उत्तराखण्ड राज्य की स्थापना से ही राष्ट्रीय दलों भाजपा और कांग्रेस के लिए दुधारू गाय की तरह रही मलिन बस्तियों पर एक बार फिर सियासी सरगर्मियां बढ़ गई हैं। सूबे में जब-जब चुनाव होते हैं तब-तब इस मुद्दे को उठाकर नेता अपना उल्लू सीधा करते रहे हैं। लेकिन इस बार चुनावी बयार शुरू होने से पहले ही इस मुद्दे ने सियासी तपिश पैदा कर दी है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने नैनीताल जिले के रामनगर में इस मुद्दे पर मौन धारण कर अपनी पार्टी की चुप्पी तोड़ डाली है तो दूसरी तरफ भाजपा में बेचैनी का आलम है। हरीश रावत ने भाजपा द्वारा अब तक इन बस्तियों के मुद्दे पर विस्थापन मामले में अपनाए जाने वाले ‘मौन’ पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। यूं तो पूरे प्रदेश में 582 मलिन बस्तियां हैं लेकिन उनमें ध्वस्तीकरण की सबसे ज्यादा तलवार लटकी है देहरादून की 128 मलिन बस्तियों पर। ये बस्तियां फिलहाल मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के ड्रीम प्रोजेक्ट में बाधक बन गई हैं। देहरादून को जाम से निजात दिलाने के लिए मुख्यमंत्री धामी ने रिस्पना और बिंदाल नदी के किनारे एलिवेटेड रोड प्रस्तावित किया है। 3400 करोड़ की यह योजना तब तक फलीभूत नहीं होगी जब तक कि नदी किनारे से मलिन बस्तियों का अतिक्रमण नहीं हट जाता है। हाई कोर्ट नैनीताल और एनजीटी भी इनको हटाने के आदेश कर चुके हैं। लेकिन भाजपा के सामने समस्या यह है कि वह मलिन बस्तियों के करीब 60 से 70 हजार मतों को भी अनदेखा नहीं कर सकती है। देहरादून शहर की पांच में से तीन विधानसभा सीट इस मुद्दे से प्रभावित होती हैं। शायद यही वजह है कि हाईकोर्ट के आदेशों के बावजूद भी भाजपा सरकार इनको बचाने के लिए तीन बार अध्यादेश ला चुकी है। फिलहाल, भाजपा सरकार के लिए यह मुद्दा ‘आगे कुआं-पीछे खाई’ साबित होता दिखाई दे रहा है
गत 21 मई को पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने नैनीताल के रामनगर स्थित भगत सिंह चौक पर मौन व्रत किया। इस दौरान उन्होंने राज्य सरकार के आगे दो बड़ी मांग रखी। जिनमें उनकी पहली मांग है कि मलिन बस्तियों के लोगों को मालिकाना हक दिया जाए। साथ ही उन्होंने याद दिलाया कि जब कांग्रेस की सरकार थी, तब 2016 में विधानसभा में एक कानून पारित कर इन बस्तियों को वैधता दी गई थी। 1 हजार से अधिक लोगों को मालिकाना हक देने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी। लेकिन भाजपा सरकार ने आते ही इस प्रक्रिया को रोक दिया। तब से यह मामला लम्बित है।

रावत ने आगे कहा कि ‘अब सरकार इन मलिन बस्तियों को उजाड़ने पर आमादा है। रिस्पना और बिंदाल जैसे क्षेत्रों में सैकड़ों घरों पर लाल निशान लगा दिए गए हैं। लेकिन पुनर्वास की कोई वैकल्पिक योजना नहीं बताई जा रही। लोगों को केवल उजाड़ने के नोटिस दिए जा रहे हैं। वे आतंक के साए में जी रहे हैं। यह अमानवीय है।’ पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि राज्य के कानूनों के अनुसार इन लोगों को संरक्षण प्राप्त है। बिना उचित मुआवजा और पुनर्वास के उन्हें हटाना गैरकानूनी है। सरकार को पहले पुनर्वास की व्यवस्था करनी चाहिए। फिर चाहे जितना विकास करें। उनकी सरकार ने फैसला लिया था कि ऐसे लगभग दो लाख लोग, जो किसी खेत, स्कूल या घर के पास की भूमि पर वर्षों से रह रहे थे, उन्हें मालिकाना हक दिया जाएगा। इसके लिए एक नाममात्र शुल्क निर्धारित किया गया और एक लाख से अधिक लोगों को इसका लाभ भी मिला। लेकिन एक लाख से ज्यादा गरीब आज भी इससे वंचित हैं और अब उन्हें हटाने के नोटिस दिए जा रहे हैं। ऐसे लोगों की आवाज बनना मेरा कर्तव्य है। हालांकि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस मुद्दे पर अपनी राय व्यक्त कर चुके हैं। जिसमें वह स्पष्ट कर चुके हैं कि मलिन बस्तियां यथावत रहेंगी। सरकार मलिन बस्तियों और उसमें रहने वाले लोगों के लिए पूरी तरह से संवेदनशील है। ऐसे में मलिन बस्तियां जहां हैं, वहीं पर रहे, उसके लिए सरकार काम करेगी।

उत्तराखण्ड में मलिन बस्तियों का मुद्दा आज का नहीं है, बल्कि वर्षों पुराना है। इस मुद्दे पर कांग्रेस-भाजपा दोनों पर ही राजनीति करने के आरोप लगते रहे हैं। कहा जाता है कि जब-जब प्रदेश में चुनाव होने होते हैं तब-तब इस मुद्दे को उठाकर सियासी फायदा लिया जाता रहा है। लेकिन फिलहाल कोई चुनाव नहीं है फिर भी यह मुद्दा एक बार क्यों जिन्न की तरह बाहर लाया जा रहा है।
देहरादून के एलिवेटेड रोड में बाधक बस्तियां
दरअसल, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देहरादून शहर के लिए महत्वपूर्ण योजना प्रस्तावित की है। जिसमें वह देहरादून में यातायात दबाव को कम करने और राजधानी की बुनियादी संरचना को बेहतर बनाने के तहत रिस्पना और बिंदाल नदी पर चार लेन एलिवेटेड कॉरिडोर का निर्माण कर रहे हैं। देहरादून में पिछले कुछ सालों में तेजी से शहरीकरण बढ़ा है। शहर के बाहरी इलाकों में भी अब नई कॉलोनियां बस रही हैं। इसी के साथ ही देहरादून में वाहनों की संख्या भी बढ़ रही है। सड़कों पर वाहनों का दबाव बढ़ने के चलते यातायात प्रभावित हो रहा है और सरकारी मशीनरी पर नए और चौड़ा मार्गों के निर्माण का दबाव बढ़ रहा है। सड़कों पर बढ़ते इसी दबाव को कम करने के लिए धामी सरकार एलिवेटेड योजना बनाकर एक बड़ी पहल करने जा रही है। राज्य सरकार ने देहरादून शहर से होकर गुजरने वाली दो नदियों बिंदाल और रिस्पना के ऊपर एलिवेटेड रोड बनाने का फैसला लिया है। इन मार्गों को इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि अन्य राज्यों से आने वाले पयज़्टकों को मसूरी जाने के लिए शहर से होकर न गुजरना पड़े।
3400 करोड़ की है योजना
यह एलिवेटेड रोड की योजना कुल 3400 करोड़ रुपए की है। बिंदाल और रिस्पना पर एलिवेटेड रोड बनाने के लिए सरकार ने अपनी कार्रवाई शुरू कर दी है। बिंदाल नदी पर कुल 15 किमी. की एलिवेटेड रोड बनाई जाएगी। जबकि रिस्पना पर 11 किमी. की एलिवेटेड रोड का प्रस्ताव है। शासन स्तर पर इन एलिवेटेड सड़कों के लिए फिजिबिलिटी सर्वे करा लिया गया है। योजना अनुसार पहले फेस में रिस्पना पुल से सहस्त्रधारा और बिंदाल पुल से मैक्स अस्पताल तक इस रोड का निर्माण किया जाएगा। हालांकि एलिवेटेड रोड निर्माण का काम इतना आसान नहीं है। एलिवेटेड रोड के निर्माण में कई ऐसी समस्याएं हैं जो इसके निर्माण को लम्बा खींच सकती हैं। वह समस्या है नदियों के किनारे का अतिक्रमण। यह अतिक्रमण सबसे ज्यादा मलिन बस्तियों का है। इस अतिक्रमण को और मलिन बस्तियों को वहां से हटाना इतना आसान भी नहीं है। बहरहाल, इसी को लेकर राजनीति गरमा गई गई।
