Uttarakhand

समान व्यवस्था या अल्पसंख्यकों पर निगरानी

एक जुलाई 2026 से उत्तराखण्ड देश का पहला राज्य बन गया है जिसने मदरसा बोर्ड को समाप्त कर सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए एक समान वैधानिक व्यवस्था लागू कर दी है। सरकार का दावा है कि यह फैसला शिक्षा में गुणवत्ता, पारदर्शिता और समान अवसर सुनिश्चित करेगा जबकि विपक्ष और कई संवैधानिक विशेषज्ञ इसे अल्पसंख्यक संस्थानों की स्वायत्तता में सरकारी हस्तक्षेप के रूप में देख रहे हैं। समान नागरिक संहिता लागू करने के बाद धामी सरकार का यह दूसरा बड़ा वैचारिक कदम माना जा रहा है जिसने संविधान, अल्पसंख्यक अधिकारों और राज्य की नई नीति को लेकर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है

उत्तराखण्ड की राजनीति पिछले चार वर्षों में केवल सरकार बदलने या योजनाओं की घोषणा तक सीमित नहीं रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य लगातार ऐसे फैसले ले रहा है, जिनका प्रभाव केवल प्रशासनिक व्यवस्था तक सीमित नहीं बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और वैचारिक विमर्श पर भी पड़ रहा है। समान नागरिक संहिता लागू करने वाला देश का पहला राज्य बनने के बाद अब उत्तराखण्ड ने एक और ऐसा निर्णय लिया है जिसने राष्ट्रीय स्तर पर नई बहस को जन्म दे दिया है। 1 जुलाई 2026 से राज्य में मदरसा शिक्षा बोर्ड का अस्तित्व समाप्त हो गया है और उसकी जगह उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण ने ले ली है। अब मुस्लिम मदरसों के साथ-साथ ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी समुदाय के शिक्षण संस्थान भी इसी प्राधिकरण के अधीन आएंगे।

सरकार इसे शिक्षा सुधार की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है। सरकार का कहना है कि अलग-अलग बोर्ड और अलग-अलग नियमों की जगह अब सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए समान कानून लागू होगा। इससे शिक्षा का स्तर सुधरेगा, पाठ्यक्रम आधुनिक होगा, वित्तीय पारदर्शिता आएगी और छात्रों को राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था के अनुरूप अवसर मिलेंगे। सरकार का यह भी तर्क है कि अल्पसंख्यक संस्थानों के छात्रों को भी वही गुणवत्ता वाली शिक्षा मिलनी चाहिए जो अन्य विद्यालयों में उपलब्ध है लेकिन सरकार के इन दावों के साथ ही कई गम्भीर सवाल भी उठ खड़े हुए हैं। विपक्ष का कहना है कि यदि उद्देश्य केवल शिक्षा सुधार था तो मदरसा बोर्ड को समाप्त करने के बजाय उसे अधिक सक्षम बनाया जा सकता था। मुस्लिम संगठनों का आरोप है कि सरकार ने बिना व्यापक संवाद के ऐसा कानून लागू किया है, जो अल्पसंख्यकों को संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों की भावना के विपरीत है। उनका कहना है कि प्रशासनिक सुधार के नाम पर धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थानों की स्वायत्तता सीमित की जा रही है। यही कारण है कि यह फैसला केवल शिक्षा व्यवस्था का विषय नहीं रह गया है। यह अब संविधान, अल्पसंख्यक अधिकार, समानता, धर्मनिरपेक्षता और राज्य की भूमिका जैसे व्यापक प्रश्नों से जुड़ चुका है।

क्या बदला है नई व्यवस्था में?
नए कानून के तहत अब राज्य में अलग से मदरसा शिक्षा बोर्ड नहीं होगा। उसकी जगह गठित अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण सभी मान्यता प्राप्त अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की मान्यता, नियमन, निरीक्षण और शैक्षणिक गुणवत्ता की निगरानी करेगा। सरकार के अनुसार यह व्यवस्था किसी एक समुदाय के लिए नहीं बल्कि सभी अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों के लिए समान रूप से लागू होगी।

