Uttarakhand

राजधानी की प्रतीक्षा में रोता उत्तराखण्ड

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शायद देश का इकलौता राज्य जिसकी स्थायी राजधानी नहीं है। उत्तराखण्ड आज 25 वर्ष का हो चुका है। एक युवा राज्य जिसकी आंखों में उजले सपने और 25 वर्षों के विकास की गाथा होनी चाहिए थी लेकिन अफसोस यह युवा आज भी अपने स्थायी घर यानि कि राजधानी के इंतजार में ही रो रहा है।

एक सवाल बार-बार उभरता है क्या इस राज्य के माता-पिता गरीब थे या असहाय जो अपने बालक अर्थात राज्य को स्थायी घर नहीं दे पाए इसका उत्तर मुझे मेरी अन्तरात्मा से मिला कि नहीं वो न असहाय थे और न ही गरीब वो तो इतने सक्षम और साहसी थे कि उन्होंने देश की व्यवस्था को ही हिला दिया था क्योंकि उन्होंने अपना खून बहाया, अपनी अस्मिता तक दांव पर लगायी लेकिन पहाड़ के हक में एक ऐसा राज्य हासिल किया जिसकी खूबसूरती देश में नहीं आपितु विश्व में विख्यात है।

सन् 1994 की बात है दिनांक 01 सितम्बर को खटीमा में आन्दोलनकारियों पर गोलियां बरसाई गई तो दिनांक 02 सितम्बर को मसूरी की पहाड़ियों ने देखा कि कैसे एक राज्य की मांग करने वालों के सीने छलनी कर दिए गए और जब यह सब भी काफी नहीं था तो 02 अक्टूबर 1994 को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा में उन माताओं बहनों की अस्मिता को रौंदा गया जिनके हाथों में सिर्फ झण्डे थे और मुख में आज दो अभी दो हमको हमारा राज्य दो जैसे नारे और दिल में सिर्फ और सिर्फ सपना था उत्तराखण्ड राज्य।

वो काली रात गन्ने के खेतों में पड़ी नग्न लाशें चुपचाप सोती रही शायद सोचती होंगी कि क्या हमारी कुर्बानी उत्तराखण्ड की राजधानी की नींव बनेगी।
 
गैरसैंण सपना, प्रतीक और प्रतीक्षा

गैरसैंण को राजधानी बनाने की कल्पना हमारे आन्दोलनकारियों के मन में यूं ही नहीं आई होगी वो इसलिए आयी कि गैरसैंण वह जगह जो भौगोलिक रूप से राज्य के मध्य में है जहां न कमाऊं की अलगाव है और न गढ़वाल की दूरी।

जो उत्तराखण्ड की आत्मा के सबसे करीब है। लेकिन जब भी सरकारें गैरसैंण जाती हैं और मात्र दो या तीन दिन में एक पिकनिक यात्रा कर लौट आती हैं तो वहां फिर पीछे छूट जाता है सन्नाटा, सड़कों पर झाड़ू लगाते हुए सफाईकर्मी, खाली पड़ी कुर्सियां और हमारे शहीदों के अधूरे सपने।

कैसे देखती होंगी वे आंखें जिन्होंने अपने बेटे को रामपुर तिराहा में खोया, जिन पिताओं ने अपनी बेटियों की चीत्कारें सुनी यही तो है राजनीति की मृत आत्मा और जनता की जीवित पीड़ा।

उत्तराखण्ड की राजनीति आज एक ऐसी मृत आत्मा बन चुकी है जिसे न जनता की आह सुनाई देती है न आन्दोलनकारियों की लाशों की चीखें।

हर सरकार आती है घोषणाएं करती हैं फिर चली जाती हैं जैसे गैरसैंण कोई तीर्थ हो जहां सिर्फ दर्शन के लिए जाया जाता है स्थायी वास के लिए नहीं यदि यहां के सत्ताधीशों की आत्माएं अगर जरा भी जीवित हैं तो उन्हें लौटकर उन खेतों में जाना चाहिए जहां बहनों की चूड़ियां टूटी थी जहां बेटों के खून में भीगी उनकी कमीजें मिली थी जहां भाईयों ने बहनों की आबरू तो पिताओं ने घर के चिराग और बहनों ने राखी बांधने वाली कलाईयां खोयी थी।

राज्य बन गया 25 वर्ष हो गए रजत जयंती मनाई जायेगी करोड़ों रुपए उड़ाए जाएंगे लेकिन राजधानी आज भी तय नहीं। विकास हुआ लेकिन मैदानों तक पहाड़ राज्य बनने के बाद दिन दुनी और रात चैगुनी रफ्तार से पलायन झेल रहा है गांव आज सुने हो गए हैं और युवा आज भी नौकरी के लिए बाहरी राज्यों की ओर टकटकी लगाए देख रहा है, क्योंकि उत्तराखण्ड का दिल आज भी अस्थायी है जिस राज्य का केन्द्र ही तय न हो उसकी नीति, नीयति और नियोजन भी भटके हुए ही रहेंगे।
 
आज निर्णय चाहिए श्रद्धांजलि नहीं

अब वक्त आ गया है राजधानी के नाम पर प्रतीक्षा नहीं अब श्रद्धांजलि नहीं इंसाफ चाहिए अब घोषणाएं नहीं निर्णय चाहिए राजधानी चाहे देहरादून रहे या गैरसैंण बने किन्तु निर्णय एक और स्थायी हो एक ऐसा निर्णय जो न माताओं की मांगों का सिंदूर लौटाए, बल्कि उन गन्ने की खेतों को शांति भी दे और इस 25 वर्ष के बेघर युवा को उसका अपना घर उसकी राजधानी यानी उसकी पहचान दे।

25 वर्ष बाद जब फिर वही भीड़ श्रद्धांजलि देगी सभी दल एक-दूसरे के साथ मिलकर ठहाके लगाएंगे तो याद रखना शहीदों की आत्माएं इतना ही कहेंगी कि क्या हमारी कुर्बानी अब भी अधूरी रहेगी क्या हमारी आत्मा को कभी चैन मिलेगा, क्योंकि जब सामने मौत और भविष्य में राज्य था तो भी हमने अपने भविष्य को देखकर मौत को गले लगाया था। आज आपको तय करना है कि श्रद्धांजलि ही मिलेगी या समाधान भी। क्या आज स्थायी घर यानि स्थायी राजधानी मिलेगी जहां यह 25 वर्षीय युवा राज्य स्वयं को पूर्ण महसूस कर सके।

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