जितना बड़ा बाजपुर विधानसभा क्षेत्र है उतनी ही बड़ी जनसमस्याएं भी हैं। राज्य स्थापना के बाद अस्तित्व में आई इस सीट पर दो बार अरविंद पाण्डेय विधायक बने लेकिन 2012 में वे बाजपुर को छोड़कर गदरपुर से चुनाव लड़ने चले गए। इसके बाद यशपाल आर्य यहां से लगातार तीन बार के विधायक हैं लेकिन जिस आशा और उम्मीद से जनता ने उन्हें अपना प्रतिनिधि बनाया उस पर वह खरा नहीं उतर पाए हैं। वे न तो रेलवे फाटक बनवा पाए, न ही 20 गांवों के लोगों को भूमिधरी अधिकार दिलवा पाए हैं। कई गांव ऐसे हैं जहां दशकों से लोग सड़कें बनने का इंतजार कर रहे हैं। कहीं खनन से प्रभावित लोग हैं तो कहीं पांच दशक पुराने अस्पताल में चिकित्सकों के अभाव से जूझते मरीज है। हालांकि आर्य का व्यावहारिकता और मिलनसार होना उनको क्षेत्र में लोकप्रिय अवश्य बनाए हुए है

ऊधमसिंह नगर जिले में स्थित बाजपुर विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित है। यह सीट साल 2008 से अस्तित्व में आई। 2017 में इस क्षेत्र में कुल 1,36,192 मतदाता थे। यहां के वर्तमान विधायक यशपाल आर्य हैं। 2022 के उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव में यशपाल आर्य ने भाजपा के राजेश कुमार को बहुत करीबी मुकाबले (लगभग 1,611 मतों के अंतर) से हराया था। इस शहर का नाम राजा बाज बहादुर के नाम पर पड़ा था। इसके अलावा, शहीद-ए-आजम भगत सिंह का परिवार भी इसी विधानसभा क्षेत्र में निवास करता है।
‘दि संडे पोस्ट’ द्वारा बाजपुर विधानसभा क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों, बाजपुर नगर, बरहैनी, बन्नाखेड़ा, दोराहा, महेशपुरा, सुल्तानपुर पट्टी, केलाखेड़ा, हबीब नगर गांव, पाण्डे काॅलोनी और घुमसानी, गांधीनगर, गुलजारपुर, जुर्का-1 और जुर्का-2 तथा आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों का स्थलीय निरीक्षण किया गया और स्थानीय निवासियों से बातचीत की गई जिसमें यह तथ्य सामने आया कि विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच अभी भी बड़ा अंतर मौजूद है। क्षेत्र के अनेक गांवों और सम्पर्क मार्गों की सड़कें वर्षों से जर्जर स्थिति में हैं तथा कई स्थानों पर सड़क निर्माण और मरम्मत कार्य लम्बे समय से अधूरे पड़े हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत यह है कि बेहतर चिकित्सा सेवाओं और विशेषज्ञ डाॅक्टरों की उपलब्धता को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं। बाजपुर नगर और आस-पास के क्षेत्रों में बढ़ता यातायात दबाव तथा ट्रैफिक जाम आम लोगों के लिए परेशानी का कारण बना हुआ है जबकि इसके स्थायी समाधान की मांग लम्बे समय से की जा रही है। स्थानीय निवासियों ने बताया कि नशे का बढ़ता प्रचलन युवाओं को प्रभावित कर रहा है और यह समस्या धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र के लिए गम्भीर सामाजिक चुनौती बनती जा रही है। वहीं खनन प्रभावित ग्रामीण इलाकों के लोग अनियंत्रित खनन गतिविधियों से सड़कों की खराब हालत, धूल प्रदूषण, कृषि भूमि को हो रहे नुकसान तथा सुरक्षा सम्बंधी चिंताओं से ग्रस्त दिखाई दिए। किसानों और ग्रामीणों का कहना है कि इन समस्याओं को लेकर समय-समय पर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के समक्ष शिकायतें दर्ज कराई गई हैं लेकिन अपेक्षित समाधान अब तक नहीं निकल पाया है। इसके अतिरिक्त शिक्षा, रोजगार, पेयजल, जल निकासी और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी समस्याएं भी कई क्षेत्रों में बनी हुई हैं। लोगों का कहना है कि अधिकांश समस्याएं नई नहीं हैं बल्कि वर्षों से चली आ रही हैं जो लगभग हर चुनाव में प्रमुख मुद्दा बनती हैं। हालांकि प्रत्येक चुनाव के  समय इनके समाधान के आश्वासन जरूर दिए जाते रहे हैं लेकिन जमीनी स्तर पर वह कहीं भी दिखाई नहीं देते हैं। क्षेत्रवासियों का मानना है कि बाजपुर विधानसभा में विकास कार्य होने के बावजूद अनेक मूलभूत समस्याएं आज भी समाधान की प्रतीक्षा में हैं, जिसके कारण आम जनता को दैनिक जीवन में लगातार कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

53 वर्ष पुराने अस्पताल में विशेषज्ञ डाॅक्टरों का अभाव
बाजपुर का सरकारी अस्पताल वर्ष 1973 में तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी के प्रयासों से स्थापित हुआ था लेकिन पांच दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों की भारी कमी बनी हुई है। स्थानीय लोगों के अनुसार अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ और हड्डी रोग विशेषज्ञ तक उपलब्ध नहीं हैं। अस्पताल में कई महत्वपूर्ण मशीनें मौजूद हैं लेकिन उन्हें संचालित करने के लिए प्रशिक्षित ऑपरेटर नहीं हैं। वेंटिलेटर जैसी महत्वपूर्ण सुविधा भी अस्पताल में नहीं है। अस्पताल में चतुर्थ श्रेणी
कर्मचारियों की भी भारी कमी है। बताया जाता है कि वर्तमान में केवल चार संविदाकर्मियों के सहारे व्यवस्थाएं संचालित की जा रही हैं। सबसे अधिक परेशानी गर्भवती महिलाओं को उठानी पड़ती है। लोगों के अनुसार अधिकांश प्रसव नर्सों की देखरेख में कराए जाते हैं। जब कोई मामला जटिल दिखाई देता है तो मरीज को तत्काल दूसरे अस्पताल रेफर कर दिया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि आपातकालीन परिस्थितियों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की अनुपस्थिति जच्चा-बच्चा के लिए खतरा बढ़ा देती है।
