‘बहुत वर्ष पहले हमने नियति के साथ एक वादा किया था और अब समय आ गया है कि हम अपना वादा पूरा करें। आधी रात के समय, जब दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जागेगा।’
14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को संविधान सभा में दिए गए इस ऐतिहासिक सम्बोधन के साथ भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने केवल सत्ता नहीं सम्भाली थी बल्कि एक ऐसे राष्ट्र के निर्माण की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली थी जिसके पास राजनीतिक स्वतंत्रता तो थी लेकिन आर्थिक शक्ति नहीं, लोकतांत्रिक आकांक्षाएं तो थीं मगर लोकतांत्रिक अनुभव नहीं, सपने तो थे परंतु उन्हें पूरा करने के लिए आवश्यक संस्थागत आधार नहीं था। आज जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 4,399 दिन पूरे होने पर एक बड़े राजनीतिक उत्सव का आयोजन किया जाता है और यह दावा किया जाता है कि उन्होंने नेहरू का रिकाॅर्ड तोड़ दिया है तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर किस रिकाॅर्ड की बात हो रही है?
क्या इतिहास को दिनों की गिनती में समेटा जा सकता है? क्या राष्ट्र निर्माण और शासन की विरासत को कैलेंडर के पन्नों पर मापा जा सकता है? क्या किसी प्रधानमंत्री का मूल्यांकन केवल इस आधार पर किया जा सकता है कि वह कितने दिन सत्ता में रहा? सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न कि क्या यह वास्तव में कोई ऐतिहासिक उपलब्धि है या फिर एक राजनीतिक आख्यान गढ़ने का प्रयास? इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए सबसे पहले हमें 1947 के भारत और 2026 के भारत के बीच का अंतर समझना होगा।
जब नेहरू ने सत्ता सम्भाली थी तब भारत विभाजन की आग से झुलसा हुआ था। लाखों लोग शरणार्थी बन चुके थे। साम्प्रदायिक हिंसा ने देश को घायल कर दिया था। औद्योगिक ढांचा लगभग न के बराबर था। देश में भारी उद्योग नहीं थे, वैज्ञानिक अनुसंधान की कोई मजबूत व्यवस्था नहीं थी, स्वास्थ्य सेवाएं बेहद कमजोर थीं और शिक्षा का स्तर अत्यंत निम्न था। औपनिवेशिक शासन भारत को एक कच्चे माल की आपूर्ति करने वाली अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित कर गया था। ऐसे भारत को आधुनिक राष्ट्र-राज्य में बदलना किसी एक सरकार का काम नहीं था लेकिन उसकी शुरुआत करने का श्रेय नेहरू को जाता है।
आज भारत जिन संस्थाओं पर गर्व करता है, उनमें से बड़ी संख्या की नींव नेहरूकाल में रखी गई। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थान, सार्वजनिक क्षेत्र के विशाल उपक्रम, इस्पात संयंत्र, सिंचाई परियोजनाएं, परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम और
लोकतांत्रिक संस्थाओं का विस्तार, ये सब उस दौर की देन हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आधुनिक भारत की संस्थागत संरचना का बड़ा हिस्सा नेहरू युग की उपज है।
नेहरू ने बड़े बांधों को ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा था। उस समय इस कथन का मजाक उड़ाया गया था लेकिन बाद के दशकों में वही बांध कृषि विकास, बिजली उत्पादन और औद्योगिक विस्तार की रीढ़ बने। भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर जैसे इस्पात संयंत्रों ने भारत को औद्योगिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाया। विज्ञान और तकनीक को राष्ट्रीय विकास का आधार बनाया गया। भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम और परमाणु कार्यक्रम की वैचारिक तथा संस्थागत नींव इसी दौर में रखी गई।
