Uttarakhand

निष्ठावान कर्मियों को सरकारी मार

उत्तराखण्ड सरकार ने मध्य प्रदेश की एक ऐसी कंपनी को 108 एम्बुलेंस सेवा का काम देने में दिलचस्पी दिखाई जो भाजपा के एक बड़े नेता की बताई जाती है। इस कंपनी पर सरकार की मेहरबानी का नतीजा रहा कि 717 कर्मचारियों के चूल्हे जलने मुश्किल हो गए हैं। ये कर्मचारी 108 और खुशियों की सवारी जैसी सेवाओं का सफल संचालन करते आ रहे थे। अब ये कर्मचारी आंदोलन पर हैं, तो सरकार उनकी सुनने को राजी नहीं

 

प्रदेश में 108 के कर्मचारियों की क्यों नहीं सुन रही सरकार। गर्मी हो या बरसात आंदोलनकारी हैं कि देहरादून के परेड ग्राउंड से हटने को तैयार ही नहीं हैं। हटे भी तो कैसे, आखिर उनकी रोजी-रोटी जो छीनी गई है। उनके परिजनों को रोटी तक के लाले पड़े हुए हैं। लेकिन उत्तराखण्ड सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही। ये वही आंदोलनकारी हैं जो कभी उत्तराखण्ड की जीवनदायिनी 108 एम्बुलेंस के कर्मचारी थे। यदि किसी को भी दर्द या तकलीफ होती थी तो इन्हें पुकारता था और ये दौड़े चले आते थे। लेकिन अब इनके दर्द, इनकी तकलीफ से सरकार को कोई वास्ता नहीं है। धनौल्टी के विधायक विधानसभा में 108 के बेरोजगार कर्मचारियों का मुद्दा उठा चुके हैं। फिलहाल ये 717 कर्मचारी इस आस में परेड ग्राउंड में धरने पर बैठे हैं कि एक दिन तो उनकी सुनवाई जरूर होगी। त्रिवेंद्र सरकार में जिस तरह से आनन-फानन में 108 एम्बुलेंस और ‘खुशियों की सवारी’ सेवा को पीपीपी मोड़ से हटाकर मध्य प्रदेश की एक कंपनी कैंप (कम्युनिटी एक्शन थ्रू मेटिवेशन प्रोग्राम) को दे दिया है, वह सवालों और संदेह के घेरे में है। जब 108 सेवा सुचारू रूप से काम कर रही थी तो फिर मध्य प्रदेश की कंपनी को 108 सेवा और ‘खुशियों की सवारी’ की जिम्मेदारी क्यों दे दी गई? हालांकि यह सरकार का अपना काम करने का नजरिया है कि वह किस तरह से बीमार लोगों को घरों से हॉस्पिटल तक पहुंचाती है, लेकिन पिछले 11 वर्षों से जो 108 सेवा और खुशियों की सवारी बीमार लोगों की सेवा में तत्पर थी वह 30 अप्रैल को बंद कर दी गई। इसी के साथ इससे जुड़े 717 कर्मचारी बेरोजगार हो गए हैं।


बेरोजगार कर्मचारी अपनी समस्या को लेकर प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से एक नहीं, बल्कि 5 बार मिले। लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन की घुट्टी पिलाकर भेज दिया गया। आखिर में जब 1 मई से मध्य प्रदेश के एक कंपनी कैंप ने 108 एम्बुलेंस सेवा और ‘खुशियों की सवारी’ का संचालन शुरू कर दिया तो पुराने कर्मचारी अपने आप को ठगा-सा महसूस करने लगे। इन पुराने कर्मचारियों को सेवा में लेने के बजाय नई कंपनी ने नए लोगों की भर्ती कर दी, जबकि उसे यह काम देते समय बकायदा शर्त रखी गई थी कि 108 एम्बुलेंस और खुशियों की सवारी में कार्यरत लोगों को रोजगार में प्राथमिकता दी जाएगी यानी कि जो कर्मचारी पिछले 11 साल से काम कर रहे हैं, उनको ही इस जिम्मेदारी पर आगे बढ़ाया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके पीछे का जो प्रमुख कारण बताया जा रहा है वह यह है कि नई कंपनी ने बहुत कम वेतन पर नए कर्मचारियों को नौकरी पर रखा है। जो कर्मचारी पिछले 11 साल से काम कर रहे थे उनका वेतन 18 हजार के करीब था, लेकिन जो नई भर्तियां हुई हैं उनका वेतन महज आठ हजार रुपया बताया जाता है।

बहरहाल 108 एंबुलेंस और खुशियों की सवारी के बेरोजगार कर्मचारी आंदोलन की राह पर हैं। करीब 600 लोग गिरफ्तारी भी दे चुके हैं। कई बार उन्होंने विधानसभा कूच किया है और मुख्यमंत्री के आवास तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन किया। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि आज तक सत्ता पक्ष का कोई भी व्यक्ति या कोई भी अधिकारी उनके पास नहीं पहुंचा। आंदोलनकारी विक्रम सिंह नेगी के अनुसार वर्ष 2008 में जीवीके कंपनी को 108 एम्बुलेंस चलाने की जिम्मेदारी सरकार ने दी थी। इसके साथ ही इसी कंपनी को खुशियों की सवारी चलाने का भी जिम्मा दिया गया था। तब जीवीके को यह काम पीपीपी मोड पर दिया गया था। लेकिन मध्य प्रदेश की कैंप कंपनी को यह काम बिना किसी अनुभव के दे दिया गया है। 108 एंबुलेंस और खुशियों की सवारी का काम उसी कंपनी को मिल सकता है जिसको स्वास्थ्य सेवा में कम से कम 3 साल का अनुभव प्राप्त हो, लेकिन सत्ता का नई कंपनी को पूरा सहयोग प्राप्त है। चर्चा है कि यह नई कंपनी मध्य प्रदेश के एक बड़े भाजपा नेता की है। यह नेता पूर्व में उत्तराखण्ड भाजपा के प्रभारी भी रह चुके हैं। उसकी कंपनी को काम देना उत्तराखण्ड सरकार की मजबूरी थी। यही वजह है कि पहली कंपनी का करार खत्म कर दिया गया। विक्रम सिंह नेगी बताते हैं कि कई कंपनी के काम संभालने के महज 2 महीने में ही 16 गाड़ियों के एक्सीडेंट हो गए हैं, जबकि पूर्व के 11 साल में कोई भी एक्सीडेंट नहीं हुआ था।

108 कर्मचारी यूनियन उत्तराखण्ड के प्रदेश सचिव विपिन जमलोकी कहते हैं कि कैंप को काम देने के लिए दिसंबर माह में टेंडर निकाले गए थे। जनवरी में टेंडर प्रक्रिया पूरी कर दी गई थी। मार्च में वर्क ऑर्डर भी दे दिए गए। नई कंपनी को 108 सेवा के 139 एम्बुलेंस, एक वोट एम्बुलेंस और 95 वाहन ‘खुशियों की सवारी’ के संचालित करने हैं। जमलोकी कहते हैं कि नई कंपनी को करार करने से पूर्व ही पहले कर्मचारियों ने आवेदन करने शुरू कर दिए थे। तब सरकार द्वारा बकायदा आश्वासन भी दिया गया था कि जो कर्मचारी पिछले 11 साल से काम कर रहे हैं उनको ही पुराने वेतनमान पर नौकरी पर रखा जाएगा। लेकिन नई कंपनी ने नए कर्मचारियों को काम पर रख लिया, जबकि टेंडर की शर्तों में स्पष्ट था कि पुराने कर्मचारियों को ही प्राथमिकता दी जाएगी।

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