रेलवे फाटक बना जाम की स्थायी वजह
बाजपुर नगर में ट्रैफिक जाम की समस्या भी लगातार बनी हुई है। स्थानीय नागरिकों के अनुसार रेलवे फाटक बंद होने पर नगर पालिका क्षेत्र से लेकर ब्लाॅक कार्यालय जाने के लिए मुख्य सड़क पर वाहनों की लम्बी कतारें लग जाती हैं। लोगों का कहना है कि कई बार घंटों तक जाम की स्थिति बनी रहती है, जिससे स्कूली बच्चों, मरीजों, व्यापारियों और आम यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। वर्षों से यह समस्या बनी हुई है लेकिन इसका कोई समाधान अब तक नहीं निकल पाया है।
बेरिया क्षेत्र में पुल निर्माण से आवागमन प्रभावि
बेरिया क्षेत्र में बाढ़ के दौरान पुल क्षतिग्रस्त होने की समस्या बार-बार सामने आती रही है। वर्तमान में पिछले लगभग दो महीनों से पुल निर्माण कार्य चल रहा है, जिसके कारण आवागमन प्रभावित है और लोगों को
वैकल्पिक मार्गों का सहारा लेना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के मौसम में यह समस्या और गम्भीर रूप ले लेती है तथा कई गांवों का सम्पर्क प्रभावित हो जाता है।
संकरी सड़कों से बढ़ रही मुश्किलें
हबीब नगर गांव, पाण्डे काॅलोनी और घुमसानी रोड जैसे क्षेत्रों में सड़कें अभी भी पर्याप्त चैड़ी नहीं हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार अधिकांश मार्ग सिंगल लेन हैं, जिसके कारण दो वाहनों के आमने-सामने आने पर आवाजाही बाधित हो जाती है। बढ़ती आबादी और वाहनों की संख्या के बावजूद सड़क चैड़ीकरण का कार्य नहीं होने से लोगों को रोजाना परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
25 वर्षों से सड़क की प्रतीक्षा कर रहे कई गांव
गांधीनगर, गुलजारपुर, जुर्का-1 और जुर्का-2 सहित कई गांवों के ग्रामीणों का कहना है कि उनके गांवों में पिछले लगभग 25 वर्षों से पक्की सड़क नहीं बन पाई है। ग्रामीणों के अनुसार बरसात के दौरान कच्चे रास्ते कीचड़ और फिसलन के कारण बेहद खतरनाक हो जाते हैं। कई बार मरीजों, बुजुर्गों और स्कूली बच्चों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, वहीं गर्मियों में पूरा रास्ता धूल से भर जाता है, जिससे आवागमन मुश्किल हो जाता है। ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने कई बार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के सामने यह मांग रखी लेकिन उन्हें केवल आश्वासन ही मिले। ग्रामीणों की मांग है कि इन गांवों को शीघ्र पक्की सड़क से जोड़ा जाए।
खनन का बढ़ता असर, गड्ढों और ओवरलोड वाहनों से परेशान लोग
बाजपुर विधानसभा के सुल्तानपुर, गांधीनगर, गुलजारपुर, जुर्का-1 और जुर्का-2 क्षेत्रों में खनन का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कई स्थानों पर सड़कों की खराब स्थिति देखने को मिली। स्थानीय लोगों का कहना है कि क्षेत्र में दिन-रात खनन में लगे भारी वाहन संचालित होते हैं। ग्रामीणों के अनुसार कई मार्गों पर सड़कें गड्ढों में तब्दील हो चुकी हैं और ओवरलोड वाहनों के लगातार संचालन से स्थिति और खराब होती जा रही है। लोगों ने आरोप लगाया कि खनन गतिविधियों के कारण क्षेत्रीय पर्यावरण, सड़कें और खेती प्रभावित हो रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि शिकायतों के बावजूद स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है।
किसान की जमीन पर विवाद और खनन से जुड़े गम्भीर आरोप
क्षेत्र में खनन और प्रशासनिक कार्यवाही को लेकर एक चर्चित मामला भी सामने आया है। बाजपुर निवासी किसान अमनदीप सिंह का आरोप है कि उनकी लगभग आठ एकड़ जमीन का एक हिस्सा वन विभाग द्वारा कब्जे में ले लिया गया। अमनदीप सिंह के अनुसार उनके खेत से सटे क्षेत्र में गहरे गड्ढे खुदे हुए थे, जिन्हें उन्होंने अवैध खनन से जोड़ते हुए वन विभाग के अधिकारियों से शिकायत की थी। शिकायत के बाद कार्रवाई खनन करने वालों पर होने के बजाय उन्हीं के खिलाफ शुरू हो गई। किसान का कहना है कि निरीक्षण के दौरान उन पर वन विभाग की भूमि पर कब्जे का आरोप लगाया गया और बाद में उनकी खड़ी धान की फसल नष्ट कर सम्बंधित भूमि को वन विभाग की भूमि बताते हुए कब्जे में ले लिया गया। मामले को लेकर पीड़ित परिवार ने प्रशासन से पैमाइश की मांग की। वर्ष 2024 में जांच समिति भी गठित हुई। बाद में मामला न्यायालय तक पहुंचा। न्यायालय के निर्देशों के बाद हुई जांच में भूमि को वन क्षेत्र बताया गया जबकि किसान आज भी अपनी मूल भूमि के सम्बंध में सवाल उठा रहा है। हालांकि इस विवाद से क्षेत्र में खनन, भूमि प्रबंधन और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
बाढ़ का खतरा
बाजपुर क्षेत्र में बाढ़ और जलभराव की समस्या भी लगातार सामने आती रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार बारिश के मौसम में कई क्षेत्रों में पानी भर जाता है, जिससे जनजीवन प्रभावित होता है। किसानों की फसलें नुकसान झेलती हैं जबकि व्यापारिक गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं। कई नागरिकों का कहना है कि वर्षों से बाढ़ नियंत्रण और जल निकासी की योजनाओं पर चर्चा होती रही है लेकिन स्थायी समाधान अब तक दिखाई नहीं देता। बरसात आते ही लोगों के मन में फिर वही पुरानी चिंता लौट आती है।
युवाओं का सवाल: रोजगार कहां है?
