entertainment

बॉलीवुड में ‘री-ब्रांडिंग’ का नया दौर

बॉलीवुड में ‘री-ब्रांडिंग’ का नया दौर
बाॅलीवुड में हीरो की पुरानी परिभाषा टूट रही है। आज सुपर स्टार सिर्फ ग्लैमर या एक्शन का भरोसा नहीं बेच रहा बल्कि वह खुद को नए दर्शक के लिए दोबारा गढ़ रहा है। कोई रोमांस किंग से एक्शन-टाइटन बन रहा है तो कोई परिवारिक हीरो से खतरनाक विलेन, कोई युवा-क्रश की छवि छोड़कर परफाॅर्मर बनने की जिद पर है तो कोई 90 के एक्शन से ओटीटी के डार्क किरदारों तक पहुंचकर नई पीढ़ी में अपनी जगह बना रहा है। यह बदलाव केवल कलाकार की पसंद नहीं, यह ओटीटी, सोशल मीडिया, बाॅक्स ऑफिस के नए गणित और दर्शकों की बदली हुई अपेक्षाओं की देन है। आज का हीरो अपनी पहचान नहीं बचा रहा, वह उसे फिर से लिख रहा है


फिल्मी दुनिया में सबसे बड़ा सच यही है कि यहां स्थायी कुछ नहीं,  न लोकप्रियता, न छवि, न तालियों की गूंज। जो अभिनेता कल तक पर्दे पर ‘अजेय’ माना जाता था, वही आज ट्रोलिंग का शिकार होकर अप्रासंगिक भी हो सकता है। जो कल तक ‘फ्लाॅप’ की मुहर झेल रहा था, वह आज एक नए रोल में धमाका करके फिर से सेंटर स्टेज पर आ सकता है। यही कारण है कि हिंदी सिनेमा आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां ‘हीरो’ खुद बदल रहा है और इस बदलाव को फिल्मी भाषा में ‘री-ब्रांडिंग’ कहा जा रहा है।

यह री-ब्रांडिंग किसी कलाकार की नई ड्रेसिंग, नए हेयरकट या जिम बाॅडी तक सीमित नहीं है। यह उसके स्क्रीन पर खड़े होने के तरीके, उसके किरदार की भाषा, उसकी कहानी की पसंद और यहां तक कि उसके
सार्वजनिक व्यवहार तक में दिखाई दे रही है। पहले स्टारडम का आधार था दमदार एंट्री, बड़े डायलाॅग, मारधाड़ और पर्दे पर अद्भुत ‘हीरोइज्म’ लेकिन आज का दर्शक ‘अदभुत हीरो’ से ज्यादा ‘असली इंसान’ देखना चाहता है। वह चाहता है कि हीरो कमजोर पड़े, टूटे, उलझे, असफल हो, फिर भी उठे। यानी आज की दुनिया में सुपर स्टार वही है जो ‘देवता’ नहीं, ‘मनुष्य’ बनकर भी दर्शक को बांध सके।
 
सोशल मीडिया और ओटीटी छवि को रोज परखने वाली अदालत

इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण ओटीटी है। ओटीटी ने दर्शक को ‘कहानी’ की आदत डाल दी है। आज का दर्शक हर सप्ताह ऐसी सीरीज देखता है जिसमें न तो पारम्परिक हीरो होता है, न बड़े डायलाॅग, फिर भी वह कहानी उसे जकड़ लेती है। इसने दर्शक की उम्मीदों का स्तर बदल दिया है। अब वह थिएटर जाकर भी वही पूछता है कि फिल्म में सिर्फ स्टार है या कहानी भी है? दूसरी तरफ सोशल मीडिया ने इस बदलाव को और तेज कर दिया है। यहां दर्शक अब चुप नहीं रहता, वह तुरंत फैसला सुनाता है, ट्रेंड बनाता है, बहस चलाता है और कभी-कभी एक फिल्म को ‘पिटा’ हुआ घोषित करने में भी देर नहीं करता। यही वजह है कि स्टार अब अकेले अपने नाम से फिल्म नहीं चला सकता। उसे ‘रोल’ और ‘कंटेंट’ से अपना असर साबित करना पड़ता है।
 
