उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की है। उन्हें एक ऐसी वार्ता को सफल बनाना है, जिसे उनके अपने राष्ट्रपति के बयान बार-बार कठिन बना रहे हैं। वेंस संयम की भाषा बोलते हैं। वे संकेत देते हैं कि अमेरिका स्थायी समाधान चाहता है लेकिन ट्रम्प का हर आक्रामक बयान ईरान के कट्टरपंथी गुटों को यह कहने का अवसर दे देता है कि अमेरिका पर भरोसा नहीं किया जा सकता। परिणामस्वरूप वेंस को केवल ईरान को ही नहीं बल्कि अपने राष्ट्रपति के बयानों से पैदा हुए अविश्वास को भी सम्भालना पड़ रहा है। यह किसी भी उपराष्ट्रपति के लिए असामान्य स्थिति है। सामान्यतः विदेश नीति में राष्ट्रपति और उनका प्रशासन एक स्वर में बोलता है लेकिन ट्रम्प के दौर में अक्सर ऐसा लगता है जैसे व्हाइट हाउस के भीतर ही दो अलग-अलग विदेश नीतियां चल रही हों एक कैमरों के सामने और दूसरी वार्ता की मेज पर।

महाशक्ति की सबसे बड़ी ताकत क्या होती है?
अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है। उसके पास सबसे आधुनिक हथियार हैं, सबसे प्रभावशाली आर्थिक व्यवस्था है और वैश्विक संस्थाओं पर भी उसका गहरा प्रभाव है लेकिन किसी भी महाशक्ति की असली ताकत केवल उसकी सेना नहीं होती बल्कि उसकी विश्वसनीयता होती है। यदि दुनिया को यह भरोसा न रहे कि अमेरिका आज जो कह रहा है, वह कल भी उसी पर कायम रहेगा तो उसकी कूटनीतिक शक्ति स्वतः कमजोर होने लगती है। इतिहास में अमेरिका ने कई बड़े समझौते इसलिए कराए क्योंकि दुनिया को उसके आश्वासनों पर भरोसा था लेकिन हर नई सरकार पिछली सरकार की विदेश नीति को पलटने लगे और स्वयं राष्ट्रपति हर कुछ दिनों में अपना रुख बदलते दिखाई दें तो उस भरोसे में दरार आना स्वाभाविक है। यही चिंता आज ईरान वार्ता के संदर्भ में भी सामने आ रही है। सवाल केवल यह नहीं है कि समझौता होगा या नहीं। असली सवाल यह है कि यदि समझौता हो भी गया तो क्या वह टिक पाएगा?

शांति पुरस्कार या युद्ध की भाषा?
यह विडम्बना ही है कि डोनाल्ड ट्रम्प कई बार स्वयं को नोबेल शांति पुरस्कार का सबसे योग्य दावेदार बताते रहे हैं। वे दावा करते हैं कि उन्होंने दुनिया में कई युद्ध रुकवाए और अनेक देशों के बीच संवाद की शुरुआत कराई लेकिन दूसरी ओर उनकी राजनीतिक शैली का सबसे प्रमुख आधार धमकी, दबाव और टकराव रहा है। यही विरोधाभास उन्हें अन्य अमेरिकी राष्ट्रपतियों से अलग करता है। वे एक ही समय में शांति के दूत भी बनना चाहते हैं और सबसे आक्रामक नेता भी दिखाई देना चाहते हैं लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दोनों भूमिकाएं हमेशा साथ-साथ नहीं चल सकतीं। बातचीत की मेज पर बैठा नेता यदि हर समय युद्ध की भाषा बोले तो उसके शांति प्रस्ताव भी संदेह के घेरे में आ जाते हैं।

कुल मिलाकर 28 जून की घटनाओं ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि किसी भी शांति प्रक्रिया की सबसे बड़ी जरूरत केवल राजनीतिक इच्छा नहीं बल्कि राजनीतिक स्थिरता भी होती है। ईरान के साथ वार्ता अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। संवाद के रास्ते खुले हैं और उम्मीद भी बाकी है लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि यदि अमेरिका स्वयं अपनी ओर से एक स्पष्ट, भरोसेमंद और लगातार एक जैसा संदेश नहीं दे पाया तो यह प्रक्रिया कभी भी पटरी से उतर सकती है।

डोनाल्ड ट्रम्प की राजनीति का सबसे बड़ा आकर्षण उनकी बेबाकी मानी जाती है लेकिन बेबाकी और बेलगाम बयानबाजी के बीच एक बहुत महीन रेखा होती है। घरेलू राजनीति में तीखे बयान चुनाव जिता सकते हैं, पर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में वही बयान वर्षों की मेहनत को कुछ घंटों में बर्बाद भी कर सकते हैं।
ईरान वार्ता का भविष्य चाहे जो भी हो, इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात फिर स्पष्ट कर दी है कि महाशक्तियां केवल अपनी सेनाओं से नहीं बल्कि अपने शब्दों की विश्वसनीयता से दुनिया का नेतृत्व करती हैं और जब किसी राष्ट्रपति की जुबान ही उसकी कूटनीति की सबसे बड़ी चुनौती बन जाए तो संकट केवल एक समझौते का नहीं बल्कि पूरे वैश्विक विश्वास का बन जाता है।

You may also like