भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की हालिया टिप्पणियों ने देश में एक गम्भीर बहस को जन्म दिया है। ‘काॅकरोच’ और ‘परजीवी’ जैसे शब्द, जब किसी राजनेता के नहीं बल्कि न्यायपालिका के सर्वोच्च पद से सुनाई दें तो उनका अर्थ केवल भाषाई नहीं रह जाता। वे उस मानसिकता की ओर संकेत करने लगते हैं जिसके भीतर लोकतंत्र, असहमति और नागरिक अधिकारों को देखा जा रहा है। इसी संदर्भ में राज्यसभा सांसद मनोज झा द्वारा लिखी गई खुली चिट्ठी खास महत्व रखती है।
जरा सोचिए कि भारत के संविधान निर्माताओं ने कैसी न्यायपालिका की कल्पना की थी? क्या उन्होंने ऐसी अदालतों का स्वप्न देखा था जो आलोचना से असहज हो या ऐसी संस्थाओं का जो सत्ता और समाज दोनों के प्रति नैतिक विनम्रता बनाए रखें? भारतीय संविधान सभा की बहसों को पढ़ते हुए स्पष्ट होता है कि हमारे संस्थापकों के लिए न्यायपालिका केवल कानून की व्याख्या करने वाली संस्था नहीं थी, वह लोकतंत्र की नैतिक चेतना थी।
संविधान सभा में डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की रीढ़ कहा था। उनका स्पष्ट मत था कि संसद बहुमत के आधार पर शासन कर सकती है परंतु नागरिक स्वतंत्रताओं की अंतिम रक्षा अदालतों के हाथ में ही होगी। इसलिए उन्होंने ऐसी न्यायपालिका की कल्पना की थी जो न केवल कार्यपालिका से स्वतंत्र हो बल्कि बहुसंख्यक जनमत के दबाव से भी मुक्त रह सके। इसी प्रकार अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर ने कहा था कि न्यायपालिका का असली दायित्व ‘राज्य और नागरिक के बीच संतुलन’ बनाए रखना है। यह संतुलन तभी सम्भव है जब अदालतें स्वयं को आलोचना से परे न मानें क्योंकि जिस क्षण कोई संस्था स्वयं को पवित्र और अचूक घोषित कर देती है उसी क्षण लोकतंत्र का क्षय आरम्भ हो जाता है।
भारतीय संविधान की संरचना में न्यायपालिका को असाधारण शक्तियां दी गई हैं। न्यायिक पुनरीक्षण का अधिकार, मौलिक अधिकारों की रक्षा का दायित्व और सरकारों को असंवैधानिक घोषित करने की क्षमता किंतु इसके साथ एक अनकहा नैतिक अनुबंध भी है कि जितनी अधिक शक्ति होगी, उतना अधिक संयम अपेक्षित
होगा।
भारत के न्यायिक इतिहास में अनेक ऐसे उदाहरण हैं जब अदालतों ने अपने नैतिक साहस से लोकतंत्र को बचाने का काम किया है। आपातकाल के बाद जब देश में नागरिक स्वतंत्रताओं पर पुनर्विचार हो रहा था तब न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना भारतीय लोकतंत्र की सबसे पुख्ता आवाज बनकर उभरे थे। उन्होंने ‘एडीएम जबलपुर’ मामले में बहुमत के विरुद्ध जाकर कहा था कि जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार संविधान से नहीं, मनुष्य की नैसर्गिक गरिमा से उत्पन्न होता है। उनकी असहमति तत्कालीन सत्ता के विरुद्ध थी परंतु इतिहास ने उसी असहमति को न्यायपालिका की नैतिक विजय माना।
दिलचस्प बात यह है कि भारतीय न्यायपालिका के भीतर से भी समय-समय पर आत्मालोचना की आवाजें उठती रही हैं। पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा ने एक बार कहा था कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता केवल निर्णयों से नहीं बल्कि जनता के विश्वास से निर्मित होती है और यदि जनता का भरोसा डगमगाने लगे तो अदालतों को आत्ममंथन करना चाहिए।
उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू भी कई बार न्यायपालिका की कार्यप्रणाली, भाई- भतीजावाद और पारदर्शिता की कमी पर तीखी टिप्पणियां करते रहते हैं।
इसी तरह न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर और कुरियन जोसेफ जैसे न्यायाधीश भी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब उसमें पारदर्शिता और आत्म-संशोधन की क्षमता बनी रहे। लोकतंत्र में न्यायपालिका का नैतिक बल उसकी शक्ति से नहीं बल्कि उसके धैर्य से आता है। संसद शोर कर सकती है, राजनीतिक दल आरोप-प्रत्यारोप लगा सकते हैं, मीडिया उत्तेजना फैला सकता है लेकिन अदालतों से अपेक्षा होती है कि वे भाषा की गरिमा बनाए रखें। अदालतें केवल फैसलों से नहीं, अपने शब्दों से भी संविधान की संस्कृति निर्मित करती हैं। यही कारण है कि मनोज झा की चिट्ठी महज राजनीतिक आलोचना नहीं लगती। उसमें बार-बार ‘संवैधानिक नैतिकता’ का उल्लेख आया है। यह वही अवधारणा है जिसे डाॅ. अम्बेडकर ने संविधान सभा में अत्यंत महत्त्वपूर्ण बताया था। उनके अनुसार संविधान केवल संस्थाओं का ढांचा नहीं है बल्कि वह एक नैतिक अनुशासन भी है। यदि संस्थाएं अपने भीतर संवैधानिक नैतिकता को जीवित नहीं रखेंगी तो सबसे सुंदर संविधान भी खोखला हो जाएगा। मनोज झा का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न शायद यही है कि क्या आलोचना करने वाले नागरिक ‘शत्रु’ हैं? क्या बेरोजगार युवाओं का आक्रोश, आरटीआई कार्यकर्ताओं की जिद और पत्रकारों के प्रश्न लोकतंत्र के लिए खतरा हैं?
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि यहां असहमति को वैधता प्राप्त रही। स्वतंत्रता आंदोलन स्वयं असहमति की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति था। महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देते हुए कहा था कि असहमति लोकतंत्र की आत्मा है। बाद में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी अनेक फैसलों में कहा कि आलोचना और असहमति को राष्ट्र-विरोध नहीं माना जा सकता लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक नई प्रवृत्ति दिखाई देती है जिसमें संस्थाएं आलोचना को व्यक्तिगत अपमान की तरह देखने लगी हैं। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तीखा बनाया है। न्यायपालिका पर होने वाली अभद्र टिप्पणियां निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं। न्यायाधीशों को भी गरिमा और सुरक्षा का अधिकार है किंतु प्रश्न यह है कि क्या इस चुनौती का उत्तर अमानवीकरण की भाषा हो सकता है?
इतिहास बताता है कि जब भी सत्ता संरचनाएं नागरिकों को ‘कीड़े’, ‘परजीवी’ या ‘घुसपैठिए’ जैसी भाषा में परिभाषित करने लगती हैं, तब लोकतंत्र का मानवीय आधार कमजोर पड़ने लगता है। भाषा केवल शब्द नहीं होती, वह सत्ता की मनोवृत्ति का दर्पण होती है। भारतीय न्यायपालिका का गौरव इस बात में रहा है कि उसने कई बार जनता के पक्ष में खड़े होकर राज्यसत्ता को सीमित किया। चाहे वह बंदी प्रत्यक्षीकरण के मामले हों, पर्यावरणीय न्याय हो, सूचना के अधिकार का विस्तार हो या निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित करना हो, अदालतों ने लोकतंत्र को व्यापक बनाया। उसी न्यायपालिका के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती उसकी अपनी सार्वजनिक विश्वसनीयता है।