नई व्यवस्था में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप आधुनिक विषयों को बढ़ावा देने, एनसीईआरटी आधारित पाठ्यक्रम लागू करने, शिक्षकों के प्रशिक्षण, शैक्षणिक गुणवत्ता और संस्थागत जवाबदेही पर विशेष बल दिया गया है। सरकार का कहना है कि मदरसों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को भी विज्ञान, गणित, कम्प्यूटर, अंग्रेजी और व्यावसायिक शिक्षा जैसी सुविधाएं मिलनी चाहिए ताकि वे मुख्यधारा की प्रतिस्पर्धा में पीछे न रह जाएं।
सरकार का यह भी तर्क है कि अलग-अलग संस्थागत ढांचे के कारण कई बार निगरानी और जवाबदेही प्रभावित होती थी। एक समान प्राधिकरण बनने से सभी संस्थानों के लिए समान मानक तय होंगे और किसी प्रकार का भेदभाव भी नहीं रहेगा।

धामी सरकार की वैचारिक राजनीति का नया अध्याय?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले को केवल शिक्षा सुधार के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं होगा। पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखण्ड सरकार ने जिन फैसलों को लागू किया है उन्हें एक क्रम में देखने पर एक अलग तस्वीर उभरती है।

सबसे पहले राज्य ने देश में सबसे पहले समान नागरिक संहिता लागू की। इसके बाद धर्मांतरण विरोधी कानून को और कठोर बनाया गया। अवैध धार्मिक अतिक्रमणों के खिलाफ अभियान चलाया गया। दंगों के दौरान सार्वजनिक सम्पत्ति के नुकसान की भरपाई के लिए सख्त प्रावधान किए गए। अवैध कब्जों और कथित ‘लैंड जिहाद’ के मामलों में भी प्रशासन ने व्यापक कार्रवाई की। अब अल्पसंख्यक शिक्षा व्यवस्था में यह बड़ा बदलाव उसी श्ृंखला की अगली कड़ी माना जा रहा है।

भाजपा इसे ‘समान कानून, समान अधिकार और समान व्यवस्था’ की नीति बता रही है। पार्टी का कहना है कि संविधान सभी नागरिकों को समान अवसर देने की बात करता है, इसलिए शिक्षा व्यवस्था में भी अलग-अलग नियमों की आवश्यकता नहीं है। वहीं विपक्ष का आरोप है कि सरकार लगातार ऐसे मुद्दों को प्राथमिकता दे रही है जिनका सीधा सम्बंध उसकी वैचारिक राजनीति से है और जिनका सबसे अधिक प्रभाव अल्पसंख्यक समुदायों पर पड़ता है। यहीं से यह बहस और गहरी हो जाती है कि क्या उत्तराखण्ड वास्तव में प्रशासनिक सुधारों की नई प्रयोगशाला बन रहा है या फिर वह राष्ट्रीय राजनीति में एक वैचारिक माॅडल के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
संविधान की कसौटी पर कितना मजबूत है यह फैसला?

उत्तराखण्ड सरकार का यह निर्णय जितना राजनीतिक बहस का विषय बना है, उससे कहीं अधिक यह संवैधानिक विमर्श का हिस्सा बन गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत का संविधान अल्पसंख्यकों को केवल धार्मिक स्वतंत्रता ही नहीं बल्कि अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान स्थापित करने और उनका संचालन करने का विशेष अधिकार भी देता है। इसलिए जब भी किसी राज्य सरकार द्वारा अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की संरचना या संचालन में बड़ा बदलाव किया जाता है तो सबसे पहले संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 की चर्चा शुरू हो जाती है।

सरकार का कहना है कि उसने किसी भी समुदाय के शिक्षा संस्थान चलाने के अधिकार को समाप्त नहीं किया है। केवल नियामक व्यवस्था बदली गई है ताकि सभी अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए एक समान मानक लागू हो सकें। दूसरी ओर आलोचकों का तर्क है कि यदि नियमन इतना व्यापक हो जाए कि संस्थानों की स्वायत्तता ही प्रभावित होने लगे तो यह संविधान की मूल भावना के विपरीत माना जा सकता है।