देहरादून में राज्य गठन पर 75 बस्तियां, अब 128
देहरादून के रिस्पना-बिंदाल किनारे शहर में 26 किलोमीटर लम्बे एलिवेटेड रोड निर्माण के लिए मलिन बस्तियों में कई घरों को तोड़ा जाएगा। इसके लिए मकानों पर लाल निशान लगाने का काम भी शुरू हो चुका है। जिन भवनों पर लाल निशान लगाए गए हैं उनकी जमीन भूमि अधिग्रहण के दायरे में आएगी। एक बार लाल निशान लगाने के बाद भवनों के चिह्नीकरण की समीक्षा भी की जाएगी।
राज्य सरकार मलिन बस्तियों को लेकर चिंतित है। अगर इसके लिए सुप्रीम कोर्ट भी जाना पड़े तो राज्य सरकार मलिन बस्तियों को लेकर वहां तक जाएगी। अगर बस्तियों को हटाया भी जाता हैं तो उन्हें ऐसे ही नहीं छोड़ा जाएगा, बल्कि उनके लिए दूसरी जगह व्यवस्था की जाएगी। व्यवस्थित तरीके से बस्तियों को विस्थापित किया जाएगा। यह लोग भी सरकार की प्राथमिकता है। कांग्रेस भ्रम फैलाने की असफल कोशिश कर रही है। इस मुद्दे को लेकर पार्टी का रुख स्पष्ट है कि इस मुद्दे का स्थाई समाधान होना जरूरी है। वर्तमान परिस्थितियों में सबसे पहले प्रभावित लोगों को सुरक्षित किया जाना आवश्यक है।
विनोद चमोली, विधायक धर्मपुर, देहरादून
राजधानी देहरादून और जिले की बात करें तो राज्य गठन के समय यहां 75 मलिन बस्तियां थीं। जिनकी आबादी नाममात्र थी, लेकिन 2002 में इनकी संख्या बढ़कर 102 और 2008 में 129 हो गई। 2016 में यह संख्या 150 तक पहुंच गई और अब यह संख्या 200 के करीब पहुंच गई है। हालांकि जो देहरादून नगर निगम ने चिन्हित की है वह 128 है।
देहरादून की ये है मलिन बस्तियां
देहरादून में नगर निगम द्वारा जिन मलिन बस्तियों को चिन्हित किया गया था उनमें वीर गब्बर सिंह कॉलोनी किशननगर, काठ बंगला ढाक पट्टी, काठ बंगला-2, आर्य नगर बस्ती करनपुर, बॉर्डी गार्ड जाखन, अम्बेडकर कॉलोनी डीएल रोड अधोईवाला, रिस्पना खटीक कॉलोनी, विजय नगर अधोईवाला, भगत सिंह कॉलोनी अधोईवाला, पंचपुरी चंद्र नगर डालनवाला, गांधी बस्ती डालनवाला, चंदर रोड डालनवाला, बलबीर रोड डालनवाला, संजय कॉलोनी मोहिनी रोड धर्मपुर, शिव नगर अजबपुर, राजीव नगर भाग-2 रिस्पना, राजीव नगर भाग-1, रिस्पना नगर अजबपुर कला, अपर राजीव नगर धर्मपुर, केदारपुर मलिन बस्ती केदारपुर, दीपनगर अजबपुर कला, ऋषि नगर अधोईवाला, राजीव नगर कंडोली, आनंद ग्राम अधोईवाला, गैस गोदाम किशन नगर राजपुर रोड, नेमी रोड मलिन डालनवाला, शास्त्री नगर चूना भट्टा और इंद्रा पुरम कॉलोनी चिन्हित की गई हैं।
बस्तियों की है तीन श्रेणी
इन मलिन बस्तियों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है। श्रेणी एक में ऐसी बस्तियां हैं जिसमें घर निवास योग्य हो और उनको भू-स्वामित्व का अधिकार निर्धारित मानकों के अनुसार दिया जा सकता हो। इसके अलावा श्रेणी दो के तहत ऐसी भूमि जो पर्यावरणीय या भौगोलिक दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में हो और उस क्षेत्र को वर्गीकृत किया जाए और सुरक्षात्मक उपायों को अपनाकर उस क्षेत्र को निवास योग्य बनाया जाना सम्भव हो और भू-स्वामित्व अधिकार प्रदान किया जाना सम्भव हो। तीसरी श्रेणी यह है कि ऐसी भूमि पर बसी बस्तियां जिनको विधिक, व्यावहारिक और मानव निवास, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के दृष्टिकोण से उपयुक्त ना हो। दून नगर निगम 78 बस्तियों का वर्गीकरण नहीं कर पाया है, क्योंकि यह 78 बस्तियां नॉन जेड-ए श्रेणी पर हैं। इन नॉन जेड ए श्रेणी में निजी भूमि और गैर जमींदारी विनाश अधिनियम के तहत निकाली गई भूमि होती है। नगर निगम इन 78 बस्तियों को लेकर निर्णय नहीं ले पाया। इसके चलते इन बस्तियों का निर्णय शासन के ऊपर छोड़ा गया है।
