Uttarakhand

भीतरघात की सुलगती आग धामी की सियासी आंधी से त्रस्त असंतुष्ट

हाशिए पर असंतुष्टड्ढ तिकड़ी
नैनीताल जनपद के रामनगर के छोई-बैलपड़ाव में मांस ले जा रहे मुस्लिम ड्राइवर पर भीड़ हमले की घटना में नैनीताल पुलिस की स्टेटस रिपोर्ट साफ कहती है कि भाजपा नेता मदन जोशी भीड़ जुटाने, अफवाह फैलाने और धार्मिक उन्माद भड़काने की ‘मुख्य भूमिका’ में थे। डिजिटल साक्ष्य, सीसीटीवी, गवाहों के बयान, लोकेशन ट्रैकिंग, फरारी और अंतरिम जमानत खारिज होने तक पुलिस ने हर स्तर पर उनके खिलाफ ठोस केस खड़ा किया। इसके बावजूद हरिद्वार से सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत इसे ‘हिंदूवादी कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई’ बताकर धामी सरकार पर हमलावर हैं। जानकारों की मानें तो पहले अवैध खनन पर लोकसभा में अपनी ही सरकार को घेर चुके त्रिवेंद्र समय-समय पर नाराजगी जताने वाले पूर्व सीएम तीरथ सिंह रावत और गढ़वाल के सांसद अनिल बलूनी, तीनों ही वर्तमान में धामी के बढ़ते प्रभामंडल और राजनीतिक रसूख से खासे त्रस्त हो चले हैं। खबर यह भी गर्म है कि भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष की ताजपोशी बाद बलूनी को राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पद से हटाने का निर्णय लिया जा चुका है


नैनीताल जनपद के रामनगर के छोई-बैलपड़ाव इलाके में 23 अक्टूबर 2025 को घटी घटना शुरू में एक सामान्य भीड़ हिंसा की खबर लगी थी। मांस से लदा एक पिकअप वाहन, उसे चलाता एक मुस्लिम ड्राइवर और अचानक जुट आई भीड़। लेकिन अगले ही कुछ घंटों में यह मामला उत्तराखण्ड की सत्ता के गलियारों में गूंजने लगा क्योंकि हिंसा की आग के पीछे जो नाम सामने आया वह सिर्फ स्थानीय राजनीति का नहीं बल्कि देहरादून से दिल्ली तक मजबूत पकड़ रखने वाला था। भाजपा नेता और पूर्व पालिका चेयरमैन प्रत्याशी मदन जोशी, जिन्हें गढ़वाल से राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी का बेहद करीबी माना जाता है। नैनीताल पुलिस की विस्तृत स्टेट्स रिपोर्ट जो सर्किल आॅफिसर रामनगर ने जाॅइंट डायरेक्टर (प्राॅसिक्यूशन) को भेजी, इस पूरी घटना का बिंदुवार ब्यौरा देती है। रिपोर्ट के शब्दों में, यह ‘अचानक भड़की भीड़’ नहीं थी बल्कि सोशल मीडिया, अफवाहों और संगठित उकसावे से पैदा हुआ ‘धार्मिक उन्माद’ था। रिपोर्ट में लिखा है कि घटना से पहले इलाके के कुछ व्हाट्सएप ग्रुपों और सोशल मीडिया पोस्टों में यह बात फैलाई गई कि ‘गौमांस की तस्करी’ हो रही है और एक वाहन संदिग्ध मांस लेकर गुजरने वाला है। जांच में खुलासा हुआ कि इस नैरेटिव को हवा देने वाले प्रमुख चेहरों में मदन जोशी शामिल था।


