साल 2020 में सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद बाॅलीवुड में नेपोटिज्म को लेकर छिड़ी बहस ने फिल्म उद्योग की कार्यशैली पर गम्भीर सवाल खड़े कर दिए थे। स्टार किड्स और आउटसाइडर्स के बीच अवसरों की असमानता, कथित गुटबाजी और फिल्मी परिवारों के प्रभाव पर देशभर में तीखी चर्चा हुई। पांच साल बाद भी यह सवाल कायम है कि क्या बाॅलीवुड वास्तव में बदल गया है या फिर केवल चेहरे और बहस का स्वर बदल गया है?
बाॅलीवुड में परिवारवाद या नेपोटिज्म कोई नई बात नहीं है। कपूर परिवार से लेकर चोपड़ा, भट्ट, देओल, रोशन और खान परिवार तक, हिंदी फिल्म उद्योग में पीढ़ी दर पीढ़ी कलाकारों का आना दशकों से सामान्य माना जाता रहा है। लम्बे समय तक इसे विरासत और पारिवारिक पेशे का स्वाभाविक विस्तार समझा गया। दर्शकों ने भी इसे सहज रूप से स्वीकार किया क्योंकि कई स्टार किड्स ने अपने अभिनय से खुद को साबित किया लेकिन समय के साथ यह सवाल भी उठने लगा कि क्या फिल्म उद्योग में प्रतिभा से अधिक महत्व परिवार, पहचान और सम्पर्कों का है?
नेपोटिज्म शब्द पहली बार राष्ट्रीय बहस का हिस्सा तब बना जब वर्ष 2017 में अभिनेत्री कंगना रनौत ने एक टीवी कार्यक्रम में निर्माता-निर्देशक करण जौहर को ‘नेपोटिज्म का ध्वजवाहक’ कहा। उस समय इस बयान को फिल्मी दुनिया का एक विवाद माना गया था। करण जौहर ने भी अपने पक्ष में कहा कि किसी को अवसर देना गलत नहीं है, सफलता अंततः दर्शक तय करते हैं। उस समय यह बहस सीमित दायरे में रही लेकिन तीन वर्ष बाद परिस्थितियां पूरी तरह बदल गईं।
14 जून 2020 को अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत की खबर ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। बिहार के एक साधारण परिवार से निकलकर इंजीनियरिंग छोड़ने वाले सुशांत ने टेलीविजन से अपने करियर की शुरुआत की और फिर ‘काई पो चे!’, ‘एम.एस. धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी’, ‘छिछोरे’, ‘केदारनाथ’ और ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी’ जैसी फिल्मों के जरिए खुद को प्रतिभाशाली अभिनेता के रूप में स्थापित किया। उनकी मृत्यु के बाद सोशल मीडिया पर यह धारणा तेजी से फैली कि फिल्म उद्योग में मौजूद कथित गुटबाजी और बाहरी कलाकारों के प्रति भेदभाव ने उन्हें मानसिक रूप से प्रभावित किया होगा। हालांकि बाद में विभिन्न जांच एजेंसियों ने अपने-अपने स्तर पर जांच की और नेपोटिज्म को उनकी मृत्यु से जोड़ने वाला कोई कानूनी निष्कर्ष सामने नहीं आया लेकिन इस घटना ने बाॅलीवुड की कार्य संस्कृति पर गम्भीर सवाल अवश्य खड़े कर दिए। इसके बाद सोशल मीडिया पर ‘बाॅयकाॅट बाॅलीवुड’ अभियान शुरू हुआ। पहली बार ऐसा हुआ कि दर्शकों ने केवल फिल्मों की कहानी या अभिनय पर नहीं बल्कि कलाकारों की पृष्ठभूमि और उद्योग की कार्यशैली पर भी सवाल उठाने शुरू कर दिए। स्टार किड्स के पुराने वीडियो वायरल होने लगे, इंटरव्यू खंगाले जाने लगे और यह बहस आम लोगों के बीच पहुंच गई कि क्या बाॅलीवुड वास्तव में प्रतिभा के आधार पर चलता है।