पूरे प्रदेश में फैला है मलिन बस्तियों का जाल
पूरे प्रदेश की अगर बात करें तो साल 2016 की विभिन्न श्रेणियों के तहत बागेश्वर में श्रेणी एक की चार मलिन बस्तियां और श्रेणी दो की दो मलिन बस्तियां, इसी तरह हरिद्वार में श्रेणी एक की 57 मलिन बस्तियां और श्रेणी 2 की दो बस्तियां, श्रेणी तीन की 24 मलिन बस्तियां हैं। नैनीताल में श्रेणी एक की 37, श्रेणी 2 की एक और श्रेणी 3 की 23 मलिन बस्तियां हैं। अल्मोड़ा में श्रेणी एक की चार मलिन बस्तियां हैं। जबकि देहरादून में कुल 128 मलिन बस्तियां चिह्नित की गई हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से यह घोषणा की थी कि 2022 तक देश के हर नागरिक को छत मिल जाएगी। लेकिन अब उत्तराखण्ड सरकार एलिवेटेड रोड के चलते ढाई से तीन हजार परिवारों को बेघर करने की योजना बना रही है। ऐसे में ट्रैफिक के बढ़ते दबाव को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि फ्लाईओवर, पब्लिक ट्रांसपोर्ट या एलिवेटेड रोड की जरूरत तो देहरादून को है परंतु यह जो घर तोड़े जाएंगे इनकी क्या वैकल्पिक व्यवस्था है? इनको कहां पुनर्वासित किया जा रहा है इसके ऊपर धामी सरकार पूर्णतया मौन धारण किए हुए है जो कि सर्वथा अनुचित और अन्याय पूर्ण है। बरसात का मौसम सर पर है यह जो लोग बेघर हो जाएंगे उसमें महिलाएं बुजुर्ग और छोटे-छोटे बच्चे हैं वो कहां जाएंगे? सरकारों का काम होता है बसाना न कि लोगों को उजाड़ना।
गरिमा मेहरा दसौनी, मुख्य प्रवक्ता उत्तराखण्ड कांग्रेस
55 फीसदी के पास है पक्के मकान
साल 2010 से 2011 के बीच शहरी विकास विभाग की ओर से किए गए सर्वे के अनुसार मलिन बस्तियों में रह रहे 55 फीसदी लोगों के पास पक्का मकान था, जबकि 29 फीसदी लोगों के पास आधा पक्का मकान और 16 फीसदी लोगों के पास कच्चा आवास था। साथ ही 86 फीसदी घरों में बिजली कनेक्शन थे, लेकिन 582 बस्तियों में से केवल 71 मलिन बस्तियां ही सीवेज नेटवर्क से जुड़ी थीं। प्रदेश के इन सभी मलिन बस्तियों में कुल 252 आंगनबाड़ी और प्री स्कूल मौजूद थे। स्वास्थ्य सुविधाओं के लिहाज से 93 हेल्थ सेंटर भी मलिन बस्तियों में बने हुए थे।
एनजीटी और हाई कोर्ट के आदेश पर कांग्रेस की पहल
उत्तराखण्ड की नदियों पर अतिक्रमण किए जाने के मुद्दे को लेकर वर्ष 2012 में एनजीटी ने सख्त रुख अपनाया था। इसके साथ ही नैनीताल हाईकोर्ट ने भी नदियों के किनारे बनी 582 मलिन बस्तियों के अतिक्रमण को हटाने के आदेश दिए थे। जिसके चलते तात्कालिक कांग्रेस सरकार ने मलिन बस्तियों के नियमितीकरण को लेकर प्रक्रिया शुरू करने का निर्णय लिया था।
