दलाई लामा और चीन के बीच दशकों पुराना विवाद अब एक निर्णायक मोड़ पर है। धर्मशाला में निर्वासित तिब्बती धर्मगुरु के रूप में उनकी वैश्विक स्वीकार्यता और चीन की राजनीतिक असुरक्षा इस मुद्दे को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक संघर्ष बना चुकी है। अब जब दलाई लामा वृद्धावस्था की ओर बढ़ चुके हैं, अगला बड़ा प्रश्न यह है कि उनका उत्तराधिकारी कौन होगा? क्या यह पुनर्जन्म भारत में होगा, जैसा उन्होंने स्वयं कहा है या चीन की स्वीकृति से कोई नया धर्मगुरु खड़ा होगा? यह केवल तिब्बत की आस्था का सवाल नहीं है। यह भारत, चीन, अमेरिका और पूरे विश्व के धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का इम्तिहान है
वर्ष 1959 में तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा का भारत में आगमन केवल एक धार्मिक शरण नहीं, बल्कि एशिया की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ था। जब पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ने तिब्बत पर सैन्य नियंत्रण स्थापित किया और ल्हासा विद्रोह के बाद तिब्बती जनता के दमन की खबरें आईं, तब 14वें दलाई लामा, तेनजिन ग्यात्सो को अपनी जान बचाकर भारत आना पड़ा। उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने धर्मशाला में शरण दी, जहां बाद में तिब्बती निर्वासित सरकार की स्थापना हुई।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : तिब्बत और चीन का संघर्ष
तिब्बत सदियों से एक स्वतंत्र धार्मिक-सांस्कृतिक इकाई रहा है। बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा यहां की आत्मा रही है। 1912 से 1950 तक तिब्बत ने व्यावहारिक रूप से स्वतंत्र शासन चलाया, लेकिन 1950 में चीन ने इसे अपनी ‘ऐतिहासिक सम्पत्ति’ बताते हुए सैन्य कार्रवाई की और 1951 में ‘17-पाॅइंट एग्रीमेंट’ के तहत तिब्बत को अपने अधीन कर लिया। यह संधि तिब्बतियों के लिए एक धोखा साबित हुई। 1959 का ल्हासा विद्रोह इस अधीनता के विरुद्ध तिब्बती जनता का स्वाभाविक प्रतिरोध था। हजारों लोग मारे गए, और दलाई लामा को 17 दिनों की खतरनाक यात्रा के बाद भारत आना पड़ा। उनके साथ हजारों तिब्बती भी भारत में शरणार्थी बनकर आए।
भारत में दलाई लामा केवल एक धार्मिक नेता नहीं रहे, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्निर्माण और राजनीतिक प्रतीक भी बन गए। धर्मशाला में तिब्बती निर्वासित सरकार की स्थापना हुई। भारत सरकार ने शरणार्थियों को शिक्षा, रहन-सहन और धार्मिक संरक्षण दिया। दलाई लामा की छवि भारत में गांधीवादी, अहिंसक संघर्ष के प्रतीक के रूप में विकसित हुई।
भारत सरकार की नीति तिब्बत को चीन का हिस्सा मानती है, लेकिन भारत दलाई लामा और तिब्बती संस्कृति के संरक्षण को मानवाधिकार का विषय मानता है। यह द्वंद्व आज भी भारत-चीन सम्बंधों के बीच संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है।
पंचेन लामा विवाद और चीन की साजिश
1995 में दलाई लामा ने 11वें पंचेन लामा के रूप में 6 वर्षीय गेदुन छोक्यी न्यिमा को मान्यता दी। चीन ने उस बालक को तुरंत अगवा कर लिया और आज तक उसे दुनिया के सामने नहीं आने दिया। उसकी जगह चीन ने अपना पंचेन लामा नियुक्त किया- ग्याल्त्सेन नोरबू। यह चीन की धार्मिक सत्ता पर पकड़ मजबूत करने की रणनीति थी।
चीन का उद्देश्य स्पष्ट है: वह भविष्य में दलाई लामा जैसे प्रभावशाली धार्मिक नेता को अपने नियंत्रण में रखना चाहता है। इसलिए 2007 में उसने एक अधिसूचना (Order No- 5) जारी कर सभी पुनर्जन्मों की मान्यता को सरकारी अनुमति से जोड़ दिया।
उत्तराधिकारी की गुत्थी
दलाई लामा अब 89 वर्ष के हो चुके हैं। उनकी उत्तराधिकार नीति अब वैश्विक चर्चा का विषय बन गई है। परम्परागत रूप से दलाई लामा की पुनर्जन्म प्रक्रिया बौद्ध धार्मिक प्रक्रियाओं से निर्धारित होती है। लेकिन चीन इस बार उसे बदलना चाहता है। दलाई लामा ने स्पष्ट किया है कि उनका अगला अवतार सम्भवतः भारत या किसी स्वतंत्र देश में जन्म लेगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि वे पुनर्जन्म की परम्परा को समाप्त कर सकते हैं यदि चीन इसे हथियार बनाता है।