रोमांस किंग से ‘एक्शन-टाइटन’ तक की सबसे बड़ी री-ब्रांडिंग

अगर री-ब्रांडिंग की बात हो और शाहरुख खान का जिक्र न हो तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी। शाहरुख लम्बे समय तक रोमांस के बादशाह रहे। उनकी छवि ऐसी थी जिसे लोग प्यार, मोहब्बत और खुले हाथों वाली एंट्री से जोड़ते थे। लेकिन जब वापसी की तो दर्शकों की बदली हुई नब्ज को पकड़ा। ‘पठान’ और ‘जवान’ जैसी फिल्मों ने शाहरुख को नए दौर में ‘मास-एक्शन’ का ऐसा चेहरा बना दिया जिसे युवा पीढ़ी ने भी अपनाया। यह केवल कमबैक नहीं है, यह अपने आप को फिर से परिभाषित करने की घोषणा है। दिलचस्प यह रहा कि इसी के बाद ‘डंकी’ जैसे प्रोजेक्ट में उन्होंने भावनात्मक और कहानी-प्रधान टोन को भी अपनाया। यानी एक तरफ बड़ा थिएटर-स्टार, दूसरी तरफ कंटेंट का साथ, यह माॅडल आज के दौर की सबसे सफल री-ब्रांडिंग रणनीति बनकर सामने आया।
 
‘युवा क्रश’ से लम्बी रेस के परफाॅर्मर बनने की कोशिश

नई पीढ़ी में कार्तिक आर्यन की फैन फाॅलोइंग बड़ी है लेकिन यही लोकप्रियता उनके लिए एक चुनौती भी रही, टाइपकास्टिंग। लम्बे समय तक उन्हें रोमांटिक, शरारती और हल्के-फुल्के ‘युवा हीरो’ के दायरे में देखा गया। अब कार्तिक लगातार ऐसी कोशिशों में लगे हैं जिनसे उन्हें सिर्फ ‘युवा पीढ़ी का क्रश’ नहीं बल्कि एक गम्भीर अभिनेता माना जाए। यही री-ब्रांडिंग का सबसे कठिन रूप है, जब आपको अपने फैंस की उम्मीदों को बनाए रखते हुए भी खुद को बदलना होता है। कार्तिक की दिशा स्पष्ट है कि वह स्टारडम को परफाॅर्मेंस से जोड़कर लम्बे समय तक टिकना चाहते हैं।
 
पुरानी पहचान को नया बाजार

री-ब्रांडिंग का मतलब हमेशा नई छवि बनाना नहीं होता। कभी-कभी री-ब्रांडिंग का मतलब अपनी पुरानी छवि को नए दौर के हिसाब से फिर से जीवित करना भी होता है। सनी देओल इसका बड़ा उदाहरण हैं। ‘ढाई किलो हाथ’ और ‘गदर’ वाली उनकी पहचान 90 की ‘मर्दाना सिनेमा’ संस्कृति से जुड़ी रही है। लेकिन नई पीढ़ी ने भी उस छवि को अपना लिया क्योंकि आज दर्शक एक तरफ नए कंटेंट की तलाश में है तो दूसरी तरफ वह ‘इवेंट सिनेमा’ और नाॅस्टैल्जिया का भी आनंद लेना चाहता है। सनी देओल ने अपनी पहचान को मजबूरी नहीं, ताकत बना दिया। उनका स्टारडम यह दिखाता है कि सही समय पर पुरानी छवि भी नया करियर बना सकती है।
 
पारिवारिक हीरो से खतरनाक विलेन
 
बॉलीवुड में कुछ री-ब्रांडिंग ऐसी होती हैं जो दर्शक को हिला देती हैं। बाॅबी देओल का उदाहरण ऐसा ही है। एक समय वे पारिवारिक, रोमांटिक और ‘साॅफ्ट’ हीरो की छवि में पहचाने जाते थे लेकिन आज दर्शक उन्हें एकदम अलग रूप में देख रहा है, एक ऐसे अभिनेता के तौर पर जो स्क्रीन पर डर पैदा करता है, खामोशी में हिंसा समेटे रहता है और नेगेटिव शेड्स में भी असर छोड़ता है। ‘एनीमल’ के बाद बाॅबी देओल की लोकप्रियता केवल बढ़ी नहीं बल्कि बदली भी है। यह ‘दूसरी पारी’ केवल वापसी नहीं बल्कि छवि का पुनर्जन्म है। बाॅबी ने यह साबित किया कि हीरो बनना जरूरी नहीं, कभी-कभी विलेन बनकर भी स्टार बना जा सकता है, बशर्ते किरदार में दम हो।
 