पुलिस ने जो डिजिटल ट्रेल इकट्ठा किया, उसमें मदन जोशी के मोबाइल फोन से किए गए कई काॅल, फाॅरवर्ड संदेश और ग्रुप चैट दर्ज हैं, जिनमें छोई-बैलपड़ाव की सड़क पर ‘तैयार रहने’ और ‘वाहन रोकने’ जैसी बातें सामने आईं। स्टेटस रिपोर्ट में धरना की बाबत मदन जोशी की भूमिका (Role of Shri Madan Joshi in the incident) वाले हिस्से में साफ लिखा है कि जोशी न सिर्फ मौके पर मौजूद था बल्कि भीड़ को संगठित करने और उकसाने की भूमिका में था। जैसे ही मांस वाला पिकअप वहां पहुंचा, भीड़ ने उसे घेर लिया, ड्राइवर को खींचकर बाहर निकाला और गाली-गलौज के बीच मारपीट शुरू हो गई। उसी समय के फुटेज और चश्मदीदों के बयान बताते हैं कि मदन जोशी सबसे आगे की कतार में दिखा, भीड़ से लगातार बात करते रहे और ‘गौमाता’ के नाम पर भावनाओं को भड़काते रहे। जोशी की दलील यह रही कि वह तो भीड़ में पहुंचकर ड्राइवर को बचा रहा था। लेकिन पुलिस रिपोर्ट इस दावे को खारिज करती है। रिपोर्ट के मुताबिक सीसीटीवी कैमरों, मोबाइल वीडियो और मौके से मिले विजुअल्स के तकनीकी विश्लेषण में ऐसा कोई दृश्य नहीं मिला जिसमें वह ड्राइवर को हिंसा से बचाने की कोशिश करते दिखें। इसके उलट, कई फ्रेम ऐसे हैं जहां वह भीड़ के बीच खड़ा है लोगों से बातचीत कर रहा है और ड्राइवर को घेरने वाली भीड़ के ठीक नजदीक दिखाई देता है। पुलिस ने गवाहों के बयान भी दर्ज किए हैं, जिनमें कहा गया है कि ‘स्थानीय नेता’ भीड़ को शांत करने के बजाय ‘सवाल पूछने और उकसाने’ की मुद्रा में था।

इसी रिपोर्ट में दर्ज है कि घटना के तुरंत बाद दर्ज एफआईआर संख्या 389/2025 तथा नई आपराधिक संहिता बीएनएस के तहत जुड़े प्रकरणों में कुल 16 लोगों को आरोपी बनाया गया, जिनमें आरोपी नम्बर वन मदन जोशी को मुख्य आरोपी के रूप में दर्ज किया गया। उसके नाम के सामने लिखा गया है कि वह ‘मुख्य योजनाकार और संचालक’ की तरह काम कर रहा था, बिना किसी आधिकारिक पुष्टि के मांस को ‘गौमांस’ बताने वाली बातें फैला रहा था और धार्मिक भावनाओं का सहारा लेकर भीड़ को कानून हाथ में लेने के लिए प्रेरित कर रहा था। पुलिस ने उनके मोबाइल लोकेशन, सीडीआर, टावर डम्प और अन्य तकनीकी रिकाॅर्ड का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला कि घटना से ठीक पहले और बाद के अधिकांश समय वह भीड़ के साथ ही रहा। स्टेटस रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि जोशी की आवाजाही किसी संयोग का नतीजा नहीं बल्कि घटनाक्रम का हिस्सा थी। कभी वह बैलपड़ाव के मोड़ पर दिखाई दिया कभी छोई की तरफ जाते दिखा और फिर वही लोकेशन उस जगह से मैच होती है जहां वाहन रोका गया और ड्राइवर की पिटाई हुई। इस डिजिटल चेन को पुलिस ने अदालत के समक्ष सबसे मजबूत साक्ष्य के तौर पर पेश किया है। साथ ही रिपोर्ट यह भी बताती है कि सोशल मीडिया पर मदन जोशी के कुछ पोस्ट और प्रतिक्रियाएं, जिनमें धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाले हैशटैग और टिप्पणियां थीं, जांच का हिस्सा बनीं और इन्हें भी उकसावे की सामग्री माना गया।