यह बयान चीन की धार्मिक नीतियों के विरुद्ध एक खुली चुनौती है। चीन का दावा है कि अगला दलाई लामा केवल उसकी स्वीकृति से ही मान्य होगा। यह टकराव अब केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और मानवाधिकारों का विषय बन गया है। अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय समर्थन 2020 में अमेरिकी कांग्रेस ने “Tibetan Policy and Support Act” पारित किया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि दलाई लामा के उत्तराधिकारी को तिब्बती बौद्ध परम्पराओं के अनुसार ही चुना जाएगा, न कि किसी सरकार के हस्तक्षेप से। इसके साथ ही अमेरिका ने चीन से पंचेन लामा की रिहाई की मांग भी की। यूरोपीय यूनियन, कनाडा और कई अन्य देशों ने भी चीन की तिब्बत नीति की आलोचना की है और तिब्बती धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा की मांग की है।
नैतिक समर्थन बनाम कूटनीति
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती है-धार्मिक समर्थन और कूटनीतिक विवेक का संतुलन बनाए रखना। 1959 से अब तक भारत ने दलाई लामा को धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान की पूर्ण छूट दी है, लेकिन चीन की संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार कई बार सार्वजनिक मंचों पर सतर्कता बरतती है। हाल के वर्षों में भारत ने थोड़ा अधिक स्पष्ट रुख दिखाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दलाई लामा को सार्वजनिक रूप से जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं। इसके अलावा भारत में तिब्बती स्कूलों, संस्थानों और बौद्ध परम्पराओं को संरक्षण मिलता रहा है।
तिब्बती युवा और संस्कृति की चुनौती
दलाई लामा की पीढ़ी के बाद तिब्बती युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, संस्कृति और धर्म की पहचान को बचाए रखना। कई युवा अब पश्चिमी देशों में बस चुके हैं, लेकिन उनके बीच अपनी जड़ों की ओर लौटने की भावना भी प्रबल है। धर्मशाला, मैक्लाॅडगंज, देहरादून, मैसूरु और बौद्धगया जैसे क्षेत्रों में बसे तिब्बती समुदाय अपनी संस्कृति, भाषा और धार्मिक परम्पराओं को जीवित रखने के लिए सक्रिय हैं। परंतु अगला दलाई लामा यदि चीन द्वारा नियुक्त होता है तो यह उनकी पूरी पहचान के लिए संकट बन सकता है।
आत्मदाह और विरोध की आवाजें
वर्ष 2009 से अब तक तिब्बत और चीन शासित क्षेत्रों में 150 से अधिक तिब्बतियों ने आत्मदाह किया है। इन आत्मदाहों का उद्देश्य था- तिब्बत की स्वतंत्रता, दलाई लामा की वापसी और धार्मिक स्वतंत्रता की मांग को उजागर करना। यह आंदोलन वैश्विक मंचों पर गम्भीर चिंता का विषय बन चुका है।
तिब्बती बौद्ध धर्म केवल आध्यात्मिक साधना नहीं, एक सामाजिक जीवन दृष्टि भी है। इसके प्रमुख चार संप्रदाय- न्यिंगमा, काग्यू, साक्य और गेलुग, तिब्बती समाज के रीढ़ रहे हैं। दलाई लामा, गेलुग परम्परा के सर्वोच्च नेता हैं। यदि चीन इस प्रणाली को राजनीतिक औजार में बदल देता है तो यह पूरी परम्परा के लिए अस्तित्व संकट बन जाएगा। यह विवाद अब केवल तिब्बत या चीन तक सीमित नहीं है। यह वैश्विक मानवाधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और नैतिक दायित्व का मामला बन चुका है। भारत की भूमिका ऐतिहासिक रूप से नैतिक नेतृत्व की रही है और यह नेतृत्व इस मुद्दे पर भी जरूरी है।
दलाई लामा की शिक्षाएं करुणा, अहिंसा और परस्पर सम्मान की रही हैं। अगला दलाई लामा यदि चीन के इशारे पर घोषित होता है तो वह इन मूल्यों को धोखा देगा। भारत, अमेरिका, यूरोप और दुनिया को यह सुनिश्चित करना होगा कि तिब्बती बौद्ध परम्परा को उसकी आत्मा के साथ जीवित रखा जाए, राजनीतिक स्वार्थों के हाथों उसकी हत्या न हो।