Uttarakhand

भूलाए नहीं भूलता मार्च 2016/भाग-5

जब आप किसी ऐतिहासिक या महत्वपूर्ण घटना के साक्षी होते हैं तो भविष्य तथ्यात्मक विवरण की आपसे अपेक्षा करता है। मैं तो मार्च 2018 को घटित विश्वासघाती घटनाक्रम के साक्ष्य के साथ-साथ इस घटनाक्रम का एक ऐसा पात्र था, जिसको या जिसकी सरकार को लेकर एक ऐतिहासिक कूट रचना रचित की गई और उसका क्रियान्वयन किया गया। उत्तराखण्ड के संसदीय विकास यात्रा का यदि आने वाली पीढ़ी अध्ययन करना चाहेगी तो अपने अध्ययन के दौरान मार्च 2016 के पृष्ठों तक भी अवश्य पहुंचेगी। आने वाली पीढ़ियों तक उस घटनाक्रम का प्रत्येक उल्लेख करने लायक विवरण उन्हें उपलब्ध रहे, यह मेरा दायित्व है। उम्र के ढलते प्रहर में मैं अपनी स्मरण शक्ति के अनुसार सभी विवरण भविष्य के लिए वर्णित कर रहा हूं। इस कालखण्ड में घटित सभी प्रसंगों की याद आने पर मन कभी-कभी विक्षुद्ध हो जाता है। मेरा अधिकतम प्रयास है कि यथावत घटनाओं व उस समय अपनी समझ व प्रयासों का उल्लेख करूं।

  • हरीश रावत
    पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड

 

हमारी सरकार ने आपदा पुनर्वास और पुनर्निर्माण का काम रिकाॅर्ड समय में डेढ़ साल के अंदर पूरा किया और राज्य के विकास को आवश्यक गति प्रदान की। यह काम मेरे मंत्रिमंडल के सहयोगियों, विधायकों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ ही अधिकारियों-कर्मचारियों, सबके सामूहिक समर्पण से सम्भव हो पा रहा था। श्रीमती सोनिया जी व श्री राहुल जी का मार्गदर्शन और प्रेरणा, हमें हमेशा और अच्छा करने के लिए उत्साहित कर रही थी। हमारी सरकार ने वर्ष 2014 से निरंतर इस बात का प्रयास किया कि आपदा पुनर्वास और पुनर्निर्माण के साथ-साथ उत्तराखण्ड का विकास का एजेंडा राज्य आंदोलन की मूल भावना के साथ आगे बढ़े। हमने हिमाचल, सिक्किम और केरल आदि विकास माॅडलों का अध्ययन कर अपना एक उत्तराखण्डी विकास माॅडल खड़ा किया और उसके क्रियान्वयन पर सम्पूर्ण शक्ति लगाई। पूरी सरकार, सभी विभाग, एक लय और लक्ष्य के साथ काम कर रहे थे। 2016-17 का बजट जहां एक ओर इन विकास की आकांक्षाओं को आगे बढ़ने का माध्यम बनने जा रहा था। वहीं हम अगले 5 वर्षों के लिए भी एक विकास माॅडल को राज्य के लोगों के सम्मुख बजट के माध्यम से रख रहे थे। ऐसे समय में केंद्र सरकार और दलबदलुओं के षड्यंत्र से आगे बढ़ती उत्तराखण्डी विकास की गाड़ी पटरी से उतार दी गई। जबरा मारे रोने न दे की तर्ज पर समस्त प्रचार साधनों का प्रयोग कर मुझे ही खलनायक सिद्ध किया जाने लगा।