क्या कहता है संविधान?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 29 सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकारों की रक्षा करता है। यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी वर्ग की भाषा, लिपि और संस्कृति को संरक्षित रखा जा सके, वहीं अनुच्छेद 30 धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार देता है। यही अनुच्छेद देश में ईसाई मिशनरी स्कूलों, सिख शिक्षण संस्थानों, मुस्लिम मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक संस्थानों की संवैधानिक नींव माना जाता है। हालांकि यह अधिकार पूर्णतः असीमित नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि राज्य शिक्षा की गुणवत्ता, शैक्षणिक मानकों, शिक्षकों की योग्यता, वित्तीय पारदर्शिता और छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए उचित नियमन कर सकता है लेकिन यह नियमन ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे संस्थान का वास्तविक प्रशासनिक नियंत्रण ही सरकार के हाथों में चला जाए। इसी सीमा रेखा को लेकर आज उत्तराखण्ड का नया कानून चर्चा में है।
सरकार का पक्ष, सुधार, नियंत्रण नहीं
धामी सरकार लगातार यह स्पष्ट कर रही है कि इस कानून का उद्देश्य किसी धार्मिक शिक्षा को समाप्त करना नहीं है। सरकार का कहना है कि मदरसों में धार्मिक शिक्षा पहले की तरह जारी रहेगी लेकिन उसके साथ आधुनिक शिक्षा को भी मजबूत किया जाएगा।

सरकार के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में यह महसूस किया गया कि अलग-अलग संस्थागत ढांचे होने के कारण शिक्षा की गुणवत्ता, मान्यता प्रक्रिया और निरीक्षण व्यवस्था में एकरूपता नहीं थी। कहीं शिक्षकों की कमी थी, कहीं आधुनिक विषय नहीं पढ़ाए जा रहे थे और कहीं छात्रों का भविष्य केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित रह जाता था।

सरकार का दावा है कि नए प्राधिकरण के माध्यम से एनसीईआरटी आधारित पाठ्यक्रम, आधुनिक विषय, डिजिटल शिक्षा, प्रशिक्षित शिक्षक और नियमित मूल्यांकन सुनिश्चित किया जाएगा। इससे अल्पसंख्यक समुदायों के विद्यार्थियों को भी वही अवसर मिलेंगे जो अन्य विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को मिलते हैं।
भाजपा इस फैसले को ‘समान अवसर’ की अवधारणा से जोड़ रही है। उसका कहना है कि जब सभी छात्रों को समान गुणवत्ता वाली शिक्षा मिलनी चाहिए तो अलग-अलग नियामक व्यवस्थाओं की आवश्यकता क्यों होनी चाहिए।

विरोधियों की आपत्तियां क्या हैं?
सरकार के तर्कों के बावजूद विरोध करने वालों के पास भी कई संवैधानिक और व्यावहारिक सवाल हैं। उनका पहला तर्क यह है कि यदि किसी संस्थान को स्थापित करने और संचालित करने का अधिकार संविधान ने दिया है तो राज्य उसकी प्रशासनिक संरचना को कितना बदल सकता है? क्या सरकार यह तय करेगी कि संस्थान कैसे चलेंगे, कौन से नियम अपनाएंगे और किस प्रकार का प्रशासनिक ढांचा होगा?
दूसरी आपत्ति यह है कि मदरसा बोर्ड केवल एक प्रशासनिक संस्था नहीं था बल्कि मुस्लिम समुदाय की शिक्षा व्यवस्था का एक विशिष्ट ढांचा भी था। उसे समाप्त कर एक साझा प्राधिकरण के अधीन लाना समुदाय की संस्थागत पहचान को कमजोर कर सकता है।

कुछ मुस्लिम संगठनों का यह भी कहना है कि यदि सरकार वास्तव में शिक्षा सुधार चाहती थी तो मदरसा बोर्ड का पुनर्गठन किया जा सकता था, उसके अधिकारों और संसाधनों को मजबूत किया जा सकता था। बोर्ड को पूरी तरह समाप्त करना आवश्यक क्यों समझा गया, इसका संतोषजनक उत्तर अभी तक नहीं दिया गया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार प्रशासनिक सुधार की आड़ में लगातार ऐसे निर्णय ले रही है जिनका राजनीतिक संदेश बहुसंख्यक समाज की ओर अधिक जाता है।

क्या अदालत तक पहुंचेगा मामला?
संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस कानून को अदालत में चुनौती दी जाती है तो न्यायालय मुख्य रूप से तीन प्रश्नों पर विचार करेगा। पहला, क्या नया कानून अल्पसंख्यकों के संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने के अधिकार को वास्तविक रूप से प्रभावित करता है? दूसरा, क्या सरकार द्वारा लाया गया नियमन शिक्षा सुधार और सार्वजनिक हित के लिए आवश्यक एवं उचित है? तीसरा, क्या यह कानून सभी अल्पसंख्यक समुदायों पर समान रूप से लागू हो रहा है या व्यवहार में इसका प्रभाव मुख्य रूप से केवल मदरसों पर पड़ रहा है?