आलोचकों का कहना था कि फिल्म उद्योग में अवसर समान नहीं हैं। यदि कोई कलाकार फिल्मी परिवार से आता है तो उसे पहली फिल्म बड़े बैनर के साथ मिल जाती है, बड़े निर्देशक उपलब्ध होते हैं, मीडिया का भरपूर समर्थन मिलता है और प्रचार पर करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं। इसके विपरीत किसी बाहरी कलाकार को वर्षों तक आॅडिशन देने पड़ते हैं, छोटी भूमिकाएं करनी पड़ती हैं और सफलता मिलने के बाद भी अगली फिल्म के लिए संघर्ष करना पड़ता है। हालांकि यह भी उतना ही सच है कि बॉलीवुड का इतिहास केवल स्टार किड्स की सफलता का नहीं है। शाहरुख खान, अक्षय कुमार, मनोज बाजपेयी, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, पंकज त्रिपाठी, इरफान खान, विक्रांत मैसी, जयदीप अहलावत और राजकुमार राव जैसे कलाकार बिना किसी फिल्मी पृष्ठभूमि के अपने दम पर सफल हुए। इन कलाकारों ने साबित किया कि प्रतिभा के लिए रास्ता पूरी तरह बंद नहीं था लेकिन यह रास्ता निश्चित रूप से अधिक कठिन था।
नेपोटिज्म की बहस का सबसे बड़ा असर फिल्म निर्माताओं की रणनीति पर पड़ा। पहले किसी स्टार किड्स की पहली फिल्म अपने आप चर्चा का विषय बन जाती थी लेकिन अब दर्शकों ने साफ संदेश दिया कि केवल बड़े परिवार का नाम सफलता की गारंटी नहीं हो सकता। पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े फिल्मी परिवारों के बच्चों की फिल्में बाॅक्स ऑफिस पर बुरी तरह असफल रहीं। इससे उद्योग को पहली बार महसूस हुआ कि दर्शकों की प्राथमिकताएं बदल रही हैं।
इसी दौरान ओटीटी प्लेटफॉर्म का तेजी से विस्तार हुआ। नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम वीडियो, जियो हाॅटस्टार और अन्य डिजिटल मंचों ने उन कलाकारों को अवसर दिए जिन्हें मुख्यधारा का सिनेमा लम्बे समय तक पर्याप्त जगह नहीं दे पाया था। पंकज त्रिपाठी, जयदीप अहलावत, प्रतीक गांधी, जितेंद्र कुमार, विजय वर्मा, रसिका दुग्गल और शेफाली शाह जैसे कलाकार घर-घर में लोकप्रिय हो गए। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि यदि प्रतिभा को मंच मिले तो दर्शक उसे स्वीकार करने में देर नहीं लगाते लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि नेपोटिज्म समाप्त हो गया? शायद नहीं। आज भी बड़े प्रोडक्शन हाउस अपनी महत्वाकांक्षी फिल्मों के लिए अक्सर फिल्मी परिवारों के बच्चों पर भरोसा करते हैं। बड़े लाॅन्च, महंगे प्रचार अभियान और मीडिया का शुरुआती समर्थन उन्हें अपेक्षाकृत आसानी से मिल जाता है। फर्क सिर्फ इतना आया है कि अब दर्शक उन्हें बिना सवाल किए स्वीकार नहीं करते। अभिनय कमजोर हुआ तो सोशल मीडिया और बाॅक्स आॅफिस दोनों तुरंत फैसला सुना देते हैं। नेपोटिज्म की बहस के दौरान सबसे अधिक आलोचना निर्माता-निर्देशक करण जौहर और कुछ बड़े प्रोडक्शन हाउसों की हुई। उन पर आरोप लगाया गया कि वे नए कलाकारों की तुलना में फिल्मी परिवारों के बच्चों को अधिक अवसर देते हैं। करण जौहर ने कई मौकों पर कहा कि फिल्म उद्योग में किसी को पहला अवसर दिया जा सकता है लेकिन उसे सफल या असफल दर्शक ही बनाते हैं। उनका तर्क था कि यदि स्टार किड्स को मौका मिलता है तो उसका कारण यह भी है कि वे बचपन से इस माहौल को देखते हुए बड़े होते हैं। दूसरी ओर आलोचकों का कहना था कि समस्या पहला अवसर मिलने में नहीं बल्कि बार-बार अवसर मिलने में है। एक बाहरी कलाकार एक असफल फिल्म के बाद वर्षों तक संघर्ष करता है जबकि कई स्टार किड्स लगातार असफलताओं के बावजूद बड़े बैनरों में काम करते रहते हैं।