इतना ही नहीं, पुलिस ने ‘एफआईआर के बाद मदन जोशी का आचरण’ शीर्षक के तहत यह भी दर्ज किया है कि एफआईआर दर्ज होने के बाद उसका रवैया एक सामान्य नागरिक की तरह नहीं बल्कि फरार अपराधी जैसा रहा। रिपोर्ट के अनुसार जैसे ही उसे एफआईआर की जानकारी मिली, उसका मोबाइल फोन तुरंत बंद हो गया, उसकी लोकेशन अचानक ट्रेस से बाहर चली गई और वह अपने नियमित घर-ठिकाने पर नजर नहीं आया। रामनगर और आस-पास के इलाकों में पुलिस ने उसके सम्भावित ठिकानों पर कई बार दबिश दी, पर वह नहीं मिला। इसके बाद उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया गया। यह सब तब हो रहा था जब वह खुद को ‘निर्दोष’ और ‘ड्राइवर को बचाने वाला’ नेता बताते हुए मीडिया में बयान दिलवा रहा था पुलिस उपाधीक्षक रामनगर ने अपने निष्कर्ष में साफ लिखा कि घटना साम्प्रदायिक रूप से अत्यंत संवेदनशील है, पीड़ित ड्राइवर की जान पर बनी थी और यदि ऐसे मामले में प्रमुख आरोपी को शुरुआती स्तर पर ही राहत मिल गई तो समाज में बेहद गलत संदेश जाएगा। इसलिए पुलिस ने अदालत से किसी भी प्रकार की ‘रियायत’ का विरोध किया और रिपोर्ट में यह भी जोड़ा कि जांच आगे भी जोशी की भूमिका के और पहलुओं को सामने लाएगी। ऐसी सख्त और तथ्य आधारित रिपोर्ट किसी भी सरकार के लिए अपने आप में ढाल का काम कर सकती थी लेकिन उत्तराखण्ड की सियासत में तस्वीर उलटी दिख रही है। हरिद्वार से सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इस पूरे प्रकरण पर धामी सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि ‘‘हिंदूवादी विचारधारा पर चलने वाली सरकार का कर्तव्य है कि वह हिंदू संगठनों और कार्यकर्ताओं की रक्षा करे, किसी को जेल भेजने से पहले सोचना चाहिए था।’’ यह बयान सीधे-सीधे नैनीताल पुलिस की जांच और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्णय पर प्रश्नचिह्न था।

त्रिवेंद्र रावत का यह रुख इसीलिए और चर्चा में है क्योंकि यह पहला अवसर नहीं जब उन्होंने धामी सरकार पर हमला बोला हो। कुछ समय पहले ही अवैध खनन के मुद्दे पर वे लोकसभा में अपनी ही पार्टी की राज्य सरकार के खिलाफ खड़े हो गए थे। उन्होंने सदन में कहा था कि उत्तराखण्ड में संगठित रूप से खनन माफिया सक्रिय हैं और ऊपर तक ‘संरक्षण’ प्राप्त है। बिना नाम लिए उनके निशाने पर धामी ही थे। उस समय भी यह संदेश गया था कि पूर्व मुख्यमंत्री अपने उत्तराधिकारी के कामकाज से संतुष्ट नहीं हैं। अब रामनगर जैसे संवेदनशील मामले में जहां पुलिस रिपोर्ट इतनी विस्तार से किसी नेता की भूमिका उजागर कर रही है, उसी नेता के बचाव में उतरकर त्रिवेंद्र ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी नाराजगी सिर्फ मुद्दों तक सीमित नहीं बल्कि राजनीतिक नेतृत्व की शैली से भी है।

इसी कड़ी में पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत का पुराना असंतोष भी जोड़ा जा रहा है। तीरथ कई मौकों पर सार्वजनिक मंचों पर यह कह चुके हैं कि ‘‘जमीनी कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं’’ और कई निर्णय ‘बिना पर्याप्त संवाद’ के लिए जा रहे हैं। वे बार-बार यह संकेत देते रहे हैं कि पार्टी के भीतर क्षेत्रीय संतुलन और वरिष्ठ-कनिष्ठ समीकरणों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। रामनगर की घटना पर भले उन्होंने अभी सीधी टिप्पणी न की हो, लेकिन संगठनात्मक बैठकों में उनका सुर अक्सर त्रिवेंद्र की लाइन के करीब दिखता है।
उधर मदन जोशी के सबसे बड़े राजनीतिक सहारा माने जाते हैं गढ़वाल से सांसद अनिल बलूनी जो राष्ट्रीय स्तर पर भी पार्टी के रणनीतिक चेहरों में गिने जाते हैं। भाजपा भीतर यह धारणा मजबूत है कि बलूनी और धामी के बीच कई मुद्दों पर दृष्टिभेद है, खासकर टिकट वितरण, संगठन संरचना और भविष्य की नेतृत्व योजना पर। ऐसे में मदन जोशी पर हुई कठोर कार्रवाई को बलूनी गुट, अंदरखाने ‘अपने लोगों पर निशाना’ मान रहा है। चर्चा है कि बलूनी जल्द ही जेल में जोशी से मुलाकात कर सकते हैं, यदि ऐसा होता है तो यह महज सहानुभूति नहीं बल्कि धामी के खिलाफ खुला राजनीतिक संदेश माना जाएगा।

