बजट चाहे वह देश का हो या किसी भी राज्य का, हर साल एक उत्सव की तरह पेश किया जाता है। घोषणाएं होती हैं, विकास के दावे किए जाते हैं और भविष्य के बड़े सपने दिखाए जाते हैं और फिर अगला साल आते-आते ये सपने धूल धूसरित हो जाते हैं। उत्तराखण्ड में वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए पेश किया गया लगभग एक लाख ग्यारह हजार करोड़ रुपए का बजट भी इसी परम्परा का विस्तार है। आकार में यह अब तक के सबसे बड़े बजटों में से एक है और सरकार इसे संतुलित, विकासोन्मुख और गरीब- युवा-अन्नदाता-नारी यानी तथाकथित ‘ज्ञान माॅडल’ पर आधारित बता रही है लेकिन यदि आप इस बजट को थोड़ा ठहर कर पढ़ंे और राज्य की वास्तविक सामाजिक-आर्थिक स्थिति से मिलाकर देखें तो एक असहज प्रश्न उभरता है कि क्या यह बजट वास्तव में उत्तराखण्ड के विकास की दिशा बदलने का दस्तावेज है? या फिर यह केवल राजकोषीय प्रबंधन का लेखा-जोखा भर और जुमलेबाजी है?
उत्तराखण्ड की अर्थव्यवस्था को समझने के लिए सबसे पहले उसकी भौगोलिक और सामाजिक संरचना को समझना जरूरी है। यह एक पहाड़ी राज्य है जहां विकास की लागत स्वाभाविक रूप से अधिक है। गांव दूर-दूर पहाड़ों में बिखरे हुए हैं, परिवहन कठिन है, खेती सीमित है और रोजगार के अवसर कम हैं। राज्य बनने के बाद उम्मीद थी कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप आर्थिक माॅडल तैयार किया जाएगा, लेकिन पिछले दो दशकों में जो विकास माॅडल उभरा है वह मुख्यतः सड़क निर्माण, पर्यटन विस्तार, तीर्थ परियोजनाओं और शहरीकरण पर आधारित रहा है। इस बजट में भी वही प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है। इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण पर भारी व्यय, धार्मिक पर्यटन परियोजनाओं के लिए बड़े प्रावधान और शहरी विकास योजनाओं का विस्तार इस बात का संकेत देते हैं कि सरकार अब भी उसी पुराने रास्ते पर चल रही है।
यह माॅडल राजनीतिक रूप से आकर्षक जरूर है। सड़क, काॅरिडोर, घाट और भवन जैसी परियोजनाएं जनता को तुरंत दिखाई देती हैं और सरकार के लिए उन्हें विकास की उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करना आसान होता है लेकिन पहाड़ की अर्थव्यवस्था का संकट केवल सड़क बन जाने से दूर नहीं हो सकता। असली सवाल यह है कि उन सड़कों से गुजर कर स्थानीय लोगों की आय कितनी बढ़ती है? यदि सड़क केवल पर्यटकों के आवागमन को सुगम बनाती है लेकिन स्थानीय उत्पादन, कृषि या छोटे उद्योगों को मजबूत नहीं करती तो उसका सामाजिक प्रभाव सीमित ही रहेगा।
उत्तराखण्ड की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे उपभोग आधारित ढांचे की ओर बढ़ती जा रही है। पर्यटन, होटल व्यवसाय, रियल एस्टेट और सरकारी खर्च इस अर्थव्यवस्था के प्रमुख स्तम्भ बनते जा रहे हैं। इन क्षेत्रों में गतिविधि बढ़ने से राज्य के सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़े जरूर बेहतर दिखाई देते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ग्रामीण समाज की आर्थिक स्थिति भी उतनी ही सुधर रही है। पहाड़ के अधिकांश गांवों में आज भी कृषि सीमित है, स्थानीय उद्योग नगण्य हैं और युवा रोजगार की तलाश में बाहर जाने को मजबूर हैं।
पलायन उत्तराखण्ड की सबसे बड़ी सामाजिक समस्या बन चुका है। हजारों गांव आंशिक या पूर्ण रूप से खाली हो चुके हैं। जो परिवार अभी भी पहाड़ में रह रहे हैं वे भी लगातार असुरक्षा और अनिश्चितता की स्थिति में हैं। खेती से पर्याप्त आय नहीं मिलती, स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधाएं सीमित हैं और रोजगार के अवसर कम हैं। ऐसे में युवा स्वाभाविक रूप से मैदानों या अन्य राज्यों की ओर चले जाते हैं। इस बजट में रोजगार के प्रश्न पर कुछ योजनाओं का उल्लेख जरूर है, जैसे मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के लिए लगभग साठ करोड़ रुपए का प्रावधान लेकिन राज्य की विशाल बेरोजगार आबादी की तुलना में यह राशि बहुत छोटी है।
