Uttarakhand

राष्ट्रीय मंच पर गूंजी उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति

संगीत नाटक अकादमी ने उत्तराखण्ड की लोकगायिका हेमा नेगी करासी को वर्ष 2024 के प्रतिष्ठित उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार के लिए चुना है। संघर्षों से भरे सफर के बावजूद उन्होंने उत्तराखण्ड की लोक गायन और जागर परम्परा को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है

भारतीय संगीत, नृत्य और रंगमंच की सर्वोच्च राष्ट्रीय संस्था मानी जाने वाली संगीत नाटक अकादमी की स्थापना वर्ष 1953 में हुई थी। अकादमी देश की विविध सांस्कृतिक और लोक कलाओं के संरक्षण, संवर्धन तथा कलाकारों के सम्मान के लिए कार्य करती है। इसी क्रम में युवा प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से वर्ष 2006 में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार की शुरुआत की गई थी। यह पुरस्कार भारत रत्न और विश्व विख्यात शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की स्मृति में प्रदान किया जाता है। देशभर की विभिन्न कला विधाओं में उल्लेखनीय योगदान देने वाले युवा कलाकारों को दिया जाने वाला यह सम्मान भारतीय सांस्कृतिक जगत के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में गिना जाता है।

संगीत नाटक अकादमी ने वर्ष 2024 और 2025 के लिए अकादमी फेलोशिप (अकादमी रत्न), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार तथा उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कारों की घोषणा कर दी है। वर्ष 2024 और 2025 के लिए कुल 106 युवा कलाकारों का चयन किया गया है। इनमें उत्तराखण्ड की प्रसिद्ध लोक गायिका हेमा नेगी करासी का चयन वर्ष 2024 के उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार के लिए किया गया है। यह सम्मान न केवल हेमा नेगी करासी की उपलब्धि है बल्कि उत्तराखण्ड की समृद्ध लोक संस्कृति, लोक गायन और जागर परम्परा की राष्ट्रीय स्तर पर मिली महत्वपूर्ण पहचान भी है।
संघर्षों से निकली सफलता की कहानी
हेमा नेगी करासी का जीवन संघर्षों और चुनौतियों से भरा रहा है। सीमित संसाधनों और अभावों के बीच उन्होंने अपने सपनों को जीवित रखा और कठिन परिस्थितियों में भी कभी हार नहीं मानी। वर्ष 2003 में अपने गांव कांडई स्थित इंटर कॉलेज के वार्षिकोत्सव में पहली बार मंच पर गायन से शुरू हुआ उनका सफर पिछले 22 वर्षों से निरंतर जारी है। इस दौरान वह 25 से अधिक एल्बमों में अपनी आवाज दे चुकी हैं और उत्तराखण्ड के लोक संगीत को नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुकी हैं।
लोकगीतों और जागर शैली को दिया नया आयाम
हेमा नेगी करासी की पहचान उनकी विशिष्ट लोकगायन शैली और जागर परम्परा के संरक्षण के लिए की जाती है। उनकी मखमली और प्रभावशाली आवाज में पहाड़ की मिट्टी की सुगंध और लोकजीवन की आत्मा महसूस की जा सकती है। पारम्परिक उत्तराखण्डी वेशभूषा में मंच पर उनकी प्रस्तुतियां लोक संस्कृति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का कार्य करती हैं। उन्होंने उत्तराखण्ड के पारम्परिक जागरों, मांगल गीतों और लोक धुनों को संरक्षित कर नई पीढ़ी तक पहुंचाने का उल्लेखनीय प्रयास किया है। उनके लोकप्रिय गीतों में गिर गेंदुवा, मेरी बामणी, मांगल गीत, आछरी जागर, कार्तिक स्वामी, मखमली घाघरी, संजू का बाबा और गुड्डू का बाबा जैसे गीत शामिल हैं जो आज भी श्रोताओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं।
देश से लेकर विदेश तक गूंजे लोक स्वर
