Country

दूषित पानी, बदजुबानी और सत्ता की जवाबदेही

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव दूषित पानी पीने को मजबूर विवादों में फंसे विजय वर्गीय
इंदौर में दूषित पेयजल से कई लोगों की मौत के बाद मध्य प्रदेश सरकार गहरे संकट में है। मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का पत्रकारों से अभद्र व्यवहार, महिलाओं और महिला खिलाड़ियों पर उनके पुराने विवादित बयान और अब ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की सिस्टम-फेल्योर रिपोर्ट ने इस त्रासदी को प्रशासनिक लापरवाही से आगे बढ़ाकर शासन की नैतिक विफलता बना दिया है। अपनी ही पार्टी की वरिष्ठ नेता उमा भारती और विपक्ष के नेता राहुल गांधी के तीखे हमलों ने सरकार को भीतर और बाहर, दोनों मोर्चों पर घेर लिया है


इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित और सीवर-मिश्रित पानी पीने से फैली बीमारी और मौतों ने मध्य प्रदेश की राजनीति को झकझोर दिया है। उल्टी-दस्त, पेट दर्द, डिहाइड्रेशन और किडनी फेल्योर के मामलों के साथ सैकड़ों लोग अस्पतालों में पहुंचे हैं और कई मौतों के दावे सामने आए हैं। यह संकट उस वक्त और गम्भीर हो गया जब इसी मुद्दे पर सवाल पूछने पहुंचे पत्रकारों के साथ मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का अभद्र और अमर्यादित व्यवहार सामने आया।

‘एनडीटीवी’ के संवाददाता अनुराग द्वारी द्वारा जब दूषित पानी से मौतों और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर सवाल पूछा गया तो मंत्री ने सार्वजनिक रूप से अभद्र भाषा का प्रयोग किया। मंत्री सवाल सुन बौखला गए। उन्होंने सवालों को ‘फोकट’’ के सवाल कह डाला और पत्रकार के खामोश न रहने पर ‘क्या घंटा हो गया है’ तक कह डाला। इस घटना के बाद ‘आजतक’ के कैमरे पर वे दो-तीन दिन बाद सवालों का जवाब दिए बिना आगे बढ़ते दिखे। दोनों घटनाओं के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए और यह सवाल उठा कि क्या सरकार जनस्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर सवाल पूछे जाने को भी ‘अपराध’ मानने लगी है।

यह टकराव इसलिए भी गम्भीर माना जा रहा है क्योंकि सवाल किसी राजनीतिक आरोप पर नहीं बल्कि लोगों की मौत पर थे। लोकतंत्र में पत्रकारों का सवाल सत्ता के लिए असहज हो सकता है लेकिन वह जनता की पीड़ा का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसे में मंत्री का यह रवैया सरकार की संवेदनशीलता और पारदर्शिता, दोनों पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
 
संयोग नहीं, पैटर्न

कैलाश विजयवर्गीय का यह व्यवहार अचानक नहीं माना जा रहा क्योंकि उनका सार्वजनिक जीवन लगातार विवादित बयानों से जुड़ा रहा है।
 
महिला खिलाड़ियों पर टिप्पणी

अक्टूबर 2025 में इंदौर में आॅस्ट्रेलियाई महिला क्रिकेटरों के साथ कथित छेड़छाड़ के मामले में विजयवर्गीय ने कहा था कि खिलाड़ियों को बाहर निकलने से पहले स्थानीय प्रशासन को सूचित करना चाहिए था और इस घटना को उन्होंने ‘सबक’ बताया था। इस बयान की व्यापक आलोचना हुई क्योंकि इसमें सुरक्षा व्यवस्था की विफलता के बजाय पीड़ितों के आचरण पर सवाल खड़े किए गए।
 
महिलाओं के पहनावे पर बयान

जून 2025 में विजयवर्गीय ने कहा था कि उन्हें ‘छोटे या कम कपड़े पहनने वाली लड़कियां पसंद नहीं हैं’ और वे ऐसी महिलाओं के साथ फोटो खिंचवाने से बचते हैं। इससे पहले एक धार्मिक मंच से उन्होंने छोटे कपड़े पहनने वाली लड़कियों की तुलना रामायण की शूर्पणखा से की थी। इन बयानों को महिला-विरोधी और नैतिक पहरेदारी का उदाहरण माना गया।
 
अन्य विवादित टिप्पणियां

‘नवभारत टाइम्स’ और ‘एबीपी न्यूज’ जैसे मीडिया संस्थानों ने उनके विवादित बयानों की सूची प्रकाशित की है, जिसमें ताजमहल को मंदिर बताने जैसे दावे, सामाजिक समूहों पर तंज और यौन अपराधों पर आपत्तिजनक उपमाएं शामिल हैं। आलोचना के बाद हर बार सफाई दी गई लेकिन भाषा और सोच का पैटर्न बना रहा। इसी बीच ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ ने इंदौर त्रासदी पर विस्तृत समाचार प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित कर इस त्रासदी  को महज एक प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि नगर व्यवस्था और स्वास्थ्य तंत्र के ढहने का नतीजा बताया है।
 
