Uttarakhand

पंचायतों में लौटी नेतृत्व की चेतना

इस बार उत्तराखण्ड के दो गांवों ने जो किया, वह किसी क्रांति से कम नहीं। गुंजी गांव (धारचूला, पिथौरागढ़) और बिरगण गांव (वीरोंखाल, पौड़ी) ने अपने ग्राम प्रधान निर्विरोध चुने, वो भी ऐसे व्यक्तित्वों को जो सेवानिवृत्त हो चुके अधिकारी हैं, एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी श्रीमती बिमला गुंज्याल और दूसरे सेना के सेवानिवृत्त कर्नल यशपाल सिंह नेगी। इन दोनों गांवों ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब नेतृत्व का पैमाना न तो जाति होगा, न पैसा और न ही दबाव, बल्कि सेवा, अनुभव और समाज के प्रति समर्पण ही मानदंड होंगे। यही लोकतंत्र की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति है

 

इन दिनों पूरे उत्तराखण्ड में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों की लोकतांत्रिक गूंज सुनाई दे रही है। हर गांव, हर घाटी, हर ब्लाॅक में यह जनादेश तय किया जा रहा है कि स्थानीय नेतृत्व किसे सौंपा जाए? कौन ग्राम प्रधान होगा? कौन क्षेत्र पंचायत सदस्य और कौन जिला पंचायत का प्रतिनिधि? यह चुनाव केवल प्रतिनिधियों के चयन की औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह उस आत्मा की आवाज है जो भारतीय लोकतंत्र को गांव-गांव तक जीवित रखती है। लेकिन इस बार उत्तराखण्ड के दो गांवों ने जो किया, वह किसी क्रांति से कम नहीं। गुंजी गांव (धारचूला, पिथौरागढ़) और बिरगण गांव (वीरोंखाल, पौड़ी) ने अपने ग्राम प्रधान निर्विरोध चुने, वो भी ऐसे व्यक्तित्वों को जो सेवानिवृत्त हो चुके अधिकारी हैं, एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी श्रीमती बिमला गुंज्याल और दूसरे सेना के सेवानिवृत्त कर्नल यशपाल सिंह नेगी। इन दोनों गांवों ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब नेतृत्व का पैमाना न तो जाति होगा, न पैसा और न ही दबाव, बल्कि सेवा अनुभव और समाज के प्रति समर्पण ही मानदंड होंगे। यही लोकतंत्र की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति है।

पंचायत की ऐतिहासिक यात्रा

भारत में पंचायत व्यवस्था का उद्भव आधुनिक काल में नहीं हुआ। ऋग्वैदिक काल से लेकर बौद्धकाल, मौर्यकाल और यहां तक कि मुगलकाल और ब्रिटिश शासन में भी गांवों में परामर्श और निर्णय की स्वायत्त प्रणाली मौजूद थी। ‘पंच’ यानी पांच ज्ञानी लोग- यह अवधारणा केवल प्रतीक नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज के आत्म निर्णय की ऐतिहासिक व्यवस्था थी। ब्रिटिशराज में पंचायती ढांचे को कमजोर किया गया, परंतु स्वतंत्रता के बाद संविधान निर्माताओं ने इस व्यवस्था को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया।

राजीव गांधी और त्रिस्तरीय पंचायती राज की संरचना

वास्तविक रूप से त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा देने का काम प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने किया। उन्होंने महसूस किया कि देश का लोकतंत्र तभी सम्पूर्ण और प्रभावी हो सकता है जब सत्ता का
विकेंद्रीकरण हो। 73वां संविधान संशोधन, जो 1992 में लागू हुआ, इस दिशा में मील का पत्थर सिद्ध हुआ। इसके तहत ग्राम पंचायत (गांव), क्षेत्र पंचायत (ब्लाॅक) और जिला पंचायत (जिला स्तर) के तीन स्तर तय किए गए। इन्हें स्वतंत्र रूप से वित्तीय, प्रशासनिक और योजना सम्बंधी अधिकार दिए गए। महिलाओं, अनुसूचित जातियों और जनजातियों को आरक्षण भी इसी के तहत सुनिश्चित हुआ। राजीव गांधी ने कहा था, ‘‘जब दिल्ली से एक रुपया भेजा जाता है, तो गांव तक केवल 15 पैसे पहुंचते हैं।’’ यह टिप्पणी उस समय की भ्रष्ट और केंद्रीकृत व्यवस्था पर तीखा प्रहार थी।

उत्तराखण्ड की सामाजिक-सांस्कृतिक जरूरतें और पंचायत

उत्तराखण्ड का भूगोल और समाज दोनों ही पंचायत प्रणाली को न केवल जरूरी बनाते हैं, बल्कि इसकी सफलता पर राज्य के विकास की दिशा भी निर्भर करती है। यहां की भौगोलिक विषमताएं- पर्वतीय इलाका, सीमांत क्षेत्र और गांवों तक पहुंच की कठिनाई, ऐसी हैं जहां मजबूत स्थानीय नेतृत्व ही समस्याओं का समाधान दे सकता है। यहां की पंचायतें केवल योजनाएं क्रियान्वित करने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि जल, जंगल, जमीन, चारागाह, मंदिर, परम्परा, सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों की प्रथम इकाई हैं।

