उत्तराखण्ड सरकार लगातार दावा करती है कि प्रदेश में अवैध खनन पर प्रभावी नियंत्रण है लेकिन गदरपुर के कुईखेड़ा-कुशालपुर क्षेत्र में जगह-जगह दिखाई दे रहे गहरे गड्ढे, भारी मशीनों की गतिविधियां और किसानों की बढ़ती शिकायतें इस दावे पर गम्भीर सवाल खड़े कर रही हैं। यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप है तो फिर खेतों के बीच 25-30 फीट तक की खुदाई, भूमि कटाव की आशंका और प्रभावित किसानों की चिंताएं आखिर क्यों बढ़ रही हैं? राजस्व के रिकॉर्ड और जमीनी हकीकत के बीच का यह विरोधाभास अब निष्पक्ष जांच और पारदर्शी जवाब की मांग कर रहा है
गदरपुर विधानसभा के अंतर्गत आने वाला कुईखेड़ा क्षेत्र इन दिनों खनन गतिविधियों को लेकर चर्चा का विषय बना हुआ है। क्षेत्र में प्रवेश करते ही कई स्थानों पर जमीन का बदला हुआ स्वरूप साफ दिखाई देता है। ग्रामीणों के अनुसार वर्षों से यहां खनन का कार्य चल रहा है लेकिन पिछले कुछ समय में इसकी गति और दायरा दोनों बढ़े हैं। स्थानीय लोगों का दावा है कि क्षेत्र में लगभग हर एक से दो किलोमीटर की दूरी पर बड़े-बड़े गड्ढे दिखाई देते हैं, जिनकी गहराई कई जगह 25 से 30 फीट तक पहुंच चुकी है।
ग्राउंड जीरो पर पहुंचने पर भी स्थिति सामान्य नहीं दिखी। खेतों के बीच कई स्थानों पर बड़े गड्ढे मौजूद थे। क्षेत्र में भारी मशीनें संचालित होती दिखाई दीं। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि दिनभर डम्परों और मशीनों की आवाजाही बनी रहती है। किसानों का आरोप है कि लगातार हो रहे खनन के कारण खेतों की प्राकृतिक संरचना प्रभावित हो रही है और कई स्थानों पर भूमि कटाव की स्थिति बन रही है।
खनन अपने आप में अवैध नहीं है। सरकार द्वारा निर्धारित नियमों और स्वीकृतियों के तहत खनन किया जा सकता है लेकिन खनन कार्य को लेकर स्पष्ट नियम और पर्यावरणीय मानक भी तय किए गए हैं। खनन के लिए निर्धारित क्षेत्र, गहराई, पर्यावरणीय अनुमति, सुरक्षा मानक, नदी और कृषि भूमि से दूरी, भूमि संरक्षण तथा स्थानीय आबादी की सुरक्षा जैसे पहलुओं का पालन करना अनिवार्य माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निर्धारित मानकों की अनदेखी होती है तो इसका सीधा असर पर्यावरण, भूजल स्तर और कृषि भूमि पर पड़ सकता है।
कुईखेड़ा में उठ रहे सवाल भी इन्हीं बिंदुओं से जुड़े हैं। यदि खनन पूरी तरह नियमों के अनुरूप हो रहा है तो क्षेत्र में इतने गहरे गड्ढे कैसे बन गए? यदि सभी स्वीकृतियां मौजूद हैं तो प्रभावित किसानों को उनकी जानकारी क्यों नहीं दी जा रही? यदि सब कुछ नियमों के अनुसार है तो किसानों की शिकायतों पर स्पष्ट जवाब क्यों नहीं मिल रहा?