युवाओं और अभिभावकों के बीच रोजगार का मुद्दा प्रमुखता से सामने आया। कई लोगों का कहना है कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी युवाओं को स्थानीय स्तर पर पर्याप्त अवसर नहीं मिलते। कुछ लोगों ने यह चिंता भी जताई कि औद्योगिक इकाइयों और फैक्ट्रियों में स्थानीय युवाओं की भागीदारी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाई है।
चीनी मिल और डिस्टिलरी के आधुनिकीकरण की मांग
बाजपुर की ऐतिहासिक सहकारी चीनी मिल और उससे जुड़ी डिस्टिलरी इकाई क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार हैं लेकिन स्थानीय लोगों और किसानों का कहना है कि वर्षों से मिल के आधुनिकीकरण और तकनीकी खामियों की समस्या पूरी तरह दूर नहीं हो पाई है। किसानों के अनुसार पेराई सत्र के दौरान मशीनों में खराबी आने से काम प्रभावित होता है, जिससे उन्हें परेशानी उठानी पड़ती है। लोगों का कहना है कि क्षेत्र की अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़े इस महत्वपूर्ण उद्योग के सुदृढ़ीकरण और आधुनिकीकरण की मांग लम्बे समय से की जा रही है लेकिन अब तक इसका स्थायी समाधान नहीं हो सका है।
सफाई व्यवस्था पर भी सवाल
दोराहा से बाजपुर बाजार जाने वाले मार्ग पर कई स्थानों पर सड़क किनारे कूड़ा-कचरा पड़ा मिला। ऐसे ही कई स्थानों पर भी अधिक मात्रा में खुले में कचरे का ढेर पड़ा मिला। क्षेत्र में साफ-सफाई की स्थिति को लेकर यह नजारा खुद बहुत कुछ बयां करता है। सड़क किनारे खुले में पड़े कचरे से न केवल क्षेत्र की छवि प्रभावित होती है बल्कि आसपास रहने वाले लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
जनप्रतिनिधि को लेकर मिला-जुला नजरिया
बाजपुर विधानसभा में लोगों से बातचीत के दौरान वर्तमान विधायक को लेकर जनता की राय पूरी तरह नकारात्मक नहीं दिखाई दी। कई लोगों ने बताया कि विधायक व्यवहारिक हैं, क्षेत्र में आते-जाते रहते हैं और लोगों से सीधे मिलते भी हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि उनके कार्यकाल में कुछ विकास कार्य भी हुए हैं और कई समस्याओं के समाधान के लिए प्रयास किए गए हैं। हालांकि इसके बावजूद स्वास्थ्य सेवाओं में विशेषज्ञ डाॅक्टरों की कमी, ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों का अभाव, ट्रैफिक जाम, नशे की बढ़ती समस्या और खनन से जुड़े मुद्दे जैसे कई मूलभूत सवाल आज भी जस के तस बने हुए हैं। लोगों का कहना है कि जनप्रतिनिधि की उपलब्धता और व्यवहार को वे सकारात्मक मानते हैं लेकिन अब उनकी अपेक्षा है कि वर्षों से लम्बित बुनियादी समस्याओं का भी स्थायी समाधान धरातल पर दिखाई दे।
जनता की अपेक्षा : समस्याओं का स्थायी समाधान
बाजपुर विधानसभा के विभिन्न हिस्सों में लोगों से बातचीत के दौरान यह बात समान रूप से सामने आई कि स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, सड़कों की बदहाली, ट्रैफिक जाम, नशे की समस्या और खनन से जुड़े मुद्दों का स्थायी समाधान आज भी लोगों की प्राथमिक मांग है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि विकास की योजनाओं का लाभ तब ही दिखाई देगा जब बुनियादी सुविधाएं मजबूत होंगी। क्षेत्र की जनता अब केवल आश्वासनों के बजाय जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई देखना चाहती है।
20 गांवों की जमीन का मुद्दा
बाजपुर विधानसभा में भूमि अधिकारों से जुड़ा ‘20 गांवों’ का मामला भी लम्बे समय से चर्चा और विवाद का विषय बना हुआ है। स्थानीय लोगों और सम्बंधित पक्षों का कहना है कि ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1920 में तत्कालीन सरकार द्वारा यह भूमि लीज पर दी गई थी, जिसके बाद समय-समय पर राजस्व अभिलेखों में अधिकार दर्ज होते रहे। वर्ष 1966 में लीज समाप्त होने के बाद तत्कालीन कानूनों के तहत भूमि धारकों को विभिन्न श्रेणियों में अधिकार प्रदान किए गए और बाद में वर्ष 1970 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी आदेशों के आधार पर अनेक लोगों को भूमिधरी अधिकार प्राप्त हुए, जिसके बाद दशकों तक भूमि की खरीद- फरोख्त और हस्तांतरण की प्रक्रिया चलती रही। अचानक ही वर्ष 2020 में जिला प्रशासन द्वारा इस पूरी प्रक्रिया पर प्रश्न उठाते हुए सम्बंधित पक्षों के विरुद्ध कार्यवाही शुरू की गई, जिसके बाद मामला न्यायालय तक पहुंच गया। प्रभावित पक्षों का कहना है कि लगभग पांच दशक बाद भूमि अधिकारों पर सवाल खड़े किए जाने से क्षेत्र के कम से कम 30 हजार लोगों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़ रहा है और हजारों परिवारों के सामने भूमि स्वामित्व को लेकर अनिश्चितता की स्थिति उत्पन्न हो गई है। उनका कहना है कि वे इस सम्बंध में मुख्यमंत्री, प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के समक्ष भी अपनी बात रख चुके हैं। क्षेत्रीय विधायक यशपाल आर्या द्वारा भी मामले के समाधान के प्रयास किए जाने की बात कही जाती है लेकिन फिलहाल यह प्रकरण न्यायालय में लम्बित है और अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा की जा रही है। स्थानीय लोगों का मानना है कि जब तक इस विवाद का स्थायी समाधान नहीं निकलता, तब तक बड़ी संख्या में परिवार अपने भूमि अधिकारों और भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति में बने रहेंगे।

