उत्तराखण्ड की राजनीति में नैनीताल जिले की कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र लम्बे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। 2006 में परिसीमन के बाद यह नई सीट अस्तित्व में आई थी और 2012 में सीट के गठन के बाद से यहां भाजपा के दिग्गज नेता बंशीधर भगत लगातार चुनाव जीतते आए हैं और क्षेत्र की राजनीति लगभग उनके इर्द-गिर्द घूमती रही है। 2012, 2017 और 2022 में वह लगातार कालाढूंगी विधानसभा सीट से विधायक बनते आ रहे हैं लेकिन पार्टी के भीतर से इस बार उनके लिए चुनौतियां खड़ी हो रही हैं और शायद बंशीधर भगत अपने राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहे हैं। हालांकि उनके हाव-भाव बताते हैं कि वह इस लड़ाई में भी निश्चिंत हैं, उनके द्वारा बार-बार दिए जाने वाले बयान कि अभी वह 10 साल तक सक्रिय रहेंगे और कालाढूंगी में अभी दूसरे के लिए कोई जगह नहीं है। स्पष्ट है कि वह आत्मविश्वास से भरपूर हैं लेकिन पार्टी के भीतर उनके विरोधी इस बार आर-पार की लड़ाई के मूड में नजर आते हैं। इस चलते पार्टी के भीतर एक बड़ा अंतद्र्वंद्व होता नजर आए तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए
उत्तराखण्ड विधानसभा चुनावों में अभी लगभग एक वर्ष का समय शेष है लेकिन आगामी विधानसभा के चुनाव के लिए दावेदारों ने कमर कसनी शुरू कर दी है। खासकर भारतीय जनता पार्टी के भीतर उन सीटों के लिए सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है, जिनमें यह मानकर चला जा रहा है कि पार्टी उम्रदराज नेताओं को विश्राम देकर युवाओं को अवसर देना चाहती है। नैनीताल जिले की कालाढूंगी विधानसभा सीट भी उन सीटों में शुमार है जहां भाजपा के स्थानीय नेताओं को आगामी विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारी के रूप में अपनी सम्भावनाएं नजर आ रही हैं। हालांकि इन उम्मीदवारों में सभी युवा ही नहीं है लेकिन उनके लिए ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ वाली स्थिति जरूर है।
उत्तराखण्ड की राजनीति में नैनीताल जिले की कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र लम्बे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। 2006 में परिसीमन के बाद यह नई सीट अस्तित्व में आई थी और 2012 में सीट के गठन के बाद से यहां भाजपा के दिग्गज नेता बंशीधर भगत लगातार चुनाव जीतते आए हैं और क्षेत्र की राजनीति लगभग उनके इर्द-गिर्द घूमती रही है। राजनीति के पितामह कहे जाने वाले बंशीधर भगत उत्तराखण्ड की राजनीति में खासकर भाजपा की राजनीति में एक बड़ा चेहरा माने जाते हैं। कल्याण सिंह सरकार में मंत्री रहे बंशीधर भगत 1991 से विधायी राजनीति में हैं। 1991 में वह राम लहर के चलते नैनीताल विधानसभा सीट से चुनकर उत्तर प्रदेश की विधानसभा में पहुंचे थे। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद वह अंतरिम सरकार में मंत्री रहे लेकिन 2002 का विधानसभा के पहले ही चुनाव में वह हल्द्वानी विधानसभा सीट से पराजित हुए थे। 2007 में उन्होंने हल्द्वानी सीट से कांग्रेस की कद्दावर नेता डाॅक्टर इंदिरा हरदेश को हराया था और खण्डूड़ी सरकार में वह कैबिनेट मंत्री बने। 2012, 2017 और 2022 में वह लगातार कालाढूंगी विधानसभा सीट से विधायक बनते आ रहे हैं लेकिन पार्टी के भीतर से इस बार उनके लिए चुनौतियां खड़ी हो रही हैं और शायद बंशीधर भगत अपने राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहे हैं। हालांकि उनके हाव-भाव बताते हैं कि वह इस लड़ाई में भी निश्चिंत हैं, उनके द्वारा बार-बार दिए जाने वाले बयान कि अभी वह 10 साल तक सक्रिय रहेंगे और कालाढूंगी में अभी दूसरे के लिए कोई जगह नहीं है, बताते हैं कि वह आत्मविश्वास से भरपूर है लेकिन पार्टी के भीतर उनके विरोधी इस बार आर-पार की लड़ाई के मूड में नजर आते हैं। इसके चलते पार्टी के भीतर एक बड़ा अंतद्र्वंद्व होता नजर आए तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कालाढूंगी की कहानी बंशीधर भगत से शुरू होकर उन पर ही खत्म नहीं होती। जिस प्रकार वह 2027 के लिए खुद या फिर अपने बेटे विकास भगत के लिए राजनीति की पिच पर बैटिंग करते नजर आ रहे हैं उसने भाजपा के अंदर कई दावेदारों के कान खड़े कर दिए हैं। भले ही बंशीधर भगत रामलीला में दशरथ की भूमिका शानदार तरीके से निभाते हों लेकिन उनके कालाढूंगी विधानसभा सीट पर अंगद की तरह पांव रख देने से कई भाजपा के नेताओं का वनवास जरूर हो गया है। सवाल यह है कि इस बार भी बंशीधर भगत या उनके पुत्र विकास भगत या फिर अन्य कोई। 