दक्षिणी लेबनान में इजराइल की लगातार सैन्य प्रगति ने पश्चिम एशिया में तनाव को नए स्तर पर पहुंचा दिया है। वहीं ईरान और अमेरिका के बीच एक बार फिर सैन्य टकराव यह संकेत दे रहे हैं कि दोनों देश पीछे हटने के बजाय अपनी-अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहे हैं। सवाल है कि आने वाले दिनों में कूटनीति सफलता मिलती है या सैन्य टकराव और बढ़ता है, इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं
पश्चिम एशिया एक बार फिर युद्ध और कूटनीति के बीच झूलता दिखाई दे रहा है। पिछले कुछ दिनों में दक्षिणी लेबनान में इजराइली सेना की बढ़ती सैन्य गतिविधियों ने न केवल लेबनान की सुरक्षा स्थिति को प्रभावित किया है बल्कि ईरान के साथ सम्भावित समझौते और पूरे क्षेत्र की राजनीतिक स्थिरता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस समय अमेरिका क्षेत्र में तनाव कम करने और विभिन्न पक्षों के बीच किसी प्रकार का राजनीतिक समाधान तलाशने की कोशिश कर रहा है, उसी समय लेबनान में इजराइली सैन्य अभियान का विस्तार नई चिंताओं को जन्म दे रहा है। विशेष रूप से दक्षिणी लेबनान के सामरिक महत्व वाले क्षेत्रों में इजराइली सेना की बढ़ती मौजूदगी को क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल सीमावर्ती सुरक्षा का प्रश्न नहीं है बल्कि इससे ईरान, हिज्बुल्लाह, अमेरिका और अरब देशों के बीच चल रही व्यापक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी प्रभावित हो सकती है।
इजराइल की बढ़ती सैन्य कार्रवाई
हाल के दिनों में इजराइली सेना ने दक्षिणी लेबनान में कई ऐसे इलाकों पर नियंत्रण स्थापित किया है जिन्हें हिजबुल्लाह की गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। इनमें सबसे चर्चित ब्यूफोर्ट किला है जो सदियों पुराना ऐतिहासिक दुर्ग होने के साथ-साथ दक्षिणी लेबनान की पहाड़ियों पर स्थित एक अत्यंत रणनीतिक स्थान भी है।
इजराइल का दावा है कि हिजबुल्लाह इस क्षेत्र का उपयोग निगरानी, हथियारों के भंडारण और इजराइली क्षेत्रों पर हमलों की तैयारी के लिए कर रहा था। इजराइली सेना का कहना है कि उसका अभियान भविष्य के खतरों को रोकने और उत्तरी इजराइल में रहने वाले नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए चलाया जा रहा है।
इजराइल के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व ने संकेत दिए हैं कि वे केवल जवाबी कार्रवाई तक सीमित नहीं रहना चाहते बल्कि ऐसी व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं जिसमें हिजबुल्लाह की सैन्य क्षमता को लम्बे समय के लिए कमजोर किया जा सके। यही कारण है कि हाल के अभियानों को केवल सामरिक कार्रवाई नहीं बल्कि दीर्घकालिक सुरक्षा रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
हिजबुल्लाह और ईरान का सम्बंध
लेबनान में सक्रिय हिजबुल्लाह को लम्बे समय से ईरान का सबसे प्रभावशाली क्षेत्रीय सहयोगी माना जाता है। 1980 के दशक में गठित यह संगठन आज केवल एक सशस्त्र समूह नहीं बल्कि लेबनान की राजनीति, समाज और सुरक्षा व्यवस्था का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। ईरान हिजबुल्लाह को आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य समर्थन प्रदान करता रहा है। इसी कारण इजरायल और पश्चिमी देशों की नजर में हिजबुल्लाह ईरान की क्षेत्रीय रणनीति का प्रमुख उपकरण माना जाता है।
तेहरान स्वयं हिजबुल्लाह को ‘प्रतिरोध धुरी’ का महत्वपूर्ण अंग बताता है। इस धुरी में इराक, सीरिया, यमन और अन्य क्षेत्रों में सक्रिय वे समूह शामिल हैं जो इजराइल और अमेरिकी प्रभाव का विरोध करते हैं। यही वजह है कि लेबनान में इजराइल की हर बड़ी सैन्य कार्रवाई का असर सीधे ईरान की रणनीतिक स्थिति पर पड़ता है। यदि हिजबुल्लाह कमजोर होता है तो इसे ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव के लिए भी झटका माना जाता है।
ईरान समझौते पर क्यों मंडरा रहा है खतरा?