केवल सड़कें बनने से नहीं होता विकास
इस समय माननीय यशपाल आर्य जी, जो नेता प्रतिपक्ष हैं, का यह विधानसभा क्षेत्र है। लगभग डेढ़ लाख की आबादी वाले इस क्षेत्र में जितना बड़ा क्षेत्रफल है, उतनी ही बड़ी इसकी समस्याएं भी हैं। जहां तक विकास कार्यों की बात आती है तो सबसे बड़ी प्रमुख समस्या 20 गांवों की है, जिनके भूमि सम्बंधी अधिकार छीन लिए गए हैं। इसके कारण किसान, उद्योग और व्यापारी वर्ग सभी प्रभावित हैं। न तो भूमि की खरीद-फरोख्त हो पा रही है, न रजिस्ट्री हो रही है और न ही दाखिल-खारिज की प्रक्रिया पूरी हो पा रही है। यह एक बहुत बड़ा विषय है, जिससे एक बड़ा इलाका प्रभावित है। दूसरी बड़ी समस्या बाढ़ की है। जैसे ही बारिश का मौसम आता है, पूरा क्षेत्र जलमग्न हो जाता है। व्यापारियों, किसानों, राहगीरों और स्कूल जाने वाले छात्रों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। तीसरी और बेहद गंभीर समस्या सरकारी चिकित्सालय में चिकित्सकों की कमी है। यहां स्वीकृत 22 चिकित्सकों के मुकाबले मात्र 4 चिकित्सक ही उपलब्ध हैं। बाल रोग विशेषज्ञ, महिला रोग विशेषज्ञ, अस्थि रोग विशेषज्ञ, सर्जन और एनेस्थेटिस्ट जैसे महत्वपूर्ण डॉक्टरों का अभाव है। इसके कारण प्रसव के लिए आने वाली महिलाओं को मजबूरी में निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है, जहां उन्हें आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है। कई ऐसे मामले भी होते हैं, जिनमें सामान्य प्रसव सम्भव होने के बावजूद ऑपरेशन कर दिए जाते हैं, जिससे महिलाओं को अतिरिक्त कष्ट झेलना पड़ता है।
जहां तक मेरी जानकारी है पुलिस प्रशासन अपनी ओर से पूरी
तत्परता के साथ कार्य कर रहा है लेकिन क्षेत्र की जरूरत के हिसाब से पुलिस बल की संख्या कम है। बाजपुर विधानसभा क्षेत्र में रोजगार और व्यापार का सबसे बड़ा आधार बाजपुर शुगर फैक्ट्री और उससे जुड़ी
आसमानी डिस्टिलरी थी। वर्तमान में डिस्टिलरी लगभग बंद पड़ी हुई है और शुगर फैक्ट्री भी मुश्किल से एक-दो महीने ही संचालित हो पाती है। इसके कारण यहां का बड़ा किसान वर्ग और व्यापारिक समुदाय प्रभावित हो रहा है। बाजपुर एक अत्यंत उपजाऊ क्षेत्र है लेकिन 20 गांवों की लगभग 5,880 एकड़ भूमि को सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसके कारण यदि कोई उद्योग स्थापित करना चाहता है या कोई नया व्यापार शुरू करना चाहता है तो वह ऐसा नहीं कर सकता। जब उद्योग और व्यापार नहीं बढ़ेंगे तो रोजगार के अवसर भी उत्पन्न नहीं होंगे। शुगर फैक्ट्री के ठप पड़ने से व्यापार और रोजगार दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
अरुण शर्मा, स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता

विधायक ने नहीं बनवाया बैरिया पुल
बाजपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक बन जाने के बाद बाजपुर की जनता से मुंह मोड़ लेना और हर सवाल पर यह कहना कि मैं सरकार में नहीं हूं, बाजपुर की जनता के साथ न्याय नहीं हुआ है। वर्ष 2016 में जब बाजपुर के विधायक यशपाल आर्य जी कांग्रेस के बड़े नेता थे, उसी दौरान एनजीटी के आदेशों के तहत बिसलेरी बंद हुई। बाद में वे भारतीय जनता पार्टी में भी रहे और सरकार का हिस्सा रहे और अब फिर कांग्रेस में नेता प्रतिपक्ष हैं। मैंने हर सम्भव प्रयास किया कि बिसलेरी दोबारा संचालित हो सके। मैंने 32 करोड़ रुपए की बैंक गारंटी दिलाने का भी प्रयास किया लेकिन बाद में वह बजट समाप्त हो गया। स्थानीय विधायक क्षेत्र में उपलब्ध नहीं होने के कारण बाजपुर की जनता को अपनी मूलभूत सुविधाओं और समस्याओं के समाधान के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। लोगों को अपनी समस्याएं लेकर हल्द्वानी जाना पड़ता है क्योंकि उनका समाधान बाजपुर में नहीं हो पाता। कई बार हल्द्वानी जाने पर भी विधायक उपलब्ध नहीं मिलते। आज 10 वर्षों से वे विधायक हैं। स्थानीय युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार नहीं मिला। चाहे विक्रमपुर का मामला हो या अन्य क्षेत्रों का, स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर नहीं मिले। फैक्ट्रियों में बाहरी लोगों को रोजगार दिया गया लेकिन स्थानीय लोगों के लिए उन्होंने कितनी बार आवाज उठाई? यदि वे नेता प्रतिपक्ष हैं तो यह मुद्दा सदन में उठा सकते थे, मगर उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया?