कुछ ऐसे कटु सत्य होते हैं जो सुनने में अच्छी नहीं लगते, मगर उनको सुने बिना हम कहां पर गलती कर गए उसका आकलन करना कठिन हो जाता है। हमारी सरकार को भंग करने तक जिस-जिस उपायों का उपयोग किया गया, वहीं आज भी थोड़े-बहुत संशोधनों, परिवर्तन और परिवर्धन के साथ विभिन्न राज्यों में वर्तमान भाजपा नेतृत्व द्वारा क्रियान्वित की जा रही है, हमारा राज्य उसकी शुरुआत थी। प्रदेश और देश की लोकतांत्रिक शक्तियों को जितनी गहराई से हमारे साथ घटित घटनाक्रम का विश्लेषण करना और उसका जवाब देने की योजना बनानी चाहिए थी वह नहीं बनाई गई। हम छोटे राज्य थे। यह माना गया कि जो कुछ वहां हो रहा है, वह गलत है। लेकिन उसको हमारे राज्य तक ही लोगों ने सीमित समझा। आज वही माॅडल व कार्य प्रणाली जब अन्य राज्यों में भी अपनाई जा रही है।

उत्तराखण्ड कांग्रेस ने अपने सामथ्र्य से ज्यादा तत्कालीन केंद्रीय सरकार की इस योजना का मुकाबला किया। यदि दल-बदल और राष्ट्रपति शासन पर आया न्यायिक निर्णय हमारे बाद हिमाचल, दिल्ली, कर्नाटका और न जाने कितनी और सरकारों जिन्हें उत्तराखण्ड के माॅडल पर अस्थिर किया जाता, उन्हें बचा लिया। बदलाव का सिलसिला कुछ समय के लिए उत्तराखण्ड की न्यायिक घटनाक्रम के बाद रूका। सफलता की एक के बाद एक सीढ़ियां चढ़ रही केंद्रीय सरकार के नेतृत्व को अपने कदम रोकने पड़े, राष्ट्रपति शासन के नोटिफिकेशन को वापस लेना तत्कालीन केंद्र सरकार की करारी हार थी। जीवन पर्यंत नियम, कानूनों तथा विधि विधान का पालन करने वाले उस समय महामहिम पद पर विराजमान व्यक्ति को भी अपनी पुस्तक में उत्तराखण्ड में राष्ट्रपति शासन लगाने के निर्णय का न चाहते हुए भी उल्लेख करना पड़ा और राजनीतिक विश्लेषक, संवैधानिक विश्लेषक हमेशा अपने मन में यह सवाल महामहिम से पूछते रहे कि आपके रहते ऐसा क्यों हुआ? दल-बदल को महा पाप और दल बदलुओं को महापापी कहना अपने आप में एक बहुत बड़ा न्यायिक आॅबजरवेशन है। आप कहीं भी जाते हैं कर्म आपका पीछा नहीं छोड़ता है। दल-बदल करने वाले लोग कितने ही बड़े पदों पर विराजमान हो जाएं जो कुछ न्यायपालिका ने कहा है वह उन पर हमेशा चिपका रहेगा और उनकी पीढ़ियों को भी उसका जवाब देना पड़ेगा। क्योंकि सार्वजनिक जीवन में कभी न कभी ऐसा मोड़ आता है जब प्रत्येक व्यक्ति को और कभी-कभी उसके बच्चों को भी उसके कर्मों का जवाब देना पड़ता है। मगर कुछ जवाब उत्तराखण्ड को भी देने पड़ेंगे और किन-किन बिंदुओं पर उत्तराखण्ड को सोचना पड़ेगा और जवाब देना पड़ेगा, इस पर मैं आगे चर्चा करूंगा।