निःसंदेह नेहरू की गलतियां भी थीं। चीन के प्रति उनकी नीति की आलोचना हुई। 1962 का युद्ध उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक विफलता माना जाता है लेकिन इतिहास में किसी नेता का मूल्यांकन उसकी उपलब्धियों और विफलताओं दोनों के आधार पर होता है। यदि नेहरू की आलोचनाएं दर्ज हैं तो उनकी उपलब्धियां भी उतनी ही मजबूती से दर्ज हैं जिन्हें मिटाने का बेहूदा प्रयास भाजपा करती नजर आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 4,399 दिन पूरे होने पर यह प्रचारित किया गया कि उन्होंने नेहरू का रिकाॅर्ड तोड़ दिया है लेकिन जब इस दावे को ध्यान से देखा जाता है तो पता चलता है कि यह दावा अनेक शर्तों और व्याख्याओं पर आधारित है।
नेहरू भारत के प्रधानमंत्री के रूप में लगभग सत्रह वर्षों तक पद पर रहे और अपने जीवन के अंतिम दिन तक प्रधानमंत्री बने रहे। यदि कुल कार्यकाल की बात की जाए तो उनका समय 4,399 दिनों से कहीं अधिक था। इंदिरा गांधी भी लगभग सोलह वर्षों तक प्रधानमंत्री रहीं। इसलिए ‘सबसे लम्बे समय तक प्रधानमंत्री’ होने का दावा अपने आप में तथ्यात्मक रूप से अधूरा है। इस दावे को स्थापित करने के लिए ‘लगातार’, ‘निर्वाचित’ और ‘बिना रुकावट’ जैसे विशेषण जोड़े जा रहे हैं। यह राजनीति में नया नहीं है। आंकड़ों को इस प्रकार प्रस्तुत करना कि वे किसी विशेष राजनीतिक कथा को मजबूत करें, आधुनिक राजनीति का एक सामान्य उपकरण बन चुका है लेकिन इतिहासकारों का काम राजनीतिक आख्यानों को दोहराना नहीं बल्कि तथ्यों की संपूर्ण तस्वीर सामने रखना होता है।
तथ्य यह भी है कि नेहरू ने 1952, 1957 और 1962 के आम चुनावों में स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया था। उनकी सरकार किसी गठबंधन की मजबूरी पर आधारित नहीं थी। इसके विपरीत 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर सकी। सरकार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सहयोगी दलों के समर्थन से बनी। लोकतंत्र में गठबंधन सरकारें पूरी तरह वैध और संवैधानिक होती हैं लेकिन यदि तुलना की जा रही है तो यह तथ्य भी छुपाया नहीं जाना चाहिए। यदि नेहरू के शुरुआती वर्षों को इसलिए अलग रखा जा रहा है कि 1952 से पहले चुनाव नहीं हुए थे तो फिर 2024 के जनादेश की वास्तविक प्रकृति पर भी चर्चा होनी चाहिए। भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था। सरकार सहयोगी दलों के समर्थन पर निर्भर थी। इसलिए तुलना यदि हो तो पूरी ईमानदारी के साथ होनी चाहिए, चयनित तथ्यों के आधार पर नहीं लेकिन शायद इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इस प्रकार के रिकाॅर्ड वास्तव में लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं?
लोकतंत्र में किसी नेता का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होता कि उसने कितने दिन सत्ता में बिताए। यदि ऐसा होता तो दुनिया के अनेक तानाशाह लोकतंत्र के सबसे बड़े नायक कहलाते। लोकतंत्र में महत्व इस बात का होता है कि सत्ता में रहते हुए किसी नेता ने संस्थाओं को कितना मजबूत किया, जनता के जीवन को कितना बेहतर बनाया और देश को किस दिशा में आगे बढ़ाया। यही कारण है कि दुनिया अब्राहम लिंकन को उनके कार्यकाल के दिनों से नहीं याद करती। फ्रैंकलिन रूजवेल्ट को केवल चार बार राष्ट्रपति बनने के कारण नहीं याद किया जाता। नेल्सन मंडेला को उनके कार्यकाल की अवधि के कारण नहीं जाना जाता। इन नेताओं की पहचान उनके द्वारा निर्मित राजनीतिक और नैतिक विरासत से होती है। भारत में भी यही कसौटी लागू होनी चाहिए।