‘सिंगल टोन’ हीरो से मल्टी-शेड सुपर स्टार

अजय देवगन की री-ब्रांडिंग सबसे समझदार और सबसे व्यवस्थित रही है। उन्होंने कभी अचानक अपनी छवि नहीं बदली बल्कि समय के साथ खुद को विस्तार दिया। वह एक्शन में भी विश्वसनीय हैं, गम्भीर रोल में भी और काॅमेडी में भी। ‘दृश्यम’ जैसी फिल्मों ने उन्हें उस सुपर स्टार के रूप में मजबूत किया जो केवल स्टाइल से नहीं बल्कि अभिनय और किरदार से याद रहता है। अजय देवगन ने यह साबित किया कि आज के दौर में सफलता का मंत्र किसी एक ‘फाॅर्मूले’ पर टिके रहना नहीं बल्कि हर बार नई परिस्थिति में खुद को फिट करना है। यही मल्टी-शेड सुपर स्टार होने की री-ब्रांडिंग है।
 
90 के एक्शन से ओटीटी के इंटेंस किरदारों तक

सुनील शेट्टी ने री-ब्रांडिंग का सबसे व्यावहारिक रास्ता चुना ओटीटी। 90 के दशक में वे बड़े स्क्रीन के एक्शन हीरो थे लेकिन समय बदला, इंडस्ट्री बदली और दर्शक की जरूरतें बदलीं। ऐसे में सुनील शेट्टी ने अपनी मौजूदगी को ‘नई पीढ़ी’ तक ले जाने के लिए ओटीटी पर इंटेंस, डार्क और एज्ड किरदारों की तरफ कदम बढ़ाया। यह बदलाव इसलिए खास है क्योंकि इससे पता चलता है कि आज अभिनेता के लिए मंच भी मायने रखता है। जो कलाकार सही मंच पकड़ लेता है, वह उम्र और दौर दोनों को मात दे सकता है।
 
पोस्टर नहीं, परफाॅर्मेंस

री-ब्रांडिंग का एक मजबूत पहलू यह भी है कि आज कई कलाकार ‘स्टार’ बनने की पारम्परिक दौड़ से अलग होकर ‘रेंज’ से अपनी पहचान बना रहे हैं। जयदीप अहलावत और रणदीप हुड्डा जैसे अभिनेता पारम्परिक सुपर स्टार नहीं हैं लेकिन उनकी मौजूदगी दर्शकों के मन में गहरी उतरती है। आज के दौर में ओटीटी और कंटेंट-कल्चर ने ऐसे ही कलाकारों को मुख्यधारा में जगह दी है। इनकी स्टारडम का आधार बाॅडी, डायलाॅग या एंट्री नहीं, किरदार की सच्चाई है। यही बदलाव बताता है कि हिंदी सिनेमा में अब स्टार बनने का रास्ता भी बदल रहा है।

अब सुपर स्टार वही है जो खुद को फिर से लिख सके कुल मिलाकर हिंदी सिनेमा में हीरो का भविष्य उसी के साथ है जो समय के साथ चल सके। आज स्टारडम ‘सिर्फ भीड़ खींचने’ का नाम नहीं रहा बल्कि खुद को बार-बार नया गढ़ने का नाम है। कोई एक्शन में खुद को तराश रहा है, कोई इमोशन में, कोई नेगेटिव रोल में, कोई ओटीटी की तरफ, कोई नाॅस्टैल्जिया की लहर में। यह सब बताता है कि हीरो अब केवल कहानी का राजा नहीं, कहानी के हिसाब से ढलने वाला अभिनेता बन रहा है। शायद यही इस नए दौर का सबसे बड़ा सच है कि आज का दर्शक हीरो को उसके पोस्टर से नहीं, उसके किरदार से याद रखता है। इसलिए अब फिल्म इंडस्ट्री में वही टिकेगा जो अपनी पहचान बचाने की जिद नहीं करेगा बल्कि उसे समय के हिसाब से बदलने का साहस रखेगा। बॉलीवुड का हीरो अब सिर्फ हीरो नहीं रहा, वह अपने ही करियर का लेखक बन चुका है।

You may also like

MERA DDDD DDD DD