उत्तराखण्ड के 70 निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है अल्मोड़ा जिले का सोमेश्वर विधानसभा क्षेत्र। यह सीट अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित है। 2012 में इस क्षेत्र में कुल 75,643 मतदाता थे। सोमेश्वर विधानसभा सीट पर फिलहाल बीजेपी का कब्जा है। यहां से विधायक और सरकार में महिला बाल विकास एवं खेल मंत्री रेखा आर्या हैं जिन्होंने 2022 के चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र बाराकोटी को हराया था और वह इससे पहले भी विधायक रह चुकी हैं जिससे यह सीट विकास और जन भागीदारी के लिए महत्वपूर्ण है। यह कोसी और साई नदियों के किनारे बसा एक पहाड़ी क्षेत्र और नदियों द्वारा लाई गई उपजाऊ मिट्टी के कारण कृषि प्रधान क्षेत्र है जो अपनी हरियाली और कृषि के लिए जाना जाता है, जिसमें कई गांव, क्षेत्र और ब्लाॅक शामिल हैं। मुख्य रूप से यह सोमेश्वर तहसील और उसके आस-पास के ग्रामीण इलाकों को कवर करता है जैसे कि कोसी, डीडा, द्वारशों, कालिका, चैकुनी, मोना, चनौदा, बाबरखोला, शीतलाखेत, कठपुड़िया, मजखाली, हवालबाग, कंधार कुआ, ताकुला, कुली जैसे अत्यंत पिछड़े क्षेत्र भी इसी विधानसभा का हिस्सा हैं और इन क्षेत्रों के सभी ग्राम पंचायतों को यह विधानसभा क्षेत्र नियंत्रित करता है
सोमेश्वर विधानसभा उत्तराखण्ड के 70 निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है। अल्मोड़ा जिले में स्थित यह निर्वाचन क्षेत्र अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित है। 2012 में इस क्षेत्र में कुल 75,643 मतदाता थे। सोमेश्वर विधानसभा सीट पर फिलहाल बीजेपी का कब्जा है। यह सीट वर्तमान में भाजपा की महिला बाल विकास एवं खेल मंत्री रेखा आर्या के पास है, जिन्होंने 2022 के चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र बाराकोटी को हराया था और वह इससे पहले भी विधायक रह चुकी हैं जिससे यह सीट विकास और जन भागीदारी के लिए महत्वपूर्ण है। यह कोसी और साई नदियों के किनारे बसा एक पहाड़ी क्षेत्र और नदियों द्वारा लाई गई उपजाऊ मिट्टी के कारण कृषि प्रधान क्षेत्र है। जो अपनी हरियाली और कृषि के लिए जाना जाता है, जिसमें कई गांव, क्षेत्र और ब्लाॅक शामिल हैं। मुख्य रूप से यह सोमेश्वर तहसील और उसके आस-पास के ग्रामीण इलाकों को कवर करता है जैसे कि कोसी, डीडा, द्वारशों, कालिका, चैकुनी मोना, चनौदा, बाबरखोला, शीतलाखेत, कठपुड़िया, मजखाली, हवालबाग, कंधार कुआ, ताकुला, कुली जैसे अत्यंत पिछड़े क्षेत्र भी इसी विधानसभा का हिस्सा हैं और इन क्षेत्रों के सभी ग्राम पंचायतों को यह विधानसभा क्षेत्र नियंत्रित करता है।
‘दि संडे पोस्ट’ ने सोमेश्वर, कोसी, शीतलाखेत, कठपुड़िया, द्वारशों, मजखाली, डीडा, चैकोनी मोना, कालिका, में व्यापक सर्वेक्षण किया। सर्वे के दौरान यह पाया गया कि कई इलाकों में पेयजल आपूर्ति, ट्रैफिक प्रबंधन, स्वास्थ्य सेवाओं, स्ट्रीट लाइट, रोजगार, काश्तकारी की नाजुक स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि विकास की दिशा में प्रयास तो हुए हैं लेकिन नशे का बढ़ता व्यवसाय में ही बेहतर क्रियान्वयन दिखा है। ग्रामीणों का कहना है कि जंगली सूअर, बंदर और बाघ के कारण खेती बर्बाद हो रही है। जमीनें बंजर पड़ती जा रही हैं और युवा रोजगार की तलाश में बाहर जा रहे हैं। ज्यादातर क्षेत्रों से पलायन की स्थिति 70 प्रतिशत हो चुकी है।
सोमेश्वर विधानसभा में बीते पांच वर्षों में सरकार द्वारा किए गए विकास कार्यों और बजट आवंटन को लेकर जमीनी हकीकत और सरकारी दावों के बीच गहरी खाई नजर आती है। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि सरकार हर चुनाव से पहले ‘काम किया है, काम करेंगे’ जैसे वाक्यों को दोहराती रही है लेकिन आम जनता को आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार सरकार द्वारा कितना बजट जारी किया गया, यह जानकारी आम आदमी को नहीं होती लेकिन सवाल यह है कि अगर लगातार बजट आ रहा है तो वह जमीन पर दिखाई क्यों नहीं देता?