हेमा के गीतों और जागरों की लोकप्रियता उत्तराखण्ड की सीमाओं से बहुत आगे निकल चुकी है। देहरादून, हल्द्वानी, दिल्ली, गाजियाबाद, लखनऊ, चंडीगढ़, अमृतसर और मुम्बई सहित देश के अनेक शहरों में उन्होंने सफल प्रस्तुतियां दी हैं, वहीं इंग्लैंड, न्यूजीलैंड, दुबई और जापान जैसे देशों में भी उनके कार्यक्रमों को व्यापक सराहना मिली है। यही कारण है कि आज उनके लाखों प्रशंसक देश और विदेश में मौजूद हैं।
पिता से मिली लोक की विरासत
रुद्रप्रयाग जनपद की दशज्यूला-कांडई पट्टी के टुखिंडा गांव में जन्मी हेमा नेगी करासी को लोक संस्कृति की प्रारम्भिक समझ अपने पिता स्वर्गीय चंद्र सिंह नेगी से मिली। बचपन में वह अपने पिता से जागर, झुमैलो, चौफला और अन्य लोक विधाओं को सुनती थीं। यही संस्कार आगे चलकर उनके संगीत जीवन की मजबूत नींव बने।
हेमा बताती हैं कि बचपन में भले ही लोकगीतों की गहराई समझ में नहीं आती थी लेकिन लोक संस्कृति के प्रति लगाव और सम्मान की भावना उन्हें अपने पिता से ही मिली। बाद में उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी, लोक गायिका बसंती बिष्ट और जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण जैसे वरिष्ठ कलाकारों से भी उन्हें सीखने और प्रेरणा लेने का अवसर मिला।
परिवार के सहयोग ने बनाया सफर आसान
हेमा नेगी करासी का मानना है कि उनके संगीत सफर में परिवार का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। वह अक्सर कहती हैं कि यदि पति, परिवार और शुभचिंतकों का सहयोग न मिला होता तो शायद यह यात्रा इतनी सफल नहीं हो पाती। कठिन समय में परिवार के साथ और समाज के प्रोत्साहन ने उन्हें निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
पहले भी मिल चुके हैं अनेक सम्मान
हेमा नेगी करासी को लोक संगीत और लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है। उन्हें उत्तराखण्ड सरकार के प्रतिष्ठित तीलू रौतेली पुरस्कार, यूथ आइकॉन सम्मान, उत्तराखण्ड उदय पुरस्कार, कल्याणी सम्मान, केदार घाटी सम्मान और मां नंदा शक्ति सम्मान सहित अनेक पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। ये सम्मान उनके व्यक्तिगत योगदान के साथ-साथ उत्तराखण्ड की लोक परम्परा के सम्मान का भी प्रतीक हैं।
राष्ट्रीय सम्मान पर भावुक हुईं हेमा
उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार के लिए चयनित होने पर हेमा नेगी करासी ने भावुक होते हुए कहा कि यह सम्मान केवल उनका नहीं बल्कि उन सभी माताओं, बुजुर्गों, गुरुजनों और प्रशंसकों का है जिन्होंने उन्हें हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने संगीत नाटक अकादमी की सूची में अपना नाम देखा तो वर्षों का पूरा संघर्ष आंखों के सामने घूम गया। पहाड़ की कंदराओं, खेतों और पगडंडियों से शुरू हुई यह यात्रा आज देश के सबसे बड़े सांस्कृतिक मंचों में से एक तक पहुंची है। उन्होंने कहा कि लोक संगीत हमारी मूल धरोहर है और राष्ट्रीय स्तर पर उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति को मिली यह पहचान पूरे प्रदेश के लिए गर्व का विषय है। हेमा नेगी करासी की उपलब्धि केवल एक कलाकार की सफलता नहीं बल्कि उत्तराखण्ड की लोक परम्पराओं, जागर विधा और लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए किए गए दीर्घकालिक प्रयासों की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति है। उनका जीवन संघर्ष, समर्पण और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता का ऐसा उदाहरण है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा। वर्ष 2024 के उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार के लिए उनके चयन पर समूचे उत्तराखण्ड में खुशी की लहर है और लोक संस्कृति से जुड़े लोग इसे प्रदेश के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि मान रहे हैं।

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