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भारी दबाव में बीएलओएसआईआर सुधार या संकट?

भारी दबाव में बीएलओ एसआईआर सुधार या संकट?
तीन हफ्तों में 16 बीएलओ की मौतें, कई आत्महत्याएं, तनाव और हार्टअटैक की घटनाएं, नोएडा में एक बीएलओ का इस्तीफा, इन सबने एसआईआर को भारत की सबसे विवादित चुनावी प्रक्रिया बना दिया है। विपक्ष कह रहा है कि यह मतदाता सुधार नहीं बल्कि वोट चोरी की साजिश और लोकतंत्र पर हमला है जबकि चुनाव आयोग इसे ‘नियमित प्रक्रिया’ बताकर बचाव कर रहा है। अत्यधिक कार्यभार, अव्यवस्थित दस्तावेज, पुरानी स्कैन सूचियां, सख्त डेडलाइन और धमकियों ने उन कर्मचारियों की जान ले ली जिन पर लोकतंत्र की नींव खड़ी है। सवाल उठ रहा है कि क्या यह सुधार है या सत्ता की रक्षा में लोकतांत्रिक संस्थाओं की बलि?


देश में ‘विशेष गहन संशोधन’ यानी एसआईआर को लेकर अभूतपूर्व विवाद खड़ा हो गया है। इस प्रक्रिया के दौरान तीन हफ्तों में कम से कम 16 बीएलओ की मौतों ने सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या यह मतदाता सूची का रिवीजन वास्तव में सुधार है या फिर जल्दबाजी में थोपा गया बोझ जिसने चुनाव कर्मियों को मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़कर रख दिया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी तीखे शब्दों में आरोप लगा रहे हैं कि यह प्रक्रिया सत्ता की रक्षा में लोकतंत्र की बलि है। उनका कहना है कि एसआईआर कोई सुधार नहीं बल्कि एक दमनात्मक अभियान है जिसमें न मतदाता की सुविधा का ख्याल है और न बीएलओ की सुरक्षा का। उनका आरोप है कि इस अराजक प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को पारदर्शी बनाना नहीं बल्कि सही मतदाताओं को थकाना और ‘वोट चोरी’ को आसान बनाना है।

पूरे देश में इस समय एसआईआर की कार्यप्रणाली पर बहस छिड़ी हुई है। यह विवाद केवल राजनीति तक सीमित नहीं है बल्कि जमीनी स्तर पर बीएलओ जो अनुभव कर रहे हैं वो कहीं अधिक चिंताजनक है। पिछले तीन हफ्तों में पश्चिम बंगाल, गुजरात, केरल, तमिलनाडु, राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बीएलओ की मौतों के मामले सामने आए हैं। इनमें कई आत्महत्याएं हैं, कई अचानक हुए हार्टअटैक और कई ऐसी मौतें जिन्हें परिवार सीधे तौर पर एसआईआर के अत्यधिक दबाव से जोड़ रहा है। कुछ परिवारों ने खुलकर कहा है कि बीएलओ लगातार अवसाद में थे, कई दिनों से घर नहीं सो पाए थे, सुबह सात बजे निकलकर रात दस-ग्यारह बजे लौटते थे और अधिकारियों द्वारा निर्धारित लक्ष्य पूरा करने के बोझ में टूट चुके थे।

सबसे ज्यादा चर्चा पश्चिम बंगाल के मामलों की हो रही है। नदिया जिले में एक महिला बीएलओ ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली।परिवार का दावा है कि उन्होंने अपने सुसाइड नोट में एसआईआर को इसके लिए जिम्मेदार बताया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस घटना पर चुनाव आयोग से तीखे सवाल पूछे कि ‘इस प्रक्रिया में और कितनी जानें जाएंगी?’ उन्होंने कहा कि मतदाता सूची को दुरुस्त करना महत्वपूर्ण है लेकिन किसी कर्मचारी की जान की कीमत पर नहीं। जलपाईगुड़ी की एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बीएलओ की आत्महत्या ने इस विवाद को और उग्र कर दिया है। इस बीएलओ के परिवार ने बताया कि वह कई दिनों से रो रही थी और कह रही थी कि वे यह काम नहीं कर पा रही हैं।

गुजरात में एक बीएलओ की हार्टअटैक से मौत हुई है। परिजनों का आरोप है कि वे पिछले दो हफ्तों से प्रतिदिन 14 घंटे से अधिक काम कर रहे थे। उनके बेटे ने कहा कि पिता को अधिकारियों ने 23 नवम्बर तक 95 प्रतिशत लक्ष्य पूरा करने के लिए कहा था, जो स्वयं उनके शब्दों में ‘मानव रूप से असम्भव’ था। इसी तरह, राजस्थान, तमिलनाडु और केरल में भी बीएलओ की मौतें कथित तौर पर एसआईआर के दौरान दर्ज हई हैं। कई मामलों में अधिकारियों ने इसे ‘व्यक्तिगत कारण’ बता दिया लेकिन परिवारों का आरोप है कि काम का दबाव ही वास्तविक कारण था।

