• दि संडे पोस्ट डेस्क
अयोध्या के राम मंदिर में दान राशि की कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर उठे विवाद ने केवल मंदिर प्रशासन ही नहीं बल्कि भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और योगी सरकार को भी असहज स्थिति में ला खड़ा किया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जहां इसे अयोध्या को बदनाम करने की साजिश बता रहे हैं, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पूर्व प्रधान सचिव और राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र इसे ‘खुला डाका’ कह रहे हैं। राम मंदिर ट्रस्ट और प्रबंधन में संघ परिवार की केंद्रीय भूमिका, स्वयंसेवक आधारित नियुक्तियों पर उठे सवाल तथा भाजपा समर्थक माने जाने वाले मीडिया के एक हिस्से द्वारा मामले को प्रमुखता से उठाए जाने के बाद यह बहस भी तेज हो गई है कि क्या यह केवल दान घोटाले की जांच है या फिर इसके भीतर भाजपा सत्ता प्रतिष्ठान और संघ परिवार के बीच किसी गहरे अंतर्विरोध की झलक भी दिखाई दे रही है

अयोध्या का राम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है। यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था, पांच सौ वर्षों के संघर्ष, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के दशकों लम्बे आंदोलन तथा भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी राजनीतिक और वैचारिक उपलब्धि का प्रतीक है। यही कारण है कि इन दिनों मंदिर में दान राशि की कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर उठे विवाद ने देशव्यापी बहस छेड़ दी है।

मामला इतना गम्भीर हो गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार को विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करना पड़ा लेकिन विवाद की असली गम्भीरता इस तथ्य से समझी जा सकती है कि आरोप केवल विपक्ष नहीं लगा रहा। स्वयं राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि यह ‘खुला डाका’ है और मंदिर की निगरानी व्यवस्था पूरी तरह विफल रही है। यहीं से यह मामला सामान्य चोरी या वित्तीय अनियमितता की जांच से आगे बढ़कर सत्ता, संगठन, आस्था और राजनीतिक प्रभाव के जटिल सवालों में बदल जाता है।

योगी का दावा : अयोध्या को बदनाम करने की साजिश
बीते 19 जून को अयोध्या पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहली बार इस विवाद पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि कुछ लोग अयोध्या धाम और राम जन्मभूमि मंदिर को बदनाम करने की साजिश कर रहे हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से धैर्य रखने और एसआईटी की रिपोर्ट का इंतजार करने की अपील करते हुए कहा कि ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ हो जाएगा। बाद में एक अन्य कार्यक्रम में उन्होंने और अधिक आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा कि जब भी भारत कोई बड़ी उपलब्धि हासिल करता है, तब कुछ शक्तियां उसे बदनाम करने में जुट जाती हैं और राम मंदिर को लेकर चल रही चर्चा भी उसी प्रकार के षड्यंत्र का हिस्सा है। योगी का संदेश साफ था जांच होने दीजिए लेकिन अयोध्या और राम मंदिर की प्रतिष्ठा पर सवाल खड़े करने से बचिए।

नृपेंद्र मिश्र का विस्फोटक बयान
मुख्यमंत्री की इस लाइन से बिल्कुल अलग स्वर नृपेंद्र मिश्र के साक्षात्कारों में सुनाई दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल में प्रधान सचिव रहे मिश्र ने विभिन्न टीवी चैनलों से बातचीत में कहा कि मंदिर की निगरानी व्यवस्था लगभग शून्य थी। उन्होंने स्वीकार किया कि दान गणना कक्ष में संदिग्ध गतिविधियां दिखाई दीं, सुरक्षा व्यवस्था प्रभावी नहीं थी और कई स्थापित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया।

मीडिया से बातचीत में उन्होंने कथित घटना को ‘खुला डाका’ बताया। उन्होंने कहा कि यह आश्चर्यजनक है कि न तो ट्रस्ट को और न ही भारतीय स्टेट बैंक को नियमित रिपोर्ट मिल रही थीं। उनके अनुसार बैंक ने भी अपनी जिम्मेदारियों का सही ढंग से पालन नहीं किया। राजनीतिक दृष्टि से यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी विपक्षी नेता का आरोप नहीं बल्कि मंदिर परियोजना से जुड़े सबसे वरिष्ठ प्रशासकों में से एक की स्वीकारोक्ति है।

शौचालय में मिली नकदी और सीसीटीवी का रहस्य
नृपेंद्र मिश्र ने जो तथ्य सार्वजनिक किए हैं, वे मामले को और गम्भीर बनाते हैं। उनके अनुसार दान गणना कक्ष के बाहर स्थित शौचालय में नकदी बरामद हुई। सीसीटीवी फुटेज में कुछ संदिग्ध गतिविधियां दिखाई दीं। कुछ व्यक्तियों द्वारा नकदी के बंडलों को व्यक्तिगत रूप से संभालने के संकेत मिले। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि दान कक्षों की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग केवल 45 दिन तक सुरक्षित रहती थी और उसके बाद स्वतः नष्ट हो जाती थी। कोई डिजिटल बैकअप उपलब्ध नहीं था। इसका अर्थ है कि यदि अनियमितताएं लम्बे समय से चल रही थीं तो उनके कई सम्भावित साक्ष्य हमेशा के लिए समाप्त हो चुके हैं।

