Editorial

नारी शक्ति के दावों की कसौटी पर भारत

‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।’’

मनुस्मृति (अध्याय 3, श्लोक 56) का यह प्रसिद्ध श्लोक भारतीय संस्कृति में नारी के स्थान को रेखांकित करता है। इसका अर्थ है कि जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहां देवताओं का वास होता है और जहां उनका सम्मान नहीं होता, वहां सभी शुभ कर्म निष्फल हो जाते हैं। भारतीय सभ्यता ने नारी को केवल परिवार की धुरी नहीं माना बल्कि उसे शक्ति, ज्ञान और समृद्धि का स्वरूप माना। दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी के रूप में स्त्री की आराधना की गई लेकिन भारतीय मिथकों और धर्मग्रंथों में एक दूसरा पक्ष भी मौजूद है, जो इस आदर्श को चुनौती देता है।

देवराज इंद्र, जिन्हें स्वर्ग का राजा और देवताओं का अधिपति माना गया, उनसे जुड़ा अहिल्या प्रसंग सदियों से बहस का विषय रहा है। वाल्मीकि रामायण के बालकांड में वर्णित कथा के अनुसार इंद्र ने ऋषि गौतम का रूप धारण कर उनकी पत्नी अहिल्या के साथ शारीरिक सम्बंध स्थापित किए। अनेक आधुनिक विद्वान और स्त्रीवादी व्याख्याकार इस प्रसंग को छल, स्त्री की सहमति और यौन शोषण के प्रश्न से जोड़कर देखते हैं। यह विडम्बना कम नहीं कि जिस परम्परा ने ‘जहां नारी की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं’ का आदर्श दिया, उसी परम्परा के सबसे शक्तिशाली देवता से जुड़ा यह प्रसंग आज भी नैतिक प्रश्नों के घेरे में है। शायद यही कारण है कि भारतीय समाज में नारी के सम्मान का आदर्श और उसके साथ होने वाले व्यवहार का विरोधाभास कोई नया नहीं बल्कि हजारों वर्षों पुराना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शासनकाल में जिन शब्दों का सबसे अधिक प्रयोग किया है, उनमें ‘नारी शक्ति’ प्रमुख है। लाल किले की प्राचीर से लेकर संसद और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक महिलाओं को भारत के विकास की धुरी बताया गया। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’, ‘उज्ज्वला योजना’, ‘सुकन्या समृद्धि योजना’, ‘लखपति दीदी’, ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ और महिला-नेतृत्व वाले विकास की अवधारणा को नई राजनीति का प्रतीक बताया गया। सरकार का दावा है कि भारत में महिलाओं की स्थिति पहले से कहीं बेहतर हुई है और देश महिला सशक्तिकरण के एक नए युग में प्रवेश कर चुका है।

किसी भी लोकतंत्र में दावों की नहीं, तथ्यों की परीक्षा होती है। किसी भी सरकार का मूल्यांकन उसके भाषणों से नहीं बल्कि उसके परिणामों से किया जाता है। इसलिए जब हम नारी शक्ति के दावों की वास्तविकता को परखते हैं तो कई ऐसे प्रश्न सामने आते हैं जिनका उत्तर केवल विज्ञापनों, नारों और अभियानों से नहीं दिया जा सकता। किसी भी राष्ट्र की प्रगति का सबसे बड़ा पैमाना यह नहीं होता कि उसकी अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी है, उसके पास कितनी सैन्य शक्ति है या वह कितने उपग्रह अंतरिक्ष में भेज सकता है। किसी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति इस बात से मापी जाती है कि उसकी महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं, उन्हें कितना सम्मान प्राप्त है और उनके अधिकार कितने संरक्षित हैं। यदि आधी आबादी भय, हिंसा, भेदभाव और न्याय की अनिश्चितता से जूझ रही हो तो विकास के सारे दावे अधूरे रह जाते हैं।

सरकार चाहे जितने दावे करे, दुनिया भारत को महिलाओं की स्थिति के आधार पर भी परखती है। जाॅर्जटाउन यूनिवर्सिटी और ओस्लो स्थित संस्थाओं द्वारा जारी Women, Peace and Security Index में भारत का स्थान उन देशों की अपेक्षा काफी नीचे रहा है जिनकी अर्थव्यवस्था और वैश्विक हैसियत भारत से कहीं छोटी है। इसी प्रकार विश्व आर्थिक मंच की Global Gender Gap Report में भी भारत लगातार निचले देशों में शामिल रहा है। यह स्थिति उस समय और अधिक चिंताजनक हो जाती है जब एक ओर सरकार ‘महिला -नेतृत्व वाले विकास’ की बात करती है और दूसरी तरफ वैश्विक सूचकांक बताते हैं कि महिलाओं की समानता, सुरक्षा और अवसरों के क्षेत्र में अभी लम्बा सफर तय करना बाकी है।