यह समस्या केवल एक किसान तक सीमित नहीं है। क्षेत्र के कई किसान इसी प्रकार की परेशानियों का सामना कर रहे हैं। उनका दावा है कि कुशालपुर-कुईखेड़ा क्षेत्र में बड़ी संख्या में ऐसे खेत हैं जिनके आसपास गहरे गड्ढे बन चुके हैं और धीरे-धीरे उनकी जमीन प्रभावित हो रही है। किसानों का कहना है कि यदि व्यापक सर्वे कराया जाए तो कई प्रभावित परिवार सामने आ सकते हैं।
क्षेत्रवासियों की सबसे बड़ी चिंता आने वाला बरसात का मौसम है। यह इलाका नदी के निकट स्थित है और बारिश के दौरान पानी का बहाव बढ़ जाता है। ऐसे में गहरे गड्ढों के कारण मिट्टी का कटाव और तेज हो सकता है। किसानों को आशंका है कि यदि भारी वर्षा हुई तो खेतों का बड़ा हिस्सा इन गड्ढों की ओर खिसक सकता है और कृषि भूमि को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है।
ग्रामीणों का कहना है कि खनन की गतिविधियां क्षेत्र में लम्बे समय से चल रही हैं। प्रतिदिन बड़ी संख्या में डम्पर यहां से मिट्टी और खनिज सामग्री लेकर जाते हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि क्षेत्र में प्रतिदिन सैकड़ों डम्परों का संचालन होता है, जिससे यह इलाका खनन गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया है। उनका यह भी कहना है कि जब भारी संख्या में डम्पर क्षेत्र में संचालित होते हैं तब सम्बंधित विभागों की उपस्थिति दिखाई नहीं देती। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है लेकिन ग्रामीणों में इस विषय को लेकर असंतोष स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
स्थानीय लोगों ने क्षेत्र में अन्य सामाजिक समस्याओं का भी उल्लेख किया। उनका कहना है कि अवैध गतिविधियों की शिकायतें भी समय- समय पर उठती रही हैं लेकिन उन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। ग्रामीणों का मानना है कि यदि प्रशासन नियमित निगरानी और सख्त कार्रवाई करे तो कई समस्याओं पर एक साथ नियंत्रण पाया जा सकता है।
ग्रामीणों की मांग है कि पूरे क्षेत्र का निष्पक्ष सर्वे कराया जाए और यह जांच की जाए कि खनन कार्य निर्धारित मानकों के अनुरूप हुआ है या नहीं। साथ ही प्रभावित किसानों को हुए नुकसान का आंकलन कर उन्हें उचित मुआवजा प्रदान किया जाए। किसानों का कहना है कि यदि समय रहते स्थिति पर नियंत्रण नहीं किया गया तो कृषि भूमि, पर्यावरण और स्थानीय आबादी सभी को गम्भीर नुकसान उठाना पड़ सकता है।
रिपोर्टिंग के दौरान जब क्षेत्र का निरीक्षण किया गया तो कई स्थानों पर गहरे गड्ढे दिखाई दिए। कुछ स्थानों पर मशीनों की गतिविधियां भी नजर आईं। स्थानीय लोगों का कहना था कि मीडिया टीम के पहुंचने की सूचना मिलते ही कुछ मशीनों को पीछे कर दिया गया और गतिविधियां धीमी हो गईं। हालांकि इस सम्बंध में किसी आधिकारिक पक्ष की पुष्टि प्राप्त नहीं हो सकी।
खनन को लेकर एक दिलचस्प तर्क अक्सर सुनने को मिलता है। जब भी अनियमित या अंधाधुंध खनन के आरोप उठते हैं तो जवाब में यह कहा जाता है कि प्रदेश को रिकाॅर्ड राजस्व प्राप्त हो रहा है और खनन से सरकारी आय बढ़ी है। निश्चित रूप से राजस्व बढ़ना किसी भी सरकार के लिए सकारात्मक संकेत माना जा सकता है लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल राजस्व बढ़ जाने भर से सभी शिकायतें स्वतः समाप्त हो जाती हैं? क्या अधिक राजस्व प्राप्त होने का अर्थ यह मान लिया जाए कि कहीं भी नियमों का उल्लंघन नहीं हो रहा? क्या इससे प्रभावित किसानों की समस्याएं, पर्यावरणीय चिंताएँ और स्थानीय लोगों के सवाल अप्रासंगिक हो जाते हैं?
दरअसल राजस्व और नियमों का पालन दो अलग-अलग विषय हैं। यदि किसी क्षेत्र में नियमों के अनुरूप खनन हो रहा है तो उसकी पारदर्शी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। वहीं यदि किसानों की शिकायतें हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होना भी उतना ही आवश्यक है। प्रशासन की जिम्मेदारी केवल राजस्व संग्रह तक सीमित नहीं होती बल्कि स्थानीय नागरिकों, किसानों और पर्यावरणीय हितों की रक्षा करना भी उसकी प्राथमिक जिम्मेदारियों में शामिल है।
प्रशासन और खनन कारोबार के बीच फंसे किसान
कुईखेड़ा क्षेत्र में बातचीत के दौरान कई ग्रामीणों ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि खनन के खिलाफ खुलकर बोलने से लोग बचते हैं। उनका कहना है कि शिकायत करने वाले लोगों पर सामाजिक और प्रशासनिक दबाव बनने का डर बना रहता है। यही कारण है कि कई प्रभावित परिवार अपनी समस्याएं निजी बातचीत में तो बताते हैं लेकिन सार्वजनिक रूप से सामने आने से कतराते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र में वर्षों से खनन एक बड़ी आर्थिक गतिविधि के रूप में मौजूद है। इससे जुड़े लोगों का अपना प्रभाव है और इसी वजह से आम किसान खुद को कमजोर स्थिति में महसूस करता है। कई लोगों का मानना है कि व्यक्तिगत स्तर पर शिकायत करने के बजाय पूरे क्षेत्र का संयुक्त सर्वे कराया जाना चाहिए ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।
गौरतलब है कि किसी भी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर मिट्टी और खनिज निकासी का असर केवल उस स्थान तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव भूजल स्तर, मिट्टी की गुणवत्ता, प्राकृतिक जल निकासी और आसपास की भूमि की स्थिरता पर भी पड़ सकता है। यदि खनन के बाद वैज्ञानिक तरीके से भूमि पुनस्र्थापन नहीं किया जाता तो लम्बे समय में इसका असर कृषि उत्पादन पर भी दिखाई दे सकता है।
स्थानीय किसानों का कहना है कि पहले जिन खेतों में बिना किसी चिंता के खेती होती थी, आज वहां भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है। यदि वर्तमान स्थिति का तकनीकी मूल्यांकन कराया जाए तो कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।
निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी?