दान गणना की प्रक्रिया में गम्भीर चूक
मिश्र के अनुसार दान गणना कक्ष में कर्मचारियों को बिना जेब वाले वस्त्र पहनने थे लेकिन नियमों का पालन नहीं किया गया। नकदी की गिनती और निगरानी के लिए निर्धारित प्रक्रिया भी प्रभावी ढंग से लागू नहीं थी। उन्होंने कहा कि सम्पूर्ण सतर्कता व्यवस्था लगभग शून्य थी और प्रशासनिक अनुभव की कमी स्पष्ट दिखाई देती है। यानी मामला केवल सम्भावित चोरी का नहीं बल्कि संस्थागत विफलता का भी है।
एफआईआर अब तक क्यों नहीं?
एक बड़ा सवाल यह है कि यदि संदिग्ध गतिविधियां दिखीं, नकदी बरामद हुई और एसआईटी जांच कर रही है तो अभी तक प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं हुई? नृपेंद्र मिश्र का जवाब है कि पहले यह स्थापित करना होगा कि वास्तव में क्या हुआ? कैसे हुआ और जिम्मेदार कौन है? उसके बाद ही एफआईआर दर्ज की जाएगी लेकिन विपक्ष इस तर्क से संतुष्ट नहीं है और इसे जांच में देरी तथा सम्भावित लीपापोती से जोड़कर देख रहा है।

कितना पैसा गायब हुआ?
विपक्ष ने करोड़ों रुपए की चोरी के आरोप लगाए हैं लेकिन अभी तक कोई आधिकारिक आंकड़ा सामने नहीं आया है। नृपेंद्र मिश्र के अनुसार मंदिर में मासिक दान चार करोड़ रुपए से लेकर बारह करोड़ रुपए तक पहुंचता रहा है। औसतन हर वर्ष लगभग 75 से 80 करोड़ रुपए का दान प्राप्त होता है। यदि जांच में यह साबित होता है कि अनियमितताएं लम्बे समय से चल रही थीं तो मामला बेहद बड़ा रूप ले सकता है।

संघ मॉडल पर पहली बार सार्वजनिक सवाल
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू शायद यही है। नृपेंद्र मिश्र ने कहा कि केवल आरएसएस स्वयंसेवक होने के आधार पर नियुक्तियां करना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने नियुक्ति प्रक्रिया में पेशेवर व्यवस्था, चरित्र सत्यापन और स्वतंत्र निगरानी की आवश्यकता बताई। यह बयान साधारण नहीं है क्योंकि राम मंदिर का प्रशासनिक ढांचा लम्बे समय से संघ परिवार और उससे जुड़े संगठनों के प्रभाव में रहा है। ट्रस्ट के महासचिव चम्पत राय विश्व हिंदू परिषद के सबसे प्रमुख नेताओं में रहे हैं। मंदिर निर्माण और प्रबंधन से जुड़े कई अन्य प्रमुख पदाधिकारी भी संघ की पृष्ठभूमि से आते हैं। यानी पहली बार मंदिर प्रबंधन के उस मॉडल पर प्रश्न उठ रहा है जो अब तक वैचारिक समर्पण और संगठनात्मक निष्ठा के आधार पर संचालित होता रहा है।

राम मंदिर पर संघ का प्रभाव कितना गहरा है?
राम मंदिर ट्रस्ट की संरचना पर नजर डालें तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि इसके संचालन और प्रबंधन में संघ परिवार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। महासचिव चम्पत राय दशकों से विश्व हिंदू परिषद और राम जन्मभूमि आंदोलन का चेहरा रहे हैं। मंदिर निर्माण व्यवस्था से जुड़े गोपाल राव, कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी तथा चंदा प्रबंधन से जुड़े अनिल मिश्रा जैसे नाम भी लम्बे समय से संघ परिवार और राम मंदिर आंदोलन की संरचना का हिस्सा रहे हैं। वास्तव में राम मंदिर केवल एक धार्मिक परियोजना नहीं बल्कि संघ परिवार के दशकों पुराने वैचारिक अभियान की परिणति है। इसलिए स्वाभाविक रूप से उसके प्रशासनिक ढांचे पर भी संघ की छाप दिखाई देती है। यही कारण है कि आज उठ रहे सवाल किसी व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं हैं। सवाल पूरे प्रबंधन मॉडल को लेकर उठ रहे हैं।

