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भूमि पूजन में शामिल नहीं होंगे राम मंदिर आंदोलन के नायक

भूमि पूजन में शामिल नहीं होंगे राम मंदिर आंदोलन के नायक

छह दिसंबर 1992 का वह दिन अयोध्या के इतिहास का काला दिवस कहा गया। इस दिन देश के कोने -कोने से आए कार सेवकों ने विवादास्पद बाबरी मस्जिद का विध्वंश किया था। जिस पर काफी बवाल मचा था। देश में महीनों तक साम्प्रदायिक तनाव रहा था। कई प्रदेश कर्फ्यूग्रस्त इलाकों में तब्दील हो गए थे। हालाँकि हालात धीरे -धीरे सामान्य हो गए थे। लेकिन दो धर्मों के लोगों के बीच मन में खटास जरूर भर गयी थी। खैर, 1992 से लेकर अब तक के लगभग 28 साल के दौरान सरयू में काफी पानी बह गया है। 28 साल पहले जिस अयोध्या को बाबरी विध्वंश की लीला देखनी पड़ी वही आज सरयू के किनारे पर जगमग हो रही है। कल 5 अगस्त के दिन यहां न केवल लाखों दिए जलेंगे, बल्कि एक बार फिर यह दिन इतिहास के पन्नों पर दर्ज हो जायेगा।

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कल अयोध्या में रामलला के मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन करेंगे। हालाँकि भूमि पूजन की तिथि को कुछ धर्माचार्यों ने उचित नहीं मानते हुए इसका विरोध किया है, फिर भी सरकार इस कार्यक्रम को लेकर उत्साहित है। एक तरफ भूमि पूजन के मुहूर्त का विवाद है तो दूसरी तरफ सवाल खड़े हो रहे हैं कि आखिर ऐसी क्या बात है कि लालकृष्ण आडवाणी, डाक्टर मुरली मनोहर जोशी कल्याण सिंह आदि दिग्गज जो कि राम मंदिर आंदोलन के नायक रहे वे क्यों नहीं भूमि पूजन में शामिल हो पा रहे हैं। जिन लोगों ने वर्षों पूर्व मंदिर के नीव की ईंटें रखने का काम किया वे आज हाशिये पर क्यों हैं। इन शख्शियतों को राममंदिर आंदोलन के वास्तुकार भी कहा गया। सवाल उठ रहा है कि आखिर मर्यादा पुरूषोतम राम के महामंदिर का ये कैसा महापूजन है कि इसमें  मंदिर आंदोलन के सारे नायक जैसे कि अडवाणी,जोशी, कल्याण सिंह, विनय कटियार, उमा भारती किसी न किसी बहाने भूमि पूजन से किनारे हैं?

मंदिर निर्माण से जुड़े लोगों का कहना है कि ऐसा कोरोना काल के चलते हो रहा है। जिसमें राम मंदिर के शिलान्यास में वह हस्तियां शामिल नहीं रहेंगी। मगर चर्चा है कि कोरोना तो एक बहाना है, असल में इन नेताओं को हाशिये पर रखा गया। जिससे यह शख्शियतें नाराज हैं। उनकी नाराजगी फिलहाल राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं में हैं। कहा जा रहा है कि पहले तो उनको समारोह में निमंत्रण ही नहीं दिया गया था। लेकिन फिर बाद में कहा गया कि उन सभी को फोन पर निमंत्रण दिया जायेगा। होते- होते बात यहां तक पहुंच गयी कि अब कहा जाने लगा है कि कोरोना वायरस महामारी और उसके प्रोटोकॉल के कारण 90 वर्ष से अधिक आयु के किसी भी व्यक्ति को भूमि पूजन समारोह में शामिल होने की सलाह नहीं दी गयी है। चर्चा तो यहां तक भी है कि राम मंदिर निर्माण का सारा श्रेय प्रधानमंत्री मोदी को देने के चक्कर में राम मंदिर आंदोलन के वास्तुकारों को हाशिए पर डाल दिया जा रहा है।

गौरतलब है कि कल अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण की आधारशिला रखी जाएगी। जिसमें मुख्य तौर पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ही कई बड़ी शख्शियतें शामिल होंगी। राम मंदिर निर्माण के आयोजकों ने समारोह में करीब 175 मेहमानों को आमंत्रित किया है। जिनमें 133 हिन्दू संत शामिल हैं। नेपाल में जानकी मंदिर के महंत को भी आमंत्रित किया गया है। हालाँकि सूत्रों के ज्ञात हुआ है कि जानकी मंदिर के महंत का अयोध्या आना निरस्त हो चुका है। इसके पीछे कोरोना महामारी को मुख्य तौर पर जिम्मेदार मानकर नेपाल सरकार ने जानकी मंदिर के महंत को बॉर्डर क्रॉस करने पर रोक लगा दी है।

इसके अलावा मोहम्मद सरीफ और रामजन्म भूमि विवाद में मुद्दई रहे इकबाल अंसारी के साथ ही विहिप के दिवंगत नेता अशोक सिंघल के भतीजे सलिल सिंघल को भी बुलाया गया है। जानकारी के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी के साथ मंच पर राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत रहेंगे। बताया जा रहा है कि मोहन भगवत के साथ ही योग गुरु रामदेव अयोध्या पहुंच चुके हैं।