20 गांवों की जमीन का जो मामला है, उसका राजनीतिक नुकसान हम भी भुगत रहे हैं। मैं स्वयं चुनाव हार चुका हूं लेकिन आज भी इस मामले की पैरवी कर रहा हूं। शासन स्तर पर भी इस विषय को उठा रहा हूं। हमारी सरकार की ओर से कोई कमी नहीं रही। सरकार ने भूमि आवंटन का कार्य किया और लोगों को अधिकार दिए लेकिन सूद पक्ष द्वारा आदेश की प्रति हाईकोर्ट में प्रस्तुत कर दी गई और मामला आगे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। फिलहाल मामला न्यायालय में विचाराधीन है। जहां तक बेरिया वाला पुल निर्माण का प्रश्न है, विधायक यह प्रमाणित कर दें कि वह पुल उन्होंने बनवाया है। इस विषय को लगातार मैंने ही उठाया है और इसकी स्वीकृति की जानकारी भी मैंने ही जनता तक पहुंचाई थी। मुख्यमंत्री जी स्वयं इसकी घोषणा करके गए थे और वर्तमान में पुल का निर्माण कार्य चल रहा है। किसी भी बड़े कार्य में कुछ समस्याएं आती हैं, लेकिन मुझे विश्वास है कि पुल का निर्माण जल्द पूरा हो जाएगा।
राजेश कुमार, पूर्व विधायक प्रत्याशी, भाजपा

असफल रहा विधायक का कार्यकाल
बाजपुर विधानसभा की स्थिति बेहद दयनीय है। बाजपुर की जनता खुद को नेताओं द्वारा ठगा हुआ महसूस कर रही है। क्षेत्र की जो मूलभूत समस्याएं हैं, उन पर आज तक किसी भी नेता ने गम्भीरता से ध्यान नहीं दिया। बाजपुर की चीनी मिल और उससे जुड़ी डिस्टिलरी (आसमानी फैक्ट्री) जो कभी किसानों, मजदूरों और स्थानीय युवाओं को बड़े स्तर पर रोजगार देती थीं, उनकी स्थिति पिछले 15-20 वर्षों से खराब बनी हुई है। इनके सुधार और पुनर्जीवन के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए।
बाजपुर आज भी बाढ़ की समस्या के मुहाने पर खड़ा है लेकिन इसका कोई स्थायी समाधान आज तक नहीं निकाला जा सका। किसी भी राजनीतिक दल या जनप्रतिनिधि ने इस दिशा में प्रभावी कार्य नहीं किया। स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी चिंताजनक है। चाहे नगर का सरकारी अस्पताल हो या ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, अधिकांश स्थानों पर सुविधाओं का अभाव है। विशेषज्ञ डाॅक्टरों के पद खाली हैं, कई मशीनें होने के बावजूद उन्हें संचालित करने के लिए ऑपरेटर उपलब्ध नहीं हैं। बाजपुर का बीस गांव भूमि प्रकरण भी वर्षों से लम्बित है। हजारों लोग, जो 50 वर्षों से अधिक समय से वहां रह रहे हैं, अपने अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। जिन लोगों को भूमि सम्बंधी अधिकार प्राप्त थे, वे उनसे छीन लिए गए लेकिन किसी भी नेता या जनप्रतिनिधि ने उन्हें न्याय दिलाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए। आज किसानों की स्थिति यह है कि यदि कोई किसान अपने खेत से 10 कुंतल मिट्टी भी ट्रैक्टर ट्राॅली में लाना चाहे तो उसे अनुमति नहीं मिलती। यदि कोई किसान अपने मकान निर्माण के लिए नदी से रेत लाना चाहे या क्रशर से खरीदकर सामग्री अपने वाहन में ले जाना चाहे, तब भी उसे विभिन्न प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में लोग एक तरह की प्रतिबंधात्मक व्यवस्था के बीच जीवन जीने को मजबूर हैं।
उद्योगों में स्थानीय लोगों को 70 प्रतिशत रोजगार देने की बात कही जाती है लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। किसी भी फैक्ट्री में स्थानीय लोगों की भागीदारी उस स्तर पर दिखाई नहीं देती। रोजगार की तलाश में स्थानीय युवा लगातार भटक रहे हैं, लेकिन उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में भी स्थिति संतोषजनक नहीं है। आज तक विधानसभा क्षेत्र में ऐसा कोई डिग्री कॉलेज विकसित नहीं हो पाया है जिसकी शैक्षणिक गुणवत्ता और उपलब्धियां युवाओं को रोजगार दिलाने में प्रभावी साबित हो सके और पलायन को रोक सकें। समय-समय पर नर्सिंग कॉलेज, आईटीआई कॉलेज और अन्य संस्थानों की घोषणाएं की गईं, लेकिन अधिकांश बातें केवल घोषणाओं तक ही सीमित रहीं और धरातल पर उनका प्रभाव दिखाई नहीं दिया। मेरी नजर में वर्तमान विधायक का कार्यकाल असफल रहा है। तीन बार चुनाव जीतने के बावजूद उन्होंने क्षेत्र की मूलभूत समस्याओं के समाधान के लिए अपेक्षित कार्य नहीं किए। कुछ सड़कें बनी हैं, जिनका बजट सरकार से मिलता है लेकिन रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, किसानों और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। ये सभी समस्याएं आज भी उसी स्थिति में बनी हुई हैं।
मेरा मानना है कि वर्तमान विधायक स्थानीय नहीं हैं और इसी कारण उनका क्षेत्र से वैसा भावनात्मक जुड़ाव नहीं है जैसा एक स्थानीय जनप्रतिनिधि का होना चाहिए। उन्होंने विधायक निधि, राजनीतिक प्रभाव और आश्वासनों के माध्यम से लोगों को भरोसा दिलाने का काम किया लेकिन धरातल पर क्षेत्र की प्रमुख समस्याओं के समाधान के लिए अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं देते।
जगतार बाजवा, किसान नेता, बाजपुर

बीस गांवों की जमीन का सबसे बड़ा मुद्दा
बाजपुर के 20 गांवों में लगभग 50 वर्षों से लोग उस भूमि पर रह रहे हैं, भूमिधर के अधिकार प्राप्त कर चुके हैं और जमीनों की खरीद-बिक्री भी होती रही है, उन्हें अचानक हटाने के लिए नोटिस क्यों जारी कर दिया गया।? हमारे अनुसार उत्तर प्रदेश विधानसभा के शासनादेश से लोगों को जो भूमिधरी अधिकार प्राप्त हुए थे, उन्हें एक जिलाधिकारी के आदेश से दरकिनार नहीं किया जा सकता।
संजय सूद, स्थानीय निवासी

बाजपुर विधानसभा 2026 – विधायक रिपोर्ट कार्ड
विधायक : यशपाल आर्य (अवधि: 4 वर्ष)
क्र. क्षेत्र                                  मुद्दा / जमीनी स्थिति                 अंक  (10 में)
  1. जनसम्पर्क व क्षेत्रीय सक्रियता जनता के बीच सक्रिय, उपलब्ध और संवाद बनाए रखा 8/10
  2. स्वास्थ्य सेवाएं विशेषज्ञ डाॅक्टरों, तकनीकी स्टाफ और आधुनिक सुविधाओं का अभाव 4/10
  3. सड़क व आधारभूत ढांचा कई गांवों में सड़कें जर्जर, पुल और सम्पर्क मार्ग अधूरे 4/10
  4. ट्रैफिक व परिवहन रेलवे फाटक पर जाम, रोडवेज संचालन लम्बित 4/10
  5. खनन व पर्यावरण अवैध/अनियंत्रित खनन से सड़क, खेती और पर्यावरण प्रभावित 3.5/10
  6. रोजगार व उद्योग स्थानीय रोजगार सीमित, चीनी मिल व उद्योगों के आधुनिकीकरण की जरूरत 5/10
  7. कृषि व भूमि अधिकार किसानों की समस्याएं और 20 गांव का भूमिधरी विवाद अब भी लम्बित 4/10
  8. सफाई व जल निकासी कई क्षेत्रों में गंदगी और कूड़ा निस्तारण की समस्या 5/10
  9. नशा व कानून व्यवस्था युवाओं में नशे का बढ़ता प्रभाव चिंता का विषय 4/10
  10. समग्र विकास प्रदर्शन विकास कार्य हुए लेकिन मूलभूत समस्याएं अभी भी बरकरार 6/10
कुल अंक :  4.75/10                        फाइनल ग्रेड : पास

‘हर वर्ग को विकास से जोड़ना मेरा लक्ष्य’
यशपाल आर्य उत्तराखण्ड की राजनीति के अनुभवी और प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। वर्तमान में बाजपुर विधानसभा से लगातार तीसरी बार विधायक हैं तथा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे हैं। लम्बे राजनीतिक अनुभव और जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर उनकी सक्रियता ने उन्हें राज्य की राजनीति में एक मजबूत पहचान दिलाई है। बाजपुर विधानसभा क्षेत्र से सम्बंधित मुद्दों पर ‘दि संडे पोस्ट’ के रोविंग एडिटर आकाश नागर उनसे मुखातिब हुए

अपने कार्यकाल की महत्वपूर्ण योजनाएं बताइए जो बाजपुर के विकास के लिए मानी जा रही है?