स्वास्थ्य और सक्षम लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि वह स्वस्थ परम्पराओं पर खड़ा हो। 18 मार्च 2016 तक हमारा राज्य नवोदित होने के बावजूद स्वस्थ लोकतांत्रिक परम्पराएं स्थापित कर रहा था और मूल्यों को आगे बढ़ा रहा था। राजनीतिक दलों, राजनीतिक संस्थाओं, मीडिया स्वयंसेवी संगठनों सहित राज्य के सभी अवयव एक सही दिशा की ओर तेजी से आगे बढ़ रहे थे। 2013 की भंयकर प्राकृतिक आपदा के बाद जिस तरीके से राज्य ने अपने को व्यवस्थित किया-बर्बाद अर्थव्यवस्था पटरी पर आई, राज्य के विषय में लोगों की धारणा में भी बहुत बड़ा शुभ अंतर पैदा हुआ। हम एक परिपक्व और सक्षम लोकतांत्रिक संस्था के रूप में आगे बढ़ रहे थे। यह तथ्य है कि तत्कालीन भाजपानित केंद्र सरकार और उसके पार्टी नेतृत्व ने धन-बल व केंद्रीय सत्ता के बल पर तत्कालीन सत्तारूढ़ दल में दल-बदल कराया। जब उन्हें लगा कि दल-बदल से सरकार नहीं गिर रही है, बल्कि उल्टा दल-बदलू सदस्यों के ऊपर सदस्यता खोने का खतरा मंडरा गया है तो एक केंद्रीय सत्ता प्रायोजित स्टिंग के माध्यम से आनन-फानन में राज्य की निर्वाचित सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन राज्य पर थोप दिया गया। राष्ट्रपति शासन थोपने का निर्णय उस समय लिया गया जब माननीय राज्यपाल, मुख्यमंत्री को विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने का आदेश दे चुके थे और बहुमत के परीक्षण की तिथि निर्धारित की जा चुकी थी और विधानसभा अध्यक्ष द्वारा विधानसभा सदस्यों को विधानसभा की बैठक हेतु आमंत्रण पत्र भेजे जा चुके थे। संविधान विशेषज्ञ व न्याय प्रणाली से जुड़े हुए लोग इस समस्त घटनाक्रम पर हतप्रद्ध थे। यह लोकतंत्र व संवैधानिक प्रणाली पर हमला था। हमारी सरकार और मुझे, इस दौरान किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा, मैं उन चुनौतियों को भी आपके साथ साझा करना चाहूंगा। जो कुछ 18 मार्च 2016 को विधानसभा में और उसके बाद राज्य में घटित हुआ, वह केवल कांग्रेस या हरीश रावत का प्रश्न नहीं है, यह समस्त उत्तराखण्ड राज्य की लोकतांत्रिक और संवैधानिक परम्पराओं का भी प्रश्न है, यह हमारे संस्कारों का भी प्रश्न है, यह उत्तराखण्डियत का भी प्रश्न है, हमारे विकास से जुड़ा हुआ प्रश्न है, इसके साथ हमारे कल का भविष्य भी जुड़ा हुआ है। मैं आपसे आग्रह करता हूं कि मेरे इस समस्त कथानक के साथ आप अपने को जोड़ें, उस पर मनन करें और अपनी सोच लोगों के साथ साझा करें।

जब आप किसी ऐतिहासिक या महत्वपूर्ण घटना के साक्षी होते हैं तो भविष्य तथ्यात्मक विवरण की आपसे अपेक्षा करता है। मैं तो मार्च 2018 को घटित विश्वासघाती घटनाक्रम के साक्ष्य के साथ-साथ इस घटनाक्रम का एक ऐसा पात्र था, जिसको या जिसकी सरकार को लेकर एक ऐतिहासिक कूट रचना रचित की गई और उसका क्रियान्वयन किया गया। उत्तराखण्ड के संसदीय विकास यात्रा का यदि आने वाली पीढ़ी अध्ययन करना चाहेगी तो अपने अध्ययन के दौरान मार्च 2016 के पृष्ठों तक भी अवश्य पहुंचेगी। आने वाली पीढ़ियों तक उस घटनाक्रम का प्रत्येक उल्लेख करने लायक विवरण उन्हें उपलब्ध रहे, यह मेरा दायित्व है। उम्र के ढलते प्रहर में मैं अपनी स्मरण शक्ति के अनुसार सभी विवरण भविष्य के लिए वर्णित कर रहा हूं। इस कालखण्ड में घटित सभी प्रसंगों की याद आने पर मन कभी-कभी विक्षुद्ध हो जाता है। मेरा अधिकतम प्रयास है कि यथावत घटनाओं व उस समय अपनी समझ व प्रयासों का उल्लेख करूं।