बीते वर्षों में सोमेश्वर विधानसभा के चनौदा और लोध घाटी क्षेत्र में कई बार भीषण आपदाएं आईं। आपदा के दौरान सड़कें दो दिनों तक मलबे से बंद रहीं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उस समय क्षेत्र की विधायक और कैबिनेट मंत्री ने मौके पर पहुंचना भी जरूरी नहीं समझा।
सोमेश्वर क्षेत्र में अस्पताल का निर्माण वर्षों से लम्बित है। काम की गति इतनी धीमी रही कि आज भी गम्भीर मरीजों को अल्मोड़ा या हल्द्वानी रेफर किया जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि चुनावी वर्ष नजदीक आते ही अस्पताल के काम में अचानक तेजी दिखाई देने लगी है जिसे वे चुनावी औपचारिकता मानते हैं।
स्कूल हैं, शिक्षक नहीं, काॅलेज बदहाल
विकासखंड में लगभग 179 प्राथमिक विद्यालय हैं लेकिन औसतन हर स्कूल में शिक्षकों की संख्या भी पूरी नहीं है। यह स्थिति तब है जब क्षेत्र की विधायक स्वयं कैबिनेट मंत्री हैं। क्षेत्र में विश्वविद्यालय नहीं है और जो महाविद्यालय है, उसकी हालत भी चिंताजनक है। लगातार छात्र संघ ने नए विषय, एनसीसी, काॅलेज को जोड़ने वाली सड़क के निर्माण की मांग की हैं। काॅलेज से जुड़ी सड़क की हालत वर्षों से खराब है और भवन में भी दरारें पड़ने लगी हैं। एमए और विज्ञान जैसे प्रयोगात्मक विषयों के अभाव में छात्रों को अल्मोड़ा या हल्द्वानी जाना पड़ता है।
सोमेश्वर क्षेत्र कृषि के लिहाज से उपजाऊ है। यहां धान और आलू की अच्छी पैदावार होती है लेकिन बंदर और आवारा पशु खेती को लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं। सरकार या प्रशासन की ओर से इस समस्या पर कोई ठोस पहल नहीं की गई है। लोगों का कहना है कि जब किसान थोड़ा जोखिम लेकर कुछ नया करना चाहता है तो उसे न तकनीकी मदद मिलती है, न आर्थिक सहयोग।
क्षेत्र की लगभग 70 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन- यापन करती है लेकिन बड़ी संख्या में लोगों के पास बीपीएल कार्ड नहीं हैं। आंगनबाड़ी केंद्रों से मिलने वाले पोषण आहार की समय-सीमा तक समाप्ति की शिकायतें भी सामने आई हैं। लोगों का कहना है कि जब खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री स्वयं इसी क्षेत्र से हैं तो हालात और बेहतर होने चाहिए थे।
जहां पहले सोमेश्वर क्षेत्र में एक ही शराब भट्टी थी वहीं अब दौलाघट, कौसी, कठपुड़िया, मजखाली में भी शराब की दुकानें खुल चुकी हैं। विधानसभा का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं जहां शराब भट्टी न हो, लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब शिक्षा संस्थानों और आईटीआई में सुधार की जरूरत थी, तब शराब की दुकानें बढ़ाना किस विकास माॅडल का हिस्सा है?
