Uttarakhand

विपक्ष नहीं, अपनों से त्रस्त धामी

उत्तराखण्ड में एक स्थिर सरकार को अस्थिर करने की कोशिश विपक्ष नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर का ही एक असंतुष्ट धड़ा कर रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व से असहज कुछ नेता, जिनकी महत्वाकांक्षाएं लम्बे समय से दिल्ली की गलियारों में पल रही हैं, अब परोक्ष रूप से मोर्चाबंदी में जुटे बताए जा रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि वर्षों से खुद को भावी मुख्यमंत्री के रूप में देखने वाले एक दिल्ली में बैठे नेता परदे के पीछे से इस पूरे असंतोष को दिशा देने की कोशिश कर रहें हैं


धामी अपने चार साल के कार्यकाल में ऐसे कई अंदरूनी षड्यंत्रों के चक्रव्यूह को भेदकर बाहर निकल चुके हैं जिससे उनके विरोधियों में हताशा बढ़ी है। अब भाजपा भीतर मौजूद धामी विरोधियों द्वारा गदरपुर के विधायक को आगे कर एक नया शक्ति प्रदर्शन खड़ा करने की कोशिश इसी हताशा की अगली कड़ी मानी जा रही है। सवाल यह है कि क्या यह दबाव की राजनीति है या 2027 से पहले नेतृत्व परिवर्तन की जमीन तैयार करने की सुनियोजित रणनीति। गौरतलब है कि उत्तराखण्ड की राजनीति में, खासकर भाजपा के अंदर राजनीतिक खींचतान का दौर चरम पर है। वैसे तो इस खींचतान में कई आयाम हैं, कई किरदार हैं, कोई पर्दे के सामने हैं तो किसी को पर्दादारी भा रही है लेकिन पर्दे के आगे और पर्दादारों के निशाने पर कोई है तो वो हैं उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी। इन दिनों उनको टारगेट करने की मंशा के चलते शहीद उधम सिंह के नाम पर बने ऊधमसिंह नगर जिले में भाजपा के अंदर ‘ऊधम’ एंटी धामी लॉबी द्वारा प्रायोजित किया जा रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के इस गृह जिले में भाजपा मुख्यमंत्री समर्थक और मुख्यमंत्री विरोधी दो गुटों में साफ बंटी नजर आ रही है। भाजपा के भीतर उठ रहे भूकम्प का एपीसेंटर इस वक्त हैं, ऊधमसिंह नगर की विधानसभा सीट गदरपुर के विधायक अरविंद पाण्डे। हालांकि कुछ छोटे-छोटे भूकम्प के केंद्र और भी हैं जो हरिद्वार और दिल्ली में उठ रहे हैं। प्रश्न उठता है कि क्या उत्तराखण्ड फिर राजनीतिक अस्थिरता का शिकार होने जा रहा है? या फिर यह क्षणिक बवंडर है? क्या इस उद्यम का राज चुनावी वर्ष में धामी को हटा खुद मुख्यमंत्री बनने की वह आस है जिसे दिल्ली बैठे एक नेता सालों से पाले हुए हैं। दरअसल गदरपुर तो महज एक संकेत है जो भाजपा के अंतर्विरोधों को उजागर करता है, इसकी पटकथा वो लोग लिख रहे हैं जिनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं चुनावी साल में अतीत के अनुभवों को याद कर जाग रही हैं जब 2021 में त्रिवेंद्र सिंह और तीरथ सिंह के बाद धामी मुख्यमंत्री बने थे।