महिलाओं की सुरक्षा के प्रश्न पर भारत की तस्वीर और भी गम्भीर दिखाई देती है। राष्ट्रीय अपराध रिकाॅर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या लगातार ऊंची बनी हुई है। हर वर्ष लाखों मामले दर्ज होते हैं। दहेज हत्या, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, बलात्कार, मानव तस्करी और साइबर अपराध जैसी घटनाएं व्यापक स्तर पर मौजूद हैं लेकिन इन आंकड़ों से भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि दर्ज होने वाले मामले
वास्तविक घटनाओं का केवल एक हिस्सा होते हैं। सामाजिक दबाव, पुलिस का रवैया और न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता के कारण अनेक महिलाएं शिकायत दर्ज ही नहीं करा पातीं।

सवाल केवल अपराधों का नहीं है। सवाल न्याय व्यवस्था में विश्वास का भी है। जब महिलाओं को लगता है कि न्याय पाने के लिए उन्हें वर्षों तक संघर्ष करना पड़ेगा, तब कानून का भय कम और निराशा अधिक पैदा होती है। दुर्भाग्य से हाल के वर्षों में कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं जिन्होंने इस विश्वास को और कमजोर किया है।

बिलकिस बानो का मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और उनके परिवार के कई सदस्यों की हत्या कर दी गई। लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद दोषियों को सजा मिली लेकिन अगस्त 2022 में जब उन दोषियों को रिहा किया गया और कुछ स्थानों पर उनका स्वागत किया गया, तब पूरे देश में आक्रोश फैल गया। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने इस रिहाई को निरस्त कर दिया लेकिन तब तक यह घटना महिलाओं के न्यायबोध को गहरा आघात पहुंचा चुकी थी। इसी प्रकार स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम बापू का मामला भी अनेक सवाल खड़े करता है। बलात्कार के मामलों में दोषी ठहराए जाने के बावजूद उन्हें समय-समय पर राहत और पैरोल मिलती रही है। धार्मिक आयोजनों और सार्वजनिक गतिविधियों से जुड़ी खबरें भी सामने आती रहीं। समर्थक इसे कानूनी अधिकार बताते हैं लेकिन महिलाओं के अधिकारों के दृष्टिकोण से यह प्रश्न बना रहता है कि इससे समाज को क्या संदेश जाता है?
गुरमीत राम रहीम का मामला भी इसी बहस का हिस्सा है। बलात्कार और हत्या जैसे गम्भीर अपराधों में दोषी ठहराए जाने के बावजूद उन्हें बार-बार पैरोल मिलने पर विवाद होता रहा है। हर बार यह सवाल उठता है कि क्या प्रभावशाली व्यक्तियों के लिए न्याय के मानदंड अलग हैं? क्या पीड़िताओं की भावनाओं और न्याय की
नैतिकता का पर्याप्त ध्यान रखा जाता है?

यदि किसी एक घटना ने सरकार के ‘नारी शक्ति’ विमर्श की सबसे कठिन परीक्षा ली तो वह महिला पहलवानों का आंदोलन था। देश के लिए ओलम्पिक और विश्व स्तर पर पदक जीतने वाली महिला खिलाड़ियों ने भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष और भाजपा सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह पर यौन उत्पीड़न के गम्भीर आरोप लगाए। देश उम्मीद कर रहा था कि इन खिलाड़ियों की बात गम्भीरता से सुनी जाएगी लेकिन इसके बजाय देश ने यह दृश्य देखा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का गौरव बढ़ाने वाली बेटियां दिल्ली की सड़कों पर धरना देने को मजबूर थीं। पुलिस कार्रवाई, हिरासत और लम्बे संघर्ष ने यह प्रश्न खड़ा किया कि यदि देश की सबसे चर्चित और सम्मानित महिला खिलाड़ी भी न्याय के लिए संघर्ष करने को विवश हैं तो आम महिलाओं की स्थिति कैसी होगी?

उन्नाव बलात्कार कांड ने भी सत्ता और न्याय के सम्बंधों पर गम्भीर प्रश्न खड़े किए। प्रभावशाली राजनीतिक संरक्षण, पीड़िता के परिवार पर दबाव और न्याय पाने के संघर्ष ने दिखाया कि भारत में केवल कानून होना पर्याप्त नहीं है। कानून का निष्पक्ष और निर्भीक क्रियान्वयन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।

हाथरस की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। पीड़िता की मृत्यु के बाद रातों-रात अंतिम संस्कार कराए जाने को लेकर उठे विवादों ने प्रशासनिक संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न लगा दिए। सरकार और प्रशासन ने अपने पक्ष में तर्क दिए लेकिन इस घटना ने यह अवश्य दिखाया कि महिलाओं से जुड़े मामलों में राज्य की
भूमिका केवल जांच तक सीमित नहीं होती, उसे संवेदनशील और विश्वसनीय भी दिखना पड़ता है।