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही भाजपा के भीतर इस सीट को लेकर नया सत्ता संघर्ष उभरने लगा है। पार्टी के कई नेता खुद को भावी उम्मीदवार के रूप में स्थापित करने की कोशिश में हैं। नतीजा यह है कि कालाढूंगी भाजपा में टिकट को लेकर एक अदृश्य लेकिन तीखा द्वंद धीरे-धीरे खुली लड़ाई में बदलता जा रहा है। हालांकि सबसे बड़ा नाम अभी भी बंशीधर भगत का ही है। सात बार विधायक रह चुके भगत प्रदेश सरकार में मंत्री और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं। कालाढूंगी सीट पर 2012, 2017 और 2022 में उनकी लगातार जीत ने उन्हें इस क्षेत्र का निर्विवाद चेहरा जरूर बना दिया लेकिन उन्हें इस बार पार्टी के अंदर के ही अपने विरोधियों से चुनौती मिलती नजर आ रही है । 2022 में भी उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार को बड़े अंतर से हराया। 2027 तक उनकी उम्र उतनी हो चुकी होगी जिस उम्र में मुरली मनोहर जोशी, लालकृष्ण आडवाणी को भाजपा ने मार्गदर्शक मंडल में धकेल दिया था। भाजपा की अंदरूनी राजनीति में यह सवाल उठने लगा है कि क्या पार्टी फिर से उन्हीं पर दांव लगाएगी या ‘पीढ़ीगत परिवर्तन’ की दिशा में कोई नया चेहरा सामने आएगा। यही सवाल इस सीट की राजनीति को गर्म बना रहा है। भाजपा के भीतर अब यह चर्चा खुलकर होने लगी है कि आने वाले चुनाव में पार्टी पीढ़ी परिवर्तन का रास्ता अपनाती है या फिर अनुभव पर भरोसा जारी रखती है।
इसी सवाल ने कालाढूंगी भाजपा में कई सम्भावित दावेदारों को सक्रिय कर दिया है। हर नेता अपने तरीके से संगठन और जनता के बीच अपनी मौजूदगी मजबूत करने में जुटा है। नैनीताल जिले की कालाढूंगी विधानसभा सीट लम्बे समय से भाजपा के वरिष्ठ नेता बंशीधर भगत की राजनीतिक पकड़ के कारण सुरक्षित गढ़ मानी जाती रही है। लगातार चुनावी जीत और प्रदेश की राजनीति में प्रभाव के चलते क्षेत्र में उनकी छवि एक मजबूत नेता की रही है लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अब भाजपा के भीतर एक नया सवाल तेजी से उभर रहा है, क्या कालाढूंगी में नेतृत्व परिवर्तन की तैयारी शुरू हो चुकी है?
सूत्रों के अनुसार पार्टी संगठन और स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच अब यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि आने वाले चुनाव में नया चेहरा सामने आता है तो बंशीधर भगत की राजनीतिक विरासत किसे मिलेगी। भाजपा के भीतर कालाढूंगी सीट को लेकर कई नेता सक्रिय हो चुके हैं और अलग-अलग स्तर पर अपनी दावेदारी मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। बंशीधर भगत के बाद सबसे पहले चर्चा विकास भगत की होती है। वे बंशीधर भगत के राजनीतिक घोषित उत्तराधिकारी हैं। इस बात को बंशीधर भगत ने कई बार सार्वजनिक रूप से कहा भी है और ‘दि संडे पोस्ट’ से बातचीत में उन्होंने कहा भी था कि परिवारवाद के नाम पर योग्य उत्तराधिकारी पर सवाल उठाना ठीक नहीं और इसे उन्होंने परिवारवाद के रूप में मानने से इंकार कर दिया था। लेकिन इस पर सवाल उनकी पार्टी के भीतर से ही उठ रहे हैं जो कहीं दबे स्वरों में हैं तो कहीं मुखर। विकास भगत की क्षेत्र में सक्रियता और कार्यक्रमों में भागीदारी को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि पार्टी के कुछ नेता इस सम्भावना को परिवारवाद के रूप में भी देखते हैं।
हल्द्वानी के मेयर गजराज सिंह बिष्ट इस बार कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र से गम्भीरता से दावेदारी का मन बना चुके हैं। उनका मानना है कि अगर भाजपा उन्हें कालाढूंगी विधानसभा से प्रत्याशी बनाती है तो वो जीतकर दिखाएंगे। उनको संगठन से जुड़े जमीनी नेता के रूप में देखा जाता है। कभी भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रहे गजराज सिंह बिष्ट की पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं के बीच पकड़ मजबूत मानी जाती है। यदि भाजपा संगठनात्मक अनुभव को प्राथमिकता देती है तो उनकी दावेदारी मजबूत हो सकती है। हालांकि हल्द्वानी नगर निगम चुनावों के वक्त जिस प्रकार भाजपा के अंदर से ही उनके लिए परेशानियां खड़ी की गईं उनके लिए भी चुनौतियां कम नहीं हैं। उस वक्त पूर्व मुख्यमंत्रियों त्रिवेंद्र सिंह रावत और भगत सिंह कोश्यारी के हस्तक्षेप के चलते वो मेयर का टिकट पा गए थे। कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र में गजराज सिंह बिष्ट और बंशीधर भगत की अदावत किसी से छिपी नहीं है। 