गदरपुर के विधायक अरविंद पाण्डे भाजपा के उन असंतुष्टों में हैं जो गाहे-बगाहे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधते रहे हैं। कई बार उनका ‘धाकड़ धामी’ कहना मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की प्रशंसा में कम व्यंग्यात्मक ज्यादा होता है। सुखवंत सिंह आत्महत्या कांड पर उनका धामी सरकार और खासकर ऊधमसिंह नगर के एसएसपी मणिकांत मिश्रा पर तीखा हमला कोई पहली बार नहीं था। इससे पहले भी वह खनन सहित कई मुद्दों पर अपनी सरकार को और एएससपी को कठघरे में खड़ा कर चुके हैं लेकिन सुखवंत आत्महत्या कांड पर उन्होंने जिस प्रकार धामी सरकार को कठघरे में खड़ा किया, वह बैक फायर करता नजर आ रहा है क्योंकि इसके पीछे खुद पाण्डे का दागी अतीत और दबंगई है जिसकी कलई अब खुलने लगी है। गौरतलब है कि इस घटना के बाद उनके परिवार के लोगों पर भूमि विवाद और भूमि कब्जाने के आरोप लगने लगे। उनके आवास पर सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने का सरकारी नोटिस चस्पा हुआ तो भाजपा का वह आंतरिक तंत्र सक्रिय हो गया जिसके निशाने पर पुष्कर सिंह धामी हैं। अरविंद पाण्डे के आवास पर आयोजित खिचड़ी भोज के जरिए इस गुट ने अपनी शक्ति को तौलने का फैसला लिया। इस खिचड़ी भोज में पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, पौड़ी सांसद अनिल बलूनी, हरिद्वार से विधायक और पूर्व कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक, डीडीहाट से विधायक बिशन सिंह चुफाल के शामिल होने का ऐलान और अरविंद पाण्डे का यह कहना कि पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और विधानसभा अध्यक्ष रितु खण्डूड़ी का समर्थन उनके साथ है, कहीं न कहीं मुख्यमंत्री धामी के खिलाफ चल रही गतिविधियों को खुलकर सामने लाने का कारण बनकर उभरा। गृहमंत्री अमित शाह के प्रदेश दौरे के दौरान ही भाजपा के अंदर इस तरह की हलचल के जरिए यह असंतुष्ट नेता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को संदेश देना चाहते थे। इसमें उन्हें कितनी कामयाबी मिली यह पता नहीं लेकिन इससे भाजपा की जो किरकिरी होनी थी वह तो हो ही गई। बताया जाता है कि दिल्ली से केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप चलते खिचड़ी कार्यक्रम में इनकी मौजूदगी पर रोक लग गई। बताया तो यह भी जाता है कि इस बात को मुख्यमंत्री धामी ने केंद्रीय नेतृत्व और अमित शाह के सामने उठाया था। इस प्रकरण चलते ऊधमसिंह नगर में भाजपा के अंदर ही तलवारें खिंच गई। भाजपा का एक बड़ा धड़ा मुख्यमंत्री के समर्थन में खड़ा हो गया है। पाण्डे की राजनीति पर सीधे प्रहार करने के लिए मुख्यमंत्री के पक्ष में जनपद के बड़े नेताओं की फौज खड़ी हो गई है। किच्छा के पूर्व विधायक राजेश शुक्ला ने तो अरविंद पाण्डे पर यह आरोप तक लगा डाला कि 2022 विधानसभा चुनाव में अरविंद पाण्डे ने खटीमा से पुष्कर सिंह धामी और किच्छा से उनको हराने के लिए काम किया। उनका कहना है कि धामी भले ही 2022 में चुनाव हार गए लेकिन वह भाजपा को विपरीत परिस्थितियों में भी वापस ले आए थे। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो अरविंद पाण्डे को इसी बात की टीस है कि वह अपने मकसद में नाकामयाब रहे और धामी के पुनः मुख्यमंत्री के बनने के बाद उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया। राजेश शुक्ला आरोप लगाते हैं कि लोकसभा चुनाव में भी अरविंद पाण्डे की भूमिका संदिग्ध थी।

काशीपुर के मेयर दीपक बाली का कहना है कि काशीपुर जैसे शांत क्षेत्र को अशांत करने का प्रयास किया जा रहा है। अरविंद पाण्डे की वरिष्ठता पर कोई सवाल नहीं है लेकिन उनके द्वारा जिस प्रकार सरकार विरोधी बयान दिए जा रहे हैं वह उनकी मंशा पर सवाल खड़ा करते हैं। जब सुखवंत आत्महत्या मामले में सरकार द्वारा गम्भीर कार्रवाई की गई, उसके बावजूद कभी उनका सीबीआई जांच की मांग करना और कभी कहना कि सीबीआई की जांच जरूरी नहीं है, उनके दोहरे रवैये को उजागर करता है। दिलचस्प बात यह है कि जिन बलराज पासी को अरविंद पाण्डे पिता तुल्य मानते हैं उनका गदरपुर के शक्ति प्रदर्शन में शामिल न होना बताता है कि वह अपने इस ‘मुंहबोले’ पुत्र के साथ नहीं खड़े हैं। वे कहते हैं कि अरविंद पाण्डे संगठनात्मक कार्यों, जिम्मेदारियों से दूरी बनाए रखते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि दिन-रात काम करने वाले युवा मुख्यमंत्री को साजिशों के तहत अस्थिर करने की कोशिश की जा रही है।

