Uttarakhand

सेवानिवृत्ति से पहले न्यायमूर्ति जी. नरेंद्र का ऐतिहासिक फैसला हाईकोर्ट का निर्णायक हस्तक्षेप

पूर्व मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र
उत्तराखण्ड के बागेश्वर जिले में वर्षों से हो रहे अवैज्ञानिक और अनियंत्रित खनन को लेकर उत्तराखण्ड हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए पूरे मसले पर एक स्वतंत्र विशेषज्ञ कमेटी का गठन कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी. नरेंद्र द्वारा सेवानिवृत्ति से ठीक पहले दिया गया फैसला पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास और अवैध खनन पर रोक की दिशा में ऐतिहासिक माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार अब तक यह प्रदर्शित करने में असफल रही है कि बागेश्वर में खनन वैज्ञानिक और सुरक्षित तरीके से किया जा रहा है


उत्तराखण्ड के हिमालयी क्षेत्र में स्थित बागेश्वर जनपद लम्बे अर्से से गम्भीर पर्यावरणीय संकट के दौर से गुजर रहा है। उल्लेखनीय है कि पहाड़ों की संवेदनशील ढलानों, नदियों के किनारों और ग्रामीण आबादी के समीप जिस तरह से खनन गतिविधियां संचालित हो रही हैं, उसने पूरे क्षेत्र के पारिस्थितिक संतुलन पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। इसी पृष्ठभूमि में उत्तराखण्ड हाई कोर्ट का ताजा फैसला सामने आया है, जिसे न केवल एक न्यायिक आदेश बल्कि हिमालयी पर्यावरण की रक्षा के लिए निर्णायक हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है।

31 दिसम्बर 2025 को मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जी नरेंद्र और न्यायमूर्ति जस्टिस सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने बागेश्वर जिले में खनन गतिविधियों से जुड़े मामलों पर सुनवाई करते हुए यह स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा न्यायालय के समक्ष ऐसा कोई ठोस तथ्य प्रस्तुत नहीं किया गया है जिससे यह प्रदर्शित हो सके कि खनन गतिविधियां वैज्ञानिक, सुरक्षित और पर्यावरण-संवेदनशील तरीके से संचालित हो रही हैं। अर्थात् राज्य सरकार यह साबित नहीं कर पाई है कि खनन से पर्यावरण को नुकसान नहीं हो रहा है।

यह फैसला इसलिए भी विशेष महत्व रखता है क्योंकि न्यायमूर्ति जी. नरेंद्र ने इसे अपने सेवानिवृत्त होने से ठीक पहले सुनाया है। न्यायिक दृष्टि से इसे उनकी उस सोच के रूप में देखा जा रहा है जिसमें न्याय केवल विधिक विवादों के निस्तारण तक सीमित नहीं रहता बल्कि समाज, प्रकृति और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा का माध्यम बनता है। इस पूरे प्रकरण की शुरुआत मीडिया में आई उन रिपोर्टों से हुई थी जिनमें बागेश्वर जिले में खनन के दुष्परिणामों को उजागर किया गया था। इन रिपोर्टों में बताया गया था कि लीज और गैर-लीज क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर खनन हो रहा है, जिससे भूमि धंस रही है, पहाड़ी ढलानों में दरारें विकसित हो रही हैं, भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं और नदियों व जलधाराओं में मलबा भरने से उनका प्राकृतिक प्रवाह अवरुद्ध हो रहा है। इन्हीं तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने वर्ष 2025 में स्वतः संज्ञान suo motu) लिया और मामले की सुनवाई प्रारम्भ की।

सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया है कि राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण SEIAA) और खनन विभाग द्वारा खनन पट्टे देते समय स्पष्ट शर्त लगाई गई थी कि खनन केवल मैनुअल और अर्ध-यांत्रिक तरीके से किया जाएगा। यह शर्त इसलिए लगाई गई थी ताकि पहाड़ी भू-भाग पर अत्यधिक दबाव न पड़े और पारिस्थितिक क्षति को न्यूनतम रखा जा सके। इसके बावजूद, कई खनन पट्टाधारकों द्वारा भारी और अत्यंत भारी मशीनों का प्रयोग किया जा रहा है जो पर्यावरणीय शर्तों का प्रत्यक्ष उल्लंघन है। अदालत के समक्ष यह भी आया है कि इन खनन संचालकों ने भारी मशीनों के उपयोग के लिए डायरेक्टरेट जनरल ऑफ माइंस सेफ्टी (DGMS) से अनुमति प्राप्त की। इस पर अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा है कि “Prima facie, none of the provisions enable the authority under the Mines Act, 1952 or the Metalliferous Mines Regulations, 1961 to dilute or modify the conditions imposed under the Environmental Clearance.” (प्रथम दृष्टया ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो खनन सुरक्षा से जुड़े कानूनों को पर्यावरणीय मंजूरी की शर्तों को कमजोर करने या बदलने का अधिकार देता हो।)

