महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा राजनीतिक भूचाल आया है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के 9 लोकसभा सांसदों में से 6 सांसदों के एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना में शामिल होने से उद्धव ठाकरे को 2022 के बाद सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है। 40 विधायकों की बगावत से शुरू हुआ संकट अब सांसदों तक पहुंच गया है। राजनीतिक हलकों में इसे ‘ऑपरेशन टाइगर’ का नया चरण बताया जा रहा है। इस घटनाक्रम ने न केवल महाराष्ट्र की राजनीति बल्कि पूरे विपक्षी खेमे में बेचैनी बढ़ा दी है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या क्षेत्रीय दलों की राजनीति लगातार कमजोर हो रही है और क्या विपक्ष अपने नेताओं को एकजुट रखने में असफल साबित हो रहा है?

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर वही सवाल गूंज रहा है जो जून 2022 में पहली बार उठा था कि असल शिवसेना किसकी है? बालासाहेब ठाकरे की विरासत का वास्तविक उत्तराधिकारी कौन है? क्या उद्धव ठाकरे अपनी पार्टी को लगातार हो रही टूट से बचा पाएंगे? इन सवालों की वजह बना है शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के छह लोकसभा सांसदों का एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना की ओर जाना। राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल सांसदों के दल-बदल के रूप में नहीं बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति में जारी शक्ति-संघर्ष का नया अध्याय मान रहे हैं।

कभी महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना का नाम ही संगठनात्मक अनुशासन और नेतृत्व के प्रति निष्ठा का पर्याय माना जाता था। बालासाहेब ठाकरे के दौर में पार्टी में बगावत की कल्पना तक मुश्किल थी लेकिन
बालासाहेब के निधन के बाद धीरे-धीरे पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष बढ़ता गया। 2019 के विधानसभा चुनावों के बाद यह असंतोष और गहरा हो गया जब भाजपा और शिवसेना के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर टकराव सामने आया। दशकों पुराना भाजपा-शिवसेना गठबंधन टूट गया और उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर महाविकास अघाड़ी सरकार बना ली।
यह फैसला महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा वैचारिक मोड़ था। शिवसेना, जिसने अपना अधिकांश राजनीतिक जीवन कांग्रेस विरोध और हिंदुत्व की राजनीति के आधार पर खड़ा किया था, अचानक कांग्रेस के साथ सत्ता में आ गई। पार्टी के भीतर कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को यह फैसला रास नहीं आया। हालांकि उस समय किसी ने खुलकर विरोध नहीं किया लेकिन असंतोष धीरे-धीरे भीतर ही भीतर बढ़ता रहा।
इस असंतोष का विस्फोट जून 2022 में हुआ जब एकनाथ शिंदे ने बगावत का झंडा उठा लिया। उस समय शिवसेना के 55 विधायकों में से 40 विधायक उनके साथ चले गए। महाराष्ट्र की राजनीति में यह अभूतपूर्व घटना थी। देखते ही देखते उद्धव ठाकरे सरकार अल्पमत में आ गई और उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद एकनाथ शिंदे भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बने और महाराष्ट्र की राजनीति का पूरा समीकरण बदल गया।
बगावत केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रही। धीरे-धीरे पार्टी संगठन, सांसदों और स्थानीय नेताओं का बड़ा हिस्सा भी शिंदे के साथ जाने लगा। इसके बाद मामला चुनाव आयोग और अदालतों तक पहुंचा। फरवरी 2023 में चुनाव आयोग ने फैसला सुनाते हुए ‘शिवसेना’ नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिन्ह एकनाथ शिंदे गुट को सौंप दिया। यह उद्धव ठाकरे के लिए बड़ा झटका था। उन्हें नई पार्टी के रूप में ‘शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे)’ नाम और ‘मशाल’ चुनाव चिन्ह के साथ राजनीतिक लड़ाई लड़नी पड़ी।