गौरतलब है कि आजकल उत्तराखण्ड की राजनीति दिल्ली के जरिए की जा रही है। खासकर ‘रैबार’ सरीखे कार्यक्रम राजनीति का जरिया बन गए हैं जिनमें धामी से असंतुष्ट नेताओं की उपस्थिति ज्यादा नजर आती है। ऐसे कार्यक्रमों के जरिए दिल्ली में बैठकर धामी के खिलाफ एक माहौल बनाया जा रहा है। इस प्रकार के कार्यक्रम में जहां उत्तराखण्ड राज्य की बात की जा रही हो, उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री को दरकिनार करना और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी की उपस्थिति ताज्जुब करने वाली है।

प्रश्न उठता है कि सत्ता में स्थिरता के बावजूद क्या सत्ता संतुलन का संघर्ष धामी के लिए दीर्घकालिक चुनौती खड़ी कर रहा है? जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी राजनीतिक और प्रशासनिक रूप में सक्रिय हैं तो ऐसे में असंतोष के सुरों को हवा कहां से मिल रही है? त्रिवेंद्र सिंह रावत, अनिल बलूनी, मदन कौशिक, अरविंद पाण्डे, बिशन सिंह चुफाल तो असंतुष्टों में गिने जाते रहे हैं लेकिन इनके साथ विजय बहुगुणा और ऋतु खण्डूड़ी का नाम जुड़ जाना जरूर चकित करता है। त्रिवेंद्र सिंह रावत को 2021 में हटाए जाने की टीस शायद अभी बाकी है और शायद वह आज भी खुद को ‘नेचुरल सीएम कैंडिडेट’ मानते हैं। खनन के मुद्दे पर वह धामी सरकार की लोकसभा में किरकिरी करवा चुके हैं। अनिल बलूनी प्रत्यक्ष रूप से सामने तो नहीं आते लेकिन वह मीडिया और नैरेटिव मैनेजमेंट के जरिए अपना काम कर रहे हैं। वह खुद को उत्तराखण्ड की राजनीति में भविष्य का चेहरा देखते हैं लेकिन आम कार्यकर्ता पर उनकी स्वीकार्यता नहीं है क्योंकि वह एक ‘एरिस्ट्रोकेट लीडर’ के रूप में ज्यादा जाने जाते हैं। शायद उनका उद्देश्य पुष्कर सिंह धामी को अस्थाई साबित कर 2027 के लिए नया पावर सेंटर तैयार करना है। विजय बहुगुणा का जहां सवाल है, वह राजनीतिक साजिशों के अनुभवी व्यक्ति हैं। 2016 में वो अपनी ये काबिलियत हरीश रावत सरकार को गिराने में दिखा चुके हैं। साथ ही काॅरपारेट सम्बंधों में माहिर हैं  और शायद इसके जरिए वह धामी सरकार के लिए परेशानी खड़ी करने का काम कर सकते हैं। इसी मंशा के चलते ही बजरिए अरविंद पाण्डे जमीनी स्तर पर असंतोष को संस्थागत रूप देने का प्रयास किया गया ताकि मुख्यमंत्री धामी को कमजोर साबित किया जा सके।

कुल मिलाकर जिस प्रकार भाजपा के अंदर से ही एक गुट द्वारा धामी सरकार की छवि को कमजोर करने का नैरेटिव तैयार कर मीडिया के जरिए नेतृत्व परिवर्तन की झूठी अफवाहें जान-बूझकर फैलाना, सत्ता बनाम विपक्ष की लड़ाई नहीं, मुख्यमंत्री बनाम मुख्यमंत्री बनने की चाहत रखने वालों के बीच की है। 2027 विधानसभा चुनाव के मद्देनजर संगठन पर नियंत्रण और भविष्य की सत्ता की लड़ाई है। इन सब के बीच सवाल है कि भाजपा का युवा नेतृत्व को तरजीह देने वाला माॅडल टिकेगा या फिर दरकिनार  होता वरिष्ठ धड़ा दबाव बनाने में सफल होगा? साथ ही एक सवाल और भी कि क्या मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपने ऊपर इस दबाव को अपने राजनीतिक कौशल से राजनीतिक ताकत में बदल पाएंगे?
 