यदि अदालत को यह लगे कि सरकार केवल शिक्षा की गुणवत्ता और पारदर्शिता सुनिश्चित कर रही है तथा संस्थानों की मूल स्वायत्तता बनी हुई है तो कानून के टिके रहने की सम्भावना मजबूत होगी लेकिन यदि यह साबित होता है कि नियमन के नाम पर प्रशासनिक स्वतंत्रता अत्यधिक सीमित की जा रही है तो कानून के कुछ प्रावधान न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकते हैं। यही कारण है कि उत्तराखण्ड का यह फैसला आने वाले समय में केवल राजनीतिक मंचों पर ही नहीं बल्कि अदालतों में भी एक महत्वपूर्ण संवैधानिक बहस का विषय बन सकता है।
समान नागरिक संहिता से मदरसा बोर्ड तक, क्या उत्तराखण्ड बन रहा है नए शासन मॉडल की प्रयोगशाला?
यदि उत्तराखण्ड सरकार के पिछले चार-पांच वर्षों के फैसलों को एक-एक करके देखा जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि मदरसा बोर्ड को समाप्त करने का निर्णय कोई अकेला प्रशासनिक कदम नहीं है। यह उन अनेक फैसलों की श्रृंखला का हिस्सा है, जिनके माध्यम से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उत्तराखण्ड को राष्ट्रीय राजनीति में एक अलग पहचान दिलाने की कोशिश की है। भाजपा इसे ‘साहसिक और निर्णायक शासन’ का मॉडल बता रही है जबकि विपक्ष इसे वैचारिक एजेंडे का चरणबद्ध विस्तार कह रहा है।

सबसे पहले उत्तराखण्ड ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू कर देश का पहला राज्य बनने का दावा किया। लम्बे समय तक यह मुद्दा केवल भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र और वैचारिक विमर्श तक सीमित था लेकिन धामी सरकार ने इसे कानून का रूप देकर यह संदेश दिया कि वह केवल घोषणा करने वाली सरकार नहीं बल्कि उसे लागू करने वाली सरकार है। इसके बाद राज्य ने धर्मांतरण विरोधी कानून को और अधिक कठोर बनाया। सरकार ने कहा कि छल, प्रलोभन या दबाव के माध्यम से होने वाले धर्मांतरण को रोकना आवश्यक है। दूसरी ओर विपक्ष ने आरोप लगाया कि इस कानून के कारण कई निर्दोष लोगों को भी संदेह के दायरे में लाया जा सकता है और इसका दुरुपयोग होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

इसी अवधि में तथाकथित ‘लैंड जिहाद’ के नाम पर सरकारी भूमि और वन भूमि पर बने अवैध धार्मिक ढांचों के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया गया। सरकार का कहना था कि कार्रवाई किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं बल्कि अवैध अतिक्रमण के विरुद्ध थी। हालांकि विरोधियों ने आरोप लगाया कि कार्रवाई का प्रभाव मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय पर अधिक दिखाई दिया जिससे सरकार की मंशा पर सवाल उठे।

दंगों और सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों से क्षतिपूर्ति वसूलने की नीति, सरकारी नौकरियों में नकल विरोधी कानून, सख्त भू-कानून की दिशा में पहल, और अब अल्पसंख्यक शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव, इन सभी निर्णयों ने मिलकर धामी सरकार की एक ऐसी राजनीतिक छवि बनाई है जो खुद को ‘निर्णायक सरकार’ के रूप में प्रस्तुत करती है।