अखबार की हेडलाइन है : “Behind Indore deaths, civic collapse, health system struggling with deluge of patients”  रिपोर्ट के मुताबिक दूषित पानी की सप्लाई से पहले ही भागीरथपुरा इलाके में बदबूदार पानी की शिकायतें सामने आ चुकी थीं लेकिन न तो समय रहते जलापूर्ति रोकी गई और न ही वैकल्पिक व्यवस्था की गई। एक सप्ताह के भीतर 310 मरीज अस्पताल में भर्ती हुए, 25 आईसीयू तक पहुंचे और 1200 से अधिक लोग ओपीडी में इलाज को मजबूर हुए।

‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ ने डाॅक्टरों के हवाले से लिखा है कि कई मरीज पहले छोटे निजी क्लीनिकों और नर्सिंग होम्स में गए जो गम्भीर डिहाइड्रेशन और किडनी फेल्योर जैसे मामलों से निपटने में सक्षम नहीं थे। इससे इलाज में देरी हुई और कई मामलों में स्थिति और बिगड़ गई। रिपोर्ट साफ कहती है कि यह संकट अचानक नहीं आया बल्कि चेतावनियों को नजरअंदाज करने और नागरिक सेवाओं की लापरवाही का परिणाम था।
 
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

इस मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी कड़ा रुख अपनाया है। सुनवाई के दौरान अदालत ने टिप्पणी की : “If people are dying because of drinking water, then something is seriously wrong with the system.” (यदि लोग पीने के पानी की वजह से मर रहे हैं तो व्यवस्था में कुछ बहुत गम्भीर रूप से गलत है।)

हाईकोर्ट ने इंदौर नगर निगम को फटकार लगाते हुए कहा कि इंदौर जैसी प्रतिष्ठित और चर्चित शहर में इस तरह की स्थिति पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करती है। इसी बीच भाजपा की वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती का बयान सरकार के लिए बड़ा झटका साबित हुआ है। उन्होंने कहा है कि इंदौर की इस घटना में सिर्फ मेयर नहीं बल्कि पूरी मध्य प्रदेश सरकार अपराध के कटघरे में है। उन्होंने इसे प्रदेश और सरकार के लिए ‘शर्म और कलंक’ करार दिया। उमा भारती ने सरकार द्वारा घोषित मुआवजे पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि जिंदगी की कीमत दो लाख रुपए नहीं होती और ऐसे मामलों में पहले सरकार को माफी मांगनी चाहिए। यह आलोचना इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि यह विपक्ष से नहीं बल्कि सत्ता के भीतर से आई है।
 
राहुल गांधी का तीखा राजनीतिक हमला
 
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी इंदौर की मौतों को लेकर भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि इंदौर में पानी नहीं जहर बांटा गया और प्रशासन कुम्भकर्णी नींद में सोया रहा।
 
राहुल गांधी ने सवाल किया कि जब

लोगों ने बार-बार गंदे और बदबूदार पानी की शिकायत की तो समय रहते सप्लाई क्यों नहीं रोकी गई? सीवर पीने के पानी में कैसे मिला? और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी? ये सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। उन्होंने इसे ‘जीवन के अधिकार’ की हत्या बताते हुए भाजपा के ‘डबल इंजन’ शासन को जिम्मेदार ठहराया।
 
2003 के बाद का शासन और बुनियादी विफलता

मध्य प्रदेश में 2003 के बाद से अधिकांश समय भारतीय जनता पार्टी की सरकार रही है। इतने लम्बे शासन के बावजूद यदि बड़े शहर में लोग दूषित पानी पीकर मर रहे हैं तो यह महज तकनीकी गलती नहीं बल्कि शासन माॅडल की विफलता का संकेत है। ‘व्यापम’ जैसे बड़े घोटालों के बाद अब पेयजल संकट ने सरकार के ‘सुशासन’ के दावों को कठघरे में खड़ा कर दिया है।

कुल मिलाकर इंदौर का दूषित पानी प्रकरण अब केवल एक नगर निगम या एक विभाग की चूक नहीं रहा। यह मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की भाषा और पुराने विवादों, सिस्टम के ध्वस्त होने पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, उमा भारती की फटकार और राहुल गांधी के राजनीतिक हमलों, सब मिलकर एक ही सवाल खड़ा करते हैं कि क्या सत्ता ने जवाबदेही छोड़ दी है?

यदि इस त्रासदी से भी सबक नहीं लिया गया तो यह केवल इंदौर की नहीं बल्कि पूरे मध्य प्रदेश की प्रशासनिक विफलता का स्थायी दस्तावेज बन जाएगी।

You may also like

MERA DDDD DDD DD