मणिपुर की भयावह घटना को भुलाया नहीं जा सकता जिसमें महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाने का वीडियो सामने आया था। यह केवल एक आपराधिक घटना नहीं थी बल्कि शासन, कानून व्यवस्था और सामाजिक विफलता का प्रतीक थी। जब किसी समाज में महिलाओं के शरीर को सामुदायिक हिंसा के हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाने लगे तो यह लोकतंत्र के लिए गम्भीर चेतावनी होती है। इन सभी उदाहरणों को देखते हुए एक प्रश्न बार-बार सामने आता है कि क्या महिलाओं का सम्मान केवल राजनीतिक नारा बनकर रह गया है? क्या ‘नारी शक्ति’ केवल चुनावी भाषणों में अधिक दिखाई देती है और वास्तविक नीतिगत प्राथमिकताओं में कम? महिलाओं के अधिकारों के प्रश्न पर भारतीय राजनीति का एक और विरोधाभास सामने आता है। लगभग सभी राजनीतिक दल महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान की बात करते हैं लेकिन जब किसी प्रभावशाली नेता, सांसद, विधायक या धार्मिक व्यक्तित्व पर गम्भीर आरोप लगते हैं तो अक्सर राजनीतिक निष्ठाएं नैतिकता पर भारी पड़ जाती हैं।

आरोपी यदि विरोधी दल का हो तो कठोर कार्रवाई की मांग उठती है लेकिन यदि मामला अपने दल या अपने समर्थक समूह से जुड़ा हो तो वही राजनीतिक दल रक्षात्मक मुद्रा में दिखाई देता है। यह प्रवृत्ति किसी एक दल तक सीमित नहीं है। लगभग पूरे राजनीतिक वर्ग पर यह आरोप लगता रहा है। इससे महिलाओं को यह संदेश जाता है कि न्याय का पैमाना कई बार अपराध की गम्भीरता नहीं बल्कि आरोपी की राजनीतिक उपयोगिता तय करती है। यह भी सच है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा केवल वर्तमान सरकार के समय की समस्या नहीं है। ‘निर्भया कांड’, ‘भंवरी देवी मामला’, ‘शाहबानो विवाद’ और अनेक अन्य घटनाएं पहले भी हुई हैं लेकिन वर्तमान सरकार से अपेक्षाएं इसलिए अधिक हैं क्योंकि उसने स्वयं महिलाओं के सम्मान और सशक्तिकरण को अपने राजनीतिक दर्शन का केंद्रीय तत्व बनाया है। जब दावे बड़े होते हैं तो जवाबदेही भी बड़ी होती है।

यह भी कटु सत्य है कि समस्या केवल सरकार की नहीं है। समाज भी उतना ही जिम्मेदार है। दहेज, पितृसत्ता, स्त्री की स्वतंत्रता पर नियंत्रण, लैंगिक भेदभाव और महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक मानने वाली मानसिकता आज भी व्यापक है। डाॅ. भीमराव अम्बेडकर ने कहा था कि किसी समाज की प्रगति का आकलन इस बात से किया जाना चाहिए कि वहां की महिलाओं ने कितनी प्रगति की है। यह कथन केवल सामाजिक सुधार का सिद्धांत नहीं बल्कि लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी भी है। यदि इस कसौटी पर भारत को परखा जाए तो उपलब्धियों के साथ-साथ अनेक ऐसे प्रश्न भी सामने आते हैं जिनका उत्तर अभी बाकी है।

भारत विश्वगुरु बनने का सपना देखता है लेकिन कोई भी राष्ट्र तब तक विश्वगुरु नहीं बन सकता जब तक उसकी आधी आबादी पूर्ण सम्मान, सुरक्षा और समान अवसरों के साथ जीवन न जी सके। आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और वैश्विक प्रतिष्ठा महत्वपूर्ण हैं लेकिन किसी भी राष्ट्र की नैतिक शक्ति उसकी महिलाओं की स्थिति से मापी जाती है। आज आवश्यकता नए नारों की नहीं बल्कि पुराने वादों को पूरा करने की है। आवश्यकता इस बात की है कि नारी शक्ति को राजनीतिक ब्रांडिंग से निकालकर संवैधानिक प्रतिबद्धता बनाया जाए। महिलाओं के अधिकारों को चुनावी मुद्दा नहीं राष्ट्रीय प्राथमिकता माना जाए। न्याय को राजनीतिक सुविधा से मुक्त किया जाए। महिलाओं की सुरक्षा को सरकार की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना बनाया जाए।

जिस दिन भारत की हर महिला बिना भय, बिना भेदभाव और बिना अपमान के जीवन जी सकेगी, उसी दिन ‘नारी शक्ति’ का नारा एक राजनीतिक घोषणा नहीं बल्कि राष्ट्रीय वास्तविकता बन जाएगा। उससे पहले तक यह प्रश्न बना रहेगा कि क्या हम सचमुच महिलाओं का सम्मान कर रहे हैं या केवल उनके नाम पर राजनीति कर रहे हैं। यही वह कसौटी है जिस पर भारत के लोकतंत्र, उसकी राजनीति और उसके विकास माॅडल, तीनों की परीक्षा होनी है। शायद तभी मनुस्मृति का वह श्लोक, जिसे हम सदियों से दोहराते आ रहे हैं, अपने वास्तविक अर्थ में साकार हो सकेगा।

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