त्रिपुरा का रहने वाला एंजेल चकमा उत्तराखण्ड के देहरादून में पढ़ाई कर रहा था। परिवार और चश्मदीदों के मुताबिक तीन हफ्ते पहले एंजेल और उसके भाई के साथ कुछ स्थानीय युवकों ने नस्लीय टिप्पणियां कीं, ‘चिंकी’, ‘चाइनीज’ जैसे शब्द उछाले गए। जब एंजेल ने इसका विरोध किया तो विवाद हिंसा में बदल गया। एंजेल को बेरहमी से पीटा गया, गम्भीर रूप से घायल अवस्था में उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां कई दिनों तक वह जिंदगी और मौत के बीच जूझता रहा। अंततः 26 दिसम्बर 2025 को उसकी मौत हो गई। यह खबर फैलते ही त्रिपुरा से लेकर असम, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और दिल्ली तक गुस्से की लहर दौड़ रही है। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक एक ही सवाल गूंज रहा है कि क्या पूर्वोत्तर के नागरिक भारत में अब भी ‘दूसरे दर्जे’ के नागरिक हैं?
वर्ष 2025 की विदाई की रात जब देश नए साल के स्वागत की तैयारी में डूबा था, तब राजधानी के जंतर-मंतर पर एक अलग ही दृश्य था। ठंडी हवा में सैकड़ों मोमबत्तियां जल रही थीं, हर लौ एक सवाल थी, हर चेहरा एक पीड़ा। ये लोग किसी उत्सव के लिए नहीं बल्कि एंजेल चकमा की याद में इकट्ठा हुए थे, उस 24 वर्षीय छात्र के लिए, जिसकी मौत ने भारत में नस्लीय हिंसा और पूर्वाग्रह की सच्चाई को फिर से नंगा कर दिया है।
एंजेल चकमा त्रिपुरा का रहने वाला था और उत्तराखण्ड के देहरादून में पढ़ाई कर रहा था। परिवार और चश्मदीदों के मुताबिक तीन हफ्ते पहले एंजेल और उसके भाई के साथ कुछ स्थानीय युवकों ने नस्लीय टिप्पणियां कीं, ‘चिंकी’, ‘चाइनीज’ जैसे शब्द उछाले गए। जब एंजेल ने इसका विरोध किया तो विवाद हिंसा में बदल गया। एंजेल को बेरहमी से पीटा गया, गम्भीर रूप से घायल अवस्था में उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां कई दिनों तक वह जिंदगी और मौत के बीच जूझता रहा। अंततः 26 दिसम्बर 2025 को उसकी मौत हो गई। यह खबर फैलते ही त्रिपुरा से लेकर असम, मिजोरम, अरुणाचल और दिल्ली तक गुस्से की लहर दौड़ रही है। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक एक ही सवाल गूंज रहा है कि क्या पूर्वोत्तर के नागरिक भारत में अब भी ‘दूसरे दर्जे’ के नागरिक हैं?
दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित कैंडल लाइट विजील में छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, कलाकारों और आम नागरिकों की भारी मौजूदगी रही। मंच से बोलने वालों में लोकसभा में विपक्ष के उपनेता गौरव गोगोई भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि एंजेल चकमा की हत्या केवल एक आपराधिक घटना नहीं है बल्कि यह उस सोच का नतीजा है जो भारत की विविधता को स्वीकार नहीं कर पाती। उन्होंने न्याय में देरी पर चिंता जताते हुए कहा कि दोषियों को सख्त और त्वरित सजा मिलनी चाहिए ताकि यह संदेश जाए कि नस्लीय नफरत के लिए इस देश में कोई जगह नहीं है।
विजिल में मौजूद पूर्वोत्तर की महिलाओं और छात्रों ने अपने निजी अनुभव साझा किए। किसी ने बताया कि दिल्ली जैसे महानगर में किराए का घर ढूंढना कितना अपमानजनक अनुभव बन जाता है तो किसी ने सार्वजनिक परिवहन में मिलने वाली घूरती नजरों और फब्तियों की बात कही। कई युवतियों ने यह भी कहा कि नस्लीय भेदभाव अक्सर यौन उत्पीड़न के रूप में सामने आता है जिसे समाज ‘हल्के मजाक’ की तरह टाल देता है। इन आवाजों के बीच एक मांग सबसे ज्यादा गूंज रही थी, नस्लीय हिंसा को हेट क्राइम के रूप में मान्यता दी जाए। वक्ताओं का कहना था कि मौजूदा कानून ऐसे अपराधों की गम्भीरता को ठीक से सम्बोधित नहीं करते। अक्सर पुलिस ऐसे मामलों को ‘आपसी झगड़ा’ या ‘सामान्य मारपीट’ मानकर दर्ज कर लेती है जिससे पीड़ितों को न्याय मिलने में मुश्किल होती है।