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम की धारा 24 के तहत इसके प्रावधानों का प्रभाव अन्य सभी कानूनों पर प्रधान है। अर्थात् पर्यावरण संरक्षण कानून सर्वोच्च है और कोई अन्य विभाग उसकी शर्तों को नजरअंदाज नहीं कर सकता।

बागेश्वर के पुलिस अधीक्षक द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट ने स्थिति की गम्भीरता को और स्पष्ट कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार जिले के विभिन्न खनन स्थलों से 124 भारी मशीनें जब्त की गई हैं। अदालत ने इसे इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण माना है कि पर्यावरणीय शर्तों का बड़े पैमाने पर उल्लंघन हो रहा है। खंडपीठ ने टिप्पणी की कि “The violation has resulted in grave degradation of the environment.” (इन उल्लंघनों के कारण पर्यावरण को गम्भीर क्षति पहुंची है।)

अदालत ने अपने आदेश में उत्तराखण्ड की भौगोलिक और भूकम्पीय संवेदनशीलता को भी विशेष रूप से रेखांकित किया है। कहा गया है कि हिमालय एक युवा पर्वतमाला है और उत्तराखण्ड का बड़ा हिस्सा उच्चतम भूकम्पीय जोखिम वाले क्षेत्र में आता है। ऐसे में अवैज्ञानिक खनन से केवल स्थानीय नुकसान नहीं बल्कि व्यापक प्राकृतिक आपदाओं का खतरा उत्पन्न हो रहा है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने आदेश दिया कि “Keeping in account the failure of the State to place any material to ensure scientific mining, this Court deems it necessary to form an independent expert committee.” (राज्य सरकार की विफलता को देखते हुए न्यायालय को एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित करना आवश्यक प्रतीत हो रहा है।)

अदालत ने अब एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति के गठन का आदेश दिया है जिसमें ‘काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च’ (सीएसआईआर), ‘वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलाॅजी’, ‘जी. बी. पंत इंस्टिट्यूट ऑफ़ हिमालयन एनवायरनमेंट’ और ‘जियोलाॅजिकल सर्वे ऑफ इंडिया’ के विशेषज्ञ शामिल हैं। साथ ही हिमालयी पारिस्थितिकी के प्रसिद्ध जानकार अजय सिंह रावत को भी समिति में शामिल किया गया है। समिति को निर्देश दिया गया है कि वह बागेश्वर जिले का निरीक्षण कर यह आकलन करे कि खनन किसी भी रूप में सम्भव है या नहीं। यदि सम्भव है तो किस विधि, किस सीमा और किस प्रकार की मशीनरी के साथ। समिति को 15 जनवरी 2026 से प्रत्येक 15 दिन में अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत करनी है।

अदालत ने खनन में लगे श्रमिकों के अधिकारों को भी महत्वपूर्ण माना है। सभी खदान मालिकों को निर्देश दिया गया है कि वे श्रमिकों की सूची प्रस्तुत करें और यह सुनिश्चित करें कि उन्हें ईएसआई और पीएफ जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिल रहा है।

कुल मिलाकर बागेश्वर में अंधाधुंध खनन पर उत्तराखण्ड हाईकोर्ट का यह फैसला इस समय राज्य के सामने खड़े सबसे बड़े पर्यावरणीय प्रश्नों में से एक पर निर्णायक हस्तक्षेप है। यह आदेश स्पष्ट संकेत देता है कि हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में विकास की प्रक्रिया अब पर्यावरणीय संतुलन की कीमत पर नहीं चल सकती। यह फैसला न केवल वर्तमान संकट का समाधान खोजने की दिशा में है बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा का मजबूत आधार भी तैयार करता है।

अमीकस क्यूरी एडवोकेट दुष्यंत मैनाली की भूमिका

एडवोकेट दुष्यंत मैनाली इस पूरे मामले में न्यायालय द्वारा नियुक्त न्याय मित्र (Amicus Curiae) हैं। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में उनकी भूमिका की विशेष रूप से सराहना की है। अदालत ने कहा है कि “The report submitted by the Amicus Curiae is not only extensive but also informative and reflects in & depth knowledge.”  (अमीकस क्यूरी की रिपोर्ट न केवल विस्तृत है बल्कि उसमें गहन अध्ययन और विषय की गहरी समझ परिलक्षित होती है।)

गौरतलब है कि दुष्यंत मैनाली लम्बे समय से उत्तराखण्ड में पर्यावरण, खनन और जनहित से जुड़े मामलों पर सक्रिय रूप से काम करते रहे हैं। इस प्रकरण में उन्होंने जमीनी हालात, कानूनी प्रावधानों और पर्यावरणीय प्रभावों को एक साथ जोड़ते हुए अदालत के समक्ष तथ्य रखे, जिससे न्यायालय को निर्णय लेने में महत्वपूर्ण सहायता मिली।

हाईकोर्ट ने उनके प्रयासों को “zealously assisting the Court”  (अदालत की पूरी लगन से सहायता) बताते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि उन्हें उनके कार्य के लिए मानदेय भी प्रदान किया जाए।

You may also like

MERA DDDD DDD DD