इसके बावजूद उद्धव ठाकरे ने हार नहीं मानी। उन्होंने पूरे महाराष्ट्र का दौरा किया, खुद को बालासाहेब की विरासत का असली उत्तराधिकारी बताया और भाजपा पर शिवसेना को तोड़ने का आरोप लगाया। लोकसभा चुनाव में महाविकास अघाड़ी ने अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया। इससे यह धारणा बनी कि तमाम झटकों के बावजूद उद्धव ठाकरे की राजनीतिक प्रासंगिकता बनी हुई है और जनता का एक बड़ा वर्ग उनके साथ खड़ा है।
यही कारण है कि छह सांसदों का शिंदे खेमे में जाना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक दृष्टि से सांसदों का महत्व केवल संसद तक सीमित नहीं होता। सांसद किसी भी दल के राष्ट्रीय चेहरे होते हैं। वे संसदीय रणनीति, राजनीतिक संदेश और संगठनात्मक प्रभाव का प्रतिनिधित्व करते हैं। यदि नौ में से छह सांसद दूसरी ओर चले जाते हैं तो यह केवल संख्या का नुकसान नहीं बल्कि राजनीतिक प्रतिष्ठा पर भी आघात होता है।
राजनीतिक गलियारों में इस पूरी प्रक्रिया को ‘ऑपरेशन टाइगर’ कहा जा रहा है। महाराष्ट्र में पिछले कुछ वर्षों से यह शब्द उन राजनीतिक अभियानों के लिए इस्तेमाल होता रहा है जिनके जरिए विपक्षी दलों के नेताओं को सत्ता पक्ष की ओर आकर्षित किया जाता है। भाजपा और उसके सहयोगी दलों पर विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि वे राजनीतिक दबाव, सत्ता के प्रभाव और भविष्य की संभावनाओं का इस्तेमाल कर विपक्षी दलों को कमजोर कर रहे हैं। हालांकि भाजपा इन आरोपों को खारिज करती रही है और कहती है कि विपक्षी दलों के नेता अपनी इच्छा से उनके साथ आते हैं क्योंकि उन्हें अपने पुराने दलों में भविष्य दिखाई नहीं देता।
जो भी हो, इतना स्पष्ट है कि महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन के बाद से राजनीतिक पलायन की प्रक्रिया रुकी नहीं है। पहले विधायक गए, फिर स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि गए, फिर संगठन के नेता गए और अब सांसदों का एक बड़ा समूह भी शिंदे के साथ चला गया है। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उद्धव ठाकरे अपने संगठन पर नियंत्रण बनाए रखने में सफल हो पा रहे हैं?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। पहला कारण सत्ता का आकर्षण है। भारतीय राजनीति में सत्ता हमेशा सबसे बड़ा चुम्बक रही है। जनप्रतिनिधि अक्सर उस पक्ष के साथ रहना पसंद करते हैं जिसे वे अधिक प्रभावशाली और स्थिर मानते हैं। महाराष्ट्र में शिंदे गुट सत्ता का हिस्सा है और भाजपा का समर्थन भी उसे प्राप्त है। ऐसे में कई नेताओं को लग सकता है कि राजनीतिक भविष्य की दृष्टि से वहां अधिक अवसर हैं।
दूसरा कारण वैचारिक असमंजस है। शिवसेना की राजनीति लम्बे समय तक हिंदुत्व और मराठी अस्मिता पर आधारित रही। कांग्रेस के साथ गठबंधन को पार्टी का एक वर्ग आज भी सहजता से स्वीकार नहीं कर पाया है। शिंदे ने इसी भावना को अपनी राजनीति का आधार बनाया और दावा किया कि वे बालासाहेब ठाकरे की मूल विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह तर्क पार्टी के भीतर प्रभावशाली साबित हुआ।
तीसरा कारण नेतृत्व का प्रश्न है। बालासाहेब ठाकरे करिश्माई नेता थे जिनके सामने संगठन में शायद ही कोई चुनौती खड़ी होती थी। उद्धव ठाकरे का नेतृत्व शैली में अलग व्यक्तित्व रहा है। वे अपेक्षाकृत शांत और प्रशासनिक दृष्टिकोण वाले नेता माने जाते हैं। कुछ नेताओं का मानना है कि संगठन में संवाद की कमी और निर्णय प्रक्रिया का केंद्रीकरण भी असंतोष का कारण बना।
इस पूरे घटनाक्रम का असर केवल शिवसेना तक सीमित नहीं है। इसका सीधा प्रभाव महाविकास अघाड़ी पर पड़ेगा। कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) का गठबंधन महाराष्ट्र में भाजपा के खिलाफ सबसे बड़ा विपक्षी मंच है। यदि गठबंधन का एक प्रमुख घटक लगातार कमजोर होता है तो पूरे गठबंधन की राजनीतिक ताकत प्रभावित होगी। सीट बंटवारे से लेकर चुनावी रणनीति तक सभी मामलों में इसका असर दिखाई दे सकता है।