कोसी क्षेत्र के बाजार में आज भी सार्वजनिक शौचालय नहीं, बंदरों का आतंक, आवारा पशुओं से गंदगी, खराब स्ट्रीट लाइट जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। मजखाली और कठपुड़िया क्षेत्रों में हर घर नल योजना के
बावजूद नलों में पानी नहीं आ रहा।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले चार वर्षों में विधायक की क्षेत्र में मौजूदगी न के बराबर रही, लेकिन चुनावी वर्ष आते ही वे महीने में 10-12 दिन क्षेत्र में दिखाई देने लगी हैं।
क्षेत्र के लोगों का साफ कहना है कि यह कार्यकाल पूरी तरह असफल रहा है। कैबिनेट मंत्री होने के बावजूद यदि सोमेश्वर की स्थिति यह है तो यह सरकार और जनप्रतिनिधि, दोनों पर गम्भीर सवाल खड़े करता है।
सबसे शर्मनाक यह है कि माननीय कैबिनेट मंत्री रेखा आर्या के पास ही (युवा कल्याण एवं खेल) मंत्रालय की अहम जिम्मेदारी भी है लेकिन फिर भी अभी तक उन्हीं की विधानसभा में खिलाड़ियों के खेलने के लिए न तो मैदान है, न कोई रोजगार का माध्यम, शिक्षा सुविधा जस की तस है जो बेहद निराशाजनक और चिंताजनक है।
सोमेश्वर विधानसभा का डीडा क्षेत्र, जिसे लम्बे समय से भारतीय जनता पार्टी का गढ़ माना जाता है, आज 2026 में भी बुनियादी विकास की बाट जोह रहा है। वर्षों से विधायक, जिला पंचायत सदस्य और अन्य जनप्रतिनिधि भाजपा समर्थित होते आए हैं, इसके बावजूद यह क्षेत्र उपेक्षा का दंश झेल रहा है। स्थानीय हालात यह सवाल खड़ा करते हैं कि सत्ता में होने के बावजूद विकास क्यों नहीं पहुंचा?
सिरोत घाटी के नाम से मशहूर इस क्षेत्र की द्वारशों-काकड़ी घाट सड़क लगभग 45 वर्ष पुरानी है लेकिन आज तक इस पर रोडवेज बसों का संचालन शुरू नहीं हो पाया है। सड़क की स्थिति ऐसी है कि न तो परिवहन निगम की बसें चलती हैं, न ही आरटीओ द्वारा नियमित निरीक्षण किया गया। परिणाम स्वरूप, ग्रामीणों को आवागमन के लिए निजी साधनों पर निर्भर रहना पड़ता है जो आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए बड़ी परेशानी है।
क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बेहद चिंताजनक है। किसी भी गम्भीर बीमारी की स्थिति में मरीजों को करीब 30 किलोमीटर दूर रानीखेत के सरकारी अस्पताल ले जाना पड़ता है। स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों द्वारा कई बार मुख्यमंत्री और क्षेत्रीय विधायक को पत्र भेजे गए लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी। उरोली ग्राम पंचायत के अंतर्गत 11 गांवों के लिए स्थापित एनएम सेंटर को अस्पताल में बदले जाने की मांग वर्षों से की जा रही है। इसी क्रम में मूल निवासी संघ रानीखेत द्वारा 19 अक्टूबर 2018 को डोला पालकी आंदोलन के जनक स्व. जयानन्द भारती की जयंती के अवसर पर महिला एवं बाल विकास मंत्री व क्षेत्रीय विधायक रेखा आर्या को ज्ञापन भेजा गया था लेकिन सात वर्ष बीत जाने के बाद भी इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