वर्तमान संकट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ईरान के साथ चल रही कूटनीतिक प्रक्रिया है। अमेरिका और ईरान के बीच लम्बे समय से विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की कोशिशें जारी हैं। इनमें परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंध, क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री मार्गों की सुरक्षा जैसे विषय शामिल हैं। हालांकि किसी भी समझौते की सफलता के लिए क्षेत्रीय माहौल का अपेक्षाकृत शांत होना आवश्यक माना जाता है। यदि लेबनान में संघर्ष लगातार बढ़ता है और हिजबुल्लाह को भारी नुकसान होता है तो ईरान के लिए वार्ता की मेज पर लचीला रुख अपनाना कठिन हो सकता है।
ईरान के भीतर भी ऐसे राजनीतिक और धार्मिक समूह मौजूद हैं जो इजराइल के खिलाफ कठोर नीति की वकालत करते हैं। ऐसे माहौल में यदि लेबनान में इजराइली सैन्य कार्रवाई जारी रहती है तो ईरानी नेतृत्व पर घरेलू दबाव बढ़ सकता है और वह किसी सम्भावित समझौते से पीछे हट सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि इस समय लेबनान का मोर्चा केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं बल्कि ईरान-अमेरिका सम्बंधों की दिशा तय करने वाला कारक बन गया है।
अमेरिका की कठिन कूटनीतिक चुनौती
अमेरिका इस पूरे घटनाक्रम में सबसे कठिन स्थिति में दिखाई देता है। एक ओर वह अपने सबसे करीबी सहयोगी इजराइल की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है, दूसरी तरफ वह क्षेत्र में व्यापक युद्ध को रोकने और ईरान के साथ संवाद बनाए रखने का भी प्रयास कर रहा है। वाॅशिंगटन की चिंता यह है कि यदि लेबनान में संघर्ष बढ़ता है तो ईरान समर्थित अन्य समूह भी सक्रिय हो सकते हैं। इससे इराक, सीरिया और यमन जैसे देशों में भी तनाव बढ़ सकता है। अमेरिकी कूटनीतिक प्रयासों का मुख्य उद्देश्य यही है कि संघर्ष को सीमित रखा जाए और ऐसा कोई कदम न उठे जिससे पूरा क्षेत्र युद्ध की आग में झुलसने लगे। लेकिन जमीनी हालात बताते हैं कि यह लक्ष्य हासिल करना लगातार कठिन होता जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता
यूरोप, संयुक्त राष्ट्र और कई अरब देशों ने मौजूदा स्थिति पर चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि यदि समय रहते तनाव कम नहीं किया गया तो यह संघर्ष व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान स्थिति 2006 के इजराइल-हिज्बुल्लाह युद्ध की याद दिलाती है लेकिन इस बार परिस्थितियां अधिक जटिल हैं क्योंकि क्षेत्र में पहले से कई मोर्चों पर तनाव मौजूद है। अरब देशों को आशंका है कि यदि संघर्ष बढ़ा तो शरणार्थी संकट, आर्थिक अस्थिरता और सुरक्षा सम्बंधी समस्याएं और गम्भीर हो सकती हैं। यही कारण है कि विभिन्न राजधानियों से लगातार संयम बरतने और संवाद जारी रखने की अपील की जा रही है।
तेल बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर
पश्चिम एशिया विश्व के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा उत्पादक क्षेत्रों में से एक है। इसलिए यहां होने वाला कोई भी बड़ा सैन्य संघर्ष वैश्विक बाजारों को प्रभावित करता है। लेबनान और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव ने तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है। निवेशकों को चिंता है कि यदि संघर्ष का दायरा बढ़ा और ईरान प्रत्यक्ष रूप से इसमें शामिल हुआ तो तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं जहां से दुनिया के एक बड़े हिस्से का तेल निर्यात होता है। यदि इस क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है तो वैश्विक ऊर्जा कीमतों में तेज वृद्धि देखने को मिल सकती है, जिसका असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा।
फिलहाल पूरा पश्चिम एशिया एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। इजराइल अपने सुरक्षा हितों को लेकर पीछे हटने के संकेत नहीं दे रहा है जबकि हिजबुल्लाह और उसके समर्थक भी संघर्ष जारी रखने की बात कर रहे हैं। अमेरिका और अन्य शक्तियां कूटनीतिक समाधान खोजने की कोशिश में जुटी हैं लेकिन सफलता अभी दूर नजर आ रही है।
यदि आने वाले दिनों में युद्धविराम या राजनीतिक समझौते की दिशा में ठोस प्रगति नहीं होती तो लेबनान का यह संघर्ष केवल सीमा विवाद नहीं रहेगा बल्कि ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच व्यापक शक्ति संघर्ष का रूप ले सकता है। ऐसी स्थिति में न केवल ईरान के साथ सम्भावित समझौता खतरे में पड़ जाएगा बल्कि पूरा पश्चिम एशिया एक बार फिर लम्बे और विनाशकारी संघर्ष के दौर में प्रवेश कर सकता है।
क्या बड़े युद्ध की ओर बढ़ रहा है मध्य-पूर्व?
