पार्क के कोने में/घास के बिछौने पर लेटे-लेटे
हम अपनी प्रेयसी से पूछ बैठे/क्यों डियर!
डेमोक्रेसी क्या होती है?/वह बोलीं-
तुम्हारे वादों जैसी होती है!/इंतजार में,
बहुत तड़पाती है/झूठ बोलती है/सताती है,
तुम तो आ भी जाते हो/ये कभी नहीं आती है!
एक विद्वान से पूछा/वह बोले-हमने राजनीति-शास्त्र
सारा पढ़ मारा/डेमोक्रेसी का मतलब है-
आजादी, समानता और भाईचारा।
आजादी का मतलब/राम नाम की लूट है,
इसमें गधे और घास/दोनों को बराबर की छूट है।
घास आजाद है कि/चाहे जितनी बढ़े,
और गधे स्वतंत्र हैं कि/लेटे-लेटे या खड़े-खड़े
कुछ भी करें/जितना चाहें इस घास को चरें।
और समानता/कौन है जो इसे नहीं मानता?
हमारे यहां-गरीबों और गरीबों में समानता है,
अमीरों और अमीरों में समानता है,
मंत्रियों और मंत्रियों में समानता है,
संत्रियों और संत्रियों में समानता है।
चोरी, डकैती, सेंधमारी, बटमारी
राहजनी, आगजनी, घूसखोरी, जेबकतरी
इन सबमें समानता है।
बताइए, कहां असमानता है?
और भाईचारा/तो सुनो भाई!
यहां हर कोई/एक-दूसरे के आगे
चारा डालकर/भाईचारा बढ़ा रहा है।
जिसके पास/डालने को चारा नहीं है
उसका किसी से/भाईचारा नहीं है।
और अगर वो बेचारा है/तो इसका हमारे पास
कोई चारा नहीं है/फिर हमने अपने
एक जेलर मित्र से पूछा-
आप ही बताइए मिस्टर नेगी।
वह बोले-डेमोक्रेसी?
आजकल जमानत पर रिहा है,
कल सींखचों के अंदर दिखाई देगी।
अंत में मिले हमारे मुसद्दीलाल,
उनसे भी कर डाला यही सवाल।
बोले-डेमोक्रेसी?/दफ्तर के अफसर से लेकर
घर की अफसरा तक/पड़ती हुई फटकार है!
जबान के कोड़ों की मार है/चीत्कार है, हाहाकार है।
इसमें लात की मार से कहीं तगड़ी/हालात की मार है।
अब मैं किसी से/ये नहीं कहता/कि मेरी ऐसी-तैसी हो गई है,
कहता हूं-मेरी डेमोक्रेसी हो गई है!
-अशोक चक्रधर
फ्रांस की प्रसिद्ध लोकोक्ति “The king is dead, long live the king” सत्ता के उस शाश्वत चक्र की ओर संकेत करती है जहां व्यक्ति बदलता है, पर व्यवस्था स्वयं को जीवित बनाए रखती है। इसी तर्ज पर यदि आज के भारत के चुनावी परिदृश्य को देखें तो एक विडम्बनापूर्ण वाक्य उभरता है, ‘‘लोकतंत्र मर गया है, लोकतंत्र अमर रहे।’’
यह वाक्य विरोधाभासी लग सकता है लेकिन हाल ही में आए पांच राज्यों के चुनाव परिणाम, विशेषकर पश्चिम बंगाल और असम में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड जीत, इस विरोधाभास को समझने का एक ठोस आधार प्रदान करते हैं। इन परिणामों ने न केवल राजनीतिक समीकरण बदले हैं बल्कि मतदाता के मानस, उसकी प्राथमिकताओं और लोकतांत्रिक चेतना को लेकर भी गम्भीर प्रश्न खड़े किए हैं। इन चुनावों में कुल मिलाकर जो तस्वीर उभरकर सामने आई, वह एकतरफा नहीं तो स्पष्ट रूप से झुकी हुई अवश्य दिखती है।