दरअसल महाराष्ट्र पिछले कुछ वर्षों से राजनीतिक अस्थिरता का केंद्र बना हुआ है। पहले शिवसेना टूटी, फिर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में विभाजन हुआ जब अजित पवार अपने समर्थक विधायकों के साथ अलग हो गए। अब शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों का पलायन विपक्षी राजनीति की कमजोरी को और उजागर करता है। भाजपा विरोधी दल लम्बे समय से यह आरोप लगाते रहे हैं कि केंद्रीय एजेंसियों और सत्ता के प्रभाव का उपयोग कर विपक्षी नेताओं को तोड़ा जा रहा है। वहीं भाजपा का कहना है कि विपक्षी दलों के भीतर नेतृत्व संकट और अवसरवाद के कारण ये घटनाएं हो रही हैं।
राष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ वर्षों में विपक्ष ने कई बार एकजुट होकर भाजपा को चुनौती देने की कोशिश की है लेकिन लगभग हर राज्य में किसी न किसी रूप में टूट, बगावत या नेतृत्व संघर्ष सामने आया है। बिहार में राजनीतिक गठबंधनों का बार-बार बदलना, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष की चर्चाएं, पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस की प्रतिस्पर्धा तथा महाराष्ट्र में लगातार हो रहे विभाजन विपक्ष की कमजोरियों को सामने लाते हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का भविष्य अब उनके संगठनात्मक ढांचे पर निर्भर करेगा। करिश्माई नेतृत्व के भरोसे लम्बे समय तक राजनीति चलाना कठिन होता जा रहा है। यदि संगठन मजबूत नहीं होगा तो सत्ता परिवर्तन के साथ नेताओं का पलायन बढ़ता रहेगा। शिवसेना का मौजूदा संकट इसी व्यापक राजनीतिक प्रवृत्ति का उदाहरण है।
उद्धव ठाकरे के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने की है। राजनीतिक दल केवल नेताओं और सांसदों के सहारे नहीं चलते। उनकी वास्तविक ताकत जमीनी कार्यकर्ताओं में होती है। यदि कार्यकर्ताओं को यह विश्वास बना रहता है कि नेतृत्व संघर्ष कर रहा है और वापसी कर सकता है तो संगठन कठिन परिस्थितियों में भी टिक जाता है लेकिन यदि कार्यकर्ताओं का विश्वास डगमगा जाए तो टूट का सिलसिला और तेज हो सकता है।
दूसरी ओर एकनाथ शिंदे के लिए यह घटनाक्रम बड़ी राजनीतिक उपलब्धि है। 2022 की बगावत के समय उनके आलोचक कहते थे कि उनके पास विधायक तो हैं लेकिन भावनात्मक समर्थन उद्धव ठाकरे के साथ है। अब सांसदों का बड़ा समूह भी उनके साथ है तो वे यह दावा और मजबूती से कर सकेंगे कि महाराष्ट्र में वास्तविक राजनीतिक शक्ति उन्हीं के पास है।
भाजपा भी इस घटनाक्रम को ध्यान से देख रही होगी। महाराष्ट्र देश का दूसरा सबसे बड़ा राजनीतिक और आर्थिक राज्य है। यहां की राजनीति का राष्ट्रीय प्रभाव पड़ता है। विपक्षी खेमे की कमजोरी भाजपा के लिए स्वाभाविक रूप से लाभकारी है। यही कारण है कि महाराष्ट्र की हर राजनीतिक हलचल राष्ट्रीय राजनीति में भी चर्चा का विषय बन जाती है।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि जून 2022 में 40 विधायकों की बगावत से शुरू हुआ संकट अभी समाप्त नहीं हुआ है बल्कि अब यह नए रूप में सामने आ रहा है। छह सांसदों का शिंदे खेमे में जाना बताता है कि शिवसेना के भीतर वर्चस्व की लड़ाई अभी जारी है। आने वाले महीनों में यह संघर्ष और तेज हो सकता है। महाराष्ट्र की राजनीति में यह केवल दो नेताओं की लड़ाई नहीं रह गई है बल्कि यह विरासत, विचारधारा, संगठन और
राजनीतिक भविष्य की लड़ाई बन चुकी है। यही कारण है कि इस घटनाक्रम को केवल एक दल-बदल की घटना नहीं बल्कि महाराष्ट्र की बदलती राजनीतिक संरचना के महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले समय में यह तय होगा कि उद्धव ठाकरे इस संकट से उबरकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत कर पाते हैं या फिर ‘ऑपरेशन टाइगर’ का यह नया अध्याय महाराष्ट्र की राजनीति में शक्ति संतुलन को स्थायी रूप से बदल देता है।

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