बाजपुर में स्टेडियम और तहसील का निर्माण के साथ ही चीनी मिल के निकट पर्यटन पार्क की स्थापना कराई। 22 करोड़ की लागत से सुल्तानपुर पट्टी, प्रतापपुर, महुवाखेड़ागंज, बाजपुर गांव, जोशी का मजरा, हरिपुरा हरसान तथा बन्नाखेड़ा के हाईस्कूल और इंटरमीडिएट काॅलेज में नए भवनों के निर्माण कराए। सड़कों के निर्माण में 600 करोड़ रुपए  की लागत से रामराज रोड, काशीपुर, खरमाशा मार्ग, बाजपुर-बेरिया दौलत मार्ग, सरदारनगर-बलाखेड़ा रोड, केशोवाला-बेलपड़ाव, मुकंदपुर-पैगा- ढकिया मार्ग तथा जैतपुर बरखेड़ी मार्ग का निर्माण कराया। महवाखेड़ागंज एवं मुंडियाकला में दो निरीक्षण भवनों के अलावा बाजपुर बस अड्डे का निर्माण और बाजपुर चीनी मिल में प्रदूषण नियंत्रण ईकाई के साथ ही आवासों का निर्माण कराया। नगर पंचायत महुवाखेड़ागंज को नगर पालिका का दर्जा दिलाया तो बाजपुर मुख्य चैराहे पर शहीद भगत सिंह की आदमकद प्रतिमा की स्थापना कराई। 233 करोड़ की लागत से बाढ़ सुरक्षा, नहर निर्माण, पुस्ता निर्माण, सिंचाई गुल, नहर मरम्मत एवं ट्यूबवेल निर्माणा कराए गए। बौर जलाशय में 14 करोड़ की लागत से वाटर एडवेंचर पार्क की स्थापना कराई जिसमें वाटर सर्फिंग, पैरासेलिंग, कैनोइंग एवं वाटर स्कूटर जैसी गतिविधियां संचालित कराई। हरिपुरा हरसान, इटव्वा में 33 केवी विद्युत उपकेंद्रों की स्थापना कराई। अनुसूचित जाति बाहुल्य क्षेत्रों में 49 करोड़ की लागत से बारातघर, सीसीमार्ग बहुउद्दशीय भवन एवं अन्य  निर्माण कराया। इसके अलावा अल्पसंख्यक बाहुल्य क्षेत्रों में 19 करोड़ की लागत से गुरूद्वारा भवन निर्माण एवं सौंदर्यीकरण के साथ ही बारातघर और कब्रिस्तान की चारदीवारी, सीसीमार्ग एवं विद्यालय भवन का निर्माण कराया गया। क्षेत्र में पेयजल व्यवस्था सुदृढ़ करने के लिए मजरा प्रभु एवं मंडी क्षेत्र में दो नलकूप, पम्प हाउस, पम्पिंग प्लांट, 10 लाख लीटर क्षमता का जलाशय तथा सुल्तानपुर पट्टी पेजयल योजना के लिए 57 लाख रुपए की स्वीकृति कराना मेरे कार्यकाल की महत्वपूर्ण योजनाएं हैं। अभी बहुत से विकास कार्य ऐसे हैं जो जमीन पर उतारे जा रहे हैं।

बीस गांवों के भूमिधरी अधिकार का मामला बाजपुर विधानसभा का सबसे बड़ा मुद्दा है। इससे प्रभावित लोग पिछले कई सालों से धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। आपने इस मामले को विधानसभा में भी उठाया और विधानसभा चुनाव में भी स्थानीय जनता से वादा किया था कि 20 गांवों के मुद्दों को जल्द ही सुलझा देंगे। आप भाजपा सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालय में भी रहे तब भी इसका समाधान कराने में सफल नहीं हुए, ऐसा क्यों?
ऐसा इसलिए कि यह जो डबल इंजन की सरकार है उसका एक इंजन आगे और एक इंजन पीछे है। मतलब यह कि आगे वाला इंजन गाड़ी को आगे खींच रहा है और पीछे वाला अपनी तरफ खींच रहा है। कहने को तो दोनों इंजन चल रहे हैं लेकिन कहां चल रहे हैं और कितनी मंजिल तय कर पा रहे हैं यह प्रश्नों के घेरे में है क्योंकि इस मामले में भारत सरकार इन्वाल्व है। भारत सरकार ने जमीन अधिग्रहित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी लेकिन राज्य सरकार चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रही है। हमने इस मुद्दे के समाधान के लिए भाजपा के तीन-तीन मुख्यमंत्रियों से मांग रखी। चाहे वह तीरथ सिंह रावत हो, त्रिवेंद्र सिंह रावत या पुष्कर सिंह धामी तीनों ही मुख्यमंत्रियों ने इसका समाधान कराने की बात कहीं लेकिन आज तक भी इस बात को कोई पूरा नहीं कर पाया। ब्रिटिशकाल से ही जिन लोगों के नाम खसरा-खतौनी में दर्ज है उन्हें अपने मूल अधिकार पाने के लिए दर-दर की ठोकर खाने को मजबूर किया जा रहा है। वे पिछले कई सालों से सड़कों पर हैं। धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं जबकि हम इस मुद्दे को सदन में लगातार उठाते रहे हैं लेकिन सरकार चाहे वह डबल इंजन हो या ट्रिपल इंजन सुनने को तैयार नहीं है।
बाजपुर में पांच दशक पुराने सरकारी अस्पताल की हालत ऐसी है कि वह खुद स्ट्रेचर पर है। इस अस्पताल में न फैकल्टी है और न ही विशेषज्ञ डॉक्टर तैनात हैं। यहां तक कि आपातकालीन स्थिति में मरीज का इलाज करने के लिए वेंटिलेटर तक मौजूद नहीं है। नर्स ही यहां डाॅक्टरों का काम करती हैं जिससे कई बार जच्चा-बच्चा की जान भी खतरे में पड़ जाती है?