3 जनवरी 2025 को गरीबी एवं शैक्षिक उत्थान समिति उत्तराखण्ड द्वारा सावित्रीबाई फुले की जयंती के अवसर पर भाजपा जिला मंत्री दीपक कन्नू शाह के माध्यम से महिला एवं बाल विकास मंत्री के नाम एक और मांग पत्र भेजा गया। स्थानीय लोगों का कहना है कि एक वर्ष बीत जाने के बावजूद उस पर भी कोई पहल नहीं की गई।
विकास के नाम पर क्षेत्र में अधूरे कार्यों की भरमार है। जिला पंचायत अल्मोड़ा द्वारा वर्ष 2016 में बनाई गई एक पुलिया पर आज तक सुरक्षा दीवार नहीं लगाई गई है। इस सम्बंध में कई बार जिला प्रशासन से शिकायत की गई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई, जिससे हादसे की आशंका बनी रहती है।
डीडा क्षेत्र में जंगली जानवरों, बंदरों और अन्य पशुओं का आतंक लगातार बढ़ रहा है। रात के समय ये जानवर किसानों की फसलों को पूरी तरह नष्ट कर देते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इस गम्भीर समस्या को लेकर न तो विधायक और न ही सांसद कभी क्षेत्र में आए।
स्थानीय लोगों को छोटे-छोटे कामों के लिए भी 80 किलोमीटर दूर द्वाराहाट विकासखंड जाना पड़ता है। विकासखंड की दूरी अधिक होने के कारण कई ग्रामीण सरकारी योजनाओं से वंचित रह जाते हैं।
क्षेत्र में गरीब और अनुसूचित जाति के परिवारों की हालत बेहद दयनीय है। स्थानीय निवासी और सामाजिक/आरटीआई कार्यकर्ता पूरन शिल्पकार बताते हैं कि कारखेत, डीडा की अनुसूचित जाति की विधवा लीला देवी पिछले 25 वर्षों से बिना बिजली के अंधेरे में जीवन-यापन कर रही है। इस सम्बंध में 7 जनवरी 2025 को संयुक्त मजिस्ट्रेट रानीखेत को लिखित शिकायत दी गई थी, लेकिन एक वर्ष बीत जाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।
डीडा क्षेत्र में स्कूल, पेयजल, बिजली, यातायात और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं की स्थिति बेहद खराब है। रोजगार के कोई साधन नहीं हैं और ऊपर से जनप्रतिनिधियों की लगातार उपेक्षा से लोगों में गहरी
नाराजगी है। ग्रामीणों का कहना है कि वे हर चुनाव में इस उम्मीद के साथ मतदान करते हैं कि इस बार विकास होगा लेकिन हालात जस के तस बने हुए हैं। स्थानीय नागरिकों के अनुसार, डीडा क्षेत्र की यह तस्वीर विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच गहरे अंतर को उजागर करती है।
नोट:- विधायक एवं उनके प्रतिनिध से बार-बार बात करने पर भी जनप्रतिनिधि द्वारा साक्षात्कार के लिए समय नहीं दिया गया।
पानी की आपूर्ति नियमित होती है मगर यह मांग से बहुत कम है। सिरौता-देवलीखान पेयजल पम्पिंग योजना में 40 से अधिक गांवों के हजारों परिवार जुङ़े हैं मगर इस योजना की क्षमता बहुत कम है जिस कारण प्रति व्यक्ति 200 लीटर प्रतिदिन के मानक से काफी कम पानी मिलता है। गर्मियों में इस योजना में पानी की आपूर्ति बेहद कम हो जाती है। काकड़ीघाट-मटीला-शीतलाखेत मोटर मार्ग में अंतिम 5 किलोमीटर का डामर और सोलिंग उखड़ गई है। इस सड़क में केवल एक साल पहले डामरीकरण कार्य हुआ था। काकड़ीघाट-सड़क-शीतलाखेत सड़क के अंतिम दो किलोमीटर हिस्से में डामरीकरण कार्य पिछले 8 साल से नहीं हुआ है। इन दोनों सड़कों की खराब स्थिति के कारण स्याहीदेवी- शीतलाखेत क्षेत्र में पर्यटन का विकास नहीं हो पा रहा है। रोजगार सृजन की सम्भावनाओं पर विपरीत असर पड़ रहा है। एएनएम सेंटर और राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय है।
