Uttarakhand

धामी का धांसू भू-कानून

‘प्रदेश की जनता की लम्बे समय से उठ रही मांग और उनकी भावनाओं का पूरी तरह सम्मान करते हुए आज कैबिनेट ने सख्त भू-कानून को मंजूरी दे दी है। यह ऐतिहासिक कदम राज्य के संसाधनों, सांस्कृतिक धरोहर और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करेगा। साथ ही प्रदेश की मूल पहचान को बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। हमारी सरकार जनता के हितों के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध है और हम कभी भी उनके विश्वास को टूटने नहीं देंगे। इस निर्णय से यह स्पष्ट हो जाता है कि हम अपने राज्य और संस्कृति की रक्षा के लिए हर सम्भव प्रयास करेंगे। निश्चित तौर पर यह कानून प्रदेश के मूल स्वरूप को बनाए रखने में भी सहायक सिद्ध होगा।’

उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रदेश के लोगों द्वारा वर्षों से उठाई जा रही सशक्त भू कानून की मांग को पूरा करते हुए यह बात कही। धामी सरकार ने 19 फरवरी को सख्त भू कानून विधेयक को मंजूरी दे दी है। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में सख्त भू-कानून विधेयक पर मुहर लगा दी है। प्रदेश में लम्बे समय से भू-कानून को लेकर मांग उठ रही थी। विधान सभा सत्र के दौरान भी विभिन्न संगठनों ने भू- कानून को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था। इसके बाद राज्य कैबिनेट की बैठक में सख्त भू-कानून को मंजूरी दी है।

साल 2000 में जब उत्तराखण्ड उत्तर प्रदेश से अलग होकर एक राज्य बना, तो यह सिर्फ एक भूगोलिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि यह प्रदेश की अनूठी संस्कृति, बोली-भाषा और पहचान को मान्यता देने की दिशा में एक बड़ा कदम था। उत्तराखण्ड एकमात्र हिमालयी राज्य है, जहां अन्य राज्य के लोग पर्वतीय क्षेत्रों की कृषि भूमि, गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए खरीद सकते हैं। राज्य बनने के बाद से कई बार विकास के नाम पर भू-कानून में कई बदलाव किए गए। लोगों की मानें तो सशक्त भू-कानून न होने के चलते प्रदेश में बाहरी लोगों और काॅरपोरेट घराने ने बड़े पैमाने में जमीन की खरीद-फरोख्त की है। इस वजह से यहां के मूल निवासी और भूमिधर अब भूमिहीन हो रहे हैं। इसके चलते ही प्रदेश में हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर भू कानून बनाए जाने की मांग वर्षों से की जा रही थी।

लोगों का कहना था कि हर हाल में हिमाचल की तर्ज पर इस हिमालयी प्रदेश में सख्त भू-कानून लागू किया जाना चाहिए। जब हमारी जमीन बचेगी तभी हमारी संस्कृति बचेगी। देश के कई राज्यों में कृषि भूमि की खरीद से जुड़े सख्त नियम हैं। पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश में भी कृषि भूमि के गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए खरीद बिक्री पर रोक है।

भू-कानून की मांग तेज होते ही वर्ष 2022 में सीएम पुष्कर सिंह धामी ने पूर्व मुख्य सचिव सुभाष कुमार की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था, जिसने सितम्बर 2022 को इस मुद्दे पर अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। गौरतलब है कि समिति ने सख्त भू-कानून को लेकर 23 संस्तुतियां दी थी। समिति की रिपोर्ट और संस्तुतियों के अध्ययन के लिए प्रारूप समिति का गठन भी किया हुआ है।

अल्मोड़ा निवासी अनिल रावत ने कहा कि ये अच्छी बात है कि उत्तराखण्ड के लोग अब जाग रहे हैं, भू-कानून को तो पहले ही लागू किया जाना चाहिए था। अन्य प्रदेशों के लोग यहां बेहताशा जमीनें औने-पौने दामों में खरीद रहे हैं और यहां की डेमोग्राफी को ही पूरा बदल रहे थे इसलिए प्रदेश में एक सख्त भू-कानून लागू किया जाना जरूरी था।

देहरादून निवासी राजेशचौधरी  ने कहा कि पिछले कुछ सालों में देहरादून की तस्वीर ही बदल गई। इतनी भीड़ की यहां रहना भी मुश्किल हो गया है। हर कोई अन्य राज्यों से आकर कई एकड़ जमीन खरीद रहे हैं। ये सब इसलिए हो रहा था क्योंकि उत्तराखण्ड में भूमि से जुड़ा एक सख्त कानून नहीं था। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। पिथौरागढ़ की रहने वाली अनीता बोरा भी प्रदेश में सख्त भू-कानून लागू होने पर खुशी जाहिर करती दिखाई दीं। उन्होंने कहा कि कई वर्षों से हम यही सुनते आ रहे हैं कि उत्तराखण्ड में सख्त भू-कानून लागू होगा, लेकिन आज इसे मुख्यमंत्री धामी ने लागू कर दिखाया।

वर्ष 2000 में राज्य बनने के बाद से अब तक भूमि से जुड़े कानून में कई बदलाव किए गए हैं और उद्योगों का हवाला देकर भू खरीद प्रक्रिया को आसान बनाया गया। प्रदेश के निवासियों में गुस्सा इस बात पर था कि सशक्त भू कानून नहीं होने की वजह से राज्य की जमीन को राज्य से बाहर के लोग बड़े पैमाने पर खरीद रहे थे और राज्य के संसाधन पर बाहरी लोग हावी हो रहे थे जबकि यहां के मूल निवासी और भूमिधर भूमिहीन हो रहे थे। इसका असर पर्वतीय राज्य की संस्कृति, परंपरा, अस्मिता और पहचान पर पड़ रहा है।

बाहरी लोगों द्वारा भूमि खरीद सीमित करने के लिए वर्ष 2003 में तत्कालीन एनडी तिवारी सरकार ने उत्तर प्रदेश के कानून में संशोधन किया और राज्य का अपना भूमि कानून अस्तित्व में आया। इस संशोधन में बाहरी लोगों को कृषि भूमि की खरीद 500 वर्ग मीटर तक सीमित की गई। वर्ष 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी ने संशोधन कर भूमि खरीद की सीमा घटाकर 250 वर्ग मीटर की।

बड़ा बदलाव 2018 में त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्री रहते हुए लिया गया। जब जेडएएलआर एक्ट में संशोधन कर, उद्योग स्थापित करने के उद्देश्य से पहाड़ में जमीन खरीदने की अधिकतम सीमा और किसान होने की बाध्यता खत्म की गई। साथ ही, कृषि भूमि का भू उपयोग बदलना आसान कर दिया। पहले पर्वतीय फिर मैदानी क्षेत्र भी इसमें शामिल किए गए। उस समय सदन में एक मात्र विधायक मनोज रावत ने इसका विरोध किया था।

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