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की दशा और दुर्दशा अकेले बाजपुर इलाके की ही नहीं है बल्कि समस्त प्रदेश के सरकारी अस्पतालों की हालत ऐसी ही है कि यहां मरीज भर्ती होने के बाद जहां ठीक होना चाहिए, वहीं वह पहले से ज्यादा बीमार हो जाता है। इसलिए उसे फिर प्राइवेट अस्पताल में ले जाना पड़ता है। पहले तो सरकारी अस्पताल में मरीजों को बहुत कम रखते हैं, अधिकतर मरीजों को कोई न कोई बहाना बनाकर रेफर कर दिया जाता है या प्राइवेट अस्पतालों में एडमिट होने की सलाह दे दी जाती है। इसलिए यह स्वास्थ्य सेंटर न होकर रेफर सेंटर बन गया है। पूरे प्रदेश के सरकारी चिकित्सालय अधिकतर रेफरल सेंटर बन गए हैं। बाजपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में एक्सरे भी हैं और अल्ट्रासाउंड भी है लेकिन किसी का भी ऑपरेटर नहीं है। यहां कई मामले ऐसे भी आए हैं जिनमें प्रसव पीड़ा के दौरान ही महिलाएं मौत के मुंह में जा चुकी हैं। मैंने प्रदेश के मुख्यमंत्री जी और स्वास्थ्य मंत्री जी का इस तरफ कई बार ध्यान दिलाया है उन्हें ऑपरेटर और विशेषज्ञ डाॅक्टरों की तैनाती करने की मांग भी की है लेकिन हर बार आश्वासन देकर मामले को पेंडिंग में डाल दिया जाता है। जब तक हमारा बुनियादी ढांचा मजबूत नहीं होगा तब तक आम आदमी की समस्या का समाधान नहीं हो सकता है लेकिन भाजपा राज में सब राम भरोसे है।
बेरिया पुल बाजपुर विधानसभा की स्थाई समस्याओं में सुमार हो चुका है। यहां बाढ़ प्रभावित क्षेत्र होने के कारण यह पुल बार-बार छतिग्रस्त होता है। कई बार यह पुल टूटा भी है। इस बार पुल पर निर्माण तो हो रहा है लेकिन लोगों को आवाजाही में परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है?
बेरिया पुल से कई गांवों का आवागमन होता है जिससे पुल पर लगातार आवागमन बना रहता है। बाढ़ से भी पुल टूटता है। हमारा प्रयास यह रहता है कि पुल पर व्यवधान होने के कारण क्षेत्र की जनता का आवागमन का क्रम न टूटे। इसके लिए हम पुल को जल्द बनवाने की कोशिश कर रहे हैं। हमने बाजपुर विधानसभा क्षेत्र में कई पुल बनवाए हैं। कई सड़कें बनवाई हैं। भाजपा शासनकाल में विकास कार्यों में पार्टी के विधायकों को जितनी प्राथमिकता मिलती है हमें उतना ही पीछे कर दिया जाता है। जो भी बड़े काम होते हैं वह भाजपा के विधायकों के विधानसभा क्षेत्रों में ही किए जा रहे हैं। हम जैसे विपक्ष के विधायक तो अपनी विधायक निधि के बल पर ही विकास कार्य करा सकते हैं। अब यह आप बखूबी जानते ही हैं कि एक विधायक निधि इतने विस्तृत विधानसभा क्षेत्र में ऊंट के मुंह में जीरा के समान होती है।
ऐसे क्या-क्या कार्य हुए हैं जिन्हें विकास का मानक मान सकें?
हमने 550 करोड़ की सड़कें बनवाई जब हम भाजपा के साथ थे तब भी विकास कार्यों को प्राथमिकता पर रखा। फिलहाल कुछ कार्य ऐसे हैं जिनसे बाजपुर में विकास की रेखा आगे बढ़ी है, चाहे रेखा छोटी ही हो लेकिन हमारा प्रयास रहा कि यह रेखा हर आम आदमी के दरवाजे तक पहुंचे। चाहे वह आईटीआई काॅलेज हो या पाॅलिटेक्निक काॅलेज हो, हमने शिक्षा के केंद्रों पर सबसे अधिक फोकस किया है। अपने विधानसभा क्षेत्र में हमने आईटीआई और पॉलिटेक्निक काॅलेज के साथ-साथ नर्सिंग कॉलेज भी खुलवाया है। डिग्री कॉलेज में एमए, एमकॉम और योग की क्लास शुरू कराई है। इसी कॉलेज में हमने मल्टी प्लाजा हाॅल भी बनवाया है। इसके अलावा विद्याथर््िायों को प्रायोगिक अध्यापन के लिए लैब भी खुलवाई है। अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों के लिए एकलव्य आवासीय स्कूल भी खुलवाया। इसके लिए हमने केंद्र सरकार से काफी भागदौड़ की थी। अगर आप भाजपाा के सांसद से पूछेंगे कि एकलव्य आवासीय विधायक के मानक क्या हैं तो वह बता नहीं सकते। हमें कभी कहा जाता है कि जमीन ही उपलब्ध नहीं है लेकिन भागदौड़ करके जमीन की व्यवस्था कराई तो फिर मानकों के पूरा करने का टारगेट दे दिया गया। हमने निर्बल वर्ग के बच्चों के लिए वह सब मानक पूरे कराए। आज अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चे यहां न केवल निशुल्क पढ़ाई कर रहे हैं बल्कि वे यहीं रहते हैं। उनकी देखरेख घर की तरह होती है। इससे उनका भविष्य उज्ज्वल हो रहा है, यह मेरे लिए सुकून देने वाली बात है। आज साढ़े आठ एकड़ में 14 करोड़ की लागत से बना यह विद्यालय गरीब अभिभावकों के द्वारा अपने बच्चों की शिक्षा को देखा गया सपने को पूरा कर रहा है।
बिजली की आंख मिचैली भी आपके विधानसभा क्षेत्र में एक समस्या है। बिजली अधिकतर कटअप यानी आना और कुछ देर बाद भाग जाना करती रहती है जिससे लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है?
