उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अब चंद महीने दूर हैं। इसे देखते हुए सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी जमीन मजबूत करने में जुट गए हैं। इसी बीच बहुजन समाज पार्टी की सक्रियता ने प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। पिछले सप्ताह एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का बयान कि अब ‘दरी बिछाने की नहीं, हिस्सेदारी और बराबरी की राजनीति’ होगी, ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दिया। इसके बाद कयास लगाए जाने लगे कि भविष्य में बसपा प्रमुख मायावती, चंद्रशेखर आजाद और ओवैसी किसी साझा मंच पर आ सकते हैं। हालांकि इन अटकलों के बीच बसपा सुप्रीमो मायावती ने एक बार फिर स्पष्ट संकेत दिए हैं कि उनकी पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव अपने दम पर लड़ने की तैयारी कर रही है। पार्टी ने 22 जून से प्रदेश की विधानसभा सीटों पर कार्यकर्ता सम्मेलनों की शुरुआत की है, जिसे 2027 के चुनावी अभियान की शुरुआती दस्तक माना जा रहा है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि मायावती के इस फैसले का सियासी संदेश क्या है? क्या इससे समाजवादी पार्टी की चिंता बढ़ेगी? या फिर भाजपा के सामाजिक समीकरणों पर भी असर पड़ेगा? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बसपा अपने पारम्परिक दलित वोट बैंक को दोबारा संगठित करने में सफल रहती है तो इसका असर सीधे समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी दोनों के चुनावी गणित पर पड़ सकता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछड़ा, दलित और मुस्लिम वोट बैंक लम्बे समय से सत्ता का आधार रहा है। यदि बसपा दलित मतदाताओं को फिर से अपने साथ जोड़ने में सफल होती है तो विपक्षी वोटों का बिखराव हो सकता है। यही वजह है कि समाजवादी पार्टी के लिए बसपा की बढ़ती सक्रियता चिंता का विषय बन सकती है। वहीं भाजपा ने पिछले कुछ चुनावों में दलित समाज के एक हिस्से में अपनी मजबूत पकड़ बनाई है। यदि मायावती की सक्रियता से बसपा का पारम्परिक आधार फिर से मजबूत होता है तो भाजपा के कुछ सामाजिक समीकरण भी प्रभावित हो सकते हैं। गौरतलब है कि मायावती कई बार साफ कर चुकी हैं कि बसपा किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी और अपने दम पर चुनाव लड़ेगी। उन्होंने सपा या अन्य दलों के साथ सम्भावित गठबंधन की खबरों को भी खारिज किया है। 22 जून से शुरू हुए कार्यकर्ता सम्मेलन केवल संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं माने जा रहे बल्कि इन्हें बसपा के चुनावी पुनरुत्थान की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी का फोकस बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने और अपने पारम्परिक वोट बैंक को दोबारा सक्रिय करने पर है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि मायावती की यह रणनीति समाजवादी पार्टी और भाजपा में से किसकी मुश्किलें ज्यादा बढ़ाती है। फिलहाल इतना तय है कि बसपा की सक्रियता ने उत्तर प्रदेश की सियासत में नए समीकरणों की चर्चा को तेज कर दिया है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर एक बार फिर अपने बयानों और राजनीतिक गतिविधियों को लेकर पार्टी के भीतर चर्चा के केंद्र में हैं। हाल के दिनों में उनके कुछ बयान और रुख कांग्रेस के अंदर नई बहस का कारण बने हैं। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह केवल वैचारिक मतभेद है या फिर पार्टी के भीतर किसी बड़े बदलाव का संकेत। शशि थरूर लम्बे समय से अपनी स्वतंत्र राय और स्पष्ट वक्तव्यों के लिए जाने जाते हैं। पूर्व में कई मुद्दों पर वह पार्टी की आधिकारिक लाइन से अलग नजर आए हैं, जिसके कारण उनके बयान अक्सर चर्चा का विषय बन जाते हैं। हाल ही में श्रीनगर दौरे के दौरान थरूर ने जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से मुलाकात की। इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर जम्मू-कश्मीर के हालात में सुधार को लेकर सकारात्मक टिप्पणी की। उनके इस बयान पर कांग्रेस के भीतर ही विरोध के स्वर सुनाई दिए। जम्मू-कश्मीर कांग्रेस के नेताओं ने कहा कि उन्हें आम लोगों से भी मिलकर जमीनी स्थिति को समझना चाहिए था। विवाद तब और बढ़ गया जब थरूर ने एक इंटरव्यू में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति से जुड़े कुछ कदमों की सराहना की। उन्होंने जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान भारतीय नाविकों के मुद्दे को उठाने और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की स्थिति को लेकर प्रधानमंत्री के रुख का समर्थन किया तो कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने इस पर तंज कसते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने जितना कहा नहीं, उससे ज्यादा उनके समर्थक सुन लेते हैं। इसके जवाब में थरूर ने कहा कि उन्होंने केवल प्रकाशित रिपोर्टों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अपनी टिप्पणी की है। इसी बीच वरिष्ठ कांग्रेस नेता मणि शंकर अय्यर ने भी थरूर पर भारत के पारम्परिक नैतिक रुख को कमजोर करने का आरोप लगाया और पूछा कि क्या वे पीएम मोदी की कृपा पाने की कोशिश कर रहे हैं। जवाब में थरूर ने कहा कि विदेश नीति के मुद्दों पर मतभेद स्वाभाविक हैं और इससे किसी की नीयत या देशभक्ति पर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए। शशि थरूर को लेकर उठी यह बहस कांग्रेस के भीतर वैचारिक स्वतंत्रता और संगठनात्मक अनुशासन के बीच संतुलन की चुनौती को सामने लाती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह विवाद केवल बयानों तक सीमित रहता है या पार्टी की आंतरिक राजनीति पर इसका कोई बड़ा असर पड़ता है।
झारखंड में हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव ने महागठबंधन की एकजुटता पर गम्भीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गठबंधन के पास पर्याप्त संख्या बल होने के बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की हार ने सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। चुनाव परिणामों के अनुसार 81 सदस्यीय विधानसभा में 31 विधायकों ने जेएमएम के बैद्यनाथ राम, 28 ने निर्दलीय परिमल नथवाणी को वोट दिया जबकि कांग्रेस उम्मीदवार को केवल 19 वोट मिले, 3 वोट अमान्य घोषित हुए। इन नतीजों के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्राॅस वोटिंग किसने की। कांग्रेस के कई नेताओं ने खुलकर सहयोगी दलों पर सवाल उठाए हैं और इसे राजनीतिक विश्वासघात तक बताया है। इससे महागठबंधन के भीतर तनाव और अविश्वास की स्थिति साफ दिखाई देने लगी है। झारखंड की राजनीति में क्राॅस वोटिंग कोई नई घटना नहीं है लेकिन जब यह सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर सामने आती है तो इसके राजनीतिक मायने काफी बढ़ जाते हैं। महागठबंधन कई दलों के समर्थन पर टिका है और ऐसे में विधायकों की नाराजगी या अलग रुख सरकार की स्थिरता पर असर डाल सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं अक्सर दलों के भीतर असंतोष, नेतृत्व को लेकर मतभेद और भविष्य की राजनीतिक सम्भावनाओं से जुड़ी होती हैं। विपक्ष भी इस मुद्दे को सरकार की कमजोरी के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि सत्तारूढ़ दलों का दावा है कि सरकार पूरी तरह स्थिर है और गठबंधन में किसी तरह का संकट नहीं है। गठबंधन के नेताओं का कहना है कि सभी सहयोगी दल एकजुट हैं और सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी लेकिन राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने यह संकेत जरूर दिया है कि महागठबंधन के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। यदि असंतोष और अविश्वास की स्थिति बनी रहती है तो आने वाले समय में इसका असर राज्य की राजनीति और सरकार की कार्यप्रणाली पर पड़ सकता है। फिलहाल झारखंड में क्राॅस वोटिंग का मुद्दा राजनीतिक चर्चा के केंद्र में बना हुआ है।