एंजेल चकमा की मौत के बाद उत्तराखण्ड सरकार पर भी दबाव बढ़ा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एंजेल के माता-पिता से फोन पर बातचीत की और गहरा शोक व्यक्त किया। उन्होंने परिवार को भरोसा दिलाया कि राज्य सरकार इस मामले में पूरी संवेदनशीलता और सख्ती से कार्रवाई करेगी तथा दोषियों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से यह भी कहा गया कि उत्तराखण्ड में पढ़ने और काम करने आए बाहरी छात्रों की सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता है।
मुख्यमंत्री की इस पहल को कुछ लोगों ने सकारात्मक कदम बताया लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठाया कि क्या केवल आश्वासन पर्याप्त हैं। छात्र संगठनों का कहना है कि जरूरत इस बात की है कि जमीनी स्तर पर सुरक्षा तंत्र मजबूत हो और पुलिस को नस्लीय अपराधों को पहचानने व दर्ज करने का स्पष्ट प्रशिक्षण मिले।
राजनीतिक स्तर पर भी प्रतिक्रियाएं तेज रहीं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस हत्या को ‘घृणा से प्रेरित अपराध’ बताते हुए कहा कि देश की आत्मा विविधता में है और ऐसी घटनाएं उस आत्मा को चोट पहुंचाती हैं। कई अन्य विपक्षी नेताओं और मुख्यमंत्रियों ने भी बयान जारी कर न्याय की मांग की है। हालांकि प्रदर्शनकारियों के बीच यह नाराजगी भी दिखी कि शीर्ष स्तर पर इस मुद्दे पर स्पष्ट और सशक्त राष्ट्रीय संदेश की कमी है।
एंजेल चकमा की हत्या ने देश को उन पुराने जख्मों की याद दिला दी है जो कभी भरे ही नहीं। 2014 में दिल्ली में अरुणाचल प्रदेश के छात्र निदो तानिया की नस्लीय हमले में मौत, 2012 में अफवाहों के कारण पूर्वोत्तर के हजारों लोगों का महानगरों से पलायन और समय-समय पर बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद व दिल्ली में सामने आए नस्लीय हमले, ये सभी घटनाएं बताती हैं कि समस्या कोई नई नहीं है। कोविड-19 महामारी के दौरान हालात और बिगड़े जब एशियाई चेहरों को वायरस से जोड़कर देखा गया। उस दौर में पूर्वोत्तर के लोगों पर नस्लीय टिप्पणियां और हमले बढ़े। सामाजिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह सब गहरी अज्ञानता और ‘हम बनाम वे’ की मानसिकता का परिणाम है।
शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ता शिक्षा व्यवस्था की भूमिका पर भी सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि स्कूली पाठ्यक्रमों में पूर्वोत्तर भारत के इतिहास, समाज और संस्कृतियों का उल्लेख बेहद सीमित है। जब बच्चों को किसी क्षेत्र के बारे में जानकारी ही नहीं दी जाती तो वे रूढ़ियों और अफवाहों पर भरोसा करने लगते हैं। यही रूढ़ियां आगे चलकर नफरत में बदल जाती हैं।
देहरादून में चल रही पुलिस जांच पर भी सबकी नजर है। गिरफ्तारियों के साथ-साथ यह मांग उठ रही है कि चार्जशीट में नस्लीय गालियों और घृणा की मंशा को प्रमुखता से शामिल किया जाए। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यदि इस पहलू को नजरअंदाज किया गया तो यह मामला भी कई पुराने मामलों की तरह अधूरा न्याय बनकर रह जाएगा।
एंजेल के माता-पिता के लिए यह व्यक्तिगत त्रासदी है, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती। लेकिन देश के लिए यह क्षण आत्ममंथन का है। क्या भारत अपनी विविधता को केवल भाषणों और नारों तक सीमित रखेगा या व्यवहार में भी समानता और सम्मान सुनिश्चित करेगा? क्या नस्लीय हिंसा को नाम देकर, कानून बनाकर और शिक्षा के जरिए रोका जाएगा या हर बार कुछ मोमबत्तियां जलाकर हम आगे बढ़ जाएंगे?