 

ग्रामीणों के साथ निर्विरोध चुने गए कर्नल यशपाल सिंह नेगी

अनुभव को सम्मान

गुंजी गांव ने जिस प्रकार से सेवानिवृत्त आईजी बिमला गुंज्याल को निर्विरोध चुना और बिरगण गांव ने सेवानिवृत्त कर्नल यशपाल सिंह नेगी को नेतृत्व सौंपा, वह केवल एक चुनाव नहीं, बल्कि एक मूल्यपरक
सांस्कृतिक निर्णय है। इन दोनों गांवों ने यह कर दिखाया कि लोकतंत्र केवल संख्या का खेल नहीं है, यह अनुभव और विवेक का चयन भी हो सकता है। न प्रचार, न पोस्टर, न पैसा, न जातिगत जोड़-तोड़, बस सेवा और पात्रता के आधार पर प्रतिनिधि का चयन।

श्रीमती बिमला गुंज्याल उत्तराखण्ड पुलिस की सेवा में एक जाना- माना नाम रही हैं। उन्होंने आपराधिक जांच से लेकर महिला सुरक्षा और प्रशासनिक नेतृत्व के कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया है। उनका गांव लौटना यह दर्शाता है कि सेवा की भावना केवल नौकरी तक सीमित नहीं होती। कर्नल नेगी भारतीय सेना के अनुशासन, संगठन और सामरिक दृष्टिकोण से प्रशिक्षित व्यक्ति हैं। उनका गांव में लौटना यह साबित करता है कि ‘रिटायरमेंट’ सेवा की समाप्ति नहीं, समाज की नई शुरुआत हो सकती है।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इस घटनाक्रम को ‘राज्य के लिए अति शुभ संकेत’ कहा। उन्होंने कहा- ‘‘सक्षम व्यक्ति गांव लौटें ताकि उत्तराखंडियत की आभा और चमके, यह आवश्यक है। सक्षम होते ही लोग गांव छोड़ दे रहे हैं। इन दोनों का ग्राम प्रधान चुना जाना यह संकेत देता है कि जीवन में क्षमता अर्जित कर चुके लोग अब अपनी क्षमता का उपयोग करने गांव लौट रहे हैं और उसकी विकास यात्रा का नेतृत्व कर रहे हैं।’’ उन्होंने यह भी कहा कि वे स्वयं गुंजी और बिरगण गांव जाकर ग्रामवासियों को माला पहनाकर धन्यवाद देंगे कि उन्होंने उत्तराखण्ड को रास्ता दिखाया।

ग्रामीणों के साथ निॢवरोध चुनी गई बिमला गुंज्याल

निर्विरोध चुनाव : लोकतांत्रिक गरिमा और सम्भावनाएं

पंचायत चुनाव में निर्विरोध चयन को अक्सर गलत दृष्टि से देखा जाता है, लेकिन यदि यह चयन आम सहमति से और योग्य व्यक्ति के पक्ष में होता है तो यह लोकतंत्र की सबसे ऊंची उड़ान है। यह सामूहिक विवेक और सामूहिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है। गुंजी और बिरगण जैसे गांवों ने यह साफ दिखा दिया है कि गांववाले विकास, ईमानदारी और अनुभव को प्राथमिकता दे रहे हैं। राज्य सरकार को चाहिए कि जो ग्राम पंचायतें निर्विरोध प्रतिनिधि चुनती हैं, उन्हें विशेष प्रोत्साहन निधि दी जाए।

सेवानिवृत्त अधिकारियों को पंचायत नेतृत्व के लिए प्रेरित किया जाए। पंचायत प्रतिनिधियों को ट्रेनिंग, तकनीकी सहायता और सूचना-प्रौद्योगिकी आधारित माॅनिटरिंग प्रणाली से जोड़ा जाए।

जब गांव भविष्य बनते हैं

आज गुंजी और बिरगण ने हमें दिखा दिया कि अगर समाज चाहे तो गांव राजनीति का अखाड़ा नहीं, सेवा और नेतृत्व की प्रयोगशाला बन सकते हैं। पंचायतों के माध्यम से न केवल योजनाएं पूरी होंगी, बल्कि भारत के गांव फिर से ‘ग्राम स्वराज’ की ओर बढ़ सकेंगे। यह केवल उत्तराखण्ड का नहीं, पूरे भारत का सपना होना चाहिए। जब गांव केवल सत्ता के उपभोक्ता नहीं, बल्कि जिम्मेदार-साझेदार बनें।

You may also like

MERA DDDD DDD DD