न्यायपालिका को यदि वास्तव में लोकतंत्र की अंतिम शरणस्थली बने रहना है तो उसे आलोचना से डरना नहीं होगा। आलोचना और अवमानना के बीच फर्क करना होगा। नागरिकों की बेचैनी को शत्रुता की तरह नहीं,
लोकतांत्रिक सहभागिता की तरह देखना होगा।
आज जब सार्वजनिक जीवन में संवाद की शालीनता लगातार क्षीण हो रही है तब न्यायपालिका से अपेक्षा और बढ़ जाती है। यदि वही संस्थाएं भी असहमति को अपमानजनक विशेषणों में बांधने लगें तो नागरिकों का भरोसा डगमगाने लगता है और लोकतंत्र में सबसे खतरनाक क्षण वह नहीं होता जब लोग सरकार से डरने लगते हैं बल्कि वह होता है जब लोग न्याय से उम्मीद करना छोड़ दें।
मा. मुख्य न्यायाधीश महोदय,
सादर प्रणाम।
आपकी हालिया टिप्पणियों में प्रयुक्त ‘काॅकरोच’ और ‘परजीवी’ जैसे शब्दों ने देश के अनेक नागरिकों की तरह मुझे भी गहराई से विचलित किया है। चिंता केवल शब्दों के चयन की नहीं है बल्कि उस दृष्टिकोण की है जिसकी झलक इन टिप्पणियों में दिखाई देती है। जब एक संवैधानिक लोकतंत्र के मुख्य न्यायाधीश बेरोजगार युवाओं, आरटीआई कार्यकर्ताओं, मीडिया कर्मियों और असहमति व्यक्त करने वालों की तुलना ‘काॅकरोच’ और ‘परजीवी’ से करते हैं तो यह केवल व्यक्तिगत आक्रोश का मामला नहीं रह जाता, यह लोकतंत्र की मूल आत्मा और उसकी बुनियादी संवैधानिक संस्कृति को आहत करने लगता है।
महोदय, किसी संवैधानिक पद की नैतिक शक्ति केवल उसके अधिकारों से नहीं आती बल्कि उससे आती है उस संयम, संवेदनशीलता और संवैधानिक नैतिकता से, जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है। हमारे न्यायिक इतिहास की यही सबसे सुंदर परम्परा रही है कि अदालतें शब्दों से भी लोकतंत्र को गरिमा प्रदान करती रही हैं। अमानवीकरण की भाषा, चाहे वह ‘काॅकरोच’ हो या ‘परजीवी’, इतिहास में हमेशा असहिष्णुता की पहली शरणस्थली रही है। कभी लगता था कि इस तरह की भाषा न्यायपालिका की चौखट तक नहीं पहुंचेगी लेकिन अब महसूस होता है कि शायद हम ही बहुत मासूम थे। मी लार्ड, लोकतंत्र इसलिए जीवित रहते हैं क्योंकि संस्थाएं आलोचना को लोकतांत्रिक आवश्यकता मानती हैं, किसी प्रदूषण की तरह नहीं।
मैं उन करोड़ों भारतीयों में शामिल हूं जिन्हें यह बेहद असहज और पीड़ादायक लगता है कि भारत के बेरोजगार युवाओं को ‘काॅकरोच’ कहा जा रहा है और वह भी ऐसे व्यक्ति द्वारा जो इस कठिन और बेचैन समय में उम्मीद के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन है। क्या यह सच नहीं कि ये युवा एक गहरे आर्थिक और संस्थागत संकट के शिकार हैं जिसका सामना स्वयं व्यवस्था को ईमानदारी से करना चाहिए? आज करोड़ों शिक्षित युवा घटते अवसरों, संविदा आधारित असुरक्षा, भर्ती में देरी, प्रश्नपत्र लीक और बढ़ती निराशा के बीच अपना जीवन जी रहे हैं। उनकी बेचैनी और आक्रोश को ‘परजीविता’ कह देना उस पीढ़ी का उपहास करना है जो पहले ही अनिश्चितताओं का भारी बोझ ढो रही है।