सवाल यह नहीं है कि किसी अभिनेता का बेटा या बेटी फिल्मों में क्यों आए बल्कि यह है कि क्या फिल्म उद्योग प्रतिभा की तुलना में वंश पर अधिक भरोसा करता है? यही कारण है कि आज भी बहस पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। हालांकि पिछले पांच वर्षों में बॉलीवुड में कई महत्वपूर्ण बदलाव भी दिखाई दिए हैं। पहले जहां किसी फिल्म की सफलता का सबसे बड़ा आधार स्टार का नाम होता था, वहीं अब कहानी, निर्देशन और अभिनय को अधिक महत्व मिलने लगा है। कई छोटे बजट की फिल्मों ने बड़े सितारों की फिल्मों को पीछे छोड़ दिया। ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘12वीं फेल’, ‘लापता लेडीज’ जैसी फिल्मों की सफलता ने यह साबित किया कि यदि विषय और प्रस्तुति मजबूत हो तो दर्शक नए चेहरों और अपेक्षाकृत छोटे कलाकारों को भी स्वीकार करते हैं।
ओटीटी प्लेटफॉर्म ने इस बदलाव को और तेज किया। पहले एक अभिनेता के लिए फिल्मों में अवसर मिलना ही सफलता का एकमात्र रास्ता माना जाता था लेकिन अब डिजिटल मंचों ने समानांतर दुनिया तैयार कर दी है। ‘स्कैम 1992’ ने प्रतीक गांधी को राष्ट्रीय पहचान दिलाई, ‘पाताल लोक’ ने जयदीप अहलावत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया, ‘पंचायत’ ने जितेंद्र कुमार को घर-घर में लोकप्रिय बना दिया जबकि पंकज त्रिपाठी और विजय वर्मा जैसे कलाकारों ने यह साबित किया कि अभिनय की ताकत किसी फिल्मी विरासत की मोहताज नहीं होती।
इसके बावजूद स्टार सिस्टम पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। आज भी बड़े बजट की फिल्मों में बड़े परिवारों का प्रभाव दिखाई देता है। आलिया भट्ट, रणबीर कपूर, वरुण धवन, जाह्नवी कपूर, सारा अली खान, अनन्या पाण्डे और अन्य स्टार किड्स लगातार बड़े बैनरों की फिल्मों का हिस्सा बनते हैं लेकिन एक महत्वपूर्ण अंतर यह आया है कि अब दर्शक उन्हें केवल उनके उपनाम के कारण स्वीकार नहीं करते। यदि प्रदर्शन कमजोर है तो सोशल मीडिया पर उनकी आलोचना पहले की तुलना में कहीं अधिक तीखी होती है।
इसके बावजूद स्टार सिस्टम पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। आज भी बड़े बजट की फिल्मों में बड़े परिवारों का प्रभाव दिखाई देता है। आलिया भट्ट, रणबीर कपूर, वरुण धवन, जाह्नवी कपूर, सारा अली खान, अनन्या पाण्डे और अन्य स्टार किड्स लगातार बड़े बैनरों की फिल्मों का हिस्सा बनते हैं लेकिन एक महत्वपूर्ण अंतर यह आया है कि अब दर्शक उन्हें केवल उनके उपनाम के कारण स्वीकार नहीं करते। यदि प्रदर्शन कमजोर है तो सोशल मीडिया पर उनकी आलोचना पहले की तुलना में कहीं अधिक तीखी होती है।
नेपोटिज्म की बहस ने मीडिया की भूमिका को भी बदल दिया। एक समय फिल्म पत्रिकाओं और मनोरंजन चैनलों में स्टार किड्स के लाॅन्च को बड़े उत्सव की तरह प्रस्तुत किया जाता था। अब वही मीडिया अभिनय, बाॅक्स आॅफिस और दर्शकों की प्रतिक्रिया पर अधिक ध्यान देने लगा है। सोशल मीडिया ने इस बदलाव को और मजबूत किया है क्योंकि अब दर्शक सीधे अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं। किसी फिल्म की सफलता या असफलता पर केवल समीक्षकों का नहीं बल्कि आम दर्शकों का भी तत्काल प्रभाव पड़ता है।