इस बीच एक बेहद महत्वपूर्ण समाचार नोएडा से सामने आया है जिसने बहस को नई दिशा दे दी। यहां एक बीएलओ ने एसआईआर के बोझ और मानसिक तनाव का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया है। उनके इस्तीफे में लिखा है कि ‘यह कार्यभार इंसान से नहीं कराया जा सकता, मुझ पर मानसिक दबाव असहनीय हो चुका है। ‘नोएडा जैसे शहर में, जहां संसाधन अपेक्षाकृत बेहतर हैं, एक बीएलओ का इस्तीफा इस बात का प्रतीक है कि एसआईआर कितना बोझिल और अव्यवस्थित है। यदि नोएडा जैसा क्षेत्र इससे अछूता नहीं तो कल्पना कीजिए कि ग्रामीण इलाकों में बीएलओ किन परिस्थितियों में काम कर रहे होंगे।

एसआईआर की प्रक्रिया के केंद्र में वह काम है जिसे आम आदमी शायद समझ ही नहीं पाए। पुरानी पीडीएफ, धुंधले स्कैन, लाखों नाम, और घर-घर जाकर सत्यापन। बीएलओ के सामने सबसे कठिन चुनौती है पुरानी, धुंधली और न पढ़ने योग्य स्कैन सूचियों को घर-घर जाकर मिलाना। कई बीएलओ बताते हैं कि पन्ने इतने धुंधले हैं कि नाम पढ़ने के लिए उन्हें धूप में खड़े होकर मोबाइल फ्लैशलाइट लगानी पड़ती है। कई पन्नों में नाम गायब हैं, कई बूथों के पते उलझे हुए हैं और कई मतदाता वर्षों पहले शिफ्ट कर चुके होते हैं, जिनका पता ट्रेस करना बीएलओ के लिए लगभग असम्भव हो जाता है। इसके ऊपर ऑनलाइन पोर्टल धीमा  है, नेटवर्क फेल हो जाता है और फाॅर्म वापस आने पर बीएलओ को उल्टा जवाब देना पड़ता है।

विपक्ष का आरोप है कि एसआईआर में पारदर्शिता नहीं है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव का आरोप है कि यूपी में, जहां उनकी पार्टी और इंडिया गठबंधन मजबूत है, उन क्षेत्रों में एसआईआर ‘चुनिंदा तरीके’ से लागू किया जा रहा है। उनका दावा है कि कुछ विधानसभा क्षेत्रों में 50 हजार तक वोट काटने की तैयारी है। अखिलेश ने कहा कि ‘‘यह केवल मतदाता सूची का संशोधन नहीं बल्कि ‘पूरी सूची को दोबारा लिखने जैसा’ है और इसे ऐसे समय में लागू करना जब लाखों शादियां हैं, यह दर्शाता है कि प्रक्रिया जल्दबाजी और राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है।’’ अखिलेश के बयान ने यूपी की राजनीति को गर्मा दिया है। कई जिलों में बीएलओ ने आॅफ-रिकाॅर्ड स्वीकार किया कि उन्हें ऐसे निर्देश मिल रहे हैं जिनसे उनके ऊपर लक्ष्य न पूरा होने पर कार्रवाई का डर बनाया गया है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे इस पूरे विवाद को सरकार के खिलाफ बड़ा हथियार बनाने का प्रयास  कर रहे हैं। उनका कहना है कि एसआईआर ने बीएलओ की जान लेने वाली परिस्थितियां पैदा कर दी हैं। वह पूछ रहे हैं कि यदि यह सब व्यक्तिगत घटनाएं हैं, जैसा आयोग कहता है तो फिर क्यों एक ही प्रक्रिया में इतनी मौतें हो रही हैं? क्यों एक ही विभाग में अवसाद, तनाव और हार्टअटैक के इतने मामले अचानक सामने आ रहे हैं? खड़गे ने कहा कि ‘‘नोटबंदी और लाॅकडाउन की तरह यह भी बिना प्लानिंग, बिना तैयारी और बिना मानवीय दृष्टिकोण के लागू किया गया निर्णय है।’’

चुनाव आयोग की ओर से कहा गया है कि एसआईआर एक नियमित वार्षिक प्रक्रिया है और पूरे भारत में मतदाता सूचियों को सटीक बनाने के लिए जरूरी है। आयोग का कहना है कि बीएलओ को पर्याप्त प्रशिक्षण दिया गया है और यदि किसी क्षेत्र में शिकायतें हैं तो उन्हें स्थानीय स्तर पर देखा जाएगा। लेकिन ग्राउंड रिपोर्टिंग इन दावों को कमजोर करती है। कई जिलों में बीएलओ की मीटिंग 10-12 घंटे खिंचती हैं, फाॅर्म भरने के बाद भी उन्हें सिस्टम में अपलोड के लिए कई घंटे इंतजार करना पड़ता है और फील्ड वर्क के दौरान महिलाकर्मियों को सुरक्षा नहीं मिलती। कई जिलों में बीएलओ का वेतन भी रोक दिया गया है, कुछ पर एफआईआर हुई हैं और कुछ को सस्पेंशन की धमकियां मिली हैं। यह सब मिलकर एक ऐसा माहौल बना देता है जहां बीएलओ खुद को असहाय मानते हैं।