खनन से जुड़े मामलों में विभिन्न विभागों की भूमिका निर्धारित होती है। राजस्व विभाग, खनन विभाग, प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े संस्थान और स्थानीय प्रशासन सभी की अपनी जिम्मेदारियां होती हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि यदि क्षेत्र में लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं तो क्या संयुक्त निरीक्षण किए गए? यदि किए गए तो उनकी रिपोर्ट क्या कहती है? यदि नहीं किए गए तो क्यों नहीं?
ग्रामीणों की मांग है कि क्षेत्र में एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए जिसमें प्रशासनिक अभिलेख, खनन अनुमति, वास्तविक खुदाई क्षेत्र और प्रभावित भूमि का मिलान किया जाए। इससे न केवल किसानों की शंकाएं दूर होंगी बल्कि यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप है तो वह भी स्पष्ट रूप से सामने आ जाएगा।
‘पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की’
मेरा खेत खनन की चपेट में आ चुका है। मेरे खेत के बगल में ही खनन किया गया है, जिसमें 30 फीट तक का गड्ढा कर रखा है, जिसकी वजह से हमारा खेत भी उसमें धंसता जा रहा है। इन लोगों को हमने मना भी किया था कि इतनी गहरी मिट्टी मत उठाओ। पुलिस प्रशासन को भी हमने रिपोर्ट की लेकिन किसी ने हमारी नहीं सुनी। जब हमने एसपी साहब से रिपोर्ट की, वहां भी कोई सुनवाई नहीं हुई। हमारी रिपोर्ट अभी तक वहीं की वहीं पड़ी है, पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की है।
हमने बहुत कोशिश की कि ये खनन रूक जाए लेकिन उल्टा हमारी मेढ़ तक उठा कर ले गए, सारी मिट्टी उठा कर ले गए। हमने कई बार दरोगा जी को भी बोला, सकोनिया चैकी इंचार्ज को भी बोला लेकिन हमें ही उल्टा मार-पीटकर भगा दे रहे हैं। दो बार तो हमें धक्का मारकर भगा दिया दरोगा जी ने। ये सब गड्ढे आप खुद देख सकते हैं, कितने गहरे हो रखे हैं, 30 फीट तक। एसडीएम साहब को भी ज्ञापन सौंपा था, पता नहीं आज तक उस लेटर का क्या हुआ, हमें कोई जानकारी नहीं मिली। पेड़ वगैरह भी सब काटकर नीचे फेंक दिए हैं इन्होंने। जेसीबी वाले की हमारे पास वीडियो भी है। हमने एसडीएम, पुलिस सबको इसकी शिकायत दर्ज की। पुलिस वाले आए भी देखने लेकिन उन्होंने खुद मेरी मेढ़ पर जबरदस्ती मिट्टी लगवाई। हमें बहुत नुकसान हो गया है और ये हाल सिर्फ मेरे ही खेत का नहीं है, यहां बहुत लोगों के खेत की यही हालत है क्योंकि यहां हर एक किलोमीटर की दूरी पर ऐसे ही बड़े-बड़े 30 फीट तक के गड्ढे किए हुए हैं, जिनकी वजह से हम लोगों के खेत ध्वस्त होते जा रहे हैं। बारिश होने पर बहुत बड़ा खतरा है क्योंकि नदी पास में है। ये इतने बड़े-बड़े गड्ढे हैं कि खेत इनमें ऐसे ही बह जाएंगे।
यहां खनन रोज का चलना है, ये खनन की नगरी है। लगभग 300 डम्पर यहां रोज भरे जाते हैं। सबकी मिलीभगत है। पुलिस पैसे ले रही है। जब यहां डम्पर चलते हैं तो पुलिस वाले जान-बूझकर नहीं आते, चार-चार दिन तक नहीं आते। यहां स्मैक बिक रही है, सब कुछ हो रहा है लेकिन कोई कार्यवाही नहीं करनी। जो सही आदमी होगा, उसके ऊपर कार्यवाही कर देंगे।
मैं खुद हमारे चौकी इंचार्ज के पास दो-तीन बार गया हूं लेकिन उल्टा हमारे ऊपर ही प्रेशर बनाया गया, हमें डराया-धमकाया गया और कहा गया कि ‘इन्हें मारो-पीटो, ये खुद भाग जाएंगे।’
अजय कुमार, स्थानीय कृषक
अजय कुमार, स्थानीय कृषक