जंतर-मंतर की उस ठंडी रात में जली मोमबत्तियां एक चेतावनी थीं कि चुप्पी अब विकल्प नहीं है। उत्तराखण्ड सरकार के आश्वासन, राजनीतिक हस्तक्षेप और नागरिक समाज के दबाव, इन सबकी अगली परीक्षा अदालतों, नीतिगत फैसलों और प्रशासनिक इच्छाशक्ति में होगी। एंजेल चकमा की स्मृति तभी सच्चे अर्थों में सम्मानित होगी जब भारत नस्लीय नफरत के खिलाफ ठोस कदम उठाएगा और यह सुनिश्चित करेगा कि कोई भी नागरिक चाहे वह किसी भी राज्य या समुदाय से हो, खुद को इस देश में पराया न महसूस करे।
ये घटना दुर्भाग्यपूर्ण है। इसमें सरकार द्वारा पूरी जांच की गई है और ये घटना जिस रूप में प्रचारित की जा रही है मामला इसके उलट है। ये छात्रों के बीच आपसी झगड़े का मामला है। ये हमलवार छात्र भी उस छात्र के इलाके पूर्वोत्तर से ही थे। इसमें पुलिस ने कारवाई की है और दो लोगों को गिरफ्तार भी किया जा चुका है एक नेपाली मूल का था जो फरार है पुलिस उसे जल्द पकड़ लेगी। इसे असहिष्णुता या कानून व्यवस्था फेल होने के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
महेंद्र भट्ट, प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखण्ड भाजपा
देहरादून में 24 वर्षीय उत्तर-पूर्वी छात्र एंजेल चकमा की निर्मम हत्या केवल एक आपराधिक घटना नहीं है बल्कि यह उस भारत की तस्वीर है जहां एक छात्र को मरते समय यह कहना पड़े कि ‘‘मैं भारतीय हूं।’’ यह वाक्य पूरे देश को झकझोरने के लिए पर्याप्त है। एंजेल चकमा पढ़ाई के उद्देश्य से देहरादून आया था। वह न कोई अपराधी था, न किसी आंदोलन का हिस्सा, वह सिर्फ एक छात्र था। नस्लीय गालियां दी गईं, उसने विरोध किया और कुछ ही मिनटों में चाकू से गोद कर उसको जख्मी कर दिया गया। यह घटना बताती है कि मामला केवल कानून-व्यवस्था का नहीं बल्कि सोच, संवेदनशीलता और शासन की गम्भीर असफलता का है। एंजेल चकमा के पिता पैरामिलिट्री फोर्सेस में अपना पूरा जीवन दे चुके हैं। ऐसे में दुखद है कि उनके घर का चिराग आज धामी सरकार की लचर कानून व्यवस्था की वजह से बुझ गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनावी मंचों से उत्तर पूर्व को ‘अष्टलक्ष्मी’ कहते हैं और उसे देश का गौरव बताते हैं लेकिन जब उत्तर-पूर्व का एक बेटा देश की राजधानी से सटे राज्य में मारा जाता है तो केंद्र सरकार की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। यह उस बढ़ती हुई नस्लीय असंवेदनशीलता का परिणाम है, जिस पर केंद्र सरकार ने आंखें मूंद रखी हैं। सवाल ये उठता है कि पुलिस और स्थानीय प्रशासन समय रहते क्यों नहीं हरकत में आया? यदि पहले हस्तक्षेप होता तो शायद आज एंजेल चकमा जीवित होता। जितना भी धामी सरकार अपनी पीठ थपथपा ले लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि छात्र असुरक्षित हैं, अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं और अब उत्तर-पूर्वी छात्र भी सुरक्षित नहीं हैं। नफरत की राजनीति का अंतिम परिणाम हमेशा हिंसा ही होती हैं।
गरिमा मेहरा दसौनी, प्रवक्ता, उत्तराखण्ड कांग्रेस