तकनीकी अव्यवस्था भी एक बड़ा कारण है। यह विवाद केवल काम के बोझ का नहीं है बल्कि तकनीकी असंगतियों का भी है। मतदाता सूची का इतना महत्वपूर्ण काम पुरानी स्कैन की हुई फाइलों पर क्यों चलाया जा रहा है? जब देश में आधार कार्ड डिजिटल है, पासपोर्ट डिजिटल है, बैंकिंग डिजिटल है, टैक्स, नौकरी और सरकारी लाभ सब डिजिटल हैं तो चुनाव आयोग मतदाता सूची को डिजिटल फस्र्ट क्यों नहीं बनाता? यह सवाल विपक्ष और नागरिक संगठनों, दोनों का है। उनका कहना है कि एसआईआर पुराने समय का अभ्यास है जिसमें 21वीं सदी के भारत को 20वीं सदी की तकनीक पर चलाया जा रहा है।

विशेषज्ञों की मानें तो मतदाता सूची को वेरीफाई करने के लिए इतने बड़े पैमाने पर फील्डवर्क की आवश्यकता ही नहीं है। यदि सूची डिजिटल, मशीन पठन योग्य और आधार/मोबाइल/पते से लिंक्ड हो तो गड़बडियों को फील्ड में आसानी से चेक किया जा सकता है। इससे लाखों बीएलओ पर बोझ खत्म होगा। लेकिन आयोग इस दिशा में इच्छाशक्ति नहीं दिखा रहा और पुरानी प्रक्रिया को नए नाम के साथ लागू कर रहा है। जब इस प्रक्रिया में मौतें हो रही हैं, इस्तीफे हो रहे हैं और अवसाद के मामले सामने आ रहे हैं तो यह सवाल और गम्भीर हो जाता है कि क्या आयोग सुधार चाहता है या नियंत्रण? बीएलओ यूनियन और शिक्षकों के संगठन भी अब सामने आने लगे हैं। कई जगह शिक्षकों ने कहा कि उन्हें स्कूल के काम के अलावा यह ड्यूटी भी दी जा रही है, लेकिन सुरक्षा नहीं। महिला बीएलओ ने शिकायत की कि उन्हें कई बार रात 8-9 बजे तक फील्ड में रहना पड़ता है। कई स्कूलों ने कहा कि शिक्षक-बीएलओ को बिना पर्याप्त संसाधनों के इतना बड़ा काम देना अनुचित है।

पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण मानवीय पक्ष यही है कि एक लोकतंत्र अपने सबसे निचले कर्मचारियों के साथ कैसा व्यवहार करता है? यदि मतदाता सूची बनाने की प्रक्रिया में कर्मचारी आत्महत्या कर रहे हों, दिल का दौरा पड़ रहा हो, इस्तीफा दे रहे हों, घर-घर से शिकायतें आ रही हों और राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हों तो यह प्रक्रिया किसी भी तरह सफल नहीं कही जा सकती। यह सिर्फ प्रशासनिक असफलता नहीं बल्कि संवेदनात्मक विफलता है। इसीलिए अब यह मांग जोर पकड़ रही है कि सभी मौतों की स्वतंत्र, निष्पक्ष और सार्वजनिक जांच होनी चाहिए। एसआईआर को समीक्षा तक रोका जाए और बीएलओ के लिए सुरक्षा, संसाधन, समय-सीमा और मानसिक स्वास्थ्य सहायता की व्यवस्था की जाए। विपक्ष कह रहा है कि यह लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है। परिवार कह रहे हैं कि उन्हें न्याय चाहिए। विशेषज्ञ कह रहे हैं कि भारत को वोटर डेटा के प्रबंधन में तकनीकी क्रांति लानी चाहिए, न कि बीएलओ की जान लेकर मतदाता सूची को ‘सटीक’ करना चाहिए।
निष्कर्ष स्पष्ट है, एसआईआर ने अपनी कार्यान्वयन शैली से लोकतंत्र को मजबूत करने की जगह कमजोर किया है। 16 मौतें, कई आत्महत्याएं, एक इस्तीफा और हजारों बीएलओ की टूटती आवाजें इस बात का प्रमाण हैं कि यह प्रक्रिया गलत तरीके से डिजाइन और लागू की गई। सुधार की परिभाषा वही है जिसमें व्यक्ति भी सुरक्षित रहे और व्यवस्था भी। यदि किसी सुधार में उसकी कीमत किसी बीएलओ की जान बन जाए तो वह सुधार नहीं, आपदा है। भारत को यह निर्णय अब लेना ही होगा कि वह लोकतंत्र को कागजी ढांचों पर चलाना चाहता है या आधुनिक, मानवीय और सुरक्षित प्रक्रिया पर।

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