विवादों के सरताज हैं अरविंद

गदरपुर के विधायक अरविंद पाण्डे का विवादों से नाता पुराना है। बिहार के गोपालगंज से उत्तराखण्ड आए अरविंद पाण्डे के पिता वीरेंद्र पाण्डे बाजपुर शुगर मिल में कार्यरत थे। 1997 में अरविंद पाण्डे बाजपुर नगर पालिका के अध्यक्ष बने। उसके बाद 2002, 2007 में बाजपुर से और फिर परिसीमन के बाद नई बनी विधानसभा गदरपुर से 2012, 2017 और 2022 में विधायक चुने गए। उन पर पूर्व में सरकारी काम में बाधा डालने, मारपीट करने सहित कई संगीन आरोपों में केस दर्ज हुए हैं। सुखवंत सिंह आत्महत्या कांड के बाद कई मामले ऐसे आए जिसमें अरविंद पाण्डे के परिजनों की भूमिका पर सवाल खड़े हुए, खासकर भूमि सम्बन्धी मामलों में। एक बुजुर्ग महिला ने आरोप लगाया कि अरविंद पाण्डे के भाई ने उनसे 3 साल के लिए जमीन लीज पर ली थी और उसे बाद में 30 साल का कर दिया लेकिन उसके लिए न वो हमें पैसे दे रहे हैं, न ही उस पर से अपना कब्जा छोड़ रहे हैं और उल्टा हमें धमकाते हैं। हालांकि बाद में वह सारी भूमि सीलिंग पर निकाली और अरविंद पाण्डे के भाई का बनाया हुआ स्कूल भी सीलिंग की जमीन पर ही बना है।

इसी प्रकार मुकुल गोयल बताते हैं कि बाजपुर के सीओ ऑफिस के मुख्य मार्ग से लगा हुआ हमारा प्लाॅट है। इसकी हम चाहरदीवारी बनवा रहे थे। मौके पर अरविंद पाण्डे के पुत्र अतुल पाण्डे, शुभम पाण्डे, अरुण तिवारी पहुंचे और उन्होंने हमारे ठेकेदार को धमकाया और माल भी उठाकर ले गए। हमें धमकी दी भविष्य में इस जगह पहुंचोगे तो कुछ भी नुकसान हो सकता है। उनका कहना है कि रजिस्ट्री और दाखिल खारिज हमारे नाम पर है तो उनका हक कहां से बनता है जबकि पहले कोई विवाद नहीं था।

भाजपा नेता और व्यापारी संजय बंसल के अनुसार ग्राम मुंडिया पिस्तौर में उनकी भूमि है जिसमें कुछ हिस्सा आपसी सहमति से काम करने और देखभाल के लिए दिया था लेकिन बाद में विधायक के रिश्तेदारों ने फर्जी किरायानामा बनाकर जमीन को कब्जाने की कोशिश की है और अब धमकी दे रहे हैं।

एएसपी एसके सिंह ने बताया कि मामले में विधायक पाण्डे के जीजा जेपी तिवारी, भाई देवानंद पाण्डे, मोहन पाण्डे, किशन पाण्डे निवासी मोहल्ला मजरा बख्श के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। इस बीच अरविंद पाण्डे के कैम्प कार्यालय को प्रशासन द्वारा अवैध अतिक्रमण घोषित करते हुए 15 दिनों के अंदर हटाने के आदेश दिए हैं। खास बात ये है कि यह नोटिस अरविंद पाण्डे के नाम से ही दिया गया है। उन पर हत्या जैसे गम्भीर आरोप में आईपीसी की धारा 302 में मुकदमा दर्ज हुआ था, डकैती के आरोप में आईपीसी की धारा 395 में एफआईआर और आपराधिक तौर पर धमकी देने के मामले में आईपीसी की धारा 506 सहित 8 से अधिक अन्य मामले उनके कानूनी फाइलों में दर्ज थे। 2015 में नायब तहसीलदार को पीटने और अभियुक्त खीम सिंह दानू और विमल शर्मा को कस्टडी से छुड़ाने के आरोप में उन पर धारा 323, 332, 353 504 और 225 का और क्रिमिनल एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था जिसमें वह 51 दिन जेल में रहे थे। हालांकि बाद में वो बरी हो गए थे। 2016 में मुरली वाला स्टोन क्रशर के गुरु पेज सिंह बाजवा, गुरविंदर सिंह बाजवा, बलविंदर सिंह बाजवा ने अपनी भूमि पर अनुप के साथ मिलकर स्टोन क्रशर लगवाया था, बाद में अनूप ने धोखाधड़ी शुरू कर दी। अरविंद पाण्डे पर अनुप को संरक्षण देने का आरोप उन्होंने लगाया था। उन्होंने 2021 में एक रैली के दौरान कांग्रेस नेता यशपाल आर्य और उनके पुत्र संजीव आर्य पर हिस्ट्रीशीटर रहे और पूर्व जिला पंचायत सदस्य कुलविंदर सिंह किंदा ने हमला कर दिया था। उस समय भी अरविंद पाण्डे पर कुलविंदर सिंह किंदा को संरक्षण देने का आरोप लगा था और उस हमले को अप्रत्यक्ष रूप से जायज ठहराते हुए अरविंद पाण्डे ने कहा था कि ‘‘जो लोग अपने राजनीतिक लाभ या अपने बेटे और बेटियों को राजनीति में स्थापित करने की सोचते हैं, उन्हें जनता कभी माफ नहीं करती।’’