चकमा मूलतः एक जनजाति है जो यहां चकमा से आए थे जो अब बांग्लादेश में चला गया है। यह वहां की जनजाति थी, यह बुद्धिस्ट थे। आजादी के बाद 1947 के आस-पास नॉर्थ ईस्ट में एक डैम बनना शुरू हुआ ये तब यह यहां आए और पूर्वोत्तर में आकर बस गए। इनमें से बहुत से ईसाई बन गए और सिर्फ नााॅर्थ ईस्ट में ही नहीं पूरे राज्यों में फैल गए। त्रिपुरा में आज भी एक चकमा घाट है। नाॅर्थ ईस्ट के जितने भी बच्चे यहां पढ़ने आते थे या बेंगलुरु जाते थे क्योंकि नाॅर्थ ईस्ट में शिक्षण संस्थाओं का वैसा प्रचार-प्रसार नहीं था। ये लोग आॅल इंडिया सर्विसेज में थे क्योंकि वहां इंसर्जेंसी थी, अनिश्चिंतता का माहौल था। ये अपने बच्चों को सुरक्षित जगह पढ़ने भेजते थे जिनमें से एक सुरक्षित जगह उत्तर प्रदेश का पर्वतीय क्षेत्र जो अब उत्तराखण्ड है, वहां भेजते थे। हालांकि उनके बच्चे नैनीताल भी पढ़ने आते थे लेकिन मसूरी और देहरादून हमारे प्राइम एजुकेशन हब थे, जो आजादी के पहले अंग्रेजों के समय से ही शिक्षा के बहुत बड़े हब थे जिनमंे पब्लिक स्कूल, राष्ट्रीय स्तर के शैक्षिक संस्थान और जिनमें आम लोगों के बच्चे भी पढ़ सकते थे। मसूरी और देहरादून शिक्षा के बड़े केंद्र बन गए। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद देहरादून सबसे बड़े एजुकेशन हब के रूप में विकसित हुआ। निजी विश्वविद्यालय बहुत आए, दून विश्वविद्यालय नारायण दत्त तिवारी के समय स्थापित हुआ, इंजीनियरिंग काॅलेज मेडिकल काॅलेज बने। नॉर्थ ईस्ट के बच्चे यहां खुद को सुरक्षित महसूस करके ही आए थे। देश के अन्य इलाकों के भी लोग यहां शिक्षा के लिए आते हैं। यह जो हुआ है उत्तराखण्ड के समाज के लिए बहुत इंसलटिंग हुआ है, हमारे प्रदेश के लिए यह लज्जा की तरह है, शर्मनाक है। यह भी देखने की बात है कि पिछले वर्ष कश्मीरी बच्चों के साथ भी यही हुआ था। इसके पीछे मामूली सतही वाली बात नहीं है। हमारी वर्तमान की या पूर्व की सरकारों ने जो एक सुनियोजित तरीके से कुछ अफवाहों का दौर चलाया है एक असहिष्णुता का माहौल बनाया है, हिंदू वर्सेस मुस्लिम, हिंदू वर्सेज ईसाई, हिंदू वर्सेस बांग्लादेशी, हिंदू वर्सेस पाकिस्तान और न जाने क्या क्या। इस पूरे समाज की साइकी पर और खास कर युवाओं की साइकी पर बड़ा असर पड़ा है और जो घर के बाहर भाषा इस्तेमाल होती है, जो बड़े-बड़े जिम्मेदार नेता ऐसी भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं, स्वाभाविक है क्यों युवाओं के दिमाग पर भी हावी हो रही है? यह माहौल थूक जिहाद, जमीन जिहाद, नकल जिहाद जो अलग-अलग जिहाद का माहौल पैदा किया गया है उससे नफरत ही भाव पैदा हुआ है और यह उसकी बड़ी अभिव्यक्ति है। हम भूल जाते हैं कि हमारे खुद के बच्चे पूरे देश के हर इलाके में हैं। नाॅर्थ ईस्ट व कश्मीर में सबसे ज्यादा पोस्टिंग उत्तराखण्ड के लोगों की है जिनमें मिलिट्री और पैरामिलिट्री के लोग भी शामिल हैं। इसमें किस-किस प्रकार के दुष्परिणाम निकाल सकते हैं ये नहीं सोचते। मिडल ईस्ट के मुस्लिम देशों में सबसे ज्यादा नौकरी तो हिंदू ही कर रहे हैं लेकिन इसमें हमारी सरकारी न्याय के बदले, अपराधों को नियंत्रित करने के बदले, अपराधियों को पकड़ने के बदले, उन्हें शह दे रही हैं। यह घटना पूरी श्ृंखला का एक हिस्सा है। बहुत-सी घटनाएं तो सामने आई नहीं क्योंकि वह अखबारों की सुर्खियां या हिस्सा नहीं बन सकी। इसमें सरकारों को सख्ती से लगाम लगानी पड़ेगी, वरना ऐसा असहिष्णु समाज पूरे उत्तराखण्ड की साख पर सवाल खड़े कर देगा।
डाॅ. शेखर पाठक, शिक्षाविद
एंजेल चकमा की मृत्यु से हम लोग बहुत शर्मिंदा हैं। पिछले 10 सालों में राजनीति जिस दिशा में चली गई है, ये उसी का परिणाम है। जब आप नफरत फैलाएंगे तो उससे नफरत ही निकलेगी। अभी भी हर घर में मोहब्बत, प्यार को एक मूल्य की तरह माना गया है। लेकिन अब हिंदुत्व के नाम पर नफरत फैलाई जा रही है। हमने कभी रामलीला या फिल्मों के अलावा राम को धनुष बाण के साथ आक्रामक रूप में नहीं देखा था। राम कभी भी अपना धनुष यूं ही अकारण नहीं निकालते थे। एक प्रसंग आता है जब समुद्र ने