क्या उत्तराखण्ड बन रहा है भाजपा की वैचारिक प्रयोगशाला?
राजनीतिक विश्लेषकों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि उत्तराखण्ड अब केवल एक पहाड़ी राज्य नहीं रह गया है। भाजपा यहां उन नीतियों को लागू कर रही है जिन्हें वह भविष्य में राष्ट्रीय स्तर पर भी अपने शासन माॅडल के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है।

यह संयोग नहीं माना जा रहा कि समान नागरिक संहिता, धर्मांतरण कानून, मदरसा व्यवस्था में बदलाव, अतिक्रमण विरोधी अभियान और समान प्रशासनिक व्यवस्था जैसे मुद्दे वर्षों से भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वैचारिक एजेंडे का हिस्सा रहे हैं। उत्तराखण्ड में इन्हें कानून और प्रशासनिक निर्णयों के रूप में लागू कर पार्टी अपने समर्थक वर्ग को यह संदेश भी दे रही है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो इन मुद्दों पर निर्णय लिए जा सकते हैं।

भाजपा नेताओं का तर्क है कि इन फैसलों का धर्म से कोई सम्बंध नहीं है। उनका कहना है कि राज्य केवल संविधान के उस सिद्धांत को लागू कर रहा है जिसके अनुसार कानून की नजर में सभी नागरिक समान हैं। पार्टी के अनुसार यदि अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं बनी रहेगी तो समानता का उद्देश्य अधूरा रहेगा।

इसके विपरीत विपक्ष का कहना है कि सरकार समानता की अवधारणा को चुनिंदा मुद्दों पर लागू कर रही है। उनका आरोप है कि जिन विषयों का सीधा संबंध अल्पसंख्यक समुदायों से है, उन्हीं पर सबसे अधिक
राजनीतिक सक्रियता दिखाई जा रही है। इसलिए इन निर्णयों को केवल प्रशासनिक सुधार कहना वास्तविकता का अधूरा चित्र प्रस्तुत करना होगा।

क्या बदलेगा अल्पसंख्यक शिक्षा का स्वरूप?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस कानून का सबसे बड़ा प्रभाव आने वाले वर्षों में दिखाई देगा। यदि सरकार अपने दावे के अनुसार आधुनिक शिक्षा, प्रशिक्षित शिक्षक, विज्ञान, गणित, कम्प्यूटर शिक्षा और बेहतर अधोसंरचना उपलब्ध कराने में सफल रहती है तो मदरसों में पढ़ने वाले हजारों छात्रों के लिए रोजगार और उच्च शिक्षा के अवसर बढ़ सकते हैं लेकिन यदि सुधार केवल प्रशासनिक नियंत्रण तक सीमित रह गए और शैक्षणिक निवेश नहीं बढ़ा तो आलोचकों के आरोप मजबूत हो सकते हैं कि यह कदम शिक्षा सुधार से अधिक संस्थागत नियंत्रण का माध्यम था।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि उत्तराखण्ड में मदरसों की संख्या उत्तर प्रदेश या पश्चिम बंगाल जैसी नहीं है। इसलिए यहां इस प्रयोग को लागू करना अपेक्षाकृत आसान माना जा रहा है। यदि यह मॉडल सफल होता है तो भविष्य में अन्य भाजपा शासित राज्यों में भी इस प्रकार की व्यवस्था लागू करने की मांग उठ सकती है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इस कानून पर गहरी नजर रखी जा रही है।

राजनीति से आगे बढ़कर सामाजिक प्रभाव
इस फैसले का प्रभाव केवल कानून की किताबों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर समाज में सरकार और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच विश्वास के स्तर पर भी पड़ेगा। यदि सरकार सभी समुदायों के शिक्षण संस्थानों के साथ समान व्यवहार करती है, पारदर्शी ढंग से नियम लागू करती है और धार्मिक शिक्षा में अनावश्यक हस्तक्षेप से बचती है तो यह व्यवस्था शिक्षा सुधार का उदाहरण बन सकती है लेकिन यदि व्यवहार में किसी एक समुदाय को यह महसूस होता है कि नियमों का प्रयोग उसके खिलाफ अधिक किया जा रहा है तो सामाजिक अविश्वास बढ़ने की आशंका भी बनी रहेगी। इसलिए इस कानून की वास्तविक सफलता केवल उसके प्रावधानों से नहीं बल्कि उसके निष्पक्ष और समान क्रियान्वयन से तय होगी।

यही वजह है कि मदरसा बोर्ड समाप्त करने का यह निर्णय उत्तराखण्ड के प्रशासनिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। यह केवल एक बोर्ड का पुनर्गठन नहीं बल्कि शासन की उस नई सोच का प्रतीक है जिसमें सरकार ‘एक राज्य, एक व्यवस्था’ की अवधारणा को शिक्षा क्षेत्र तक भी विस्तारित करती दिखाई दे रही है।
देश के दूसरे राज्यों पर क्या पड़ेगा असर और क्या होगा आगे?