कांग्रेस को इस मुद्दे पर कमी निकालने के स्थान पर जनता के सामने अपना विजन रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि मलिन बस्तियों के मुद्दे पर कांग्रेस भ्रम फैला रही है। भाजपा किसी को बेघर नहीं होने देगी। पाटी ने जो संकल्प पत्र जारी किया है, उसे कार्यकर्त्ता घर-घर पहुंचाने में जुटे हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट समेत अन्य नेता चुनाव के दृष्टिगत लगातार प्रवास पर हैं। प्रदेश और केंद्र में भाजपा की सरकार है। लिहाजा मलिन बस्तियों वाले मुद्दे को सुलझा लिया जाएगा।
आदित्य कोठारी, प्रदेश महामंत्री भाजपा
साल 2016 में तात्कालिक कांग्रेस सरकार मलिन बस्तियों में रह रहे लोगों के नियमितीकरण को लेकर अध्यादेश लेकर आई थी। राजपुर सीट से तात्कालिक विधायक राजकुमार की अध्यक्षता में कमेटी भी गठित की गई थी, जो मलिन बस्तियों के नियमितीकरण को लेकर काम कर रही थी। यही नहीं बल्कि नगर निगम को इस बाबत निर्देश दिए गए थे कि कुछ प्रारूप पत्र तैयार किए जाएं, जिसमें इन सभी लोगों के जमीनों की जानकारी हो, ताकि इन सभी को मालिकाना हक दिया जा सके।
अध्यादेश लाकर बचाया जाता रहा
साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में सरकार बदली और भाजपा की सरकार बनने के बाद कांग्रेस सरकार का मलिन बस्तियों के नियमितीकरण का मामला ठंडे बस्ते में चला गया। इसके बाद साल 2018 में नगर निकाय चुनाव से ठीक पहले नैनीताल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को इस बाबत आदेश दिए कि मलिन बस्तियों में रह रहे लोगों को वहां से हटाकर अन्य जगह पर पुनर्वासित किया जाए। जिसके चलते उत्तराखण्ड सरकार ने 17 अक्टूबर 2018 को तीन साल के लिए एक अध्यादेश जारी किया, जिसके तहत सरकार ने इस बात को कहा कि 3 साल तक मलिन बस्तियों में रह रहे लोगों को हटाया नहीं जाएगा और इस दौरान राज्य सरकार मलिन बस्तियों के नियमितीकरण को लेकर कदम उठाएगी। लेकिन भाजपा पर आरोप है कि इस दौरान उनकी पार्टी की सरकार की ओर से मलिन बस्तियों के अस्थायी समाधान को लेकर कोई भी काम नहीं किया गया और ना ही कोई निर्णय लिया गया। इस चलते 21 अक्टूबर 2021 को एक बार फिर अध्यादेश के कार्यकाल को 3 साल के लिए बढ़ा दिया गया। 23 अक्टूबर 2024 को अध्यादेश का कार्यकाल पूरा हो चुका है। इसके बाद इस मामले में सरकार द्वारा तीसरा अध्यादेश लाकर स्थिति को यथावत बनाया हुआ है।
भाजपा को 2027 की चिंता
देहरादून शहर में पांच विधानसभाएं आती हैं। फिलहाल पांचों विधानसभाओं के विधायक भाजपा के ही हैं। इस मुद्दे की गम्भीरता को देखते हुए फिलहाल सभी चिंता में हैं। देखा जाए तो पांचों विधानसभाओं को यह मुद्दा प्रभावित करता है लेकिन सबसे ज्यादा राजपुर रोड और रायपुर है। राजपुर रोड विधानसभा से विधायक खजानदास और रायपुर विधानसभा से विधायक भाजपा के उमेश काऊ हैं। जबकि धर्मपुर से विधायक विनोद चमोली भी इसके घेरे में हैं, क्योंकि रिस्पना और बिंदाल नदी पर मलिन बस्तियों का सबसे ज्यादा अतिक्रमण इनके ही विधानसभा क्षेत्र में है।
विधानसभा में भी उठ चुका है मुद्दा
विधायक खदान दास तो मलिन बस्तियों को लेकर लगातार कई बार चिंता जाहिर कर चुके हैं। वे विधानसभा में भी नियम 310 के तहत इस मुद्दे को उठा चुके हैं। वह की बार पूर्व शहरी विकास मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल से भी मिलते रहे हैं और यह जानने की कोशिश करते रहे हैं कि आखिर उनकी सरकार इस मामले में क्या हल निकाल रही है?