क्या यह केवल दान विवाद है या दिल्ली बनाम संघ?
यहीं से इस पूरे मामले का सबसे रोचक और संवेदनशील राजनीतिक पहलू सामने आता है। नृपेंद्र मिश्र को दिल्ली की सत्ता संरचना का प्रतिनिधि माना जाता है। वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे भरोसेमंद नौकरशाहों में रहे हैं। दूसरी ओर राम मंदिर ट्रस्ट और उसका संचालन बड़े पैमाने पर संघ परिवार से जुड़े लोगों के हाथों में रहा है। ऐसे में जब नृपेंद्र मिश्र स्वयं सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि निगरानी व्यवस्था विफल थी, स्वयंसेवक आधारित नियुक्ति मॉडल पर्याप्त नहीं है और यहां ‘खुला डाका’ हुआ है तो इसे केवल प्रशासनिक टिप्पणी नहीं माना जा सकता है।

दिलचस्प तथ्य यह भी है कि भाजपा समर्थक माने जाने वाले कुछ मीडिया संस्थानों, विशेषकर हिंदी मीडिया के प्रभावशाली हिस्से जिनमें भाजपा निष्ठ दैनिक समाचार पत्र ‘दैनिक जागरण’ प्रमुख है, ने इस खबर को असाधारण प्रमुखता से प्रकाशित किया। सामान्य परिस्थितियों में ऐसे विवादों को सीमित रखने की कोशिश होती है लेकिन इस बार मामला लगातार सुर्खियों में बना रहा।

यहीं से राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा शुरू हुई कि क्या यह केवल दान की कथित चोरी का मामला है या फिर इसके पीछे भाजपा के सत्ता प्रतिष्ठान और संघ परिवार के बीच प्रभाव, जवाबदेही और नियंत्रण को लेकर कोई गहरी खींचतान भी मौजूद है। हालांकि इस निष्कर्ष के समर्थन में अभी कोई प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे एक राजनीतिक सम्भावना या विश्लेषण के रूप में ही देखा जाना चाहिए लेकिन इतना अवश्य है कि इस विवाद ने पहली बार राम मंदिर के प्रबंधन और संघ की भूमिका पर सार्वजनिक बहस छेड़ दी है।

चंपत राय और टिन्नू यादव विवाद
विवाद के केंद्र में ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का नाम भी लगातार चर्चा में है। हालांकि नृपेंद्र मिश्र ने उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी का बचाव करते हुए उन्हें ‘दागरहित’ बताया है। इसके समानांतर चम्पत राय के बेहद करीबी राम शंकर यादव उर्फ टिन्नू का नाम भी सामने आया है। उन पर लगभग 50 करोड़ रुपए की सम्पत्ति अर्जित करने के आरोप लगाए जा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी लगाया गया है कि उन्होंने दान गणना कक्ष में नियुक्तियों को प्रभावित किया। टिन्नू यादव इन सभी आरोपों का खंडन कर चुके हैं और दावा कर रहे हैं कि उनकी सम्पत्ति वर्षों पुराने वैध निवेश और आय का परिणाम है। इसके बावजूद नृपेंद्र मिश्र ने उन्हें क्लीन चिट नहीं दी है और कहा है कि एसआईटी इस पहलू की भी गहराई से जांच करेगी।

भाजपा की सबसे बड़ी नैतिक परीक्षा
राम मंदिर भाजपा की सबसे बड़ी वैचारिक उपलब्धि है। अनुच्छेद 370, समान नागरिक संहिता और राम मंदिर, इन तीन मुद्दों में भी राम मंदिर सबसे अधिक भावनात्मक और प्रतीकात्मक महत्व रखता है। यही कारण है कि दान राशि में कथित गड़बड़ी के आरोप भाजपा के लिए केवल राजनीतिक संकट नहीं बल्कि नैतिक संकट भी बन सकते हैं। यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो विपक्ष इसे ‘राम के नाम पर जुटाई गई आस्था की लूट’ के रूप में प्रस्तुत करेगा और यदि आरोप गलत साबित होते हैं तो भी ट्रस्ट और सरकार को अभूतपूर्व पारदर्शिता के साथ जनता के सामने सभी तथ्य रखने होंगे।

कुल मिलाकर अयोध्या का यह विवाद केवल दान पेटी में पड़े रुपयों की कहानी नहीं है। यह उस विश्वास की परीक्षा है जिसके आधार पर करोड़ों लोगों ने राम मंदिर निर्माण में योगदान दिया था। यह भाजपा की नैतिक विश्वसनीयता की परीक्षा है। यह संघ परिवार के प्रबंधन माॅडल की परीक्षा है। यह योगी सरकार की प्रशासनिक निष्पक्षता की परीक्षा है और सबसे बढ़कर यह उस आस्था की परीक्षा है जिसने राम मंदिर को केवल एक इमारत नहीं बल्कि राष्ट्रीय भावना का प्रतीक बनाया।

एसआईटी की रिपोर्ट यह तय करेगी कि यह मामला कुछ कर्मचारियों की कथित चोरी तक सीमित है या फिर इसके पीछे भारतीय राजनीति, सत्ता और संगठन की कहीं अधिक बड़ी कहानी छिपी हुई है। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि राम के घर में उठे इस विवाद ने देश को एक असहज प्रश्न के सामने खड़ा कर दिया है कि क्या करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास वास्तव में सुरक्षित हाथों में था?

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