सोमेश्वर में बिहार की बेटियों पर कैबिनेट मंत्री रेखा आर्या के पति द्वारा की गई अमर्यादित टिप्पणी से उपजा विवाद केवल एक व्यक्ति या एक दल तक सीमित नहीं है। गिरधारी लाल साहू जैसे दागी चरित्र को संरक्षण देने का इतिहास सिर्फ भारतीय जनता पार्टी का नहीं रहा है बल्कि कांग्रेस के दौर में भी ऐसे तत्व सत्ता और प्रभाव के आस-पास बने रहे हैं। यह तथ्य अहम है कि रेखा आर्या कभी कांग्रेस की विधायक भी रह चुकी हैं और दल बदलकर भाजपा में आई हैं। उनकी राजनीतिक यात्रा भाजपा से कांग्रेस और फिर कांग्रेस से भाजपा तक जाती रही है। ऐसे में सवाल किसी एक पार्टी पर उंगली उठाने का नहीं बल्कि उस पूरी राजनीतिक संस्कृति पर है जिसमें सत्ता बदलती रही, झंडे बदलते रहे लेकिन अपराध, अनैतिकता और संरक्षण की राजनीति लगभग जस की तस बनी रही। यह प्रकरण साफ करता है कि दाग किसी एक दल के नहीं, कांग्रेस और भाजपा, दोनों के दामन में गहरे हैं
अल्मोड़ा जिले के सोमेश्वर विधानसभा क्षेत्र के स्याही देवमंडल में 23 दिसम्बर को आयोजित एक राजनीतिक कार्यक्रम सामान्य भाषणों और औपचारिक नारों तक सीमित रह सकता था लेकिन मंच से बोले गए कुछ शब्दों ने पूरे देश में एक नया विवाद खड़ा कर दिया। उत्तराखण्ड सरकार की कैबिनेट मंत्री रेखा आर्या के पति गिरधारी लाल साहू ने अपने भाषण के दौरान बिहार की बेटियों के बारे में जिस अमर्यादित और स्त्री-विरोधी भाषा का इस्तेमाल किया, उसने न केवल राजनीतिक मर्यादा को तोड़ा बल्कि महिलाओं के सम्मान पर सीधा आघात किया।
कार्यक्रम में कही गई बातें कैमरे में रिकॉर्ड हो गईं और कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं। बिहार की महिलाओं को पैसे में ‘मिल जाने’ जैसी भाषा में संदर्भित करना केवल एक व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं बल्कि इसे पूरे राज्य की बेटियों का अपमान मान बिहार में भारी आक्रोश फैल गया है।
बिहार में इस बयान को सामूहिक अपमान के रूप में देखा जा रहा है। महिला संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक दलों ने एक स्वर में अपना विरोध दर्ज कराया है। बिहार के विधायक आईपी गुप्ता ने
सार्वजनिक रूप से यह घोषणा कर दी कि जो कोई भी गिरधारी लाल साहू को पकड़कर बिहार लाएगा उसे दस लाख रुपए का इनाम दिया जाएगा। यह घोषणा भले ही कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा न हो लेकिन इसने यह दिखा दिया कि आक्रोश कितना गहरा है?
दबाव बढ़ने पर गिरधारी लाल साहू को सामने आकर माफी मांगनी पड़ी है। उन्होंने कहा कि उनके शब्दों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है और उनका इरादा किसी का अपमान करने का नहीं था। लेकिन माफी के साथ ही यह सवाल भी तेज हो गया कि आखिर ऐसा व्यक्ति जिस पर पहले से गम्भीर आरोप रहे हों, सार्वजनिक मंच पर इस तरह बोलने का आत्मविश्वास कैसे रखता है?