एलोपैथिक चिकित्सालय की घोषणा हुई है, आपात स्थिति में 33 किलोमीटर दूर रानीखेत या अल्मोड़ा जाना पड़ता है, गांव में नियमित स्वास्थ्य शिविर या डाॅक्टर की विजिट नहीं होती है, आज भी गांव से पलायन जारी है, शीतलाखेत क्षेत्र में सिंचाई वर्षा पर निर्भर है। शीतलाखेत को पर्यटन गांव के रूप में विकसित करने के लिए अब तक कोई विशेष प्रयास नहीं किए गए हैं जबकि इको-टूरिज्म के रूप में यह क्षेत्र अच्छी प्रगति कर सकता है। महिलाओं को रोजगार या स्वरोजगार से जोड़ने की कोई ठोस पहल सरकारी स्तर पर अब तक नहीं हुई। पर्यटन रोजगार का अच्छा माध्यम बन सकता था मगर पर्यटन के विकास के लिए अच्छी सड़कों का अभाव है, क्षेत्र का प्रचार-प्रसार भी बहुत कम है। मानव वन्य जीव संघर्ष विशेषकर सूअर, लंगूर और बंदरों के आतंक से सभी किसान, बागवान परेशान हैं। स्थानीय स्तर पर अच्छे कार्यकर्ता होते तो क्षेत्र की बहुत-सी समस्याओं का समाधान हो सकता था।
गजेंद्र पाठक, सामाजिक कार्यकर्ता, शीतलाखेत
सोमेश्वर विधानसभा का डीडा क्षेत्र जिसे भारतीय जनता पार्टी का गढ़ माना जाता है। कई वर्षों से यहां विधायक जिला पंचायत सदस्य सभी भाजपा समर्थित बनते आ रहे हैं लेकिन आज 2026 में भी यह क्षेत्र विकास की बाट जोह रहा है। भाजपा शासित होने के बाद भी यह क्षेत्र उपेक्षा का दंश झेल रहा है। सिरोत घाटी के नाम से मशहूर इस क्षेत्र में 45 साल पुरानी द्वारशों काकड़ी घाट सड़क पर आज भी रोडवेज बसों का संचालन नहीं हो रहा है, क्षेत्र के लोगों को आवागमन के लिए बहुत परेशानी का सामना करना पड़ता है और न तो इस सड़क पर कभी आरटीओ आता है।
इस क्षेत्र में किसी के बीमार होने पर उसे 30 किलोमीटर दूर रानीखेत सरकारी अस्पताल में लेकर जाना पड़ता है। कई बार स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों द्वारा क्षेत्र के विकास के लिए मुख्यमंत्री और क्षेत्र के विधायक को पत्र भेजे गए हैं लेकिन आज तक उन पर कोई सुनवाई नहीं हुई। उरोली ग्राम पंचायत में 11 गांव की एनम सेंटर को अस्पताल में बदलने के लिए कई बार स्थानीय लोगों द्वारा सरकार से मांग की गई है जिसके क्रम में मूल निवासी संघ रानीखेत द्वारा डोला पालकी आंदोलन के जनक श्री जयानन्द भारती जी की जयंती के अवसर पर 19 अक्टूबर 2018 को महिला एवं बाल विकास मंत्री तथा क्षेत्रीय विधायक श्रीमती रेखा आर्या को समस्याओं से सम्बंधित एक ज्ञापन भेजा गया जिस पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
इसके बाद 3 जनवरी 2025 को गरीबी एवं शैक्षिक उत्थान समिति उत्तराखण्ड द्वारा सावित्रीबाई फुले की जयंती के अवसर पर भाजपा जिला मंत्री श्री दीपक कन्नू शाह द्वारा एक मांग पत्र महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती रेखा आर्या के नाम जिसमें स्थानीय समस्याओं के समाधान हेतु भेजा गया। उस पर भी पूरा 1 वर्ष बीतने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई है। क्षेत्र में विकास