याद रहे कि रामलला के मंदिर निर्माण के भव्य समारोह में राममंदिर आंदोलन के वास्तुकार और मंदिर निर्माण की पहली नीव की ईट कहे जाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह, विनय कटियार शामिल नहीं होंगे। जबकि गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष सवतंत्र देव सिंह कोरोना वायरस के चलते आमंत्रण-निमंत्रण प्रक्रिया से ही बाहर हैं। हालाँकि सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे मैसेज के अनुसार चर्चा यह भी गृह मंत्री अमित शाह को निमंत्रण भेजा ही नहीं गया था। जिसके बाद उन्होंने अपने आपको उपेक्षित मानकर कोरोना पॉजिटिव पाया जाना घोषित कर दिया। हालाँकि इसकी कहीं से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।

राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चंपत राय के अनुसार कोरोना वायरस महामारी और उसके प्रोटोकाल के कारण 90 वर्ष की आयु वर्ग के जिन व्यक्तियों को समारोह से दूर रहने की सलाह दी गयी है उनमें भाजपा के सीनियर लीडर लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी हैं। गौरतलब है कि आडवाणी 92 साल के है जबकि मुरली मनोहर जोशी भी 90 पार की श्रेणी में शामिल हैं। दोनों ही सीनियर लीडरों को भाजपा ने मार्गदर्शक मंडल में शामिल किया हुआ है। बताया जा रहा है कि आडवाणी और जोशी फिलहाल अयोध्या नहीं जायेंगे। दोनों नेता सशरीर समारोह में शामिल नहीं होंगे बल्कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये समारोह में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएँगे। कोरोना संकट की बात कहकर फिलहाल दोनों को भूमि पूजन समारोह से दूर रखने से उनके प्रति लोगों में सहानुभूति उमड़ रही है। ये दोनों नेता ढाई दशक पूर्व राममंदिर आंदोलन की रीढ़ कहे जाते थे।

कहा जाता है कि 90 के दशक की शुरुआत में आडवाणी और जोशी के आशीर्वाद और मेहनत का ही नतीजा था कि भाजपा की एक राजनीतिक जमीन तैयार हुई। तब जमीनी स्तर पर भाजपा की पहचान बनाने में इन दोनों नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। आडवाणी ही वो शख्श थे जिन्होंने राममंदिर निर्माण के लिए 1990 में गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथ यात्रा शुरू की थी। तब रथ यात्रा के स्वागत में लोगों का जनसमूह उमड़ गया था। विपक्षी नेताओं को इस रथ यात्रा के लोकप्रिय होने पर चिंता सताने लगी थी। जिसके चलते बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने इस यात्रा को समस्तीपुर में रोक लिया था। कहा भी जाता है कि आडवाणी के नेतृत्व में ही भाजपा ने 1992 के बाद बढ़त बनायीं थी। इसके बाद ही देश में भाजपा की सरकार बनी थी। तब अटल बिहारी वाजपेई देश के प्रधानमंत्री और लाल कृष्ण आडवाणी उप प्रधानमंत्री बनाये गए थे। हालाँकि मोदी युग के बाद आडवाणी को हाशिए पर डाल दिया था।

भाजपा के सीनियर लीडर मुरली मनोहर जोशी ऐसे नेता हैं जिन्होंने पार्टी और खासकर राम मंदिर आंदोलन की रुपरेखा तैयार की थी। तब जोशी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ  करते थे। उनके नेतृत्व में ही पार्टी कार्यकताओं ने ‘रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’ का जोशीला नारा दिया था। यही नहीं बल्कि उन योजनाओं को जमींन पर उतारने वाले नेता जोशी आज पार्टी की जमींन से ही खिसका दिए गए हैं। 2014 के बाद जब से मोदी युग आया तब से उनको पार्टी ने पर्दे के पीछे धकेल दिया था। फिलहाल पार्टी में जोशी की हैसियत आडवाणी की तरह ही है। वह भी मार्गदर्शक मंडल का चेहरा बनाकर सुसज्जित कर दिए गए हैं।

1992 में जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंश हुई थी और राममंदिर का आंदोलन जब यौवन पर था तब कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। इसी दौरान उमा भारती के जोशपूर्ण भाषणों ने राममंदिर आंदोलन को धार दी थी। राम मंदिर आंदोलन में उमा भारती ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था। यहां तक की बाबरी मस्जिद विध्वंश के बाद बने लिब्रहान आयोग ने भी उनकी भूमिका को दोषपूर्ण माना था। लेकिन आज दोनों नेता राम मंदिर भूमि पूजन से दूर हैं। कल्याण सिंह इस पर मौन हैं तो उमा भारती गुस्से से भरी हैं। उमा भारती ने तो गुस्से में यहां तक कह दिया है कि राम मंदिर भाजपा की बपौती नहीं है। उमा भारती की नाराजगी का आलम यह है कि वह कल अयोध्या में तो रहेंगी लेकिन समारोह में शामिल नहीं होंगी। उमा भारती ने कहा है कि वह समारोह में कोरोना की वजह से शामिल नहीं होंगी। जहां प्रधानमंत्री मोदी उपस्थित रहेंगे वह वहां से दूर रहेंगी। वह समारोह समाप्त होने पर सरयू नदी के तट पर जाकर पूजा अर्चना करेंगी और रामलला के दर्शन करेंगी। राजनीतिक हलकों में उमा भारती के स्वर को बगावत के तौर पर देखा जा रहा है।

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