2017 के विधानसभा चुनावों में गजराज सिंह बिष्ट ने निर्दलीय लड़ने का मन बना लिया था तब भाजपा नेतृत्व ने पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को उन्हें मनाने भेजा था। भले ही वो निर्दलीय चुनाव नहीं लड़े लेकिन उन्होंने कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र में काम न कर भीमताल से भाजपा प्रत्याशी गोविंद सिंह बिष्ट का प्रचार करना ज्यादा उचित समझा था। भाजपा की अंदरूनी राजनीति में उन्हें त्रिवेंद्र सिंह रावत गुट का माना जाता है। बाहर से भले ही सब ठीक नजर आता हो लेकिन सूत्र बताते हैं कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से उनके रिश्ते कभी भी सहज नहीं रहे। पूर्व कैबिनेट मंत्री गोविंद सिंह बिष्ट के भाई और उत्तराखण्ड भाजपा के वर्तमान में उपाध्यक्ष राजेंद्र सिंह बिष्ट भी कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र से दावेदारी पेश कर रहे हैं।
इसी तरह शशांक रावत भी युवा चेहरे के रूप में सक्रिय हैं। युवाओं के बीच उनकी मौजूदगी और सोशल मीडिया पर सक्रियता उन्हें अलग पहचान दिलाने की कोशिश कर रही है। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में राज्यमंत्री रहे स्व. बची सिंह रावत के पुत्र शशांक रावत उत्तराखण्ड भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं। उनके युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष बनने पर भाजपा द्वारा बचदा की सादगी भरी राजनीति का सम्मान बताया जा रहा था, वहीं शशांक रावत के लिए विनम्र स्वभाव और पार्टी के लिए समर्पित रहने का इनाम भी माना गया था। पार्टी ने उन्हें लीगल सेल का प्रदेश संयोजक बनाया था। इसके अलावा वह पार्टी व आरएसएस के जुड़े कार्यक्रमों को पूरे समर्पित भाव से करते रहे हैं। युवाओं के बीच खासे लोकप्रिय शशांक रावत की कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र में सक्रियता से लगता है कि वो आगामी विधानसभा चुनावों के लिए गम्भीरता से तैयारी कर रहे हैं। जिस प्रकार भाजपा पीढ़ीगत बदलाव की दिशा में आगे बढ़कर युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की नीति पर चल रही है, उस आधार पर शशांक रावत गम्भीर दावेदार के रूप में उभर सकते हैं। पार्टी के अंदरूनी समीकरणों में सुरेश भट्ट का नाम भी लिया जाता है। अगर भाजपा ब्राह्मण समीकरणों को ध्यान में रखती है तो सुरेश भट्ट की दावेदारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हरियाणा प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री रहते उनकी काबिलियत का सम्मान भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भी करता है। हालांकि वो दायित्वधारी राज्य मंत्री जरूर हैं लेकिन वो उनके कद को कमतर करता है। हालांकि दायित्वधारियों को टिकट न देने की नीति उनके लिए बाधा बन सकती है। संगठन से निकटता और राजनीतिक नेटवर्क को उनकी ताकत माना जाता है।
इसके अलावा पूर्व में कांग्रेस से जुड़े रहे महेश शर्मा भी भाजपा में सक्रिय होने के बाद इस सीट की राजनीति में नया समीकरण जोड़ने की कोशिश करते जरूर दिखाई दे रहे हैं लेकिन भाजपा कालाढूंगी जैसे मजबूत गढ़ से अपने सक्रिय कैडर से इतर किसी अन्य व्यक्ति पर दांव लगाएगी इसकी सम्भावना नगण्य है। इसी प्रकार कांग्रेस से भाजपा में आए मोहन पाठक कालाढूंगी से भाजपा के अंदर अपने लिए सम्भावनाएं जरूर खोज रहे हैं लेकिन उनके लिए भी महेश शर्मा वाला ही फार्मूला लागू होता है। नैनीताल भाजपा के जिलाध्यक्ष प्रताप सिंह बिष्ट एक गम्भीर व सुलझे हुए व्यक्ति हैं। उन्हें मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का विश्वास भी प्राप्त है। वो भी कालाढूंगी से भविष्य के मजबूत दावेदार हो सकते हैं। वैसे दावेदारों की भाजपा के अंदर एक लम्बी फेहरिस्त है जिनमें पूर्व जिला पंचायत उपाध्यक्ष आनंद सिंह दरम्वाल, मनोज पाठक भी शामिल हैं।