रास्ता देने में आनाकानी की, तब उनको गुस्सा आया हनुमान जी को हमेशा प्यार और मोहब्बत का जीवंत प्रतीक मानते हैं लेकिन आज हर गाड़ी में आक्रामक राम और गुस्से वाले हनुमान के स्टीकर चिपके दिखाई देते हैं, मर्यादा पुरषोत्तम राम की हनुमान की एक नई आक्रामक छवि गढ़ दी गई है। वोट पाने के लिए एक गुस्से और नफरत सरीखे नकारात्मक मूल्यों को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है और उसका स्वाभाविक परिणाम है कि हम देवभूमि को दैत्य भूमि बनाने पर आमादा हैं। सीधी सी बात है कि कश्मीर से लेकर नाॅर्थ ईस्ट तक हम सब पहाड़ी हैं या कहें तो भारतीय हैं लेकिन नाॅर्थ ईस्ट से हमारा खास तरह का जुड़ाव है। कश्मीरियों के साथ देहरादून और काशीपुर में दुव्र्यवहार किया गया। अगर नफरत के मूल्य परम्परा के रूप में स्थापित करेंगे तो नफरत अलग-अलग रूप में सामने आएगी। यह प्रकरण बहुत दुखद है। एक असंवेदनशील समाज के रूप में हम कहां जा रहे हैं, ये चिंता का विषय है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित कैंडल लाइट विजील में छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, कलाकारों और आम नागरिकों की भारी मौजूदगी रही। मंच से बोलने वालों में लोकसभा में विपक्ष के उपनेता गौरव गोगोई भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि एंजेल चकमा की हत्या केवल एक आपराधिक घटना नहीं है बल्कि यह उस सोच का नतीजा है जो भारत की विविधता को स्वीकार नहीं कर पाती। उन्होंने न्याय में देरी पर चिंता जताते हुए कहा कि दोषियों को सख्त और त्वरित सजा मिलनी चाहिए ताकि यह संदेश जाए कि नस्लीय नफरत के लिए इस देश में कोई जगह नहीं है।
विजिल में मौजूद पूर्वोत्तर की महिलाओं और छात्रों ने अपने निजी अनुभव साझा किए। किसी ने बताया कि दिल्ली जैसे महानगर में किराए का घर ढूंढना कितना अपमानजनक अनुभव बन जाता है तो किसी ने सार्वजनिक परिवहन में मिलने वाली घूरती नजरों और फब्तियों की बात कही। कई युवतियों ने यह भी कहा कि नस्लीय भेदभाव अक्सर यौन उत्पीड़न के रूप में सामने आता है जिसे समाज ‘हल्के मजाक’ की तरह टाल देता है। इन आवाजों के बीच एक मांग सबसे ज्यादा गूंज रही थी, नस्लीय हिंसा को हेट क्राइम के रूप में मान्यता दी जाए। वक्ताओं का कहना था कि मौजूदा कानून ऐसे अपराधों की गम्भीरता को ठीक से सम्बोधित नहीं करते। अक्सर पुलिस ऐसे मामलों को ‘आपसी झगड़ा’ या ‘सामान्य मारपीट’ मानकर दर्ज कर लेती है जिससे पीड़ितों को न्याय मिलने में मुश्किल होती है।
एंजेल चकमा की मौत के बाद उत्तराखण्ड सरकार पर भी दबाव बढ़ा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एंजेल के माता-पिता से फोन पर बातचीत की और गहरा शोक व्यक्त किया। उन्होंने परिवार को भरोसा दिलाया कि राज्य सरकार इस मामले में पूरी संवेदनशीलता और सख्ती से कार्रवाई करेगी तथा दोषियों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से यह भी कहा गया कि उत्तराखण्ड में पढ़ने और काम करने आए बाहरी छात्रों की सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता है।
मुख्यमंत्री की इस पहल को कुछ लोगों ने सकारात्मक कदम बताया लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठाया कि क्या केवल आश्वासन पर्याप्त हैं। छात्र संगठनों का कहना है कि जरूरत इस बात की है कि जमीनी स्तर पर सुरक्षा तंत्र मजबूत हो और पुलिस को नस्लीय अपराधों को पहचानने व दर्ज करने का स्पष्ट प्रशिक्षण मिले।