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए सत्ता पर कब्जा जमाया और लम्बे समय से स्थापित क्षेत्रीय राजनीति को चुनौती देते हुए उसे परास्त किया वहीं तृणमूल कांग्रेस, जो अब तक राज्य की राजनीति का केंद्र रही थी, को एक बड़ी राजनीतिक हार का सामना करना पड़ा।
असम में भी भारतीय जनता पार्टी ने अपनी स्थिति को और मजबूत करते हुए स्पष्ट बहुमत हासिल किया। यहां विपक्ष बिखरा हुआ नजर आया और कांग्रेस अपनी पुरानी पकड़ को पुनः स्थापित करने में असफल रही।
अन्य राज्यों में मिश्रित परिणाम देखने को मिले। तमिलनाडु ने डीएमके को नकार एक नए राजनीतिक दल को जीता डाला है तो केरल में वामपंथियों को बाहर कर कांग्रेस को एक बार फिर से सत्ता दे डाली है। लेकिन समग्र रूप से यह स्पष्ट है कि इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने अपने राजनीतिक विस्तार और वैचारिक प्रभाव को और सुदृढ़ किया है जबकि विपक्षी दलों की कमजोरी और विखंडन भी उतनी ही स्पष्टता से सामने आया है।
लोकतंत्र की मूल आत्मा केवल मतदान की प्रक्रिया में नहीं बल्कि उस चेतना में निहित होती है जिसके आधार पर जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है। यदि हम इन चुनावों को देखें तो कई गम्भीर प्रश्न सामने आते हैं, स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन जैसे प्रक्रियात्मक हस्तक्षेपों पर उठे सवाल, केंद्रीय जांच एजेंसियों के कथित दुरुपयोग के आरोप, बेरोजगारी की लगातार बढ़ती समस्या, आर्थिक असमानता के बीच चैड़ी होती खाई, राज्य की दमनकारी नीतियों को लेकर असंतोष। इन सबके बावजूद यदि चुनावी परिणाम असम में एकतरफा रूप से सत्ता पक्ष के पक्ष में जाते हैं तो यह केवल राजनीतिक सफलता का संकेत नहीं बल्कि सामाजिक-राजनीतिक मनोविज्ञान का भी दर्पण है। यह दर्शाता है कि मतदाता किन मुद्दों को प्राथमिकता दे रहा है और किन्हें नजरअंदाज कर रहा है।
इन चुनावों में सबसे निर्णायक तत्व यदि कोई दिखाई देता है तो वह है ध्रुवीकरण। धर्म, पहचान और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मुद्दे, विशेषकर हिंदुत्व ने चुनावी विमर्श को इस हद तक प्रभावित किया कि विकास, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत प्रश्न हाशिए पर चले गए। यहां एक मूलभूत सवाल उठता है: क्या मतदाता ने अपने जीवन की वास्तविक समस्याओं को पीछे छोड़कर एक वैचारिक पहचान को प्राथमिकता दी?
यदि उत्तर ‘हां’ है तो यह लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को लेकर गहरी चिंता का विषय है। और यदि ‘नहीं’ है तो यह समझना और भी आवश्यक हो जाता है कि आखिर किन कारणों ने मतदाता को इस दिशा में प्रेरित किया। क्या यह जनता की असफलता है?
लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है। उसका निर्णय अंतिम होता है, चाहे वह निर्णय कितना ही विवादास्पद क्यों न हो? लेकिन क्या जनता के निर्णय पर प्रश्न उठाना लोकतंत्र-विरोधी है? या यह लोकतंत्र की आत्मा को बचाने का एक आवश्यक प्रयास है? जब मतदाता बार-बार उन मुद्दों की अनदेखी करता है जो उसके प्रत्यक्ष जीवन से जुड़े हैं, जैसे रोजगार, महंगाई, शिक्षा और उसके स्थान पर भावनात्मक या वैचारिक मुद्दों को प्राथमिकता देता है, तब यह केवल एक राजनीतिक प्रवृत्ति नहीं बल्कि एक सामाजिक संकट भी बन जाता है। यहां यह भी समझना आवश्यक है कि लोकतंत्र में मतदाता की समझ केवल व्यक्तिगत नहीं होती, वह मीडिया, प्रचार, राजनीतिक विमर्श और सामाजिक परिवेश से भी निर्मित होती है। ऐसे में सवाल केवल मतदाता पर नहीं बल्कि उस पूरे तंत्र पर भी उठता है जो उसकी सोच को आकार देता है।
‘‘लोकतंत्र मर गया है’’, यह कथन यहां एक रूपक है। इसका अर्थ यह नहीं कि चुनावी प्रक्रिया समाप्त हो गई है या संस्थाएं काम करना बंद कर चुकी हैं बल्कि इसका अर्थ है- लोकतंत्र की आत्मा कमजोर हो रही है विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता पर सवाल उठ रहे हैं, बहस और असहमति की जगह संकीर्णता ले रही है। चुनावी प्रक्रिया में असमानता और प्रभाव के नए आयाम जुड़ रहे हैं।
जब लोकतंत्र केवल एक संख्यात्मक खेल बनकर रह जाए, और गुणात्मक विमर्श समाप्त हो जाए, तब उसकी मृत्यु का आभास होता है। फिर भी लोकतंत्र जिंदा है लेकिन इसी के साथ दूसरा वाक्य भी उतना ही सत्य है, ‘‘लोकतंत्र अमर रहे।’’ क्योंकि अंततः जनता ने मतदान किया सत्ता का हस्तांतरण चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से हुआ परिणाम जनता की इच्छा का प्रतिबिम्ब हैं यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति और उसकी सबसे बड़ी विडम्बना भी है, वह अपने भीतर ही अपने विरोधाभासों को समेटे रहता है। आज जो जनादेश है, वही कल बदल भी सकता है। जो सत्ता आज अजेय दिखती है, वह कल चुनौती के घेरे में भी आ सकती है।
लोकतंत्र का यह चक्र ही उसे जीवित रखता है। इन चुनाव परिणामों को केवल जीत-हार के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं है। यह एक गहरे आत्ममंथन का अवसर है, क्या हम एक ऐसे लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं जहां भावनाएं तथ्यों पर भारी पड़ती हैं? क्या मतदाता की प्राथमिकताएं बदल रही हैं या उन्हें बदला जा रहा है? क्या विपक्ष अपनी भूमिका निभाने में विफल हो रहा है या उसे व्यवस्थित रूप से कमजोर किया जा रहा है? और सबसे महत्त्वपूर्ण, क्या हम लोकतंत्र को केवल जीवित रखना चाहते हैं या उसे स्वस्थ भी बनाना चाहते हैं? अंततः लोकतंत्र की असली शक्ति केवल मतदान में नहीं बल्कि सचेत नागरिकता में है और जब तक यह चेतना जीवित है, लोकतंत्र मरकर भी जीवित रहेगा। हालांकि वर्तमान में जो हालात हैं वह किसी अघोषित आपातकाल से कम नहीं हैं। लोकतंत्र के हर स्तम्भ को फिर चाहे वह मीडिया हो, न्यायपालिका को, नौकरशाही हो या फिर चुनाव आयोग सरीखी अन्य संवैधानिक संस्थाएं, सभी का बुरी तरह क्षरण हो चुका है। आपातकाल के दौरान कम से कम न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना जैसों के चलते लोकतंत्र की वापसी की उम्मीद बनी रही थी, आज ऐसा कोई हंसराज दूर-दूर तक नजर नहीं आता। फिर भी आशा ही जीवन है इसलिए इस मुल्क में लोकतंत्र जिंदा रहेगा इसकी उम्मीद तो बनती है।