ईरान और अमेरिका के बीच ताजा सैन्य टकराव ने एक बार फिर पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। युद्धविराम के बावजूद ईरान द्वारा अमेरिका का अपाचे हेलीकाॅप्टर गिराए जाने के बाद लगातार दूसरे दिन अमेरिका ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर हमले किए हैं, जवाब में तेहरान ने भी अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 10 जून को साफ शब्दों में चेतावनी दी थी कि ईरान के खिलाफ और भी अधिक तीव्र सैन्य कार्रवाई की जाएगी।
ट्रम्प की चेतावनी के कुछ घंटों बाद ही अमेरिकी सेना ने पश्चिमी तेहरान, फार्स प्रांत, बंदर अब्बास और केशम समेत कई रणनीतिक इलाकों पर हवाई हमले किए। इसके अलावा गोरगन, सिरिक और मीनाब जैसे शहर भी अमेरिकी कार्रवाई की जद में आए। हमलों के बाद पश्चिमी तेहरान और फार्स प्रांत में एयर डिफेंस सिस्टम को सक्रिय कर दिया गया।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने सोशल मीडिया पर जारी बयान में कहा कि राष्ट्रपति के निर्देश पर ईरान में कई अतिरिक्त ‘आत्मरक्षा हमले’ शुरू किए गए हैं। अमेरिकी सेना का दावा है कि यह कार्रवाई ईरान की बढ़ती आक्रामकता के जवाब में की गई है। वहीं होर्मुज जलडमरूमध्य के पास स्थित बंदर अब्बास शहर में कई धमाकों की आवाजें सुनाई दीं। इससे पहले ट्रम्प ने कहा था, ‘हम आज फिर उन पर कड़ा प्रहार करेंगे।’ उन्होंने आरोप लगाया कि ईरान ने शांति समझौते के लिए चल रही बातचीत में बहुत अधिक समय गंवाया है और अब उसे इसकी कीमत चुकानी होगी। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भी चेतावनी देते हुए कहा कि अमेरिका ईरान के ‘प्रमुख सैन्य ठिकानों’ को निशाना बनाना जारी रखेगा।
दूसरी ओर ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई तेज कर दी है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड काॅप्र्स के अनुसार अमेरिकी हमलों के जवाब में कुवैत के अली अल-सलेम और अहमद अल-जाबेर एयरबेस तथा बहरीन के शेख ईसा एयरबेस समेत 18 महत्वपूर्ण अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया है। सबसे बड़ा कदम उठाते हुए ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह बंद करने का दावा किया है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के लगभग एक-पांचवें तेल व्यापार के लिए जीवनरेखा माना जाता है। रिपोर्टों के अनुसार आईआरजीसी ने इस क्षेत्र से गुजर रहे दो जहाजों पर भी हमला किया है। यदि यह स्थिति लम्बे समय तक बनी रहती है तो वैश्विक तेल कीमतों में भारी उछाल आ सकता है और इसका असर भारत समेत दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है। हालांकि सवाल यह है कि क्या इन ताजा हमलों से युद्ध और व्यापक होगा या फिर दोनों पक्ष सीमित सैन्य कार्रवाई तक ही खुद को सीमित रखेंगे?
मध्य-पूर्व मामलों के विशेषज्ञ मानते हैं कि फिलहाल यह स्थिति ‘जैसे को तैसा’ वाली प्रतिक्रिया का हिस्सा अधिक दिखाई देती है। उनके अनुसार अभी तक के घटनाक्रम को पूर्ण युद्ध की शुरुआत नहीं माना जा सकता लेकिन लगातार बढ़ती जवाबी कार्रवाइयों से गलत आकलन या किसी बड़े सैन्य हादसे का खतरा जरूर बढ़ गया है। हालात यह संकेत देते हैं कि न तो अमेरिका और न ही ईरान किसी बड़े युद्ध में उतरना चाहते हैं लेकिन लगातार बढ़ती सैन्य गतिविधियां, कड़ी बयानबाजी और क्षेत्रीय तनाव किसी भी छोटी चूक को बड़े संकट में बदल सकते हैं। यही वजह है कि पूरी दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में कूटनीति जीतती है या फिर मध्य-पूर्व एक नए संघर्ष की आग में धकेल दिया जाता है। यदि तनाव और बढ़ता है तो इसका असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि तेल बाजार, वैश्विक अर्थव्यवस्था, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी गहरा प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए यह संघर्ष अब सिर्फ दो देशों के बीच की लड़ाई नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन चुका है।