राजनीतिक स्तर पर भी प्रतिक्रियाएं तेज रहीं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस हत्या को ‘घृणा से प्रेरित अपराध’ बताते हुए कहा कि देश की आत्मा विविधता में है और ऐसी घटनाएं उस आत्मा को चोट पहुंचाती हैं। कई अन्य विपक्षी नेताओं और मुख्यमंत्रियों ने भी बयान जारी कर न्याय की मांग की है। हालांकि प्रदर्शनकारियों के बीच यह नाराजगी भी दिखी कि शीर्ष स्तर पर इस मुद्दे पर स्पष्ट और सशक्त राष्ट्रीय संदेश की कमी है।
एंजेल चकमा की हत्या ने देश को उन पुराने जख्मों की याद दिला दी है जो कभी भरे ही नहीं। 2014 में दिल्ली में अरुणाचल प्रदेश के छात्र निदो तानिया की नस्लीय हमले में मौत, 2012 में अफवाहों के कारण पूर्वोत्तर के हजारों लोगों का महानगरों से पलायन और समय-समय पर बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद व दिल्ली में सामने आए नस्लीय हमले, ये सभी घटनाएं बताती हैं कि समस्या कोई नई नहीं है। कोविड-19 महामारी के दौरान हालात और बिगड़े जब एशियाई चेहरों को वायरस से जोड़कर देखा गया। उस दौर में पूर्वोत्तर के लोगों पर नस्लीय टिप्पणियां और हमले बढ़े। सामाजिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह सब गहरी अज्ञानता और ‘हम बनाम वे’ की मानसिकता का परिणाम है।
शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ता शिक्षा व्यवस्था की भूमिका पर भी सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि स्कूली पाठ्यक्रमों में पूर्वोत्तर भारत के इतिहास, समाज और संस्कृतियों का उल्लेख बेहद सीमित है। जब बच्चों को किसी क्षेत्र के बारे में जानकारी ही नहीं दी जाती तो वे रूढ़ियों और अफवाहों पर भरोसा करने लगते हैं। यही रूढ़ियां आगे चलकर नफरत में बदल जाती हैं।
देहरादून में चल रही पुलिस जांच पर भी सबकी नजर है। गिरफ्तारियों के साथ-साथ यह मांग उठ रही है कि चार्जशीट में नस्लीय गालियों और घृणा की मंशा को प्रमुखता से शामिल किया जाए। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यदि इस पहलू को नजरअंदाज किया गया तो यह मामला भी कई पुराने मामलों की तरह अधूरा न्याय बनकर रह जाएगा।
एंजेल के माता-पिता के लिए यह व्यक्तिगत त्रासदी है, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती। लेकिन देश के लिए यह क्षण आत्ममंथन का है। क्या भारत अपनी विविधता को केवल भाषणों और नारों तक सीमित रखेगा या व्यवहार में भी समानता और सम्मान सुनिश्चित करेगा? क्या नस्लीय हिंसा को नाम देकर, कानून बनाकर और शिक्षा के जरिए रोका जाएगा या हर बार कुछ मोमबत्तियां जलाकर हम आगे बढ़ जाएंगे?
जंतर-मंतर की उस ठंडी रात में जली मोमबत्तियां एक चेतावनी थीं कि चुप्पी अब विकल्प नहीं है। उत्तराखण्ड सरकार के आश्वासन, राजनीतिक हस्तक्षेप और नागरिक समाज के दबाव, इन सबकी अगली परीक्षा अदालतों, नीतिगत फैसलों और प्रशासनिक इच्छाशक्ति में होगी। एंजेल चकमा की स्मृति तभी सच्चे अर्थों में सम्मानित होगी जब भारत नस्लीय नफरत के खिलाफ ठोस कदम उठाएगा और यह सुनिश्चित करेगा कि कोई भी नागरिक चाहे वह किसी भी राज्य या समुदाय से हो, खुद को इस देश में पराया न महसूस करे।
बात अपनी-अपनी
ये घटना दुर्भाग्यपूर्ण है। इसमें सरकार द्वारा पूरी जांच की गई है और ये घटना जिस रूप में प्रचारित की जा रही है मामला इसके उलट है। ये छात्रों के बीच आपसी झगड़े का मामला है। ये हमलवार छात्र भी उस छात्र के इलाके पूर्वोत्तर से ही थे। इसमें पुलिस ने कारवाई की है और दो लोगों को गिरफ्तार भी किया जा चुका है एक नेपाली मूल का था जो फरार है पुलिस उसे जल्द पकड़ लेगी। इसे असहिष्णुता या कानून व्यवस्था फेल होने के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