प्रधानमंत्री मोदी निःसंदेह भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक हैं। उन्होंने भारतीय राजनीति का चरित्र बदला है। भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व विस्तार दिया है। कल्याणकारी योजनाओं, डिजिटल शासन, बुनियादी ढांचे और विदेश नीति के क्षेत्र में उनकी सरकार ने कई महत्वपूर्ण पहलें की हैं लेकिन उनके शासनकाल पर गम्भीर प्रश्न भी उठते रहे हैं, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, संस्थागत स्वायत्तता, सामाजिक ध्रुवीकरण, मीडिया की स्वतंत्रता और संघीय ढांचे से जुड़े मुद्दों पर बहस लगातार जारी है। इसीलिए यह आवश्यक है कि मोदी सरकार का मूल्यांकन भी प्रचार अभियानों से नहीं बल्कि ठोस परिणामों के आधार पर हो। इस पूरे प्रकरण का सबसे विचित्र पक्ष वह उत्सवी वातावरण था जो 4,399 दिनों की संख्या के इर्द-गिर्द निर्मित किया गया। ऐसा प्रतीत हुआ मानो देश ने कोई असाधारण ऐतिहासिक उपलब्धि प्राप्त कर ली हो। विभिन्न कार्यक्रम आयोजित हुए, नेताओं के बयान आए, सोशल मीडिया अभियान चलाए और पूरे आयोजन को राष्ट्रीय उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास हुआ।
आलोचकों का प्रश्न है कि क्या यह वास्तव में शासन की उपलब्धियों का उत्सव है या व्यक्तित्व-केंद्रित राजनीति का प्रदर्शन? एक ओर सरकार नागरिकों से ईंधन बचाने, संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और मितव्ययिता की अपील करती है। दूसरी तरफ राजनीतिक आयोजनों के लिए पूरे देश से नेताओं, मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की आवाजाही को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में राजनीतिक आयोजन कोई असामान्य बात नहीं हैं लेकिन जब वे शासन की वास्तविक उपलब्धियों के स्थान पर व्यक्तिपूजा का रूप लेने लगें तो आलोचना भी उतनी ही स्वाभाविक हो जाती है। लोकतंत्र में नेता महत्वपूर्ण होते हैं लेकिन संस्थाएं उनसे भी अधिक महत्वपूर्ण होती हैं। यही कारण है कि नेहरू की विरासत का केंद्र उनका व्यक्तित्व नहीं बल्कि उनके द्वारा निर्मित संस्थाएं हैं। संसद, चुनाव आयोग, न्यायपालिका, विश्वविद्यालय, अनुसंधान संस्थान और सार्वजनिक क्षेत्र की संरचनाएं, ये सब उस विरासत का हिस्सा हैं। आज भारत में एक नई बहस भी चल रही है। सार्वजनिक क्षेत्र के अनेक उपक्रमों में विनिवेश हुआ है। ‘एयर इंडिया’ का निजीकरण हुआ। एलआईसी का आंशिक विनिवेश हुआ। परिसंपत्तियों के उपयोग अधिकार निजी क्षेत्र को दिए जा रहे हैं। सरकार इसे आर्थिक सुधार कहती है जबकि आलोचक इसे उस सार्वजनिक क्षेत्र की क्रमिक समाप्ति मानते हैं जिसे स्वतंत्रता के बाद बड़ी मेहनत से खड़ा किया गया था। यहीं नेहरू और वर्तमान आर्थिक दृष्टिकोण के बीच सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है। नेहरू का विश्वास सार्वजनिक निवेश और संस्थागत निर्माण में था। वर्तमान मॉडल निजी निवेश और बाजार आधारित विकास को प्राथमिकता देता है। दोनों दृष्टिकोणों पर बहस हो सकती है लेकिन यह कहना मूर्खता है कि नेहरू की विरासत को केवल दिनों की संख्या के आधार पर चुनौती दी जा सकती है।
सच तो यह है कि नेहरू का रिकॉर्ड किसी कैलेंडर में दर्ज नहीं है। वह उन विश्वविद्यालयों में दर्ज है जहां लाखों छात्र शिक्षा प्राप्त करते हैं। वह उन प्रयोगशालाओं में दर्ज है जहां वैज्ञानिक अनुसंधान होता है। वह उन बांधों में दर्ज है जिन्होंने खेतों तक पानी पहुंचाया। वह उन लोकतांत्रिक संस्थाओं में दर्ज है जिन्होंने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनाए रखा। इसलिए यदि तुलना करनी ही है तो दिनों की नहीं, विरासतों की कीजिए। यदि रिकॉर्ड की बात करनी है तो संस्थाओं के निर्माण, लोकतंत्र की मजबूती, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक प्रगति और आर्थिक परिवर्तन के रिकॉर्ड की कीजिए। इतिहास प्रचार अभियानों से नहीं लिखा जाता। इतिहास उन संरचनाओं से लिखा जाता है जो किसी नेता के जाने के बाद भी समाज को दिशा देती रहती हैं। 4,399 दिन एक संख्या भर है। नेहरू की विरासत एक राष्ट्र की कहानी है और राष्ट्रों का इतिहास संख्याओं से नहीं, निर्माण से लिखा जाता है। यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण सत्य है।