दल-बदल के महापाप का प्रयास 18 मार्च, 2016 में ही नहीं हुआ बल्कि इससे पहले जब हमने गैरसैंण में दूसरा विधानसभा सत्र पाॅलिटेक्निक काॅलेज में किया था, उस समय भी करने का प्रयास हुआ। उस समय मुझे यह सूचना मिली थी और यह सूचना मुझे तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा दी गई थी कि सरकार गिराने का प्रयास शुरू हो चुका है, मगर संख्या बल नहीं जुट पा रहा है। मैंने इस सूचना के बाद विधायकों से सम्पर्क और बढ़ा दिया। कांग्रेस और भाजपा, दो अलग-अलग राजनीतिक संस्कृतियां हैं इसका एक बड़ा उदाहरण उत्तराखण्ड की विधानसभा में मार्च 2016 में 17 व 18 मार्च को घटित घटनाक्रम के दौरान समझने को मिला। भारतीय जनता पार्टी का विधान मंडल दल बजट सत्र के दौरान अत्यधिक आक्रामक था। 17 मार्च को लगातार सदन की कार्यवाही में व्यवधान पैदा किया जा रहा था। माननीय स्पीकर और माननीय संसदीय कार्य मंत्री की सोच है। भारतीय जनता पार्टी का विधान मंडल दल बजट सत्र के दौरान अत्यधिक आक्रामक था। 17 मार्च को लगातार सदन की कार्रवाई में व्यवधान पैदा किया जा रहा था। नेता प्रतिपक्ष के नेतृत्व में समस्त भाजपा विधायक वेल में आकर नारेबाजी के साथ-साथ स्पीकर के ऊपर कागज फेंक रहे थे, रूल्स आदि के सम्बंध में पटल पर उपलब्ध पुस्तकों को खतरनाक अंदाज में स्पीकर के ऊपर फेंक रहे थे। सचिव और उनके सहयोगियों की टेबल उलट दी गई थी, माइक को उखाड़ कर खतरनाक तरीके से लहराया जा रहा था। सदन के स्थगन काल के दौरान मैं और माननीय संसदीय कार्य मंत्री श्रीमती इंदिरा हृदयेश, माननीय स्पीकर महोदय के कक्ष में उनके पास गए और हमने सदन की स्थिति पर उनसे विमर्श किया। मैंने एक सुझाव दिया कि क्यों नहीं हम आठ-दस उग्र विधायकों को सदन से कुछ दिनों के लिए निलंबित कर दें। स्पीकर महोदय और श्रीमती इंदिरा हृदयेश जी ने मेरे सुझाव पर असहमति जाहिर की और कहा कि हमें यह परंपरा नहीं डालनी चाहिए। ऐसा कदम उठाना उचित नहीं होगा। कांग्रेस हमेशा मध्य मार्ग की बात करती है। हम अपने विरोधी के प्रति भी कोई कार्रवाई करने में (एक्सट्रीम) पर नहीं जाते हैं, हम मध्यमार्ग तलाशते हैं।

जब भी उत्तराखण्ड के राजनीतिक इतिहास में मार्च 2016 के विधानसभा सत्र और फिर उसके बाद राज्य में घटित घटनाक्रम का जिक्र आएगा तो शक्तिमान घोड़े का उल्लेख भी निश्चय ही प्रमुखता से होगा। शक्तिमान राज्य का गौरव बढ़ाने वाला घोड़ा था। राज्य की गौरव गाथा की चमक को और चमकदार बनाता था, शानदार पुलिसकर्मी था। वह उत्तराखण्ड पुलिस की शान था। न जाने कितने महामहिम राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों को उस घोड़े ने अपने सवार पुलिस कप्तान के साथ सलामी देने का काम किया था। हर बार पुलिस के लोग मुझे बताते थे कि ऐसा अवसर आने पर शक्तिमान एक-दो दिन पहले से ही अपने आप को स्वयं तैयार करना प्रारंभ कर देता था। जानवर होते हुए भी शक्तिमान उस अवसर के महत्व को समझता था।

क्रमशः
(यह लेखक के अपने विचार हैं।)

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