वर्ष 1990 के दशक में बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड के रिश्तों ने फिल्म उद्योग को गहरे संकट में डाल दिया था। फिल्म निर्माण में काले धन की घुसपैठ, सितारों को धमकियां, जबरन वसूली और माफिया फंडिंग के आरोपों ने लम्बे समय तक हिंदी सिनेमा को प्रभावित किया। हालांकि सरकारी कार्रवाई और कॉरपोरेट निवेश के बाद स्थिति बदली लेकिन यह दौर आज भी बॉलीवुड के सबसे विवादास्पद अध्यायों में गिना जाता है

हिंदी फिल्म उद्योग की चमक-दमक के पीछे कई ऐसी कहानियां छिपी हैं जो पर्दे पर दिखाई नहीं देतीं। इनमें सबसे चर्चित और विवादास्पद कहानी बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड के रिश्तों की है। 1980 और विशेष रूप से 1990 के दशक में यह रिश्ता इतना गहरा हो गया था कि फिल्म निर्माण, कलाकारों की सुरक्षा, संगीत अधिकारों और वितरण व्यवस्था तक पर माफिया गिरोहों का प्रभाव दिखाई देने लगा था।

दरअसल उस समय भारतीय फिल्म उद्योग को औपचारिक उद्योग का दर्जा प्राप्त नहीं था। फिल्मों के लिए बैंकों से ऋण मिलना लगभग असंभव था। निर्माता निजी साहूकारों, वितरकों या अनौपचारिक स्रोतों से पैसा जुटाते थे। इसी वित्तीय शून्य का फायदा अंडरवर्ल्ड ने उठाया। मुम्बई के अपराध जगत से जुड़े गिरोहों ने फिल्मों में पैसा लगाना शुरू किया और धीरे-धीरे उनका प्रभाव बढ़ता गया।

1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक की शुरुआत में मुम्बई अंडरवर्ल्ड का सबसे बड़ा नाम दाऊद इब्राहिम था। उसके गिरोह डी-कम्पनी पर आरोप लगते रहे कि उसने फिल्म निर्माण और वितरण में भारी निवेश किया। उस दौर के कई निर्माताओं और वितरकों ने बाद में स्वीकार किया कि उन्हें अपराध जगत से जुड़े लोगों के फोन आते थे जिनमें कलाकारों को लेने, फिल्म के अधिकार बेचने या आर्थिक लेन-देन को लेकर दबाव बनाया जाता था।

1993 के मुम्बई बम धमाकों के बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया। जांच एजेंसियों ने दावा किया कि  अंडरवर्ल्ड केवल अपराध तक सीमित नहीं था बल्कि उसने मनोरंजन उद्योग में भी मजबूत नेटवर्क खड़ा कर लिया था। कई फिल्मी हस्तियों से पूछताछ हुई और मीडिया में बाॅलीवुड-माफिया गठजोड़ की चर्चाएं तेज हो गईं।

उस दौर में कई कलाकारों और निर्माताओं को धमकियां मिलने की खबरें आम थीं। कुछ मामलों में फिरौती की मांग की जाती थी जबकि कुछ मामलों में फिल्मों की कास्टिंग तक प्रभावित करने की कोशिश की जाती थी। प्रसिद्ध फिल्म निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि उन्हें धमकियों का सामना करना पड़ा। कई अन्य निर्माताओं ने भी सुरक्षा एजेंसियों से संरक्षण मांगा।

साल 1997 में संगीत उद्योग के बड़े नाम गुलशन कुमार की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया। जांच एजेंसियों ने इस मामले में अंडरवर्ल्ड से जुड़े तत्वों की भूमिका की जांच की। यह घटना इस बात का प्रतीक बन गई कि अपराध जगत और मनोरंजन उद्योग के रिश्ते कितने खतरनाक स्तर तक पहुंच चुके थे।

1990 के दशक में बाॅलीवुड और अंडरवर्ल्ड के कथित रिश्तों को लेकर एक और बड़ा विवाद दुबई में आयोजित होने वाली उन पार्टियों और स्टेज शो को लेकर था जिनमें फिल्मी हस्तियों की मौजूदगी चर्चा का विषय बनती थी। उस दौर में दाऊद इब्राहिम और उसके सहयोगियों की ओर से आयोजित बताई जाने वाली कुछ महफिलों और आयोजनों में कई फिल्मी सितारों के शामिल होने की खबरें मीडिया में प्रमुखता से प्रकाशित होती थीं। जांच एजेंसियों और पत्रकारों की रिपोर्टों में दावा किया गया कि दुबई उस समय बाॅलीवुड, क्रिकेट और अंडरवर्ल्ड के प्रभावशाली लोगों की मुलाकातों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था। कई कलाकारों की तस्वीरें और वीडियो भी सामने आए। हालांकि अधिकांश मामलों में किसी आपराधिक साजिश या अपराध में उनकी प्रत्यक्ष संलिप्तता सिद्ध नहीं हो सकी। इसके बावजूद इन आयोजनों ने यह धारणा मजबूत की कि उस दौर में फिल्म उद्योग का एक हिस्सा अंडरवर्ल्ड के प्रभाव से पूरी तरह अछूता नहीं था।

बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड के कथित रिश्तों को लेकर सबसे अधिक चर्चित मामलों में अभिनेत्री मंदाकिनी का नाम भी शामिल रहा। फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ से रातोंरात स्टार बनीं मंदाकिनी की कुछ तस्वीरें दुबई में दाऊद इब्राहिम के साथ सामने आने के बाद मीडिया में व्यापक चर्चा का विषय बनी थीं। इन तस्वीरों के आधार पर दोनों के बीच सम्बंधों को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए गए। हालांकि मंदाकिनी ने समय-समय पर इन आरोपों और अटकलों से इनकार किया। बावजूद इसके, यह प्रकरण बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड के कथित संपर्कों पर चलने वाली बहस का एक चर्चित उदाहरण बन गया और लम्बे समय तक मीडिया तथा फिल्म जगत में इसकी चर्चा होती रही।

इसी दौर में अभिनेता संजय दत्त का नाम भी 1993 में बम धमाकों के बाद हथियार रखने के मामले में सुर्खियों में आया। हालांकि उनका मामला अलग कानूनी प्रक्रिया का विषय था लेकिन इसने फिल्म उद्योग और अपराध जगत के कथित सम्पर्कों पर बहस को और तेज कर दिया।

1990 के दशक के अंत तक स्थिति इतनी गम्भीर हो चुकी थी कि कई फिल्मी हस्तियां विदेशों में आयोजित कार्यक्रमों में जाने से भी डरने लगी थीं। रिपोर्टों के अनुसार दुबई और अन्य खाड़ी देशों में होने वाले कुछ शो और आयोजनों में अंडरवर्ल्ड की मौजूदगी को लेकर लगातार चर्चाएं होती थीं। कुछ कलाकारों पर ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होने का दबाव के आरोप भी लगे। हालांकि नई सदी के साथ तस्वीर बदलनी शुरू हुई।

वर्ष 1998 में फिल्म उद्योग को औद्योगिक दर्जा मिलने के बाद बैंकों और वित्तीय संस्थानों से अवैध निवेश का रास्ता खुला। धीरे-धीरे बड़े काॅरपोरेट घराने फिल्म निर्माण में आए और वित्तीय व्यवस्था अधिक पारदर्शी हुई। इससे अंडरवर्ल्ड की आर्थिक पकड़ कमजोर पड़ने लगी। साथ ही मुम्बई पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई ने भी माफिया नेटवर्क पर दबाव बढ़ाया।

इसके बावजूद बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड का यह अध्याय भारतीय सिनेमा के इतिहास से कभी अलग नहीं हो पाया। इस दौर ने अनेक फिल्मों और वेब सीरीज को भी जन्म दिया। ‘कम्पनी’, ‘वन्स अपॉन ए टाइम इन मुम्बई’, ‘शूटआउट एट लोखंडवाला’ और ‘सेक्रेड गेम्स’ जैसी फिल्मों और वेब सीरीज ने अपराध जगत और मुम्बई की अंधेरी दुनिया को लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बना दिया।

फिल्म इतिहासकारों का मानना है कि बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड का रिश्ता केवल अपराध की कहानी नहीं बल्कि उस दौर की आर्थिक और संस्थागत कमजोरियों की भी कहानी है। जब एक विशाल उद्योग को वैध वित्तीय व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी, तब अपराध जगत ने उस खाली जगह को भरने की कोशिश की। यही कारण है कि इस संबंध को केवल सनसनीखेज घटनाओं के रूप में नहीं बल्कि भारतीय फिल्म उद्योग के विकास क्रम के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में भी देखा जाता है।

आज बाॅलीवुड पहले की तुलना में कहीं अधिक संगठित और कॉरपोरेट ढांचे में काम करता है लेकिन 1990 का दशक अब भी एक ऐसी याद के रूप में मौजूद है जब सपनों की नगरी मुम्बई में फिल्मी सितारों की चमक के पीछे अंडरवर्ल्ड का साया भी दिखाई देता था।

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