महेंद्र भट्ट, प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखण्ड भाजपा
देहरादून में 24 वर्षीय उत्तर-पूर्वी छात्र एंजेल चकमा की निर्मम हत्या केवल एक आपराधिक घटना नहीं है बल्कि यह उस भारत की तस्वीर है जहां एक छात्र को मरते समय यह कहना पड़े कि ‘‘मैं भारतीय हूं।’’ यह वाक्य पूरे देश को झकझोरने के लिए पर्याप्त है। एंजेल चकमा पढ़ाई के उद्देश्य से देहरादून आया था। वह न कोई अपराधी था, न किसी आंदोलन का हिस्सा, वह सिर्फ एक छात्र था। नस्लीय गालियां दी गईं, उसने विरोध किया और कुछ ही मिनटों में चाकू से गोद कर उसको जख्मी कर दिया गया। यह घटना बताती है कि मामला केवल कानून-व्यवस्था का नहीं बल्कि सोच, संवेदनशीलता और शासन की गम्भीर असफलता का है। एंजेल चकमा के पिता पैरामिलिट्री फोर्सेस में अपना पूरा जीवन दे चुके हैं। ऐसे में दुखद है कि उनके घर का चिराग आज धामी सरकार की लचर कानून व्यवस्था की वजह से बुझ गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनावी मंचों से उत्तर पूर्व को ‘अष्टलक्ष्मी’ कहते हैं और उसे देश का गौरव बताते हैं लेकिन जब उत्तर-पूर्व का एक बेटा देश की राजधानी से सटे राज्य में मारा जाता है तो केंद्र सरकार की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। यह उस बढ़ती हुई नस्लीय असंवेदनशीलता का परिणाम है, जिस पर केंद्र सरकार ने आंखें मूंद रखी हैं। सवाल ये उठता है कि पुलिस और स्थानीय प्रशासन समय रहते क्यों नहीं हरकत में आया? यदि पहले हस्तक्षेप होता तो शायद आज एंजेल चकमा जीवित होता। जितना भी धामी सरकार अपनी पीठ थपथपा ले लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि छात्र असुरक्षित हैं, अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं और अब उत्तर-पूर्वी छात्र भी सुरक्षित नहीं हैं। नफरत की राजनीति का अंतिम परिणाम हमेशा हिंसा ही होती हैं।
गरिमा मेहरा दसौनी, प्रवक्ता, उत्तराखण्ड कांग्रेस
चकमा मूलतः एक जनजाति है जो यहां चकमा से आए थे जो अब बांग्लादेश में चला गया है। यह वहां की जनजाति थी, यह बुद्धिस्ट थे। आजादी के बाद 1947 के आस-पास नॉर्थ ईस्ट में एक डैम बनना शुरू हुआ ये तब यह यहां आए और पूर्वोत्तर में आकर बस गए। इनमें से बहुत से ईसाई बन गए और सिर्फ नााॅर्थ ईस्ट में ही नहीं पूरे राज्यों में फैल गए। त्रिपुरा में आज भी एक चकमा घाट है। नाॅर्थ ईस्ट के जितने भी बच्चे यहां पढ़ने आते थे या बेंगलुरु जाते थे क्योंकि नाॅर्थ ईस्ट में शिक्षण संस्थाओं का वैसा प्रचार-प्रसार नहीं था। ये लोग आॅल इंडिया सर्विसेज में थे क्योंकि वहां इंसर्जेंसी थी, अनिश्चिंतता का माहौल था। ये अपने बच्चों को सुरक्षित जगह पढ़ने भेजते थे जिनमें से एक सुरक्षित जगह उत्तर प्रदेश का पर्वतीय क्षेत्र जो अब उत्तराखण्ड है, वहां भेजते थे। हालांकि उनके बच्चे नैनीताल भी पढ़ने आते थे लेकिन मसूरी और देहरादून हमारे प्राइम एजुकेशन हब थे, जो आजादी के पहले अंग्रेजों के समय से ही शिक्षा के बहुत बड़े हब थे जिनमंे पब्लिक स्कूल, राष्ट्रीय स्तर के शैक्षिक संस्थान और जिनमें आम लोगों के बच्चे भी पढ़ सकते थे। मसूरी और देहरादून शिक्षा के बड़े केंद्र बन गए। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद देहरादून सबसे बड़े एजुकेशन हब के रूप में विकसित हुआ। निजी विश्वविद्यालय बहुत आए, दून विश्वविद्यालय नारायण दत्त तिवारी के समय स्थापित हुआ, इंजीनियरिंग काॅलेज मेडिकल काॅलेज बने। नॉर्थ ईस्ट के बच्चे यहां खुद को सुरक्षित महसूस करके ही आए थे। देश के अन्य इलाकों के भी लोग यहां शिक्षा के लिए आते हैं। यह जो हुआ है उत्तराखण्ड के समाज के लिए बहुत इंसलटिंग हुआ है, हमारे प्रदेश के लिए यह लज्जा की तरह है, शर्मनाक है। यह भी देखने की बात है कि पिछले वर्ष कश्मीरी बच्चों के साथ भी यही हुआ था। इसके पीछे मामूली सतही वाली बात नहीं है। हमारी वर्तमान की या पूर्व की सरकारों ने जो एक सुनियोजित तरीके से कुछ अफवाहों का दौर चलाया है एक असहिष्णुता का माहौल बनाया है, हिंदू वर्सेस मुस्लिम, हिंदू वर्सेज ईसाई, हिंदू वर्सेस बांग्लादेशी, हिंदू वर्सेस पाकिस्तान और न जाने क्या क्या। इस पूरे समाज की साइकी पर और खास कर युवाओं की साइकी पर बड़ा असर पड़ा है और जो घर के बाहर भाषा इस्तेमाल होती है, जो बड़े-बड़े जिम्मेदार नेता ऐसी भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं, स्वाभाविक है क्यों युवाओं के दिमाग पर भी हावी हो रही है? यह माहौल थूक जिहाद, जमीन जिहाद, नकल जिहाद जो अलग-अलग जिहाद का माहौल पैदा किया गया है उससे नफरत ही भाव पैदा हुआ है और यह उसकी बड़ी अभिव्यक्ति है। हम भूल जाते हैं कि हमारे खुद के बच्चे पूरे देश के हर इलाके में हैं। नाॅर्थ ईस्ट व कश्मीर में सबसे ज्यादा पोस्टिंग उत्तराखण्ड के लोगों की है जिनमें मिलिट्री और पैरामिलिट्री के लोग भी शामिल हैं। इसमें किस-किस प्रकार के दुष्परिणाम निकाल सकते हैं ये नहीं सोचते। मिडल ईस्ट के मुस्लिम देशों में सबसे ज्यादा नौकरी तो हिंदू ही कर रहे हैं लेकिन इसमें हमारी सरकारी न्याय के बदले, अपराधों को नियंत्रित करने के बदले, अपराधियों को पकड़ने के बदले, उन्हें शह दे रही हैं। यह घटना पूरी श्ृंखला का एक हिस्सा है। बहुत-सी घटनाएं तो सामने आई नहीं क्योंकि वह अखबारों की सुर्खियां या हिस्सा नहीं बन सकी। इसमें सरकारों को सख्ती से लगाम लगानी पड़ेगी, वरना ऐसा असहिष्णु समाज पूरे उत्तराखण्ड की साख पर सवाल खड़े कर देगा।
डाॅ. शेखर पाठक, शिक्षाविद
एंजेल चकमा की मृत्यु से हम लोग बहुत शर्मिंदा हैं। पिछले 10 सालों में राजनीति जिस दिशा में चली गई है, ये उसी का परिणाम है। जब आप नफरत फैलाएंगे तो उससे नफरत ही निकलेगी। अभी भी हर घर में मोहब्बत, प्यार को एक मूल्य की तरह माना गया है। लेकिन अब हिंदुत्व के नाम पर नफरत फैलाई जा रही है। हमने कभी रामलीला या फिल्मों के अलावा राम को धनुष बाण के साथ आक्रामक रूप में नहीं देखा था। राम कभी भी अपना धनुष यूं ही अकारण नहीं निकालते थे। एक प्रसंग आता है जब समुद्र ने रास्ता देने में आनाकानी की, तब उनको गुस्सा आया हनुमान जी को हमेशा प्यार और मोहब्बत का जीवंत प्रतीक मानते हैं लेकिन आज हर गाड़ी में आक्रामक राम और गुस्से वाले हनुमान के स्टीकर चिपके दिखाई देते हैं, मर्यादा पुरषोत्तम राम की हनुमान की एक नई आक्रामक छवि गढ़ दी गई है। वोट पाने के लिए एक गुस्से और नफरत सरीखे नकारात्मक मूल्यों को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है और उसका स्वाभाविक परिणाम है कि हम देवभूमि को दैत्य भूमि बनाने पर आमादा हैं। सीधी सी बात है कि कश्मीर से लेकर नाॅर्थ ईस्ट तक हम सब पहाड़ी हैं या कहें तो भारतीय हैं लेकिन नाॅर्थ ईस्ट से हमारा खास तरह का जुड़ाव है। कश्मीरियों के साथ देहरादून और काशीपुर में दुव्र्यवहार किया गया। अगर नफरत के मूल्य परम्परा के रूप में स्थापित करेंगे तो नफरत अलग-अलग रूप में सामने आएगी। यह प्रकरण बहुत दुखद है। एक असंवेदनशील समाज के रूप में हम कहां जा रहे हैं, ये चिंता का विषय है।