यह समस्या पहले थी लेकिन अब न के बराबर है। इस समस्या को खत्म करने के लिए हमने अपने विधानसभा में तीन जगह बिजलीघर बनवाए हैं। ये बिजलीघर रेहटा, बरनी और महुवाखेड़ागंज में बनवाए गए हैं। इसके अलावा पेयजल के लिए कई ट्यूबवेल लगवाए हैं। किसानों के लिए नलकूप बनवाए हैं। लोगों को सामाजिक कार्यक्रम करने के लिए बारात घर बनवाए हैं। हमारा लक्ष्य हर वर्ग, हर जाति को विकास से जोड़ना है। हम हर समुदाय के लिए समदृष्टि और समभाव का व्यवहार करते हैं।
आपके विधानसभा क्षेत्र में सुल्तानपुर पट्टी तो अवैध खनन के लिए काफी बदनाम क्षेत्र माना जाता है जहां उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश के खनन माफिया कोसी नदी का सीना चीरकर खनन की चोरी को अंजाम देते हैं। ऐसे में अगर कोई अधिकारी या जागरूक व्यक्ति उनके खिलाफ कार्यवाही करता है या कराता है तो उन्हें अपनी जान के लाले तक पड़ जाते हैं। कई अधिकारियों को अवैध खनन माफियाओं ने अपने डम्परों से कुचलने का प्रयास किया है, कई पर गम्भीर वार भी हुए हैं?
आपकी बात से पूर्ण सहमत हूं। इस क्षेत्र में खनन माफिया न किसी सरकार से न किसी प्रशासन से डरते हैं।  सभी इनके अवैध खनन के आगे नतमस्तक रहते हैं। अवैध खनन का मामला अकेले हमारे विधानसभा क्षेत्र सुल्तानपुर पट्टी में नहीं है बल्कि पूरे प्रदेश का है। प्रदेश की कोई ऐसी नदी नहीं बची है कि जहां अवैध खनन नहीं हो रहा है। चाहे वह कोसी हो या दाबका, गंगा या रामगंगा, सभी जगह खनन माफियाओं की पोकलैंड चल रही है जिन्होंने जंगल के जंगल खोद डाले हैं। आम आदमी आज अपने खेतों से मिट्टी तक नहीं ला सकते हैं लेकिन खनन माफिया खुलेआम खेत के खेत खोद रहे हैं। सरकार ने हैदराबाद की एक कम्पनी को खनन का ठेका देकर मध्यम वर्गीय लोगों की रोजी-रोटी छीन ली है। पहले यह काम मध्यम वर्गीय लोग मजदूरों से कराते थे अब बड़े-बड़े माफिया इसमें जुटे हैं जिनमें अधिकतर बाहरी प्रदेशों के हैं।
बाजपुर की बहुत पुरानी सरकारी चीनी मिल और डिस्टलरी के आधुनिकीकरण की बात वर्षों से की जाती रही है लेकिन अभी तक भी यह पूरी नहीं हुई है, क्या कारण है?
कारण सरकार है। भाजपा सरकार नहीं चाहती कि सरकारी चीनी मिल चलती रहे। वह उनका आधुनिकीकरण कराने की बात करती है लेकिन उन्हें निजी हाथों में सौंप देती है। सितारगंज की चीनी मिल इसका उदाहरण है जिसे पीपीपी मोड पर चलाने के लिए निजी हाथों में सौंप दिया गया है। ऐसा अभी प्रदेश की कई चीनी मिलों में कराने की प्लानिंग चल रही है। बाजपुर सहकारी चीनी मिल के बारे में भी यही चर्चा है। बाजपुर सुगर मिल की स्थापना पंडित जवाहरलाल नेहरू जी ने की थी जहां उत्तराखण्ड ही नहीं बल्कि पड़ोसी प्रदेश उत्तर प्रदेश के किसान अपना गन्ना बेचने के लिए कई-कई दिनों तक लाइनों में खड़े रहते थे लेकिन मिल अब आपसी राजनीति का शिकार हो चली है। किसानों के गन्ने को पहले तो लेने में ही आनाकानी की जाती है, फिर उनकी पेमेंट समय पर नहीं की जाती है। उचित मूल्य नहीं दिया जाता है जिससे किसानों ने गन्ने की पैदावार करना ही बंद कर दिया है। अब यह मिल बंद होने के कगार पर है। सरकार की निगाह मिल की 100 एकड़ जमीन पर है जिसे किसी बिल्डर को देने की तैयारी की जा रही है। इसे भी सितारगंजज चीनी मिल की तरह पीपीपी मोड पर दिया जा सकता है।
बाजपुर सहकारी चीनी मिल की डिस्टलरी में बनने वाली अश्विनी शराब बहुत प्रसिद्ध रही है। कभी यहां से निर्मित शराब की इतनी मांग थी कि उसकी आर्मी को सप्लाई की जाती थी। उत्तर प्रदेश के लोग तो इसके बड़े दीवाने थे लेकिन अब यह अश्विनी प्लांट अंतिम सांसें गिन रहा है?
सही बात है। बाजपुर की चीनी मिल से निकली वाइन सेना के जवानों की पहली पसंद हुआ करती थी। यूपी के लोग तो इसका नाम सुनते ही झूमने लगते थे लेकिन अब इसका प्लांट जो अश्विनी के नाम पर था वह बंद है। जिस तरह सरकार ने रामनगर की आईएमपीसीएल कम्पनी को प्रोफिट में होने के बावजूद निजी हाथों में बेच दिया उसी तरह अश्विनी प्लांट को भी बेचने की तैयारी है। यह प्लांट प्रोफिट में रहा है लेकिन इसकी जमीन पर माफियाओं की गिद्ध दृष्टि पड़ चुकी है। हो सकता है कुछ दिनों बाद आईएमपीसीएल की तरह ही इसकी भी बेशकीमती जमीन को बेच दिया जाए।
शहर के बीचोंबीच स्थित रेलवे फाटक भी यात्रियों के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है। दोनों तरफ वाहनों की लम्बी कतार लगी रहती है। इस फाटक पर ओवर ब्रिज बनवाने की मांग वर्षों पुरानी है?
यह फाटक भी भारत सरकार का मामला कहकर लटकाया जा रहा है। इस पर फ्लाई ओवर बनवाने के लिए मेरे द्वारा सरकार से कई बार अनुरोध किया गया है। मैंने केंद्र सरकार को भी इस बाबत कई बार पत्र लिखे हैं लेकिन राज्य से लेकर केंद्र तक कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

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