उतनी ही गम्भीर चिंता आपकी उन टिप्पणियों से भी उत्पन्न होती है जिनमें आरटीआई कार्यकर्ताओं और मीडिया के एक बड़े हिस्से को संदेह की दृष्टि से देखा गया। सूचना के अधिकार का आंदोलन उन साधारण नागरिकों के संघर्ष से निकला था जिन्होंने सत्ता से पारदर्शिता की मांग की। अनेक आरटीआई कार्यकर्ताओं ने भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं को उजागर करने के लिए भारी व्यक्तिगत जोखिम उठाए हैं, कई लोगों ने तो अपनी जान तक गंवाई है। खोजी पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता, अपनी सीमाओं और अपूर्णताओं के बावजूद लोकतांत्रिक जवाबदेही के आवश्यक स्तम्भ हैं। क्या हर आलोचक को ‘व्यवस्था-विरोधी’ तत्व के रूप में चित्रित करना उचित है? ऐसा दृष्टिकोण एक खतरनाक परिस्थिति निर्मित करता है जहां ‘जी हां हुजूर’ को देशभक्ति और प्रश्न पूछने को शत्रुता या राष्ट्र-विरोध में बदल दिया जाता है।
महोदय, न्यायपालिका का संवैधानिक स्थान इसलिए विशिष्ट है क्योंकि उससे अपेक्षा की जाती है कि वह असहमति की आवाजों की रक्षा करेगी, न कि उन्हें कलंकित करेगी। अदालतों ने ऐतिहासिक रूप से सरकारों को यह याद दिलाया है कि आलोचना देशद्रोह नहीं होती, असहमति राष्ट्र-विरोध नहीं होती और बेहतर जवाबदेही की मांग कोई विध्वंसक गतिविधि नहीं है। यदि नागरिकों को यह भय सताने लगे कि संस्थाओं की आलोचना करने पर उन्हें अपमान या प्रतिशोध का सामना करना पड़ सकता है और वह भी उन्हीं संस्थाओं से जो उनकी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बनी हैं तो लोकतांत्रिक अनुबंध कमजोर पड़ने लगता है।
सोशल मीडिया पोस्टों को लेकर की गई टिप्पणियां और वकीलों की ऑनलइन अभिव्यक्तियों की जांच कराने के सुझाव भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में गम्भीर प्रश्न खड़े करते हैं। पेशेगत अनुशासन निस्संदेह आवश्यक है और यदि फर्जी डिग्रियां हैं तो उनकी जांच भी अवश्य होनी चाहिए लेकिन आलोचना, असहमति या असहज प्रश्नों को संस्थागत संदेह का आधार नहीं बनाया जा सकता। अन्यथा जवाबदेही और भयादोहन के बीच की रेखा खतरनाक रूप से धुंधली हो जाती है।
मी लाॅर्ड, सार्वजनिक संस्थाओं विशेषकर संवैधानिक अदालतों से यह अपेक्षा होती है कि वे ऐसी भाषा में संवाद करें जो सार्वजनिक विमर्श को ऊंचा उठाए, न कि उसे और अधिक कठोर और असभ्य बनाए। ऐसे समय में जब देश पहले ही राजनीतिक संवाद में गिरती शालीनता का साक्षी बन रहा है, न्यायपालिका से यह उम्मीद थी कि वह संवैधानिक संयम और गरिमा की अंतिम शरणस्थली बनी रहेगी।
प्रश्न यह नहीं है कि न्यायाधीश को क्रोध आ सकता है या नहीं, आप भी मनुष्य हैं। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या संवैधानिक अधिकार और सार्वजनिक जीवन नागरिकों के प्रति तिरस्कार की भाषा वहन कर सकते हैं? लोकतंत्र आलोचना से कमजोर नहीं होते, वे तब कमजोर होते हैं जब शक्तिशाली संस्थाएं आलोचकों को लोकतांत्रिक भागीदारों के बजाय ‘शत्रु’ की तरह देखने लगती हैं।
अंत में केवल इतना कहना चाहता हूं कि भारत के बेरोजगार युवा, आरटीआई कार्यकर्ता, स्वतंत्र पत्रकार और असहमति रखने वाले नागरिक लोकतंत्र में रहने वाले कीड़े-मकोड़े नहीं हैं। वे उन अनेक स्वरों में शामिल हैं जिनसे लोकतंत्र सांस लेता है और उम्मीद का दायरा विस्तृत होता है।
सादर!