उत्तराखण्ड का यह फैसला केवल राज्य की सीमाओं तक सीमित रहने वाला नहीं है। जिस प्रकार समान नागरिक संहिता लागू करने के बाद उत्तराखण्ड राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया था, उसी प्रकार मदरसा बोर्ड को समाप्त कर अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए एक समान प्राधिकरण की व्यवस्था लागू करने का निर्णय भी अन्य राज्यों की राजनीति और नीतियों को प्रभावित कर सकता है। विशेष रूप से वे राज्य, जहां भाजपा की सरकारें हैं, इस माॅडल का अध्ययन कर सकती हैं। यदि उत्तराखण्ड में यह व्यवस्था बिना बड़े विवाद और न्यायिक अड़चन के सफल रहती है तो भविष्य में मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, असम, गुजरात और अन्य भाजपा शासित राज्यों में भी इस तरह की मांग उठ सकती है। दूसरी ओर, विपक्षी दल इसे केंद्र और भाजपा शासित राज्यों की उस व्यापक नीति का हिस्सा बता रहे हैं, जिसके तहत धीरे-धीरे अल्पसंख्यक संस्थाओं की स्वायत्तता कम करने का प्रयास किया जा रहा है। इसलिए यह मुद्दा आने वाले समय में केवल शिक्षा का नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति का भी बड़ा विषय बन सकता है।

2027 के चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक संदेश
राजनीतिक दृष्टि से भी इस निर्णय का महत्व कम नहीं है। उत्तराखण्ड में विधानसभा चुनाव में अभी समय है लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी- अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है। भाजपा की कोशिश यह संदेश देने की है कि उसने वे सभी फैसले लिए हैं जिनकी अपेक्षा उसका समर्थक वर्ग लम्बे समय से करता रहा है। समान नागरिक संहिता, नकल विरोधी कानून, धर्मांतरण विरोधी कानून, अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई और अब मदरसा बोर्ड को समाप्त करने का निर्णय, इन सबको भाजपा अपनी ‘निर्णायक सरकार’ की पहचान के रूप में प्रस्तुत कर रही है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की व्यक्तिगत राजनीतिक छवि भी इन फैसलों से जुड़ गई है। भाजपा के भीतर उन्हें ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया जा रहा है जो कठिन और विवादास्पद निर्णय लेने से पीछे नहीं हटते। यही कारण है कि उत्तराखण्ड के कई फैसलों का उल्लेख अब राष्ट्रीय स्तर पर भी भाजपा के राजनीतिक विमर्श में होने लगा है।

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के सामने चुनौती यह है कि वे इन मुद्दों का विरोध किस आधार पर करें। यदि वे केवल ‘अल्पसंख्यक विरोधी’ कहकर विरोध करते हैं तो भाजपा इसे तुष्टिकरण की राजनीति बता कर पलटवार करती है। यदि वे समर्थन करते हैं तो उनके पारम्परिक राजनीतिक आधार में असहजता पैदा हो सकती है। यही कारण है कि विपक्ष अभी इस मुद्दे पर संतुलित रणनीति अपनाने की कोशिश कर रहा है। अंततः फैसला कानून से नहीं, उसके क्रियान्वयन से होगा। किसी भी कानून का मूल्यांकन केवल उसकी प्रस्तावना से नहीं किया जाता बल्कि यह देखा जाता है कि उसका वास्तविक प्रभाव क्या पड़ता है। उत्तराखण्ड का यह नया कानून भी इसी कसौटी पर परखा जाएगा।