रोजगार के सवाल को समझने के लिए यह भी देखना होगा कि राज्य में किस प्रकार की अर्थव्यवस्था विकसित हो रही है। यदि विकास का आधार निर्माण और पर्यटन ही रहेगा तो रोजगार भी मुख्यतः अस्थायी और मौसमी होंगे। निर्माण कार्य कुछ वर्षों तक रोजगार दे सकते हैं लेकिन स्थायी आर्थिक गतिविधि नहीं बनाते। पर्यटन भी वर्ष भर समान रूप से नहीं चलता। चारधाम यात्रा या छुट्टियों के मौसम में अचानक गतिविधि बढ़ जाती है मगर बाकी समय स्थानीय व्यवसायों को कठिनाई का सामना करना पड़ता है। ऐसे में पहाड़ की अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाने के लिए उत्पादन आधारित क्षेत्रों जैसे कृषि प्रसंस्करण, बागवानी, औषधीय पौधे, डेयरी, कुटीर उद्योग और डिजिटल सेवाओं पर गम्भीर निवेश की आवश्यकता है।
सरकार ने इस बजट में मिलेट मिशन और मिशन एप्पल जैसी योजनाओं का उल्लेख किया है। यह स्वागत योग्य पहल है क्योंकि पहाड़ी क्षेत्रों में पारम्परिक अनाज और बागवानी की बड़ी सम्भावनाएं हैं लेकिन इन योजनाओं का पैमाना अभी बहुत छोटा है। यदि पहाड़ी खेती को लाभकारी बनाना है तो केवल उत्पादन बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए प्रसंस्करण इकाइयां, कोल्ड स्टोरेज, परिवहन नेटवर्क और बाजार तक पहुंच की व्यवस्था भी बनानी होगी। जब तक किसान अपने उत्पाद को उचित कीमत पर बेच नहीं पाएगा तब तक खेती से जुड़ाव बढ़ना मुश्किल है।
इस बजट की एक और बड़ी चुनौती राज्य की वित्तीय स्थिति है। उत्तराखण्ड पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है और कुल देनदारियां एक लाख करोड़ रुपए से अधिक हो चुकी हैं। बजट का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान में चला जाता है। यह स्थिति केवल उत्तराखण्ड की नहीं, कई राज्यों की है लेकिन छोटे और सीमित संसाधनों वाले राज्य के लिए यह दबाव अधिक गम्भीर हो जाता है। जब राजस्व का बड़ा भाग पहले से तय खर्चों में बंधा हो तो नई आर्थिक पहल के लिए संसाधन सीमित रह जाते हैं। यही कारण है कि बजट में कई घोषणाएं तो दिखाई देती हैं लेकिन संरचनात्मक बदलाव का स्पष्ट रोडमैप नहीं बन पाता।
स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों की स्थिति भी चिंताजनक है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार स्वास्थ्य विभाग में बड़ी संख्या में पद रिक्त हैं। कई ग्रामीण अस्पतालों में डाॅक्टरों की कमी है और उपकरणों का अभाव भी बना रहता है। शिक्षा क्षेत्र में भी संसाधनों की कमी और संस्थागत समस्याएं दिखाई देती हैं। यदि किसी राज्य को दीर्घकालिक विकास हासिल करना है तो उसे मानव संसाधन पर सबसे अधिक ध्यान देना पड़ता है। स्वस्थ और शिक्षित समाज ही उत्पादक अर्थव्यवस्था की नींव बन सकता है लेकिन जब बजट में इन क्षेत्रों का हिस्सा अपेक्षाकृत कम होता है तो विकास की प्रक्रिया भी सीमित रह जाती है।
ऊर्जा क्षेत्र में भी उत्तराखण्ड की स्थिति विरोधाभासी है। यह राज्य जलविद्युत उत्पादन की बड़ी क्षमता रखता है और इसे ऊर्जा सम्पन्न क्षेत्र कहा जाता है लेकिन बिजली वितरण व्यवस्था में कई समस्याएं बनी हुई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कटौती आम है, वितरण कम्पनियों का घाटा बढ़ रहा है और बुनियादी ढांचे की मरम्मत पर लगातार खर्च करना पड़ता है। सौर ऊर्जा और छोटी जलविद्युत परियोजनाओं के माध्यम से ऊर्जा क्षेत्र में नई सम्भावनाएं पैदा की जा सकती हैं लेकिन इसके लिए स्पष्ट और दीर्घकालिक नीति की आवश्यकता होगी।