सोमेश्वर का यह बयान एक अलग-थलग घटना नहीं बन पाया। जैसे ही विवाद बढ़ा वैसे ही गिरधारी लाल साहू का वह अतीत फिर सामने आने लगा है जो वर्षों से पुलिस रिकाॅर्ड, अदालतों और मीडिया रिपोर्टों में दर्ज है। ऐसा इसलिलए क्योंकि मामला केवल भाषा का नहीं बल्कि उस चरित्र का है जो लम्बे समय से विवादों से घिरा रहा है।
गिरधारी लाल साहू का नाम सबसे पहले बड़े पैमाने पर जिस संगीन मामले में सामने आया, वह उत्तर प्रदेश के बरेली में वर्ष 1990 में हुआ जैन दम्पति हत्याकांड है। इस मामले में नरेश जैन और उनकी पत्नी पुष्पा जैन की उनके ही घर में निर्मम हत्या कर दी गई थी। आरोप था कि सम्पत्ति विवाद इस दोहरे हत्याकांड की पृष्ठभूमि में था और हत्या के समय दम्पति की बेटियों को एक कमरे में बंद कर दिया गया था।
यह कोई साधारण आपराधिक मामला नहीं है। दोहरी हत्या, प्रत्यक्षदर्शी बेटियों के बयान और सम्पत्ति विवाद, इन सबने इसे बेहद संवेदनशील बना दिया। जांच चली, चार्जशीट दाखिल हुई और गिरधारी लाल साहू का नाम अभियुक्त के रूप में सामने आया। लेकिन इसके बाद न्याय की प्रक्रिया जिस तरह ठहरती चली गई उसने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए।
इस हत्याकांड में सबसे चैंकाने वाला मोड़ तब आया, जब यह सामने आया कि मुकदमे की पूरी फाइल अदालत के रिकाॅर्ड रूम से गायब हो चुकी है। चार्जशीट, गवाहों के बयान, सबूत, सब कुछ अचानक लापता हो गया। नतीजा यह हुआ कि वर्षों तक ट्रायल आगे नहीं बढ़ सका और पीड़ित परिवार न्याय के लिए भटकता रहा।
मामला अंततः इलाहाबाद उच्च न्यायालय तक पहुंचा। उच्च न्यायालय ने इस स्थिति पर कड़ी टिप्पणी करते हुए आदेश दिया कि गायब हुई फाइलों को पुनः रिस्टोर किया जाए और मुकदमे की सुनवाई दोबारा शुरू की जाए। हाईकोर्ट का यह आदेश अपने आप में इस बात की स्वीकारोक्ति था कि निचली न्यायिक प्रक्रिया में गम्भीर चूक हुई है।
फाइलों के पुनर्निर्माण के बाद निचली अदालत को ट्रायल आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए और इसी दौरान गिरधारी लाल साहू के खिलाफ गैर-जमानती वारंट भी जारी हुए। यह तथ्य कि एक हत्या के मामले में फाइलें वर्षों तक गायब रहीं और आरोपी प्रभावशाली बना रहा, राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक विफलता, दोनों की ओर इशारा करता है।
हत्या के आरोपों के अलावा गिरधारी लाल साहू पर एक और बेहद गम्भीर आरोप किडनी प्रत्यारोपण से जुड़ा। आरोप है कि उसके सहयोगी नरेश गंगवार को इलाज के बहाने धोखे में रखकर उसकी किडनी निकलवाई गई और उसे साहू की पहली पत्नी वैजयंती माला के प्रत्यारोपण में इस्तेमाल किया गया।
नरेश गंगवार ने प्रशासन को दी गई शिकायतों में कहा कि उसे पूरी सच्चाई नहीं बताई गई थी और यह प्रक्रिया उसकी स्वतंत्र व सूचित सहमति के बिना कराई गई। यदि यह आरोप सही हैं तो यह केवल आपराधिक मामला नहीं बल्कि मानवाधिकार उल्लंघन का गम्भीर प्रश्न है। ‘दि संडे पोस्ट’ ने ही इस सनसनीखेज कांड का खुलासा अपने 21 अक्टूबर 2017 के अंक 18 में ‘किडनी चोर मंत्री पति’ शीर्षक से प्रकाशित किया था।
गिरधारी लाल साहू का नाम उत्तराखण्ड के रुद्रपुर और आस-पास के क्षेत्रों में जमीनों की खरीद-फरोख्त में कथित फर्जीवाड़े के मामलों में भी सामने आ चुका है। आरोप है कि कूटरचित दस्तावेजों के जरिए सरकारी और निजी जमीनों का अवैध हस्तांतरण किया गया। इन मामलों में एफआईआर दर्ज होने और जांच की बातें सामने आईं। इन्हीं लेन-देन से जुड़े संदिग्ध धन प्रवाह को लेकर मनी लाॅन्ड्रिंग के आरोप भी उठते रहे। ‘दि संडे पोस्ट’ ने अपने कई अंकों में इस मामले का खुलासा किया था।
इस पूरे विवादास्पद इतिहास में एक ऐसा प्रकरण भी है जिसने स्थिति की गम्भीरता को और स्पष्ट किया। कल्पना मिश्रा नाम की महिला से जुड़े मामले में खुद मंत्री रेखा आर्या को बरेली में एफआईआर दर्ज करानी पड़ी। यह विपक्ष का आरोप नहीं था बल्कि एक कैबिनेट मंत्री द्वारा उठाया गया कानूनी कदम था। यह तथ्य अपने आप में बताता है कि गिरधारी लाल साहू से जुड़े विवाद केवल राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं रहे बल्कि निजी और पारिवारिक जीवन तक में कानूनी हस्तक्षेप की नौबत आ चुकी है।
इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए रेखा आर्या की राजनीतिक यात्रा भी अहम है। वह कांग्रेस से विधायक रह चुकी हैं और बाद में दल बदलकर भाजपा में आईं। उनकी राजनीति की शुरुआत भाजपा से हुई, फिर कांग्रेस में गई और उसके बाद दोबारा भाजपा में लौट आईं। इस यात्रा ने यह सवाल और गहरा कर दिया है कि संरक्षण किसी एक दल का नहीं बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा है जिसमें सत्ता बदलती रहती है लेकिन चरित्र वही बने रहते हैं।
सोमेश्वर में दिया गया बयान केवल एक अमर्यादित टिप्पणी भर नहीं है। वह उस आत्मविश्वास का परिणाम है जो लम्बे समय से जवाबदेही से मुक्त रहा है। हत्या के आरोप, गायब फाइलें, किडनी कांड, जमीन फर्जीवाड़ा, आर्थिक अनियमितताएं और निजी विवाद, ये सब मिलकर एक ऐसे चरित्र की तस्वीर पेश करते हैं, जिसे बार-बार राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा है और आज भी मिल रहा है।
यह मामला केवल गिरधारी लाल साहू का नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है जिसमें कांग्रेस और भाजपा, दोनों के दौर में दागी तत्व सत्ता के आस-पास बने रहे। सवाल यह नहीं है कि माफी मांगी गई या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या कानून और लोकतंत्र इतनी हिम्मत रखते हैं कि ऐसे दागी चरित्रों को उसी कसौटी पर परखें, जिस पर एक सामान्य नागरिक को परखा जाता है।
बिहार में उबाल और इनाम की घोषणा
बिहार में इस बयान को सामूहिक अपमान के रूप में देखा जा रहा है। महिला संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक दलों ने एक स्वर में अपना विरोध दर्ज कराया है। बिहार के विधायक आईपी गुप्ता ने
सार्वजनिक रूप से यह घोषणा कर दी कि जो कोई भी गिरधारी लाल साहू को पकड़कर बिहार लाएगा उसे दस लाख रुपए का इनाम दिया जाएगा। यह घोषणा भले ही कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा न हो लेकिन इसने यह दिखा दिया कि आक्रोश कितना गहरा है?
दबाव बढ़ने पर गिरधारी लाल साहू को सामने आकर माफी मांगनी पड़ी है। उन्होंने कहा कि उनके शब्दों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है और उनका इरादा किसी का अपमान करने का नहीं था। लेकिन माफी के साथ ही यह सवाल भी तेज हो गया कि आखिर ऐसा व्यक्ति जिस पर पहले से गम्भीर आरोप रहे हों, सार्वजनिक मंच पर इस तरह बोलने का आत्मविश्वास कैसे रखता है?
सोमेश्वर का बयान और खुलती परतें
सोमेश्वर का यह बयान एक अलग-थलग घटना नहीं बन पाया। जैसे ही विवाद बढ़ा वैसे ही गिरधारी लाल साहू का वह अतीत फिर सामने आने लगा है जो वर्षों से पुलिस रिकाॅर्ड, अदालतों और मीडिया रिपोर्टों में दर्ज है। ऐसा इसलिलए क्योंकि मामला केवल भाषा का नहीं बल्कि उस चरित्र का है जो लम्बे समय से विवादों से घिरा रहा है।
बरेली का जैन दम्पति हत्याकांड
गिरधारी लाल साहू का नाम सबसे पहले बड़े पैमाने पर जिस संगीन मामले में सामने आया, वह उत्तर प्रदेश के बरेली में वर्ष 1990 में हुआ जैन दम्पति हत्याकांड है। इस मामले में नरेश जैन और उनकी पत्नी पुष्पा जैन की उनके ही घर में निर्मम हत्या कर दी गई थी। आरोप था कि सम्पत्ति विवाद इस दोहरे हत्याकांड की पृष्ठभूमि में था और हत्या के समय दम्पति की बेटियों को एक कमरे में बंद कर दिया गया था।
यह कोई साधारण आपराधिक मामला नहीं है। दोहरी हत्या, प्रत्यक्षदर्शी बेटियों के बयान और सम्पत्ति विवाद, इन सबने इसे बेहद संवेदनशील बना दिया। जांच चली, चार्जशीट दाखिल हुई और गिरधारी लाल साहू का नाम अभियुक्त के रूप में सामने आया। लेकिन इसके बाद न्याय की प्रक्रिया जिस तरह ठहरती चली गई उसने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए।
गायब हुई फाइल और न्याय का संकट