यही कारण है कि धार्मिक उन्माद की घटनाएं अब सिर्फ आपराधिक केस नहीं लगती बल्कि भाजपा के भीतर बड़े पावर सेंटरों, धामी बनाम त्रिवेंद्र-तीरथ और बलूनी  के बीच वर्चस्व की जंग का मंच बन गई है। एक तरफ धामी हैं जो हाईकमान के ‘भरोसेमंद और युवा चेहरा’ कहे जाते हैं जो संदेश देना चाहते हैं कि कानून के मामले में कोई राजनीतिक रियायत नहीं होगी, चाहे आरोपी कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो। दूसरी ओर वे नेता हैं जो पहले से ही खुद को उपेक्षित महसूस करते रहे हैं और जिन्हें लगता है कि राज्य की राजनीति में उनका स्पेस लगातार घटाया जा रहा है। रामनगर और हल्द्वानी की घटनाओं ने एक और सम्भावना को जन्म दिया है कि आने वाले महीनों में भाजपा भीतर धामी के खिलाफ असंतोष और अधिक व्यवस्थित रूप ले सकता है। 2027 के विधानसभा चुनाव दूर नहीं हैं और उससे पहले संगठनात्मक फेरबदल, टिकट वितरण और नेतृत्व की भूमिका जैसे सवालों पर बहस तेज होनी ही है। त्रिवेंद्र का लोकसभा में अवैध खनन पर हमला, तीरथ की बीच-बीच में उभरती नाराजगी और अब मदन जोशी के बहाने बलूनी खेमे की बेचैनी, ये तीनों मिलकर इस आशंका को मजबूत करते हैं कि धामी को आगे लम्बी ‘इन-हाउस’ लड़ाई झेलनी पड़ सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी के पुराने नेता धामी के बढ़ते प्रभामंडल से अस्त-व्यस्त और त्रस्त हो चले हैं। चूंकि यह तय है कि धामी के नेतृत्व में ही पार्टी आगामी चुनाव लड़ेगी, ऐसे में इन नेताओं की हताशा उनके बयानों से झलकने लगी है। 
 
बात अपनी-अपनी

किसी भी घटना पर हर व्यक्ति का अपना-अपना दृष्टिकोण हो सकता है। किसी के हर बयान को
नकारात्मक दृष्टि से या सरकार के खिलाफ असंतोष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। मुख्यमंत्री जी हों या त्रिवेंद्र सिंह जी या तीरथ सिंह जी या फिर अनिल बलूनी जी सब एक ही लक्ष्य को लेकर चल रहे हैं कि 2027 में भाजपा की सरकार उत्तराखण्ड में बने।
महेंद्र भट्ट, प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखण्ड, भाजपा

जहां तक हल्द्वानी और रामनगर की घटनाओं का प्रश्न है, अपराधी को अपराधी की दृष्टि से ही देखा जाना चाहिए उसमें जाति, धर्म का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। भाजपा के अंतर्विरोधों की जहां तक बात है, भाजपा के अंदर कई घटक हैं जो अपना अस्तित्व बचाने की कोशिश में एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। जहां तक त्रिवेंद्र रावत जी के बयान ‘‘भाजपा के राज में हिंदूवादी नेताओं को जेल नहीं जाना चाहिए’’ के सम्बंध में मेरा कहना है कि अपराधी को धर्म के चश्मे से नहीं देखें और उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। भाजपा के अंदर सत्ता संघर्ष चल रहा है जो स्पष्ट रूप से दिखाई भी दे रहा है।
गणेश गोदियाल, प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखण्ड कांग्रेस


देखिए, इन मामलों का कोर्ट ने संज्ञान लिया था, सरकार की इसमें कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं है। कोर्ट ने एसएसपी नैनीताल को तलब भी किया था। हल्द्वानी वाले मामले में जिन पर आरोप लगे थे उनका घटना से पूर्व ही भाजपा से कोई सम्बन्ध नहीं है। रामनगर वाले प्रकरण पर हम भाजपा से सम्बंधित जो लोग हैं अपने स्तर से सहायता कर रहे हैं। इसकी निष्पक्ष जांच हो और न्याय हो।

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