एनजीटी का डंडा
मलिन बस्तियों के मुद्दे पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के 10 जनवरी 2025 को दिए गए एक आदेश से सरकार पशोपेश में है। रिस्पना और बिंदाल नदी पर अतिक्रमण पर एनजीटी ने सरकार से रिपोर्ट मांगी है। साथ ही सचिव शहरी विकास, सचिव सिंचाई, डीएम, नगर आयुक्त देहरादून, एमडीडीए उपाध्यक्ष को व्यक्तिगत पेश होने का आदेश दिया था। गौरतलब है कि रिस्पना किनारे बाढ़ क्षेत्र में बसी बस्तियों को लेकर देहरादून निवासी निरंजन बागची ने एनजीटी में एक शिकायत की थी। इसका संज्ञान लेते हुए एनजीटी ने बस्तियां हटाने के आदेश दिए थे।
इसके बाद जिलाधिकारी के स्तर से 89 अतिक्रमण चिह्नित करते हुए इनमें से 69 को हटाने की रिपोर्ट एनजीटी को भेजी गई। उत्तराखण्ड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भी बाढ़ क्षेत्र को लेकर ई-मेल के माध्यम से जानकारी दी थी कि मामला सरकार के विधि विभाग के पास राय के लिए भेजा गया है लेकिन इसके बाद बोर्ड ने एनजीटी को कोई जवाब नहीं भेजा। एनजीटी के संज्ञान में राज्य सरकार का मलिन बस्तियों सम्बंधी अध्यादेश भी आया है। इस पर एनजीटी ने माना है कि इस मामले में राज्य नहीं, बल्कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय का कानून लागू होगा। एनजीटी के न्यायिक सदस्य जस्टिस अरुण कुमार त्यागी और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद की पीठ ने मुख्य सचिव को निर्देश दिए हैं, वे पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 रिस्पना किनारे का अतिक्रमण हटाने के लिए सरकार के सामने प्रस्ताव पेश करें।


राज्य सरकार मलिन बस्तियों को लेकर चिंतित है। अगर इसके लिए सुप्रीम कोर्ट भी जाना पड़े तो राज्य सरकार मलिन बस्तियों को लेकर वहां तक जाएगी। अगर बस्तियों को हटाया भी जाता हैं तो उन्हें ऐसे ही नहीं छोड़ा जाएगा, बल्कि उनके लिए दूसरी जगह व्यवस्था की जाएगी। व्यवस्थित तरीके से बस्तियों को विस्थापित किया जाएगा। यह लोग भी सरकार की प्राथमिकता है। कांग्रेस भ्रम फैलाने की असफल कोशिश कर रही है। इस मुद्दे को लेकर पार्टी का रुख स्पष्ट है कि इस मुद्दे का स्थाई समाधान होना जरूरी है। वर्तमान परिस्थितियों में सबसे पहले प्रभावित लोगों को सुरक्षित किया जाना आवश्यक है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से यह घोषणा की थी कि 2022 तक देश के हर नागरिक को छत मिल जाएगी। लेकिन अब उत्तराखण्ड सरकार एलिवेटेड रोड के चलते ढाई से तीन हजार परिवारों को बेघर करने की योजना बना रही है। ऐसे में ट्रैफिक के बढ़ते दबाव को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि फ्लाईओवर, पब्लिक ट्रांसपोर्ट या एलिवेटेड रोड की जरूरत तो देहरादून को है परंतु यह जो घर तोड़े जाएंगे इनकी क्या वैकल्पिक व्यवस्था है? इनको कहां पुनर्वासित किया जा रहा है इसके ऊपर धामी सरकार पूर्णतया मौन धारण किए हुए है जो कि सर्वथा अनुचित और अन्याय पूर्ण है। बरसात का मौसम सर पर है यह जो लोग बेघर हो जाएंगे उसमें महिलाएं बुजुर्ग और छोटे-छोटे बच्चे हैं वो कहां जाएंगे? सरकारों का काम होता है बसाना न कि लोगों को उजाड़ना।
कांग्रेस को इस मुद्दे पर कमी निकालने के स्थान पर जनता के सामने अपना विजन रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि मलिन बस्तियों के मुद्दे पर कांग्रेस भ्रम फैला रही है। भाजपा किसी को बेघर नहीं होने देगी। पाटी ने जो संकल्प पत्र जारी किया है, उसे कार्यकर्त्ता घर-घर पहुंचाने में जुटे हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट समेत अन्य नेता चुनाव के दृष्टिगत लगातार प्रवास पर हैं। प्रदेश और केंद्र में भाजपा की सरकार है। लिहाजा मलिन बस्तियों वाले मुद्दे को सुलझा लिया जाएगा।