इस हत्याकांड में सबसे चैंकाने वाला मोड़ तब आया, जब यह सामने आया कि मुकदमे की पूरी फाइल अदालत के रिकाॅर्ड रूम से गायब हो चुकी है। चार्जशीट, गवाहों के बयान, सबूत, सब कुछ अचानक लापता हो गया। नतीजा यह हुआ कि वर्षों तक ट्रायल आगे नहीं बढ़ सका और पीड़ित परिवार न्याय के लिए भटकता रहा।
मामला अंततः इलाहाबाद उच्च न्यायालय तक पहुंचा। उच्च न्यायालय ने इस स्थिति पर कड़ी टिप्पणी करते हुए आदेश दिया कि गायब हुई फाइलों को पुनः रिस्टोर किया जाए और मुकदमे की सुनवाई दोबारा शुरू की जाए। हाईकोर्ट का यह आदेश अपने आप में इस बात की स्वीकारोक्ति था कि निचली न्यायिक प्रक्रिया में गम्भीर चूक हुई है।
फाइलों के पुनर्निर्माण के बाद निचली अदालत को ट्रायल आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए और इसी दौरान गिरधारी लाल साहू के खिलाफ गैर-जमानती वारंट भी जारी हुए। यह तथ्य कि एक हत्या के मामले में फाइलें वर्षों तक गायब रहीं और आरोपी प्रभावशाली बना रहा, राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक विफलता, दोनों की ओर इशारा करता है।
नरेश गंगवार किडनी प्रकरण
हत्या के आरोपों के अलावा गिरधारी लाल साहू पर एक और बेहद गम्भीर आरोप किडनी प्रत्यारोपण से जुड़ा। आरोप है कि उसके सहयोगी नरेश गंगवार को इलाज के बहाने धोखे में रखकर उसकी किडनी निकलवाई गई और उसे साहू की पहली पत्नी वैजयंती माला के प्रत्यारोपण में इस्तेमाल किया गया।
नरेश गंगवार ने प्रशासन को दी गई शिकायतों में कहा कि उसे पूरी सच्चाई नहीं बताई गई थी और यह प्रक्रिया उसकी स्वतंत्र व सूचित सहमति के बिना कराई गई। यदि यह आरोप सही हैं तो यह केवल आपराधिक मामला नहीं बल्कि मानवाधिकार उल्लंघन का गम्भीर प्रश्न है। ‘दि संडे पोस्ट’ ने ही इस सनसनीखेज कांड का खुलासा अपने 21 अक्टूबर 2017 के अंक 18 में ‘किडनी चोर मंत्री पति’ शीर्षक से प्रकाशित किया था।
जमीन फर्जीवाड़ा और आर्थिक आरोप
गिरधारी लाल साहू का नाम उत्तराखण्ड के रुद्रपुर और आस-पास के क्षेत्रों में जमीनों की खरीद-फरोख्त में कथित फर्जीवाड़े के मामलों में भी सामने आ चुका है। आरोप है कि कूटरचित दस्तावेजों के जरिए सरकारी और निजी जमीनों का अवैध हस्तांतरण किया गया। इन मामलों में एफआईआर दर्ज होने और जांच की बातें सामने आईं। इन्हीं लेन-देन से जुड़े संदिग्ध धन प्रवाह को लेकर मनी लाॅन्ड्रिंग के आरोप भी उठते रहे। ‘दि संडे पोस्ट’ ने अपने कई अंकों में इस मामले का खुलासा किया था।
कल्पना मिश्रा प्रकरण
दल-बदल, सत्ता और संरक्षण
इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए रेखा आर्या की राजनीतिक यात्रा भी अहम है। वह कांग्रेस से विधायक रह चुकी हैं और बाद में दल बदलकर भाजपा में आईं। उनकी राजनीति की शुरुआत भाजपा से हुई, फिर कांग्रेस में गई और उसके बाद दोबारा भाजपा में लौट आईं। इस यात्रा ने यह सवाल और गहरा कर दिया है कि संरक्षण किसी एक दल का नहीं बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा है जिसमें सत्ता बदलती रहती है लेकिन चरित्र वही बने रहते हैं।
व्यक्ति नहीं, व्यवस्था कटघरे में
सोमेश्वर में दिया गया बयान केवल एक अमर्यादित टिप्पणी भर नहीं है। वह उस आत्मविश्वास का परिणाम है जो लम्बे समय से जवाबदेही से मुक्त रहा है। हत्या के आरोप, गायब फाइलें, किडनी कांड, जमीन फर्जीवाड़ा, आर्थिक अनियमितताएं और निजी विवाद, ये सब मिलकर एक ऐसे चरित्र की तस्वीर पेश करते हैं, जिसे बार-बार राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा है और आज भी मिल रहा है।
यह मामला केवल गिरधारी लाल साहू का नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है जिसमें कांग्रेस और भाजपा, दोनों के दौर में दागी तत्व सत्ता के आस-पास बने रहे। सवाल यह नहीं है कि माफी मांगी गई या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या कानून और लोकतंत्र इतनी हिम्मत रखते हैं कि ऐसे दागी चरित्रों को उसी कसौटी पर परखें, जिस पर एक सामान्य नागरिक को परखा जाता है।