उत्तराखण्ड की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू प्रवासी श्रमिक भी हैं। बड़ी संख्या में राज्य के लोग देश के अन्य हिस्सों और खाड़ी देशों में काम करते हैं और अपनी आय का एक हिस्सा घर भेजते हैं। यह धन ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण सहारा बनता है लेकिन वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव आने पर यह संतुलन भी प्रभावित हो सकता है। यदि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण प्रवासी श्रमिकों की वापसी होती है तो राज्य के सामने रोजगार और पुनर्वास की नई चुनौती खड़ी हो सकती है। इसलिए कई विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि राज्य को प्रवासी श्रमिकों का डिजिटल डेटाबेस बनाना चाहिए और उनके कौशल के आधार पर स्थानीय रोजगार के अवसर तैयार करने चाहिए।
पर्यावरण और विकास का संतुलन भी उत्तराखण्ड के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है। हिमालयी क्षेत्र पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील है और बड़े निर्माण कार्यों का प्रभाव लम्बे समय तक दिखाई देता है। पिछले कुछ वर्षों में कई प्राकृतिक आपदाएं इस क्षेत्र की नाजुकता को उजागर कर चुकी हैं। इसलिए विकास की किसी भी योजना को पर्यावरणीय संतुलन के साथ जोड़ना आवश्यक है। हरित ऊर्जा, पर्यावरण पर्यटन और कार्बन अर्थव्यवस्था जैसे नए विचार इस दिशा में अवसर प्रदान कर सकते हैं लेकिन इनके साथ भी सावधानी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण जरूरी है।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह बजट चुनाव से पहले की परिस्थितियों में पेश किया गया है। ऐसे समय में सरकारें आम तौर पर जोखिम भरे आर्थिक सुधारों से बचती हैं और अपेक्षाकृत सुरक्षित और लोकप्रिय योजनाओं पर जोर देती हैं। खाद्य सब्सिडी, सामाजिक योजनाएं और अवसंरचना परियोजनाएं इस रणनीति का हिस्सा होती हैं। इससे अल्पकालिक राजनीतिक लाभ मिल सकता है लेकिन दीर्घकालिक आर्थिक परिवर्तन के लिए अधिक साहसिक नीतियों की आवश्यकता होती है।
उत्तराखण्ड के बजट 2026-27 को यदि समग्र रूप से देखा जाए तो यह राजकोषीय संतुलन बनाए रखने की कोशिश जरूर करता है लेकिन विकास की दिशा में कोई बड़ा मोड़ नहीं देता। यह उस मौजूदा माॅडल की निरंतरता है जिसमें पर्यटन, निर्माण और सरकारी व्यय प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इससे राज्य की आय और आर्थिक गतिविधि कुछ हद तक बढ़ सकती है लेकिन पहाड़ के सामाजिक-आर्थिक संकट, विशेषकर पलायन और रोजगार,का समाधान अभी भी दूर दिखाई देता है।
वास्तविक चुनौती यह है कि उत्तराखण्ड अपनी अर्थव्यवस्था को स्थानीय संसाधनों और मानवीय क्षमता के आधार पर पुनर्गठित करे। पहाड़ी कृषि को लाभकारी बनाना, छोटे उद्योगों को बढ़ावा देना, ग्रामीण पर्यटन को स्थानीय समुदायों से जोड़ना और शिक्षा-स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करना ऐसे कदम हैं जो राज्य के विकास को अधिक संतुलित बना सकते हैं। यदि बजट इन क्षेत्रों में ठोस और दीर्घकालिक निवेश का रास्ता खोलता तो उसे वास्तव में
परिवर्तनकारी दस्तावेज कहा जा सकता था।
फिलहाल यह बजट स्थिरता बनाए रखने की कोशिश जरूर करता है लेकिन परिवर्तन की स्पष्ट दिशा नहीं देता। पहाड़ की अर्थव्यवस्था आज भी उस मोड़ पर खड़ी है जहां उसे केवल सड़कों और भवनों से नहीं बल्कि नई आर्थिक सोच से आगे बढ़ाया जा सकता है। जब तक बजट इस सोच को केंद्र में नहीं लाता, तब तक विकास के दावे कागज पर ही अधिक मजबूत दिखाई देंगे, जमीन पर नहीं।