यदि आने वाले वर्षों में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में आधुनिक शिक्षा का स्तर सुधरता है, विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, शिक्षकों का प्रशिक्षण बेहतर होता है और संस्थानों की स्वायत्तता भी सुरक्षित रहती है तो यह निर्णय शिक्षा सुधार के एक सफल माॅडल के रूप में देखा जा सकता है लेकिन यदि यह धारणा बनती है कि प्रशासनिक निगरानी के नाम पर संस्थानों की स्वतंत्रता सीमित की जा रही है, धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान प्रभावित हो रही है या नियमों का प्रयोग निष्पक्ष नहीं है तो यह कानून लम्बे समय तक राजनीतिक और न्यायिक विवाद का विषय बना रहेगा। इसलिए इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह नहीं है कि सरकार क्या दावा कर रही है या विपक्ष क्या आरोप लगा रहा है। असली प्रश्न यह है कि जमीन पर यह व्यवस्था कैसे लागू होती है और उसका लाभ वास्तव में विद्यार्थियों तक पहुंचता है या नहीं। मदरसा बोर्ड को समाप्त करने का उत्तराखण्ड सरकार का निर्णय निश्चित रूप से राज्य के शिक्षा इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। इसे केवल एक प्रशासनिक बदलाव या केवल एक राजनीतिक कदम कह देना दोनों ही स्थितियों में अधूरा आकलन होगा। इस फैसले में शिक्षा सुधार की मंशा भी दिखाई देती है और वैचारिक राजनीति की छाया भी। सरकार इसे समानता, पारदर्शिता और आधुनिक शिक्षा की दिशा में उठाया गया कदम बता रही है जबकि आलोचकों को इसमें अल्पसंख्यक संस्थानों की स्वायत्तता पर बढ़ते सरकारी नियंत्रण की आशंका दिखाई देती है।
सच्चाई सम्भवतः इन दोनों ध्रुवों के बीच कहीं है। संविधान राज्य को शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने का अधिकार देता है लेकिन वही संविधान अल्पसंख्यकों को अपने शिक्षण संस्थान स्थापित करने और उनका संचालन करने का विशेष अधिकार भी प्रदान करता है। लोकतंत्र की कसौटी यही होगी कि सरकार इन दोनों उद्देश्यों के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित करती है।

उत्तराखण्ड ने एक नया प्रयोग शुरू किया है। यह प्रयोग भविष्य में शिक्षा सुधार का आदर्श माॅडल भी बन सकता है और संवैधानिक बहस का बड़ा विषय भी। इसका उत्तर राजनीतिक भाषणों से नहीं बल्कि आने वाले वर्षों में इसके निष्पक्ष क्रियान्वयन, न्यायिक समीक्षा और सबसे बढ़कर उन हजारों विद्यार्थियों के भविष्य से मिलेगा, जिनके जीवन पर इस निर्णय का सीधा प्रभाव पड़ने वाला है। इसी कारण यह निर्णय केवल उत्तराखण्ड का नहीं बल्कि पूरे देश के लिए एक ऐसी नीति-परीक्षा बन गया है, जिस पर आने वाले वर्षों में सरकारों, न्यायपालिका, शिक्षाविदों और समाज, सभी की निगाहें टिकी रहेंगी।

बात अपनी-अपनी
एक जुलाई को उत्तराखण्ड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का शुभारम्भ हो गया है। अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों के लिए प्राधिकरण ने धार्मिक सिलेब्स तैयार कर दिया है। इसे तैयार करने के लिए हर धर्म की अलग-अलग कमेटी गठित की गई थी। हर अल्पसंख्यक धर्म का धार्मिक सिलेब्स तैयार होने के बाद उसके वेरिफिकेशन के लिए धर्मगुरुओं और विशेषज्ञों को बुलाया गया था। जिनके सुझाव के आधार पर कमियों को दूर करते हुए प्राधिकरण की वेबसाइट पर धार्मिक सिलेब्स को अपलोड कर दिया गया है। धार्मिक सिलेब्स अनिवार्य नहीं है बल्कि बच्चों के लिए आॅप्शनल रखा गया है। ऐसे में जो बच्चा पढ़ना चाहता है, वो पढ़ सकता है। शिक्षा विभाग से बकायदा अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों को शिक्षण की मान्यता मिलेगी जबकि राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण से धार्मिक और अल्पसंख्यक की मान्यता मिलेगी। यानी इस प्राधिकरण से मान्यता लेने पर वो संस्थान अल्पसंख्यक संस्थान बन जाएगा।
डाॅ. सुरजीत सिंह, अध्यक्ष, राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण, उत्तराखण्ड’

उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण को अल्पसंख्यक समुदाय कितना एक्सेप्ट कर रहा है इसको इससे समझा जा सकता है कि उत्तराखण्ड में पंजीकृत 452 मदरसे है, जिसमें से 158 मदरसों ने शिक्षा विभाग से मान्यता प्राप्त करने के लिए पहले दिन ही आवेदन कर दिया था। जिनमें से एक जुलाई को 7 मदरसे, 1 सिख समुदाय का स्कूल और एक जैन समुदाय का स्कूल शामिल है। अभी तक काफी मदरसों की ओर से पोर्टल पर आवेदन किया जा चुका है। ऐसे में शिक्षा विभाग के जो मानक हैं, उनके आधार पर शिक्षा विभाग की ओर से इन सभी मदरसों का फिजिकल वेरिफिकेशन किया जा रहा है। जो मदरसे मानकों पर खरे उतरेंगे उनको मान्यता दी जाएगी लेकिन जो मानकों पर खरे नहीं उतरेंगे उनको मानकों के अनुरूप व्यवस्थाएं मुकम्मल करने के लिए एक तय समय-सीमा दी जाएगी।
डाॅ. पराग मधुकर धकाते, विशेष सचिव, उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक कल्याण विभाग

उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के माध्यम से मदरसों के लिए नई प्रणाली लागू तो कर दी गई है लेकिन इससे कई व्यावहारिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। खासतौर पर यदि किसी संस्था को दो अलग-अलग विभागों से मान्यता लेनी होगी तो दोनों के नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करना कठिन हो सकता है। इससे मदरसा संचालकों के सामने प्रशासनिक जटिलताएं बढ़ेंगी और शिक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। दूसरा यह कि धार्मिक शिक्षा के स्वरूप में यह अनावश्यक हस्तक्षेप माना जाएगा। कुरआन, बाइबिल, गुरु ग्रंथ साहिब जैसी धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन का एक निर्धारित स्वरूप होता है, जिसे बदलना या उस पर नियंत्रण स्थापित करना तानाशाहीपूर्ण माना जाएगा। ऐसे में प्राधिकरण द्वारा पाठ्यक्रम निर्धारित करने की बाध्यता धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों के खिलाफ मानी जा सकती है। उत्तराखण्ड सरकार से हमारा आग्रह है कि ऐसा संतुलित समाधान
निकाला जाए, जिसमें संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक अधिकारों और शिक्षा व्यवस्था तीनों के बीच सामंजस्य स्थापित हो सके।
इमरान प्रतापगढ़ी, राज्यसभा सांसद

राज्य सरकार ने उत्तराखण्ड मदरसा शिक्षा व्यवस्था को समाप्त कर उत्तराखण्ड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के माध्यम से मदरसों के लिए नई व्यवस्था लागू कर दी है। उत्तराखण्ड में मदरसा बोर्ड का गठन वर्ष 2012 में हुआ था। उससे पहले भी प्रदेश के मदरसे स्वतंत्र रूप से संचालित होते रहे हैं। समाज के सहयोग से धार्मिक और नैतिक शिक्षा का कार्य लम्बे समय से चलता रहा है। ऐसे में यह मानना उचित नहीं होगा कि मदरसों का अस्तित्व केवल मदरसा बोर्ड पर निर्भर रहा है। इस विषय को केवल प्रशासनिक सुधार के रूप में नहीं देखा जा सकता क्योंकि यह सीधे तौर पर धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के शैक्षिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25, 26, 29 और 30 में स्पष्ट है कि संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन, आचरण और प्रचार करने का अधिकार देता है। साथ ही धार्मिक एवं भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और संचालन का विशेष संरक्षण भी प्रदान करता है। धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाले संस्थानों की प्रवृत्ति सामान्य विद्यालयों से अलग होती है। इसलिए उन पर सामान्य शिक्षण संस्थानों की तरह सभी नियमों को समान रूप से लागू करना व्यावहारिक और न्यायसंगत नहीं माना जा सकता है।
शहजाद, विधायक लक्सर हरिद्वार

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