का हाल यह है कि जिला पंचायत अल्मोड़ा द्वारा 2016 में बनाई गई एक पुलिया पर सुरक्षा ग्रिल तक नहीं लगाई गई है जिसके लिए कई बार जिला प्रशासन से मांग की गई लेकिन उसे पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। क्षेत्र में जंगली जानवरों और बंदरों का तथा बर्हसिंगों का बहुत ही आतंक है जो रात में किसानों की सारी फसलों को नष्ट कर देते हैं। क्षेत्र में कभी भी ना तो विधायक और नहीं सांसद आते हैं।
स्थानीय लोगों को छोटे-छोटे कामों के लिए भी 80 किमी दूर विकासखंड द्वाराहाट जाना पड़ता है। विकासखंड दूर होने के कारण क्षेत्रवासियों को कई योजनाओं का लाभ ही नहीं मिल पाता है। क्षेत्र में गरीबों की हालत बहुत ही दयनीय है। अनुसूचित जाति की एक विधवा महिला लीला देवी पिछले 25 वर्षों से बिना बिजली के रहती है जिसके लिए हमारे द्वारा संयुक्त मजिस्ट्रेट रानीखेत को 7 जनवरी 2025 को एक पत्र लिखित रूप में दिया गया, इस पर भी 1 वर्ष बीतने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई है। क्षेत्रवासी आवारा पशुओं से जंगली जानवरों से बहुत परेशान है। यहां पर स्कूल, पानी, बिजली, यातायात, स्वास्थ्य आदि की स्थिति बहुत खराब है। रोजगार का कोई भी साधन नहीं है और ऊपर से विधायक और सांसद के उपेक्षा का शिकार हैं। लोग इसी आस में हर बार चुनाव में वोट देते हैं कि इस बार सहित विकास होगा लेकिन विकास है कि पैदा होने का नाम ही नहीं ले रहा है।
पूरन शिल्पकार, सामाजिक आरटीआई कार्यकर्ता, कारखेत, डीडा
- सड़कें व कनेक्टिविटी (डीडा, शीतलाखेत, काकड़ीघाट, मजखाली, कठपुड़िया) 45 साल पुरानी सड़कें, रोडवेज बस नहीं, नया डामर 1 साल में उखड़ा 2/10
- पेयजल व्यवस्था (‘हर घर नल, हर घर जल’, सिरौता-देवलीखान योजना) नल हैं पर जल 200 लीटर मानक से बहुत नीचे, गर्मियों में संकट 2/10
- स्वास्थ्य सेवाएं (अस्पताल, रेफर सिस्टम) अस्पताल अधूरा, आपात में 30-33 किमी दूर रानीखेत/अल्मोड़ा 1.5/10
- आपदा प्रबंधन (चनौदा, लोध घाटी) आपदा में विधायक की गैर-मौजूदगी का आरोप, सड़कें दो दिन बंद 2/10
- शिक्षा व्यवस्था (स्कूल, काॅलेज, शिक्षक) 179 प्राथमिक स्कूल, शिक्षक अधूरे, काॅलेज बदहाल, विषयों का अभाव 3/10
- खेल व युवा कल्याण (मैदान, अवसर) स्वयं मंत्री होने के बावजूद मैदान व प्रशिक्षण शून्य 1/10
- रोजगार व पलायन कृषि क्षेत्र होते हुए भी 70 प्रतिशत तक पलायन, स्थानीय रोजगार नहीं 2/10
- कृषि व मानव-वन्यजीव संघर्ष सूअर, बंदर, बर्हसिंघों से खेती तबाह, कोई ठोस नीति नहीं 2/10
- शराब नीति व सामाजिक असर लगभग हर क्षेत्र में शराब की दुकानें, युवाओं में नशा बढ़ा 4/10
- नेतृत्व, मौजूदगी व जवाबदेही चार साल क्षेत्र से दूरी, चुनावी साल में अचानक सक्रियता 3/10
औसत: 2.25/ 10 फाइनल ग्रेड: फेल
निष्कर्ष: (वन-लाइन जजमेंट)
कैबिनेट मंत्री और दो अहम विभागों की जिम्मेदारी होने के बावजूद सोमेश्वर विधानसभा में न सड़क पहुंची, न पानी, न अस्पताल, न खेल, सिर्फ घोषणाएं और शराब की दुकानें बढ़ीं।
यह रिपोर्ट कार्ड साफ करता है कि सोमेश्वर में सत्ता है, पर सुशासन नहीं।