यह भी ध्यान रखना होगा कि नेपोटिज्म केवल बाॅलीवुड तक सीमित नहीं है। राजनीति में नेताओं के बेटे-बेटियां, उद्योग जगत में कारोबारी परिवारों की अगली पीढ़ी, खेल संघों में पारिवारिक प्रभाव और मीडिया संस्थानों में भी परिवारवाद के उदाहरण मिलते हैं। इसलिए बाॅलीवुड की बहस वास्तव में भारतीय समाज में अवसरों की समानता पर चल रही व्यापक चर्चा का हिस्सा भी है।
फिल्म उद्योग के भीतर भी इस बहस ने आत्ममंथन को जन्म दिया। आज कई निर्माता नए कलाकारों के लिए खुले ऑडिशन आयोजित कर रहे हैं। स्वतंत्र फिल्मकारों और नए निर्देशकों को भी पहले की तुलना में अधिक पहचान मिल रही है। छोटे शहरों से आने वाले कलाकार अब केवल सहायक भूमिकाओं तक सीमित नहीं हैं बल्कि फिल्मों और वेब सीरीज के मुख्य किरदार भी निभा रहे हैं। यह बदलाव भले धीमा हो लेकिन महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके बावजूद यह कहना जल्दबाजी होगी कि बाॅलीवुड पूरी तरह बदल चुका है। बड़े बैनरों, बड़े एजेंसियों और प्रभावशाली फिल्मी परिवारों का नेटवर्क आज भी उद्योग की वास्तविकता है। अवसरों का वितरण अभी भी पूरी तरह समान नहीं कहा जा सकता लेकिन इतना अवश्य है कि अब दर्शक पहले की तरह निष्क्रिय नहीं रहे। वे सवाल पूछते हैं, तुलना करते हैं और अभिनय के आधार पर निर्णय भी सुनाते हैं।
शायद नेपोटिज्म की बहस का सबसे बड़ा परिणाम यही है कि इसने दर्शकों को अधिक जागरूक बना दिया। अब फिल्मी विरासत सफलता की गारंटी नहीं रही। यदि कोई स्टार किड्स अच्छा अभिनय करता है तो दर्शक उसे स्वीकार करते हैं लेकिन केवल परिवार के नाम के आधार पर उसे सिर-आंखों पर नहीं बैठाते। दूसरी ओर यदि कोई बाहरी कलाकार असाधारण प्रतिभा दिखाता है तो उसे लोकप्रिय होने से कोई नहीं रोक सकता। यह बदलाव पिछले पांच वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि कहा जा सकता है।
पांच वर्ष बाद इस पूरी बहस को देखें तो निष्कर्ष यही निकलता है कि बालीवुड पूरी तरह नहीं बदला है लेकिन बाॅलीवुड को देखने वाला भारत जरूर बदल गया है। दर्शकों की अपेक्षाएं बदल गई हैं, सोशल मीडिया ने शक्ति संतुलन बदल दिया है, ओटीटी ने अवसरों के नए दरवाजे खोल दिए हैं और अभिनय अब पहले की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। यही कारण है कि आज नेपोटिज्म पर बहस पहले से अधिक परिपक्व दिखाई देती है। अंततः प्रश्न यह नहीं है कि नेपोटिज्म पूरी तरह समाप्त हुआ या नहीं बल्कि यह है कि क्या प्रतिभा को पहले की तुलना में अधिक अवसर मिलने लगे हैं। इसका उत्तर आंशिक रूप से ‘हां’ में है। संघर्ष आज भी है, प्रभाव आज भी है लेकिन दर्शकों की अदालत पहले से कहीं अधिक कठोर हो चुकी है। शायद यही बदलाव आने वाले वर्षों में बाॅलीवुड का भविष्य तय करेगा क्योंकि अब अंतिम फैसला किसी फिल्मी परिवार, किसी बड़े निर्माता या किसी स्टार का नहीं बल्कि टिकट खरीदने वाले दर्शक का होगा।