उस वक्त पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने आरोप लगाया था कि सरकार अपराधियों को संरक्षण दे रही है। उन्होंने यशपाल आर्य पर हमले के पीछे अरविंद पाण्डे की भूमिका पर सवाल उठाए थे।

   प्रश्न उठता है कि सत्ता में स्थिरता के बावजूद क्या सत्ता संतुलन का संघर्ष धामी के लिए दीर्घकालिक चुनौती खड़ी कर रहा है? जब मुख्यमंत्री धामी राजनीतिक और प्रशासनिक रूप में सक्रिय हैं तो ऐसे में असंतोष के सुरों को हवा कहां से मिल रही है? त्रिवेंद्र रावत, अनिल बलूनी, मदन कौशिक, अरविंद पाण्डे, बिशन सिंह चुफाल असंतुष्टों में गिने जाते रहे हैं लेकिन इनके साथ विजय बहुगुणा और ऋतु खण्डूड़ी का नाम जुड़ जाना जरूर चकित करता है

बात अपनी-अपनी

अरविंद पाण्डे तिलकराज बेहड़ की भाषा बोल रहे हैं और सीएम को बदनाम करना चाहते हैं। पाण्डेय चाहते हैं कि भाजपा सत्ता में न आए। वह कोई न कोई मुद्दा उठाकर सरकार को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। ये अच्छी बात है कि वो काशीपुर सुखवंत आत्महत्या के सम्बंध में चिन्हित हुए लेकिन जब किच्छा में भाजपा के कार्यकर्ता की हत्या हो जाती है और अन्य घटनाओं पर वो चुप्पी साध लेते हैं लेकिन सरकार के खिलाफ उनका मुखर होना दर्शाता है कि उनकी मंशा ठीक नहीं है। उन्होंने 2022 के  विधानसभा चुनाव में मेरे और मुख्यमंत्री जी के खिलाफ काम किया। किसी को मंत्री नहीं बनाया गया है तो उसको यह अधिकार नहीं हो जाता है कि हमेशा सरकार की आलोचना में ही मशगूल रहे। अरविंद पाण्डे कहते हैं कि उनमें अमित शाह का डीएनए है लेकिन वो अमित शाह के जूते की धूल के बराबर भी नहीं हैं।

राजेश शुक्ला, पूर्व विधायक, किच्छा

बड़े संगठनों में थोड़ी-बहुत बातों में विभिन्नताएं आ जाती हैं। इसे आपसी बातचीत से और बैठकर उनका समाधान निकलता है। हमने कहा है कि सरकार और संगठन से जुड़े विषयों पर सरकार और संगठन के माध्यम से बात होनी चाहिए। सार्वजनिक मंचों पर किसी प्रकार के बयानबाजी नहीं होनी चाहिए। सार्वजनिक बयान बाजी करने पर हमने पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। अगर फिर भी कोई ऐसा करता है तो उसे हम अनुशासन के दायरे में लेंगे। जहां तक मुख्यमंत्री के दावेदारों की बात है तो ऐसा कुछ नहीं है। पार्टी के अंदर सब ठीक है, जल्द ही हम कोर कमेटी की बैठक बुलाने जा रहे हैं उसमें सभी मुद्दों पर खुलकर बात होगी।

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